तेरे उम्मीद से ज्यादा मैं दर्द छुपाए बैठा हूँ
खुद अपने सीने में अपना दिल दबाए बैठा हूँ
तुमने जो मेरे जिस्म के कई टुकड़े किये थे
अपने ज़िस्म का वो हरेक टुकड़ा लुटाए बैठा हूँ
तेरे ज़ख्मों से जो लहू का दरिया निकल आया था
वो आखों का लहू तिश्नकामों को पिलाए बैठा हूँ
खुद अपने सीने में अपना दिल दबाए बैठा हूँ
तुमने जो मेरे जिस्म के कई टुकड़े किये थे
अपने ज़िस्म का वो हरेक टुकड़ा लुटाए बैठा हूँ
तेरे ज़ख्मों से जो लहू का दरिया निकल आया था
वो आखों का लहू तिश्नकामों को पिलाए बैठा हूँ
No comments:
Post a Comment
Note: only a member of this blog may post a comment.