Tuesday, 8 September 2020

चंद शेर

 1.

वो चिराग़ ग़र जले तो घर जले  न तो बस बुझा रहे 
वो ख़ार जब भी उपजे "धरम" तो सीने में चुभा रहे 


2.

हरेक ख्वाहिश "धरम" रात सिरहाने से लुढ़ककर  क़दमों में पहुँचती है 
दिन भर पैरों तले कुचलाती है औ" फिर शाम ढ़लते ही सर चढ़ जाती है

Tuesday, 2 June 2020

न ही शक्ल नायाब हुई

जब भी कुछ लिखा  कागज़ की  शक्ल खराब हुई
औ" ग़र खुल गई ज़ुबाँ  तो ज़िंदगी ही  अज़ाब हुई

ज़िंदगी जब तलक  ग़म के साये में थी महफूज़ थी
वो ग़म न था  ख़ुशी थी  जिससे  ज़िंदगी यबाब हुई

वो एक ख्वाईश थी  जो मिल भी गई तो कुछ नहीं
पहले भी  न कभी दिल जला न ज़िंदगी बेताब हुई 

ख़ुद ही के दो अलग-अलग  किरदार को मिलाया 
न तो सूरत-ए-कलम हुआ न सीरत-ए-ज़काब हुई

उसके हर बात पर अड़ा रहने का नतीजा 'नीरस' 
न तो ओहदा ऊँचा हुआ  न ही शक्ल  नायाब हुई 

Thursday, 30 April 2020

चंद शेर

1.
कि एक उम्र से ठहरी है  ये किस मोड़ पर ज़िंदगी
'धरम' क्यूँकर रास आ ही नहीं रही कोई भी बंदगी

2.
ग़र बात आपके जान की होती तो लहू अपना छलका देता
कि उतारकर आसमाँ से चाँद  आपके माथे पर चस्पा देता

3.

वो  शख़्स कौन था  "धरम"  उसकी उम्र कितनी थी
वो एक चाँद था औ" उम्र उसकी सितारों जितनी थी

4.
दरम्यां ज़िंदगी और मौत के फ़ासला सिर्फ़ एक सांस का कभी न था
हर दरिया मोम का था  कदम आग के थे औ" रास्ता उम्र भर का था

5.
कि कल का ख्याल कर कभी आज को जी न सका
हर घूँट गले में उतारा मगर एक भी घूँट पी न सका

Monday, 13 April 2020

ख़ुद अपने ही सफर ने मुझको

कई बार  यूँ ही लूटा है  ख़ुद  अपने ही  शहर ने मुझको
कि सरापा  डुबोया है  ख़ुद  अपने  ही  क़हर ने मुझको

वर्षों तक खुली ऑंखें औ" नींद का बिल्कुल ही न आना 
ये आलम भी दिखाया है  ख़ुद अपने ही नज़र ने मुझको 

एक बार मंज़िल पहुंचाया  और  फिर ता-उम्र भटकाया
ये अपने ही हाथों सजाये  ख़ुद अपने ही डगर ने मुझको

मौत से कदम भर का फ़ासला  औ"  उम्र भर का वास्ता
क्या खूब सिखाया 'धरम' ख़ुद अपने ही सफर ने मुझको 

Sunday, 22 March 2020

पहला वरक़ कुतर आया

जब भी कोई मंज़र देखना चाहा  सिर्फ पस-मंज़र नज़र आया
सूरत किसी और की नज़र आई चेहरा कोई और उभर आया

सब को मालूम है कि वो सितमगर है  मगर  फिर भी ऐसा क्यूँ
जब भी  फैसला उसके खिलाफ आया तो  सन्नाटा पसर आया

वो ज़िंदगी की  आखिरी शाम थी  वो करता भी तो  क्या करता
बस यूँ ही  उसकी  चौखट से होकर  आखिरी बार गुजर आया

जहाँ भी ज़मीं को आसमाँ से मिलाया गया तो वहां के फिज़ा में
सिर्फ एक बार बहार आई  औ" बाद उसके सिर्फ कहर आया

बात  पहले मोहब्बत से की गई  फिर ज़िंदगी  उधार माँगी गई
फिर शहादत बदनाम हुई  फिर नक़ाब इश्क़ का  उतर आया

सजा उसको सुनाई गई  सर किसी और का कलम किया गया
फिर किताब-ए-फैसला का 'धरम' वो पहला वरक़ कुतर आया

Wednesday, 8 January 2020

मुर्दा होने का ख़िताब

हिज़्र का एक दश्त  औ" बाद उसके  मुसलसल  हिज़्र का सैलाब
ऐ! ज़िंदगी  मुझे ख़ुद भी तो पता नहीं  कि तुमसे क्या माँगे जवाब

वो एक ख़ुशी का दरिया था  जो पहले उतरा  औ" फिर सूख गया
उस दरिया  को याद करके  क्यूँ ही करना ढ़लते वक़्त का हिसाब

वो एक रौशनी दिखी थी  जो बस थोड़े से वक़्त में ही कहीं खो गई
क्या था  यूँ कह लो  की हो किसी उतरते दिन का कोई आफ़ताब

ज़माने के दौर-ए-महफ़िल में हर ज़िंदगी के बस दो ही हैं पहचान 
या तो पूरा ज़िंदा रखता है या फिर दे देता है मुर्दा होने का ख़िताब

