Thursday, 18 May 2017

होंठ भी सिला बैठे

ज़िक्र-ए-यार पर फिर से हम भी हाँ में हाँ मिला बैठे
कि तेरे हरेक शिकवा को हम फिर से यूँ ही भुला बैठे

मेरे ख़्वाब से जो ऊँची है वो तेरे पैरों के तले भी नहीं
कि हम भी क्या सोचकर ये ज़मीं-आसमाँ मिला बैठे

अतीत में गए तो फिर हम वर्तमान में आ ही न सके
कि खुद को हम अपने ही आखों के पानी से जला बैठे

"धरम" हमने ज़िंदगी से इस तरह किनारा कर लिया
कि खुद ही अपनी जुबां काटी औ" होंठ भी सिला बैठे

Monday, 15 May 2017

अब माला लगे हैं जपने

निकले जो लुटिया डूबने को उनसे कैसे हो सत्कर्म
की पीटते हैं ढोल अपने नाम का करके सारे कुकर्म

कर के सारे कुकर्म भरी भीड़ में सब से आँख लड़ाये
लिए हैं स्वप्न मन में की जनता को भी खूब ये भाये

की जनता को भी खूब भाये सब उलटी सीधी इसकी
लगे हैं लोग कहने की क्या खूब पीते हैं ये व्हिस्की

उतरा नशा जब आशव का करने लगे सबको प्रणाम
अनायाश ही उनके मुख से भी फूट गया जय श्री राम

फूट गया जय श्री राम की अब लगे हैं माथा वो टेकने
उतारकर सर से टोपी "धरम" अब माला लगे हैं जपने 

Friday, 5 May 2017

किशोरावस्था में घुड़कना

तुमने थोड़ा सा वक़्त दिया था मुझे
खुद में पनपने को
मैं तब बस उस रिश्ते में
घुड़कना सीख ही रहा था
कभी तेरा सहारा मिलता
तो उसे थामकर
छन भर खड़ा हो पाता था
हाँ! मगर फिर गिरने के बाद
कराह नहीं निकलती थी दिल दुखता नहीं था
कुछ उम्मीद थी मन में

थोड़ा वक़्त और गुज़रा था तेरे साथ
मैं बिना सहारे
थोड़ी थरथराहट के साथ खड़ा हो पाता था
बाद उसके तेरे सहारे
मेरे पैर ज़मीं पर टिकने लगे थे

मुझे अब भी याद है
मैंने बिना चलने का अभ्यास किए
तेरे साथ सीधा दौड़ा ही गया था
मगर उस दौड़ के बाद
बुनियाद हिलने लगी थी

ये कहाँ पता था
की दौड़ने के पहले चलना आना चाहिए
वो पहली दौड़ ही आखिरी दौड़ हो गई
औ" बाद उसके
उस रिश्ते में घुड़कना भी मुमकिन न रहा

किशोरावस्था में किसी का घुड़कना
खड़ा होना और फिर एकदम से दौड़ पड़ना
बाल्यावस्था में घुड़कने खड़ा होने और फिर
एकदम से दौड़ने पड़ने से बिलकुल अलग होता है


Tuesday, 2 May 2017

आधा दर्द पूरी ज़िंदगी

आओ
अपने-अपने जज़्बातों को
अब आधा-आधा बाँट लेते हैं
आधा तुम मुझमें जीना
आधा मैं तुझमें जीयूँगा

मैं अपनी संवेदनाओं को तुझमें देखूंगा
और तुम मुझमें देखना

आधे मेरे सपने तुम जीना
आधा तुम्हारा मैं जी लूंगा

फिर जीवन के चक्र में
बाकी का आधा तुम मुझको दे देना
और अपना पुराना आधा मुझसे ले लेना

यही क्रम मैं भी तुम्हारे लिए दुहराऊंगा
दोनों की पूरी ज़िंदगी मुकम्मल होगी
और इस तरह हम दोनों
एक दूसरे को पूरी तरह जी लेंगे

