Monday, 16 January 2012

मोहब्बत एक बार फिर

मोहब्बत एक बार फिर
मुझको बेजाँ कर गया
हसरत दिल की पूरी भी न हुई
वह फिर रूठ कर गया

नैन भर देखा भी न था
वह फिर ओझल हो गया
सासें थम सी गई
मन उदास हो गया


एक हूँक सी उठी
थोड़ी बेचैनी भी हुई
कुछ ज़ख्म भी दिए
थोडा दर्द भी हुआ

कुछ सवाल उसके चेहरे पर भी था
जो मुझको जबाब दे गया
खुद बे- करार होकर
मुझको बेक़रार कर गया

Monday, 9 January 2012

धरती का स्वर्ग

पुरखों द्वारा बनवाए खपरैल के एक कमरे में
फर्श पर चटाई बिछाकर मैं लेटा हुआ था
दिन के दोपहर में खपरैल के बीच के छिद्र से
सूरज की कुछ मोटी तीब्र किरणे फर्श पड़ रही थी
जिसमे धूल के कण स्पष्ट दिखाई दे रहे थे
बर्षों पहले बचपन में कभी उसी कमरे में
पिताजी के साथ बैठकर सूर्य- ग्रहण देखा करता था

कमरे के दीवार से सटाकर
काठ का एक पुराना आलमीरा रखा था
मैंने उस आलमिरे को खोलकर देखा
एक खाने में अब भी मेरे स्वर्गीय दादाजी के
जरुरत के कपडे और कुछ किताबें रखी थी

दूसरे खाने में तस्वीरों के कुछ एल्बम रखे थे
मैंने उन सारे एल्बम को उठाया और फिर
उस चटाई पर बैठकर तस्वीरें देखने लगा
उनमे कुछ तस्वीरें मेरे जन्म के पहले की भी थी
पुरानी यादें मानस पटल पर सचित्र दस्तक दे रही थी
बड़ा अद्भुत लग रहा था  

सूरज के किरणों की तीब्रता धूमिल हो चली थी
किरणें अब फर्श के बजाए दीवारों पर पड़ रही थी
मेरा व्यथित मन बड़ा ही शांत हो गया था
मुझे स्वर्ग के आनंद की अनुभूति हो रही थी
हाँ, सचमुच वह धरती का स्वर्ग ही तो है
जहाँ पुरखों की स्मृति बसती है.

Friday, 30 December 2011

हाय रे सरकार...

अर्पित बलि पर है मानव का सुविचार 
फिर क्यूँ ख़त्म हो यह भ्रष्टाचार
चलते रहने दो यू ही व्यभिचार
मत करो इस पर पुनः विचार
हाय रे सरकार,   हाय रे सरकार...

मंत्री ही करे जनता पर अत्याचार
फिर करे संसद में भी विचार
और कहे बंद करो यह भ्रष्टाचार
हम सब लड़ने को हैं तैयार
हाय रे सरकार,   हाय रे सरकार...

मंत्री ही रखवाते हैं अबैध हथियार
करवाते हैं मानव जीवन का व्यापार
कभी जाने जाती हैं, कभी मानवता होती है शर्मशार
और फिर कहते हैं, उनके हैं अद्भुत विचार
हाय रे सरकार,   हाय रे सरकार...

Thursday, 15 December 2011

वह अब भी जवां था...

अपनी ही सूरत देखकर हैरां हो गया
आइना देखा और फिर परेशां हो गया
चेहरे पर पड़ी झुर्रियां भी ढीली हो गई
लब्ज़ भी कुछ लडखडा सा गया
एक आह! सी निकली जुबां से
हाय! क्या उसका चेहरा हो गया


वह चेहरा जिसे कभी
ओस की बूंद पिलाता था
चन्दन का लेप लगता था
कभी गुलाब जल में रुई भिंगो कर रगड़ता था
तो कभी मर्द पार्लर में संजोता था
और न जाने क्या क्या करता था

फिर एहसास हुआ उसे अपने बुढ़ापे का
मगर जब उसने अपने दिल से पूछा
तो उत्तर कुछ और ही पाया
फिर वह शरमाया, घबराया, बलखाया
और फिर बीते लम्हों को
पुनः जिंदा करने के लिए चल पड़ा
उन्हीं गलिओं में, उन्हीं सड़कों पर ........ 

