Monday, 3 April 2017

आँखें

कि रात भर कोई भी ख़्वाब देखने से डराती हैं आँखें
औ" दिन भर हर हक़ीकत से नज़रें चुराती हैं आँखें

न जाने कैसे-कैसे अंदाज़ में ये दिल दुखाती हैं आँखें
औ" होकर नम न जाने किस-किस को बुलाती हैं आँखें

कहीं मिलाकर नज़र से नज़र प्यास बुझाती हैं आँखें
औ" कहीं पशेमाँ होकर भी क्या खूब पिलाती हैं आँखें

तेरे बज़्म में न जाने कितने रंग दिखाती हैं आँखें
कि किसी को हँसाती तो किसी को रुलाती हैं आँखें

सारे ग़मों से रिश्ता कुछ इस क़दर निभाती हैं आँखें
कि पीकर पूरा समंदर 'धरम' हर दर्द छुपाती हैं आँखें

Monday, 13 March 2017

चंद शेर

1.

जो मैंने दिखाया ज़ख्म तो एक और ज़ख्म मुझे मिल गया
तेरे इस करम पर "धरम" मेरे दुश्मन का सर भी झुक गया

2.
जब भी अपने क़द-ओ-कामत का "धरम" ख़याल आता है
वो दिल दुखने वाली अपनी हर बात पर मलाल आता है

3.
एक तो पतझड़ औ" उसपर आँधी का आलम
सूखे हुए पत्तों को तो "धरम" खो ही जाना है

4.
"धरम" मिट्टी का शेर काठ का राजा कागज़ का घोड़ा
ज़िन्दगी के इस शतरंज के खेल को कब तुमने छोड़ा

5.
अब ज़िन्दगी की महज़ एक और चाल बाद उसके शह और मात
'धरम' कर लो कितना भी आरज़ू-औ-मिन्नत मगर न बनेगी बात

6.
तेरा इश्क़ 'धरम' शुरूर से खुमारी तक आ गया
ये तबियत बुलंदी से अब बीमारी तक आ गया

7.
बाद तेरे मरने के 'धरम' मुझमे अब मैं पूरा ज़िंदा हूँ
है सीने में धुआं होठों पर ज़ाम अब मैं पूरा रिंदा हूँ

8.
मेरे चेहरे पर मेरा अपना ही चेहरा निखरना बाकी है
ग़ुलाम के बाद "धरम" बादशाह का उभरना बाकी है

9.
किसे सराहूं किसको छोड़ दूं है यह बड़ा मुश्किल काम
चुप रहूँ "धरम" तो हासिल न होगा कभी कोई मुक़ाम

10.
मिट्टी के मोल भी "धरम"हम बिक नहीं सके
ख़ाक के सामने भी हम कभी टिक नहीं सके

11.
किस मिट्टी को खोजता उड़कर तू आकाश
अँधेरे में है ढूंढता "धरम" कौन सा प्रकाश

12
खालीपन के बीच 'धरम' एक और खालीपन का एहसास
मानो उठे नज़र जब ऊपर तो कहीं दिखता नहीं आकाश  


Saturday, 4 March 2017

मैं चाहता हूँ

सच्चाई से रु-ब-रु हूँ मगर ग़फलत में रहना चाहता हूँ
ऐ! हुस्न इस बुढ़ापे में भी मैं तेरे साथ बहना चाहता हूँ  

जो कल की बात भी आपने उसपर गौर नहीं फ़रमाया
उसी मसले में मैं आज कुछ और भी कहना चाहता हूँ

वो शान से उठा हुआ सर औ" कितने सल्तनत का ताज़
अपने काँधे पर सर का बोझ अब नहीं सहना चाहता हूँ

ऐसा कोई जहाँ न चाहिए की रुकूँ तो गिरने का डर रहे
ऐ! ज़मीं अब मैं ता-उम्र तुमसे लिपटकर रहना चाहता हूँ

उसका जूता इसका सर औ" फिर हर ओर क़त्ल-ऐ-आम
तेरे इस जहाँ से "धरम" अब तो मैं बस चलना चाहता हूँ