वक़्त ज़िंदगी का जब उतरता है 'धरम' तो वो किस तरह देखता है
जैसे की कई रँगों के हिजाब के ऊपर हो कोई एक काला हिजाब  

Friday, 3 January 2020

रह-रहकर भुलाना है

बिन तेरे वो  कारवाँ पहले  भी सूना था  अब भी सूना है
मगर क्या कहें कि  दिल-ए-दर्द  अब पहले से दुगुना है

जब साँसों से  साँसें मिलती थी तो  नज़्म उभर आता था
उस नज़्म को  अपने होठों से  अब क्यूँ ही गुनगुनाना है

फिर क्यूँ चेहरे पर उपजी  मायूसी क्यूँ दर्द छलक आया
ऐ दिल-ए-ज़ख्म तुझे फिर से क्यूँ वही किस्सा सुनाना है

वक़्त-ए-रुख़सत कहाँ ख़त्म  हुआ कुछ भी तो याद नहीं
ज़ख्म-ए-रुख़सत अब भी है जिसे रह-रहकर भुलाना है

ये कैसी बज़्म है  जिसमे एक मेरा अक्स है  और एक मैं
ऐसे बज़्म में  अपने ही दिल से दिल को  क्या मिलाना है

मौसम इश्क़ का बदलने से पहले ही ईंसाँ बदल जाता है
बाद इसके भी "धरम" कैसे हर  कोई तुम्हारा दीवाना है

Friday, 20 December 2019

चंद शेर

1.

कि बाद एक सांस के दूसरे सांस को सीने में उतरने में अब वक़्त लगता है
ये कैसा वक़्त आया "धरम" जिसे भी देखो वो आदमी बड़ा सख्त लगता है

2.

कि सिर्फ मेरा लहू ही शामिल न था  उस बुत को इन्सां बनाने में
ताल्लुकात हज़ारों लम्हों का पिरोया था 'धरम' उसमें जॉ लाने में

3.
वो शर्त ये थी कि बाद इन्तहाँ के भी न कभी ज़ख्म दिखाया जाए
न कभी आह निकले "धरम"  न कभी ग़म-ए-दास्ताँ सुनाया जाए

4.
जायका भोजन का हरेक निवाले में 'धरम' बदल जाता था
न जाने किस-किस का लहू शामिल था  उस एक थाली में

5.
कि ताज नापसंद था सर पर इसलिए हमेशा सर को झुकाए रखा
अपने इस हुनर से "धरम" उसने हमेशा ज़माने को भटकाए रखा

6.
इस हुनर से "धरम" वो हमेशा मेरे दिल में उतर कर आया
कि वो जब भी मेरे पास आया  पंख अपने कुतर कर आया

7.
कि जो भी सुबह तक जला 'धरम' चौखट उसकी रौशन रही शब भर
न जाने कितनी साँसे टूटी थी  एक गर्दन को खड़ा रखने में अदब भर 

Sunday, 15 December 2019

एक अलग ही अंदाज़-ए-बयाँ कर दिया

कि जहाँ से  जैसा भी मुझे  ख़्याल  आया मैंने सब कुछ  बयाँ कर दिया
दिल के एक हिस्से में आग लगाई औ" दूसरे हिस्से को धुआँ कर दिया

ज़िंदगी के  हरेक कदम  के लिए  कई टुकड़ों में  अपनी ज़मीं तलाशी
औ" बाद उसके  तलाशे  ज़मीं के सारे टुकड़ों  को  आसमाँ कर दिया

वो सबसे पुरानी  किताब  निकाली जिसमें कभी  एक ग़म महफूज़ था
मैंने फिर से पढ़ा औ"  एक-एक  हर्फ़ को ग़मों का आशियाँ कर दिया 

वो एक आवाज़  उठी थी  तो तख़्त  हरेक  सियासत का हिल उठा था
हुक़ूमत ने  उस हरेक शख़्स को तलाशा  औ"  फिर बेज़ुबाँ कर दिया

वो बस एक चिंगारी थी मगर जो आग दिलों में जली बहुत भयावह थी
आग ठंढी तब हुई जब उस घर में  अलग-अलग  कई मकाँ कर दिया

'धरम' वो बात जो मुझसे निकली थी वो मुझ तक फिर से पहुँच तो गई
ज़माने ने बात भी बदली औ" एक अलग ही  अंदाज़-ए-बयाँ कर दिया

Thursday, 21 November 2019

एक ग़ुमनाम शहज़ादा ही रहा

दाग दामन में बहुत लगे  फिर भी  किरदार सादा ही रहा
कि ऐ ज़माना तुमको यकीं मेरे ऊपर कुछ ज़्यादा ही रहा

ज़ख्मों से न तो कभी दिल जला न ही बदन में आग लगी
दरम्यां  ज़ख्मों के सुलगकर जीने का बस इरादा ही रहा

ख़ुद अपने ही दिल में एक लकीर खींची फ़ासला बनाया
मैं दिल के दूसरी ओर था एक ग़ुमनाम शहज़ादा ही रहा

पूरा का पूरा ज़िस्म सिमटकर  मेरे दिल में समा गया था
बावजूद इसके भी ज़िस्म उसका 'धरम' कुशादा ही रहा