Tuesday, 26 March 2013

हरजाई

तुम तो मुझे जिंदगी की दुआ न दो 
तुम हरजाई हो मुझे झूठी वफ़ा न दो 
रिश्ते जोड़ना रिश्ते तोडना 
तुम्हारे लिए खेल सतरंज सा है
प्यार तो ऐसा है की सिर्फ रंज सा है 
उससे वफ़ा की बात पर "धरम" 
अब तो हर सक्श तंग सा है

Friday, 15 March 2013

कमर टूट जाती है


मेरी कमर टूट जाती है
उधारी की लाठी पकड़कर खड़ा होता हूँ
मगर जब फ़क्त सूद
मूलधन से जियादा हो जाता है
मेरी कमर टूट जाती है

सड़क के किनारे खड़ा होकर
कातर निगाह से
बड़ी बड़ी गाड़ियों में झांकता हूँ
शाही कुत्तों को देखता हूँ
मेरी कमर टूट जाती है

महंगाई की मार ऐसी  है
की मुझ मुफलिस के पास
न "वायफ" है न "तवायफ" है
खाली थैली और खोखला दिल
हाँ मेरी कमर टूट जाती है

Saturday, 9 March 2013

जिंदगी और रिश्ता


औरों के शिकस्त पर मुस्कुराना ठीक नहीं
खुद अपनी शिकस्त पर रोना  भी ठीक नहीं
जिंदगी है, यह बहुत कुछ दिखाती है
यह कर्म भूमि भी यह धर्म भूमि भी
यह कर्त्तव्य भूमि भी यह रणभूमि भी

यहाँ रिश्ते बनते भी है टूटते भी हैं
कुछ रिश्ते गांठ के सहारे चलते भी हैं
अर्थ के नींब पर टिके रिश्ते
जरा सी चूक पर बिखर जाते हैं
कुछ ठिठुरते रिश्ते कुछ उबलते रिश्ते
मानो शर्द भी गर्म भी और हवा भी
मन यूँ उलझता है कि अब क्या करें


प्रेम की परिभाषा भी कुछ बदल सी गई है
जैसे मानो की प्रेम कोई व्यापार हो
आह!अगर प्रेम निःस्वार्थ और निश्छल हो
तो जीवन सुखी भी और सफल भी हो

Wednesday, 20 February 2013

चंद शेर

1.

गुजरे वक़्त में मैंने खुद को कुछ यूँ तलाशा 
जैसे डूब रही हो नैया और छूटती हो आशा ...

2.

मिले तो मुलाकात के कीमत वसूल गए 
खुद हसें और मुझको रुला के चले गए ...

3.

उसने मुझे तन्हा देखा अधूरा समझा 
मिला भी तो कहाँ कभी पूरा समझा ...

4.

तन्हाई की रात थी बहुत देर से गुजरी
ख़ामोशी रौशन थी और साँस थी ठहरी ...

5.

इश्क में रूठना, नाराज़ होना अदाकारी होता है 
जाम अगर न छलके तो कहाँ खुमारी होता है ...

6.

महफ़िल सजी और मेरे इश्क का जनाज़ा निकला 
हाय "धरम "ये कैसा प्यार का खामियाजा निकला

7.


खतरों का सिलसिला उसने जारी रखा 
मुफलिसी में भी इश्क का बीमारी रखा 

8.


अब तो यहाँ हर जगह  इन्शां बिकते हैं 
मगर फिर भी उसने अपना एतवारी रखा 

Tuesday, 12 February 2013

तन्हाई भी न रही


मोमबत्ती की मद्धिम रौशनी थी
सामने आइना था
मैं खुद को तलाश रहा था
तन्हाई मेरे बगल से गुजरी थी
चेहरे पर नकाब लिए
मैंने रोका उसे
बोला तू तो मेरी अपनी है
तू मुझसे दूर क्यूँ है
वो बोली
अब तन्हाई भी तेरी अपनी न रही