Friday, 3 February 2017

ऐसा कोई भी न खिलौना आए

खुद अपने बदन के ज़ख्म पर अब न रोना आए
न रात न नींद और न ही वो ख़्वाब सलोना आए

ये फूल जिसके दामन के हैं उन्हें ही मुबारक हो
ऐसे फूल मुझे तो अपने गले में न पिरोना आए

ग़र मोहब्बत है तो बात आर या पार की होगी
मुझे तो इश्क़ में किसी को भी न डुबोना आए

कि यारों का खंज़र यार का ही सीना वाह रे दुनियाँ
मुझे तो दुश्मन को भी न कोई कील चुभोना आए

काठ की दुल्हन मिट्टी का घोडा या कागज़ का हाथी
मेरे दामन में "धरम" ऐसा कोई भी न खिलौना आए

Thursday, 19 January 2017

मंज़िल-ए-मक़सूद के आगे भी

ज़हन्नुम के हक़ीकत का अंदाज़ा घर बैठे लगाने लगे हैं
की ठंढे पानी से लोग अब यहाँ मोम पिघलाने लगे हैं

बज़्म-ए-उल्फ़त में लोग खूब रंज-ओ-ग़म गाने लगे हैं
की जो निकले थे नेकी को वो यहाँ रंजिश पकाने लगे हैं

बात एक छोटी सी थी मगर क़त्ल-ए-आम कुछ यूँ बरपा
की यहाँ लोगों के साथ अब जानवर भी चिल्लाने लगे हैं

बात सिर्फ एक कदम लड़खड़ाने की थी नतीजा यूँ हुआ
की ना-उम्मीदी जहन में अब हर ओर से आने लगे हैं

वक़्त कदम-कदम पर तबज्जो भी खूब बदल देता है
की कई नए क़रीब आए कई पुराने दूर जाने लगे हैं

इन्सां ख्वाइशों के उलझन में कुछ यूँ फंस गए हैं "धरम"
की मंज़िल-ए-मक़सूद के आगे भी कदम बढ़ाने लगे हैं 

Friday, 13 January 2017

चंद शेर

1.
तेरे बज़्म में "धरम" मुझे कुछ इस तरह सजा दी गई
की मैं बोलने लगा तो शम्मा-ए-महफ़िल बुझा दी गई

2.
ऐ! ज़िन्दगी तू रेत का महल फिर न बना
अपने मुक़्क़र्र कब्र में रह हाथ-पैर न बढ़ा

3.
किसी और का दर्द "धरम" अपने सीने में उतार लिया
ऐ! मौत मैंने फिर तुझसे अपनी ज़िन्दगी उधार लिया

4.
जिसे समझ था उल्फत "धरम" हक़ीकत में वो एक ख्वाब था
तेरे बज़्म में आना बस उसका चुकाना एक पुराना हिसाब था

5.
जब भी मंज़िल की ओर चला "धरम" फ़ासला और बढ़ता ही गया
की मुक़द्दर ज़मीं पर रेंगता रहा औ" हौसला हवा में उड़ता ही गया


6.
हस्र-ए-ज़िन्दगी "धरम" अब तो इस मुक़ाम पर है
जो लब खुले तो सिर्फ निकलती दुआ जुबान से है

7.
जो गर्क-ए-दरिया से निकल तो अब किनारा नहीं ढूंढता
मैं अपने ज़ीस्त में "धरम" अब कोई सहारा नहीं ढूंढता

8.
जो रखते हो दिल माथे में तो सीने में दिमाग भी रखो
की अपने हिस्से में "धरम" कुछ चीज़ नायाब भी रखो

9.
तेरी इस आह! पर "धरम" लब खामोश रहे दिल फट गया
फ़ासला-औ-नज़दीकी के दरम्यां जो भी था वो मिट गया

Saturday, 31 December 2016

बुझ न सकेगी

ऐसे रु-ब-रु न हो मेरी नज़र तुझपर टिक न सकेगी
तू फ़ासले से मिल नहीं तो तेरी याद मिट न सकेगी

