Tuesday, 30 July 2019

हर चेहरा उभर कर चला

महफ़िल में दौर जब ज़हर कर चला
हर सैलाब उस महफ़िल में ठहर कर चला

रुख़सत के वक़्त के लम्हों का क्या कहना 
एक-एक लम्हा मानो कहर कर चला

कई ज़िंदगी के बाद एक मौत नसीब हुई थी
अब तो मौत पर भी ज़िंदगी का लम्हा असर कर चला

जब उसे माँगने पर मौत भी उधार में न मिली
तो अपनी ज़िंदगी वो यूँ हीं किसी को नज़र कर चला

बुलंदी और ज़िंदगी पाने को एक हुजूम चल रहा था
वो देकर अपनी मौत हर सोहरत को सिफर कर चला

जब उसे किसी भी रास्ते का कोई अंदाजा ही नहीं रहा
तब वो अपने ही खून के दरिया में निखर कर चला

उसके अंजुमन में कद्रदान जब गैर को निहारने लगे
तो ख़ुद अपने ही अंजुमन से वो बिफर कर चला

याद किसी और की आई चेहरा कोई और सामने आया
जो भूलना चाहा "धरम" तो हर चेहरा उभर कर चला

Sunday, 28 July 2019

सबका जनाज़ा किया गया

कि हर दीवार ऊँची करके मेरे कद को छोटा किया गया
खरा सोना था  मुझे पत्थर पर रगड़कर  खोटा किया गया

रुस्वा तो सिर्फ नाम हुआ था सज़ा पूरे ज़िस्म को यूँ मिली
पहले क़त्ल किया फिर उस क़त्ल का तमाशा किया गया 

अपने हुदूद-ए-ग़म  का मुझे कभी ख़ुद  ही अंदाज़ा न था
पहले तो  ज़माने ने हिसाब किया  फिर धोखा किया गया

मेरे लिए हर किसी का लिखा कलाम नश्तर बन गया था
करके क़त्ल ज़िस्म पर ज़ख्म न देने का वादा किया गया

रिश्ते में जब से ज़ुल्म शुरू हुआ  तब से ज़िंदगी शुरू हुई
हर ज़ुल्म के बाद  उससे मिले मौत को  आधा किया गया

शक़्ल  उसकी थी  नग़मा मेरा था  आवाज़  रक़ीब की थी
एक ही ख़्वाब के बाद "धरम" सबका जनाज़ा किया गया 

Friday, 26 July 2019

जहाँ तो सितारों के आगे था

कि हर वक़्त फूलों  को पैरों तले रौंदा औ" काँटों पर सोया
ज़ीस्त तू मुझे ये मत  बता मुझे कितना खोया कितना पाया

आँखों से जब भी  अश्क छलकते हैं  उसे छलक जाने दो
ज़िंदगी से तुम कभी  हिसाब मत करना  कि कितना रोया

मौसम हिज़्र का है  बारिश लहू की है  हर अश्क प्यासा है
आओ कहीं दूर चलें  यहाँ न  जाने फैला है किसका साया

कल तुझको  पलट के देखा था  अब फिर कभी न देखूंगा
कल मेरी साँस फूली थी  पूरा का पूरा मन भी था भरमाया

तेरा ज़मीं पे  कुछ न था तेरा जहाँ तो सितारों के आगे था
भटकाकर ज़मीं पर खुद को "धरम" तुम कितना भुलाया

Wednesday, 24 July 2019

यूँ ही मालिक का सर नहीं झुकता

ख़्वाब कैसा भी हो उसे भर नज़र देखना जरुरी होता है
ये हम कैसे कह दें कि इश्क़ का हर रंग सिंदूरी होता है

ये सारे सामईन को कद्रदान समझूँ या फिर ग़ुलाम तेरा
तेरी महफ़िल में हर किसी का जवाब जी हुज़ूरी होता है

कैसे कह दें कि ये बोझ अब तो कभी न उठाया जाएगा
यहाँ अपनी लाश अपने कंधे पर ढ़ोना रोजगारी होता है

एक ज़िस्म दो रूहों को अपने अंदर कब उतार लेता है 
जब दोनों रूहों  का दोनों जिस्मों  पर सरदारी  होता है

ग़ुलाम के क़दमों में यूँ ही मालिक का सर नहीं झुकता 
दोनों एक अलग ही  दर्ज़े का "धरम" व्यापारी  होता है

Wednesday, 10 July 2019

दर्द

दर्द किसी पेड़ का कोई एक फल नहीं होता
वह तो पूरा का पूरा दरख़्त होता है
जिसकी जड़ें किसी भी सीने की गहराई से
ज़्यादा गहरी होती है
दर्द को सीने में समेटना
इसीलिए मुमकिन नहीं होता

दर्द महज़ एक एहसास नहीं होता 
वह तो कई एहसास से मिलकर बनता है
जो सीने के परत-दर-परत को चीरते हुए
सीने से बाहर निकल जाता है
बाद इसके बाक़ी सारे एहसास
बिना किसी रुकावट के
सीने के आर-पार होते रहते हैं

दर्द कभी भी सीने के किनारे से नहीं गुजरता
वह समान रूप से सीने में फैलता 
हर एहसास को
छूता-टटोलता जिलाता-मारता निकल जाता है 
अपने पीछे प्रश्न छोड़कर
कि दर्द पैदा होता है बढ़ता है
मगर बूढ़ा क्यूँ नहीं होता मरता क्यूँ नहीं ?