न मैं कभी अस्तित्व विहीन होऊँगा
औ" न तुम होगी

हाँ! मगर यह एक मिशाल होगा
आधा दर्द और पूरी ज़िंदगी का


Tuesday, 25 April 2017

वो अँधेरे में आ गया

जो तुमने डाल दी रौशनी तो वो अँधेरे में आ गया
कि उजड़े हुए गुलसन पर एक और क़हर ढा गया

दिल जला ज़िस्म भी जला औ" राख़ हो गई सारी यादें
कि उस गर्दिश-ए-अय्याम को उसका चेहरा भा गया

जो दो रूहों की पैदाईश थी उसे दो ज़िस्म ने मार डाला
कि रूह का इस तरह मिटना सब के ज़हन में छा गया

मुर्दा जिस लाठी पर अपना ज़िस्म तौल लेता था 'धरम'
कि ज़माना उस सहारे को बस सेहत के लिए खा गया

Thursday, 20 April 2017

चंद शेर

1.
इस ज़िंदगी में अब इससे बढ़कर और क्या जीना होगा
कि खुद अपने ही सीने का लहू "धरम" अब पीना होगा

2.
हरेक सिक्के का "धरम" एक ही पहलू यहाँ देखा जाता है
दूसरे पहलू पर हर रोज कुछ और धूल डाल दिया जाता है

3.
जो दरिया नहीं छलका तो मैं भी प्यासा लौट गया
कि मेरे ग़ुरूर पर 'धरम' कोई भी प्यास भारी न था

4.
क्या मुलाक़ात का बहाना लिखूं मोहब्बत का कौन सा अफ़साना लिखूं
तुम कहते हो "धरम" कुछ लिखने तो मैं अब तुमको ही ज़माना लिखूं

Friday, 7 April 2017

चंद शेर

1.
ख़्वाब सारे आसमाँ से भी ऊँचे औ" हक़ीक़त सारे ज़मीं के अंदर
बस जिस्म ही है ज़मीं पर "धरम" यहाँ दिखते सारे उजड़े मंज़र

2.
मुझपर रहम अब और न कर ज़िंदगी तू मेरी हर राह में कील चुभा
जलाना है "धरम" तो पूरा जिस्म जला आग सिर्फ दिल में न लगा

3.
वो टूट कर बिखरा तो ज़मीं पर अपने होने का कई निशां छोड़ गया
मैं जो अकड़कर खड़ा रहा "धरम" तो नक्श-ए-पाँ भी न छोड़ पाया

4.
जब भी तुम्हें सराहा तो तेरा जी भर के दीदार भी किया
नज़र मिलाया भी "धरम" सीने के आर-पार भी किया

5.
इस उम्मीद में हैं की मोहब्बत का अंतिम पत्थर भी न खाली जाये
कि बिना दिया जलाये 'धरम' ज़िंदगी के ये आख़िरी दिवाली न जाये

6.
यहाँ ख़्यालों में जल रहा है हरेक लम्हा "धरम" अब पिघल रहा है
मैंने देखा था तो रंग कोई और था अब कोई और रंग निकल रहा है

7.
कभी रूह ज़िस्म के अंदर थी कभी जां ज़िस्म के बाहर था
जब डूबा था तो आशिक़ था जब निकला तब वो शायर था

8.
मुझे संभाला था ठोकरों ने औ" पत्थरों ने दिखाया था रास्ता
ज़माने के नेकी से 'धरम' अब तू ही बता मेरा क्या है वास्ता

9.
बाद तेरे हरेक लब पर 'धरम' मेरा नाम आता है
फिर झुकती हैं सारी नज़रें और तूफ़ान आता है 

Monday, 3 April 2017

आँखें

कि रात भर कोई भी ख़्वाब देखने से डराती हैं आँखें
औ" दिन भर हर हक़ीकत से नज़रें चुराती हैं आँखें