Saturday, 2 February 2013

लकीर


मेरा प्यार था दरिया था बह गया
तेरी खींची लकीरें को पार कर गया
वापस आया तुम्हें छू कर आया
कुछ यादें समेट कर साथ लाया

तेरे हुस्न की गर्मी से
तेरे अश्क सूख गए हैं मगर
यकीं है तेरे दिल का रूखापन
जरुर थोड़ा गीला हुआ होगा

Wednesday, 30 January 2013

मैंने अपनाया है


बिखरे हुए रेत को मैंने फिर से सजाया है
वो लौट आई तो मैंने उसे फिर से अपनाया है
हाँ उसकी यादों को मैंने रह-रह के भुलाया है
मगर वो जब भी तन्हा थी उसे मैंने हँसाया है

Friday, 25 January 2013

इमां टूट गया


जिक्र-ए-यार हुआ
और ज़ख्म हरा हुआ
हाय! ये तेरी याद ने
सारे ग़म रौशन कर दिए

हुस्न भी था इश्क भी था
और मेरी वफाई भी थी
हाँ तेरे ही दिल में
मगर कुछ रुसवाई भी थी

दरख्त से कोई जवाँ पत्ता
बेमौसम क्यूँ टूट गया था

लहर तो यूँ उठा मानो मैं समंदर था
देखी तेरी वफाई तो कतरा भी न रहा
वो थी उसकी वफाई भी थी  "धरम"
मगर अब मेरे हिस्से उसका वो इमां न रहा




Wednesday, 16 January 2013

चंद शेर

1.

मुलाकात का मसला है 
जज्बात का मसला है 
दिल फिर से फिसला है 
मगर न जाने क्यूँ 
कदम पत्थर सा हो गया 
अब आगे बढ़ता ही नहीं

2.

मेरे मरने के बाद याद आई मेरी यारी 
वह रे तेरी यारी वह रे तेरी तलबगारी

3.

हिज़्र का फिर से मौसम आया 
वो तन्हा रोया ज़ार-ज़ार रोया 
अश्क की बूंदें समेटी 
नाम-ए-यार लिख दिया 
जीनतकद: वीरां हो गया 
दिल फिर से परीशां हो गया 

जीनतकद:- प्रेयषी का घर

4.

वो जो चाँद बन के मिली थी तू 
तू अज़ीज थी मेरे करीब थी 
ये गिला तुझसे क्यूँ हो गया
मेरा चाँद तन्हा फिर हो गया

5.

पुराने वादों का सफ़र अभी बाकी था
वो फ़िक्र-ए-यार भी अभी बाकी था 
मैं चला गया था अकेले उस गली की तरफ 
जहाँ उसके साथ जाना अभी बाकी था

6.

उदासी चेहरे से उसकी छुपी ही नहीं 
नज़र यूँ झुकी कि फिर उठी ही नहीं
वो खुद परेशां थी जुबां भी खामोश थी 
बस सिसकियों ने ही तो कुछ कहा था 
अश्क था या समंदर पता ही न चला 
गहरा इतना कि मैं माप ही न सका 
मैं बहता चला गया संभल ही न पाया 
डूबने लगा तो सहारा उसके बाहों का ही था







Sunday, 6 January 2013

चंद कदमों का सवारी


उम्र भर का साथ
रक्खा तो सही उसने निभाया ही नहीं
मिलकर साथ चले थे
मैं गिर पड़ा उसने उठाया ही नहीं
मैं खुद उठा चल पड़ा पास पहुंचा
मेरी आहट को उसने पहचाना ही नहीं

मेरा भरम अभी जिन्दा था
सामने ही मेरे वो परिंदा था
हाथ पकड़ा नाम पूछा
झटका हाथ मेरा और जुबां खामोश

मैं उसके साथ था खामोश था उदास था
अचानक एक और लम्हा आया
हलक में जाँ मेरी अटक गई थी
वो गैरों की बाँहों में लिपट गई थी

मेरे जज्बात पर हुस्न उसका भारी था
मैं तो बस चंद कदमों का सवारी था