Monday, 28 November 2011

बर्षों पहले जब कभी

बर्षों पहले जब कभी मैं
अपने आँगन के धुल में लेट कर
माँ माँ कहकर पुकारता था
तब माँ अपने आँचल से
मेरे बदन पर लगे धुल को झाड़ती थी
और फिर धुल लगे उस आँचल को
अपने कमर में लपेट लेती थी


बर्षों पहले जब कभी मैं
पिताजी की ऊँगली पकड़ कर स्कूल जाता था
और गर्मी के दिनों में जब
वो छाता लेना भूल जाते थे
तब वो मुझसे कहते थे
कि तुम मेरे परछाही में चलो
तुम्हे धुप नहीं लगेगी 

Wednesday, 23 November 2011

मंजिल का पता

जब उसने अपने मंजिल का पता पूछा
फिर से वही सड़क पाया
फिर से वही गली पाया
फिर से वही मकां पाया

जिसके साथ वह जीवन के सपने बुनता था
कभी संग चलता था, कभी रंग भरता था
और फिर कभी उसकी बाहों में सर रख कर
बिलकुल खामोश हो जाता था

ऐसा हो ...

ऐसा हो
मेरे जीवन में
तुम फिर रंग भरो
कभी शर्माओ
कभी घबराओ
कभी मुस्काओ
कभी इठलाओ
कभी बलखाओ
कभी सज कर आओ

ऐसा हो
तुम फिर
मुलाकात करो
कुछ बात करो
सौगात करो
जज्बात भरो

ऐसा हो
तुम फिर
उस बाट चलो
उस घाट चलो
छप छप करते पानी पर
पनघट के उस पर चलो
भीगी हुई उस रेत पर
मुझ जैसा एक मूरत गढ़ों
फिर उसके दिल में
तुम आपना नाम भरो

ऐसा हो
तुम फिर
इकरार करो
इज़हार करो
प्यार करो
मुझको अपने अंक भरो 

ऐसा हो...  

Monday, 21 November 2011

टूटते रिश्ते ...

एक टूटा पुराना रिश्ता
जिसे फिर से जोड़ा गया था
जिसके गाँठ स्पष्ट दिखाई दे रहे थे
अब उस रिश्ते की गिरह भी
ढीली हो चली है
बीते हुए लम्हों की कसक भी
तमाम यादों को दफनाकर
ठंढी हो चली है

वो हवाएँ जो अपने साथ
ढेर सारी खुश्बू समेटकर लाती थी
अब इधर नहीं आती
कि उसके भी रुख अब
बदले-बदले से नज़र आते हैं

वह ख़ामोशी
जो नर्म साँसों कि गर्माहट में
कभी सुकूं देती थी
अब दर्द-ए-बेजुबाँ हो गई है

Tuesday, 15 November 2011

चंद लम्हे


1.

      बादल के कुछ टुकड़े आसमां में छाये थे
      एक चांदनी रात थी,वो मुझसे मिलने आये थे
      फूलों कि खुश्बू थी,कुछ सितारे भी छाये थे
      हम कुछ दूर-दूर बैठे थे, वो फिर भी हमारे थे

2.


देर से ही सही मेरी याद तो आई
रफ्ता-रफ्ता तू करीब तो आई
ये तेरी मोहब्बत है या ज़रूरत
मुझे पता नहीं ए दिल-ए-हुकूमत
बस सुकूं सिर्फ इतना है
कुछ पल के लिए ही सही
तुम्हे मेरी याद तो आई

मुझे मत छेड़ो

मेरी जां मुझे और न छेड़ो
इल्जाम तेरे ही सर जायेगा
टूटे हुए को और न तोड़ो
वरना वह और बिखर जायेगा

वह शख्स जो जिंदा दिल था
बड़ी प्यारी बातें करता था
उसकी बातें अब बेजां हो गई
वह गुफ्तगू भी अब बेजुबां हो गई

उसे मिला तेरी चाहत का सिला
उसके सपने टूटे वह हुआ बावला
उसके अपने छूटे सबसे हुआ फासला
और फिर मिला तुमसे भी गिला

रहने दे उसे अपने हाल पर
न तुम उससे कोई सवाल कर
करना हो तो बस इतना ख्याल कर
कि रहने दे उसे अपने हाल पर