Wednesday, 7 March 2018

चंद शेर

1.
हर हवा के सामने "धरम" मेरा ही चिराग़ है
हाँ मगर इसमें मेरे जलते लहू की आग है

2.
हमारे दरम्या बात वफ़ा की कब थी जो था परस्पर का सहारा था
कि न कभी तुम ही हमारे थे 'धरम' और न ही मैं कभी तुम्हारा था

3.
कि हो पंख उड़ो तब गरुड़ सदृश औ" बोलो तो निकले दहाड़
हर हीन भावना पर "धरम" तुम खुलकर करो प्रचंड प्रहार

4.
कि अब बताओ तेरे लिए कौन सी गली बाकी है कौन सा द्वार बाकी है
ये भी बताओ "धरम" की तेरे बुलंद हौशले का कितना पारावार बाकी है

5.
वसीयत के नाम पर स्थाई ज़ख्म मिला औ" मिली कई तस्वीर
जब भी ज़माने से किया नेकी "धरम" अपने हिस्से आया जंज़ीर

6.
सब ताज़ उछाले जाएँ सब तख्त गिराए जाएँ
सारे चेहरों से "धरम" अब नक़ाब हटाए जाएँ

7.
इस सुकूँ के बाद "धरम" अब बाकी कोई सुकूँ नहीं
तुम जब मिल ही गए तो अब बाकी कोई जुनूँ नहीं

8.
एक ही रास्ता एक ही मंज़िल औ" दरम्याँ हमारे कोई फ़ासला भी नहीं "धरम"
फिर न जाने क्यूँ तुम चलते चलते रुक गए थे मैं बोलते बोलते चुप हो गया था

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