Thursday, 5 June 2014

रिश्ता

मेरे रिश्ते को धागों से मत बांधो
खुला रहने दो सैर करने दो आसमाँ में
झुक कर चूम लेने दो ज़मीं को
घुलकर बहने दो नदी में कहीं संगम हो जाए

बहने दो इसे हवा के साथ स्वछन्द
कस कर खींचो स्वांस कहीं क्षणिक मिलन हो जाए
और कर पाये महसूस तुम्हारी धड़कन को
स्वांस का आना-जाना तो यूँ हीं लगा रहता है

ग़र तुम पलटो वरक मेरे दिल का
मिलेंगे आड़ी-तिरछी रेखाएं तेरे हथेली की
और उसके साथ मिलेगा कुछ महफ़ूज़ यादें
जिसे वक़्त ने धुंधला कर दिया है 

Wednesday, 28 May 2014

ऐ साक़ी !

चला जो तीर-ए-नज़र हर एक दिल घायल हुआ
उसके महफ़िल का हर एक दीवाना कायल हुआ

इस बाजार-ए-हुस्न में हर कोई है दिलफ़रोश
बेनकाब साक़ी और मय अब कहाँ किसे है होश

साक़ी का तक्खल्लुस भी यहाँ होता है दिलसाज़
गर वो हो मेहरबाँ तो कैसा होगा वो दिलजू अंदाज़

उसके आने से ये महफ़िल हो गया दीवान-ए-खास
मेरा दर्द-ए-दिल "धरम" अब हो गया तह-ए-ख़ाक 

Saturday, 17 May 2014

सियासत का खेल

सियासत का खेल कितना नंगा था
मुद्दा वज़ीरों का सिर्फ दंगा था

जो बन जाएगी दूसरी सरकार
हर ओर होगी क़त्ल औ' हाहाकार

एक के बाद एक सब लग गए तुष्टिकरण में
मुद्दा भ्रष्टाचार औ' मानवता उड़ गया गगन में

लगे बस ठोकने ताल कि हम ही हैं तुम्हारे रक्षक
बाकि सब तो हैं राक्षस औ' तुम्हारे भक्षक

डराकर मानव को दानव ही तो जीता है
कोई मानव कहाँ किसी का लहू पीता है

खुद देकर ज़ख्म आरोप किसी और सर मढ़ दिए
जो न माने बात तो खुलेआम सीने पर चढ़ गए

डराए धमकाए और क़त्ल भी करवाये
और रखे हैं अरमान कि लोग उन्हें ही अपनाये

लिया धरा पर जन्म तो जीवन पर अधिकार सिद्ध है
एक बार खुद भी तो परखें कि कौन गरुड़ कौन गिद्ध है

मानव से मानव को तोडना एक राक्षशी प्रवृत्ति है
मिलाकर जो चल सके सबको उसी की राष्ट्र में भक्ति है

जय हिन्द जय भारत

Wednesday, 14 May 2014

अखंड हिन्दुस्तान

जय बोलो श्री राम की जय बोलो गुरु परशुराम की
जय बोलो बजरंग की जय बोलो अब संघ की

जय बोलो उपनिषद् की जय बोलो अब परिषद् की
जय बोलो श्री श्याम की जय बोलो अब आवाम की

जय बोलो माँ दुर्गा की जय बोलो माँ काली की
जय बोलो सत्कर्म की जय बोलो सनातन धर्म की

जय बोलो रणचंडी की जय बोलो माँ भारती अखंडी की
जय बोलो राष्ट्र-गाण की जय बोलो अखंड हिंदुस्तान की   

Saturday, 3 May 2014

तुम और रकीब

तुम आए जीने का तहजीब आ गया
मैं खुद भी अपने करीब आ गया

कब धड़का था दिल मेरा यूँ इस तरह
कि हर धड़कन पर मैं तेरे करीब आ गया

जो मैंने बढ़ाया हाथ तो तुम गले भी मिले
औ' ज़माने की खुशियाँ मेरे नसीब आ गया

तेरे इश्क़ का दरिया था मैं उतरा औ' डूबा भी
महज़ चंद डुबकियों में ही एक ताकीद आ गया

हर कोई मुकद्दर का सिकंदर कहाँ होता "धरम"
अगली मुलाक़ात में ही साथ उसके रकीब आ गया  

Friday, 18 April 2014

ज़माने की मिशाल

मैं झुका भी और हर जोड़ से टूटा भी
मगर ज़माने को कभी खुश न कर सका 

Saturday, 12 April 2014

देते हो

करवाके क़त्ल ख़ुदकुशी का नाम देते हो
तुम तो जुर्म को भी नया आयाम देते हो

हर रोज नए गिरह बांधते हो खोलते भी हो
घोलकर ज़हर इंसानियत का नाम देते हो

हम तो ज़माने से जमीं पर रहने के शौक़ीन हैं
कुछ वक़्त के लिए क्यों आसमाँ की ऊडॉं देते हो

हमने सोचा तेरे आने से मुकद्दर जाग जायेगा
तुमतो आकर सोये मुकद्दर को भी मार देते हो

हवा देकर आपसी रंजिश को तुम "धरम"
हमें भीड़ में भी डर तन्हाई का दिखा देते हो

Tuesday, 8 April 2014

बना रखा है

अनगिनत ज़ख्म सीने में छुपा रखा है
हरेक दर्द को मैंने धड़कन से लगा रखा है

हरेक रिश्ता यहाँ पोसीदः होकर टूट गया है
फिर भी उससे भरम इख़लास का बना रखा है

अश्क़ का दरिया था अब सूखकर क़तरा हो गया है
आखों में उसके आने का ख्वाब अब भी छुपा रखा है

मुझसे बिछड़कर वो कुछ इसकदर रूठा है "धरम'
कि रुठने का वो अपना नया अन्दाज़ बना रखा है 

Friday, 4 April 2014

अच्छा नहीं लगता

हर रोज टूटना बिखरना अच्छा नहीं लगता
किसी को बार-बार मनाना अच्छा नहीं लगता

माना कि उससे रंजिश नई है मगर प्यार तो पुराना है
यकायक मिलें तो नज़र झुकाके निकलना अच्छा नहीं लगता

सुना है कि ऊपर वाला तंग दिल नहीं होता "धरम"
करम ख़ुदा का ग़र मुवाज़ी न बरसे तो अच्छा नहीं लगता


मुवाज़ी : बराबर-बराबर


Tuesday, 1 April 2014

चंद शेर

1.
तुम मुझे दर्द दो तो ज़िंदगी का एहसास हो जाए
हर वक़्त हर लम्हा अब मेरे लिए खास हो जाए

2.
यहाँ कोई नहीं जो मेरे दर्द-ए-दिल कि दवा करे
मैं जब भी गर्दिश में रहूँ वो मेरे लिए दुआ करे

3.
ये दर्द तो अपना है मगर ख्याल किसका है
जवाब तो मैं खुद हूँ मगर सवाल किसका है

4.
ग़र दिल न मचले तो धड़कने का सबब क्या है
मेरा साथ है तो फिर रूठने का मतलब क्या है