Wednesday, 3 July 2019

चंद शेर

1.
क्यूँ किनारा नहीं लगती ज़िंदगी  क्यूँ कोई ख़्वाब उभरकर नहीं आता
बहार के मौसम में भी "धरम" क्यूँ कोई हिज़्र भी उभरकर नहीं आता

2.
अपने पाँव तले अपनी ज़मीं कब थी "धरम" अपने सर के ऊपर अपना आसमाँ कब था
अपनी ज़िंदगी कितने ही कब्र से होकर गुजरी मगर उसमें कोई भी अपना जहाँ कब था

3.
ज़िंदगी इस शक्ल से गुज़री "धरम" कि हर हद तक नासाज़ रही
लिखने के लिए न हाथ रहा बोलने के लिए न मुँह में आवाज़ रही

Sunday, 16 June 2019

दिल मरोड़ना पड़ता है

हर बार ख़त मोहब्बत का लिखने से पहले कलम तोड़ना पड़ता है
दिल में कोई भी आरजू पैदा करने के लिए दिल मरोड़ना पड़ता है

कोई इश्क़ कब तक ज़िन्दा रहता है इसका कुछ भी अंदाज़ा नहीं 
मगर हाँ! ज़िन्दा इश्क़  को देखने के लिए  आँख फोड़ना पड़ता है 

कोई एक तहज़ीब दूसरे किसी तहज़ीब से यूँ ही नहीं जुड़ जाता है
कि दोनों के मिट्टी से मिट्टी औ" पानी से पानी को जोड़ना पड़ता है 

ऐ हुस्न-ए-बेपरवाह तुझसे बचकर  निकलना कुछ आसान तो नहीं 
लिए इसके हर दिल को हर बार  ख़ुद-ब-ख़ुद  सिकुड़ना पड़ता है

फ़ैसला ख़ुद अपने ही दिल का  ख़ुद को भी  यूँ ही मंज़ूर नहीं होता 
कि ख़ुद ही से ख़ुद को "धरम" कई बार तन्हाई में लड़ना पड़ता है 

Monday, 3 June 2019

चंद शेर

1.
अब तो थक चुका हूँ "धरम" बुरा सुनते सुनते भला कहते कहते
अब तो कुछ भी असर नहीं होता इस तरह ज़माने में रहते रहते

2.
नग़मा अब कोई ज़ुबाँ पर आता नहीं किसी भी ज़ख्म पर अब दिल दुखाता नहीं
मौत से पहले मौत की बात "धरम" अब तो ग़ुबार उड़ाता नहीं दिल जलाता नहीं

3.
बाहर तन्हा चारदीवारी अंदर हिज़्र में लिपटे एक-एक जज़्बात
क्या कहें अब तो "धरम" ख़ुद से भी ख़ुद की होती नहीं है बात  

Saturday, 1 June 2019

हर ओर ज़िस्म लहराता रहा

जो छलक कर जाम प्याले से ज़मीं पर गिरा तो वो सूखता रहा
कितने सारे हलक़ प्यासे थे मगर हर हलक़ सिर्फ तरसता रहा

ज़िंदगी रेत की  तरह थी  मुट्ठी से हर वक़्त  बस  सरकती रही
ज़मीं पर गिरी  धूल में मिली  वह  सिर्फ भर नज़र  देखता रहा

वो  इश्क़ मोहब्बत उल्फ़त  सब का  बज़्म में  एक ही रंग रहा
वो सब  बस कदम ही चूमती रही हर ओर ज़िस्म लहराता रहा

रूह को जब शक्ल मिली  तो आईने ने उसको भी नकार दिया
ज़िस्म से निकलकर  रूह जाता रहा  ज़िस्म  बस पुकारता रहा

हुनर पर यकीं था  तो ज़माने से  न जाने क्यूँ  उम्मीद  लगा बैठे
उम्मीद के तराजू पर हर हुनर "धरम" बस उम्र भर झूलता रहा 

Tuesday, 7 May 2019

अब तक न हुआ

कि जब तक  शबाब-ए-हुस्न था  ज़िक्र-ए-इश्क़  तब तक न हुआ
एक आग  सुलगती  रही बदन में रूह  शादाब अब तक न हुआ

जब यार पर  ऐतबार न  किया मज़ार-ए-यार पर सज़दा न किया
ज़माने में  हद-ए-निगाह  तक  कोई भी  अपना अब तक न हुआ

दरम्यां दोनों  रूहों के न  सिर्फ दीवार उठाई  गई  बुलंद भी हुई
बाद दीवार  गिरा  दी गई  मगर हर्ष-ए-विसाल  अब तक न हुआ

हर जंग-ए-ज़िंदगी में न सिर्फ  शिकस्त खाई मिट्टीपलीत भी हुआ
मौत तो क्या  ज़िंदगी के साथ  चलने का साहस अब तक न हुआ

ज़िंदगी के हर आग से आग के रिश्ते को 'धरम' पानी करता रहा 
हाँ मगर उस रिश्ते के पानी को छूने का साहस अब तक न हुआ