Saturday, 26 December 2015

इसके पहले भी

हम तो लुट चुके हैं तेरे यारी से पहले भी
और कई ख़ुमारी थी इस ख़ुमारी से पहले भी

इश्क़ में फ़ना हुआ औ" कई बार दिल गया
मेरी जाँ गई थी इस जाँनिसारी से पहले भी

लब खुले तेरी चर्चा चली औ" सीना भर आया
हुआ था इश्क़ इस ज़िक्र-ए-यारी से पहले भी

अदब की महफ़िल थी औ" करम बरस रहा था
और भी पाई थी शोहरत इस ज़रदारी से पहले भी

किसी का ज़ख्म भरा औ" कुछ बीमार हुए "धरम"
और भी अदाएं थी तुझमें इस अदाकारी से पहले भी



Thursday, 12 November 2015

खंड-खंड

काल यह प्रचंड है हर मस्तक खंड-खंड है
दुर्ग जो अभेद्य था वहाँ बह रहा अब मुंड है  

Monday, 9 November 2015

कोई बात न होती है

अब न तो ख्वाब में मुलाकात ही होती है
औ" पड़ जाए सामने तो बात न होती है

ख्यालों की दुनिया से निकल गया हूँ मैं
ज़िंदगी में अब कभी चांदनी रात न होती है

मैं जब से लुटा हूँ बस तन्हा ही जी रहा हूँ
मुफ़लिस के साथ कभी बारात न होती है

ऐ! मौला ज़िंदगी के बोझ से दब गया हूँ मैं
आह! भरूँ तो उसमे भी जज़्बात न होती है

मैं जहाँ रहता हूँ वहां तो हर कोई मतलबी है
"धरम" मेरी किसी से कोई बात न होती है

Saturday, 3 October 2015

ज़माने से नेकी कर

तुम्हें ग़र खुद पर यकीं है तो औरों पर भी यकीं कर
तू दिल से निकाल दे रंजिश औ" ज़माने से नेकी कर

इंसान ग़र खुश हो किसी से तो ख़ुदा भी मुस्कुरा देता है
कर के दीदार-ए-नज़र तुम सारे ज़माने को ख़ुशी कर

गहरे ज़ख्म का जायका हर किसी के नसीब में नहीं होता
ये नसीब तुम्हें ख़ुदा ने बख़्शा है तू इसे जी औ" मस्ती कर

न हो सके कोई तुझ से छोटा औ" न तुम रहो किसी से बड़ा
करना हो तो ज़माने में तुम "धरम" ऐसी अपनी हस्ती कर 

Friday, 2 October 2015

गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का अनर्गल प्रलाप

गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का अनर्गल प्रलाप
खुद देकर ज़ख्म करते घड़ियाली विलाप

आरक्षण राग का तुम तो खूब करते अलाप
मुफ़लिस तो अब भी कर ही रहे हैं बाप-बाप

सरकारी तंत्रों को खाकर तुम लेते भी नहीं डकार
पैसा मुफलिसों का खाकर खुद ही करते हो पुकार
न चलेगा ये अत्याचार! न चलेगा ये अत्याचार!

जो कोई गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देते करके व्यापार
दो साधुबाद उन लोगों को मत करो उनपर प्रहार
क्यों हो जाते हो तुम उसे भी लील लेने को तैयार
जब लील लोगे तुम इसे भी तब उठेगा हाहाकार

क्यों तुम्हारा हर नीत अब हो रहा यहाँ विफल
क्यों हो रहे बुद्धिजीबी हर कदम पर असफल
जब परोसोगे हर थाली में तुम यहाँ विष-फल
तो कैसे उगेगा वह वृक्ष जो जनेगा अमृत-फल

हैं प्रार्थना तुमसे अब मत ज़ुल्म कर शिक्षा पर
बना ऐसा तंत्र कि दीपक ज्ञान का जले हर घर
न हो हर किसी के घर में कभी भी अँधेरा प्रखर

Thursday, 24 September 2015

क्या नाम दूँ

जो फिर तुमने तोड़ा था उसे मैंने जोड़ दिया
भटकते रिश्ते को मैंने फिर नया मोड़ दिया

