Saturday, 14 February 2015

आहिस्ते से

कब दिल में दस्तक दे गया वो आहिस्ते से
अजनबी शहर में मिला था जिस फ़रिश्ते से

वीरानी अब दूर तक दिल में दिखती नहीं है
पता नहीं कब निकल गई वो किस रस्ते से

पहले कभी मिलता था तो नज़र चुरा लेता था
अब मिलता है तो सलाम करता है गुलदस्ते से

जो आँखें चार हुई तो दिल में उतारा भी गया
मिल गई मोहब्बत की मिल्कियत सस्ते से

ये मेरी मोहब्बत नहीं है तो और क्या है "धरम"
वो जो जा रहा था लौट के आ गया फिर रस्ते से 

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