मुझे आखों से ऐसे न पिला की प्यास बढ़ती ही जाए
सिर्फ ज़ाम दे मुझे नहीं तो तश्ना-लब बुझ न सकेगी

कतरा सी ज़िन्दगी औ" उसमे दरिया भरने की चाहत
की मौत के बाद भी ये ख्वाईश कभी पूरी हो न सकेगी

ज़माने भर की उदासी अपने चेहरे पर लिए फिरते हो
ऐसे में कोई भी ख़ुशी तेरे पहलू में कभी आ न सकेगी

ग़र तमन्ना है उससे मिलने की तो आज मिलो "धरम"
वो कभी भी अपने वादा-ए-फ़र्दा पर मिलने आ न सकेगी 

Saturday, 10 December 2016

सबकुछ ढल जाएगा

अब जो बहार आई तो साथ में ग़ुबार भी आएगा
चमक कुछ देर ठहरेगी बाकी अँधेरा छा जाएगा

एक तो तन्हाई औ" उसपर मुफ़लिसी का आलम
ये ऐसा ग़म-ए-हयात है जो अब साथ ही जाएगा

तेरा इश्क़ मोहब्बत आशियाँ औ" यह पूरा ज़माना
वक़्त के एक ही धमाके में सब कुछ बिखर जाएगा  

नेकी बंदगी बेवफ़ाई मक्कारी हर चीज़ में मिलावट है
मालूम ही नहीं पड़ता कि कौन रास्ता किधर जाएगा

नज़रें मिलाना नज़रें चुराना औ" फिर थोड़ा मुस्कुरा देना
उसको मालूम न था की अब ये वार भी बेअसर जाएगा

रात का आलम महताब की रौशनी सितारों की महफ़िल
एक खुर्शीद के निकलते ही "धरम" सबकुछ ढल जाएगा 

Friday, 9 December 2016

दफ़न हो जाएँ एक दूसरे के लिए

अभी दीवार पूरी तरह से उठी नहीं है
थोड़ा मैं भी झांक सकता हूँ तुझमें
और थोड़ा तुम भी मुझमें
हाँ मगर दीवार की नीब बहुत मजबूत है
एक बार बन गई तो फिर
उसको गिराना मुश्किल होगा

तुम्हारे उसूल पर बनी ईमारत
अब ढह गई है
उसी ईमारत की ईटें
इस दीवार में लगा रही हो तुम
छूता हूँ तो ईटें बोलने लगते हैं
कहतें है
अभी तो ईमारत से मुक्त हुआ हूँ
फिर से मत बांधो मुझे

तुम्हारा मौन
मेरे हरेक अभिव्यक्ति पर भारी है
उसे भी एक दिन गिरना पड़ेगा
तुम्हारे उसूल के ईमारत की तरह
उसके बाद सिर्फ चीख सुनाई देगी
जो काटने दौड़ेंगे

मेरी साँसें अब चुभती हैं तुझे
अपूर्ण दीवार आँखों को खटक रही हैं
तुम इसे पूरा कर दो
ताकि ताउम्र हम दोनों
दफ़न हो जाएँ एक दूसरे के लिए 

Thursday, 8 December 2016

सीने से दिल निकालो अपना

सीने से दिल निकालो अपना
झाड़ो साफ़ करो उसको
की बहुत धूल जम गई है
इसमें मुझे मेरी सूरत नज़र नहीं आती

सिर्फ ग़ुबार है यहाँ
न जाने किस आँधी से पैदा हुआ
तुम्हारे अंदर
फल-फूल भी रहा है
हैरत हो रही है मुझे

दिल में कालिख़ बैठा है या नहीं
यह तो धूल झड़ने के बाद ही पता चलेगा
और कितने चेहरे छुपे हैं इसमें
इसका शायद तुमको भी अंदाज़ा नहीं

सिर्फ मुस्कुरा देना तेरी आदत न थी
कहाँ से सीखा ये
लगता है शायद वक़्त की देन हो
या किसी और की
मगर क्यूँ
यह प्रश्न मैं तुम्हारे लिए छोड़ देता हूँ