ये कैसा शहर है कि यहाँ बुत भी है परेशां
दिल है पत्थर का और शीशे का है आशियाँ
हर मजार पर रौशन है चमकता रहता है
और मन ही मन इन्शां दहकता रहता है
वो खड़ा है लूटने फ़क़ीर को हर मोड़ पर यहाँ
इन्शां के शक्ल में भेड़िए बच के जाओगे कहाँ
दरख़्त की छाहँ भी किसी के जागीर में बसती है
इस शहर में "धरम" कहाँ किसी इन्शां की हस्ती है
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