रिश्ता कितना मुकम्मल है इसे क्या नाम दूँ
इन बातों पर मैंने तुमसे उलझना छोड़ दिया

दिल को जितना जलना था उतना जल चुका है
दिल में मैंने इश्क़ का दीया जलाना छोड़ दिया

मुफ़लिस के कब्रगाह पर हुस्न नीलाम हो रहा है
"धरम" अब ख़ुदा यहाँ इन्सां बनाना छोड़ दिया 

Wednesday, 16 September 2015

चंद शेर

1.
हर कदम पर शिकस्त खाई हर मंज़िल पर मिली मौत
ज़िंदगी! तुमने रास्ता औ" बुलंदी भी बहुत खूब दिखाई

2.
कल तक जो रुस्वा था आज दामन-ए-पाक हो गया
ऐ! सियासत तेरे दर पर इंसानियत हलाक़ हो गया

3.
"धरम" जरा सी बात थी औ" इसके अफ़साने बन गए
जो मैंने खाई शिकस्त तो कितने और दीवाने बन गए

4.
ऐ ज़िंदगी तू मोहब्बत के सिवा हर रंग से गुजरी है
औ" मेरे आशियाने के अलावा तू हर जगह ठहरी है

5.
न तो ग़म-ए-हिज़्र का सवाल था न दर्द-ए-दिल का मलाल था
अब फिर उसे चाहने का "धरम" न तो ख्वाब था न ख्याल था

6.
तुमसे मिला तो जीने का अंदाज़ यूँ बदल गया
जो पहले ख्वाब था अब एक सवाल बन गया 

Monday, 7 September 2015

डराया गया मुझे

हर बार किताब-ए-अमन दिखाकर डराया गया मुझे
ज़ख्मों पर अनगिनत ज़ख्म देकर सताया गया मुझे

जो बात मोहब्बत की थी मोहब्बत से सुलह हो जाती
फिर क्यूँ सर-ए-आम आग में ज़िंदा डुबाया गया मुझे

मैं प्यासा मुसाफिर था मुझे गले की प्यास बुझानी थी
छोटी सी जरुरत पर भी घूँट लहू का पिलाया गया मुझे

हाँ! फटे लिबास में ही सही मगर ढँकी तो थी मेरी आबरू
किस जुर्म में बे-आबरू कर सर-ए-आम घुमाया गया मुझे

मैं ज़िंदा था तो सारा ज़माना पैर से ठोकर मारता था "धरम"
औ" मर गया तो कंधे पर उठाकर कब्र में लिटाया गया मुझे 

Friday, 4 September 2015

दिशाहीन रिश्ता

दिशाहीन पनपता रिश्ता
एक मजबूत आधार की तलाश में
हर रोज सिसकता है
अँधेरे में तलाशता है राह
मगर किसी अनजाने डर से
सिकुड़कर छुप जाता है
नेपथ्य से आती ध्वनि सुनकर

रिश्ते में उपजे खोखलेपन को
गर्म रेत से भरता है
इस उम्मीद में शायद
कि रिश्ते में कुछ गर्माहट आ जाए
मगर उस रेत की गर्मी से तो
रिश्ते में फफोले आने लगते हैं

रिश्ते में उपजे सन्नाटे से
जब कभी चुप्पी अट्टहास करता है
जहन में उठने लगतीं हैं सुनामी लहरें
बदन काँपने लगता है
अश्क़ और लहू के मिश्रण से
मानसपटल पर एक चेहरा
उभरने लगता है
मुस्कुराते दिल में सुराख करते
एक ओर से दूसरी ओर निकल जाता है

दिशाहीन रिश्ते को जब भी छूना चाहा
चेहरा जल उठा
पाँव फिसला
हाथ कपकपाया
और वक़्त की मार से दिल पर
ज़ख्मों का गाढ़ा निशाँ उग आया  

Wednesday, 2 September 2015

रुला देती है

उम्मीद हरेक चेहरे पर दूसरा चेहरा चढ़ा देती है
ख़ुशी देती है और फिर ज़ख्म देकर रुला देती है

न जाने ज़माने में इंसानियत का ये कैसा रोग है
जो इन्सां का दर्द बांटकर उसे और भी बढ़ा देता है

यहाँ तो एक ही ज़ुर्म पर सजा अलग-अलग होती है
ये कैसा इन्साफ है जो बुझी आग को भी हवा देता है

अब मुख़्तसर सी ज़िंदगी में ख़ुदा की बख़्शी दोस्ती भी
एक दोस्त की रुस्वाई पर दूसरे दोस्त को मज़ा देती है