न जाने कैसे-कैसे अंदाज़ में ये दिल दुखाती हैं आँखें
औ" होकर नम न जाने किस-किस को बुलाती हैं आँखें

कहीं मिलाकर नज़र से नज़र प्यास बुझाती हैं आँखें
औ" कहीं पशेमाँ होकर भी क्या खूब पिलाती हैं आँखें

तेरे बज़्म में न जाने कितने रंग दिखाती हैं आँखें
कि किसी को हँसाती तो किसी को रुलाती हैं आँखें

सारे ग़मों से रिश्ता कुछ इस क़दर निभाती हैं आँखें
कि पीकर पूरा समंदर 'धरम' हर दर्द छुपाती हैं आँखें

Monday, 13 March 2017

चंद शेर

1.

जो मैंने दिखाया ज़ख्म तो एक और ज़ख्म मुझे मिल गया
तेरे इस करम पर "धरम" मेरे दुश्मन का सर भी झुक गया

2.
जब भी अपने क़द-ओ-कामत का "धरम" ख़याल आता है
वो दिल दुखने वाली अपनी हर बात पर मलाल आता है

3.
एक तो पतझड़ औ" उसपर आँधी का आलम
सूखे हुए पत्तों को तो "धरम" खो ही जाना है

4.
"धरम" मिट्टी का शेर काठ का राजा कागज़ का घोड़ा
ज़िन्दगी के इस शतरंज के खेल को कब तुमने छोड़ा

5.
अब ज़िन्दगी की महज़ एक और चाल बाद उसके शह और मात
'धरम' कर लो कितना भी आरज़ू-औ-मिन्नत मगर न बनेगी बात

6.
तेरा इश्क़ 'धरम' शुरूर से खुमारी तक आ गया
ये तबियत बुलंदी से अब बीमारी तक आ गया

7.
बाद तेरे मरने के 'धरम' मुझमे अब मैं पूरा ज़िंदा हूँ
है सीने में धुआं होठों पर ज़ाम अब मैं पूरा रिंदा हूँ

8.
मेरे चेहरे पर मेरा अपना ही चेहरा निखरना बाकी है
ग़ुलाम के बाद "धरम" बादशाह का उभरना बाकी है

9.
किसे सराहूं किसको छोड़ दूं है यह बड़ा मुश्किल काम
चुप रहूँ "धरम" तो हासिल न होगा कभी कोई मुक़ाम

10.
मिट्टी के मोल भी "धरम"हम बिक नहीं सके
ख़ाक के सामने भी हम कभी टिक नहीं सके

11.
किस मिट्टी को खोजता उड़कर तू आकाश
अँधेरे में है ढूंढता "धरम" कौन सा प्रकाश

12
खालीपन के बीच 'धरम' एक और खालीपन का एहसास
मानो उठे नज़र जब ऊपर तो कहीं दिखता नहीं आकाश  


Saturday, 4 March 2017

मैं चाहता हूँ

सच्चाई से रु-ब-रु हूँ मगर ग़फलत में रहना चाहता हूँ
ऐ! हुस्न इस बुढ़ापे में भी मैं तेरे साथ बहना चाहता हूँ  

जो कल की बात भी आपने उसपर गौर नहीं फ़रमाया
उसी मसले में मैं आज कुछ और भी कहना चाहता हूँ

वो शान से उठा हुआ सर औ" कितने सल्तनत का ताज़
अपने काँधे पर सर का बोझ अब नहीं सहना चाहता हूँ

ऐसा कोई जहाँ न चाहिए की रुकूँ तो गिरने का डर रहे
ऐ! ज़मीं अब मैं ता-उम्र तुमसे लिपटकर रहना चाहता हूँ

उसका जूता इसका सर औ" फिर हर ओर क़त्ल-ऐ-आम
तेरे इस जहाँ से "धरम" अब तो मैं बस चलना चाहता हूँ