Thursday, 13 January 2022

एक चेहरा-ए-बशर चाहिए

हर कदम पर नई कश्ती  हर सफ़र में  नया समंदर  चाहिए 
ऐ! दिल-ए-परेशां  तुझे हर ज़ख्म पर  ख़ून-ए-जिगर  चाहिए 

हवा  शाख़ से पत्ते को उड़ा ले गई   शजर  बस  देखता रहा  
ऐ! बवंडर  तुम्हें अपने  जुनूँ का और  कितना  असर चाहिए   

तलाश-ए-यार कैसे ख़त्म होगी  तुझे ख़ुद  इसका  पता नहीं 
ऐ! अँधेरे के  अक्स तू  ये बता की   तुझे कैसी  नज़र चाहिए 

जो मेरे दामन की बुलंदी थी  वो किस-किस  को  नसीब हुई 
मुझे तो नहीं  मगर हाँ!  ज़माने को इसकी पूरी ख़बर चाहिए 

वो एक  शक्ल पर  मुखौटों चेहरों का चढ़ना-उतरना "धरम"
बावजूद इसके भी उस शक्ल को एक चेहरा-ए-बशर चाहिए 

Monday, 29 November 2021

फ़ना-ए-नस्ल

कि एक भी जाम कभी तश्ना-लब तक  पँहुच न सका  
क़ातिल का इरादा  कभी क़त्ल  तक   पँहुच न सका  

कि सूरत-ए-यार  बनाते बनाते  इल्म दम   तोड़ गया 
मगर वो  कभी  उसकी  शक़्ल तक  पँहुच   न सका

उम्र-ए-उम्मीद-ए-इश्क़  दोनों  के उम्र से ज़ियादा थी 
नतीजा यूँ  हुआ की  कभी वस्ल  तक पँहुच  न सका

"धरम" वो इश्क़ न था  बस एक  झूठी  मोहब्बत थी   
वो इश्क़ क्या जो  फ़ना-ए-नस्ल तक  पँहुच न सका

Monday, 31 May 2021

चंद शेर

1.

जब भी दिये की आढ़ में  अपना दिल जलाया 
बस "धरम" एक  सुहाना मुस्तक़बिल जलाया 

2.

कि हर मुलाक़ात में वो मुझे एक नया चेहरा देता है 
औ" मेरे हर पुराने चेहरे पर 'धरम' वो पहरा देता है 

3.
बुलंद हौसले "धरम" घुटनों के बल चले कदम साथ न चला 
कि न तो तजुर्बा साथ चला औ" न ही कभी राश्ता साथ चला

4.
कि ज़िंदगी हर कदम मेरे आरज़ू से कमती रही   
मेरे हर सजदे पर "धरम" मेरी बंदगी घटती रही 

Tuesday, 11 May 2021

चंद लम्हें आवारा लाता था

रास्ते की  हर  रौशनी  जीवन  में  एक नया  अँधेरा  लाता था 
वो उगता  हुआ सूरज  कहाँ कभी  मेरे लिए  सवेरा लाता था 

साथ ज़माने  भर का था  तो जरूर  मगर  कभी पता न चला 
कि कौन  मेरे लिए  समंदर लाता था  कौन किनारा लाता था

यूँ तो नए  ज़ख्मों का दर्द बड़ा ही नायाब होता था  मगर क्यूँ 
दिल उस सख्श को ढूंढता था जो हर ज़ख्म दुबारा लाता था

वक़्त अब मरहम  अपने साथ ले जाता है  ज़ख्म छोड़ देता है 
कहाँ गया वो वक़्त जो साथ अपने चंद लम्हें आवारा लाता था 

बाद एक शाम के दूसरी शाम हो जाती थी दिन नहीं होता था  
रात ज़िंदगी तो क्या मौत के लिए भी न कोई सहारा लाता था

न जाने  क्यूँ  अपनो के बीच भी "धरम" हमेशा दम घुँटता था  
वो कौन था  जो हर रोज  मेरे लिए  साँस का पिटारा लाता था 

Wednesday, 17 March 2021

अपनी नीयत देख लेना

हाल-ए-दिल सुनाने से पहले अपनी नीयत देख लेना 
बाजार में उतरने  से पहले  अपनी कीमत देख लेना 

आईना एक चेहरे में सिर्फ एक ही चेहरा दिखाता है 
तुम ख़ुद से अपनी आँखों में  अपनी सूरत देख लेना 

आसाँ नहीं खज़ाना-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी महफूज़ रखना 
किस सख़्श पे  लुटानी है  कौन सी  दौलत देख लेना 

क्या बरपा था उस शाम  मुझे कुछ भी तो  याद नहीं 
वक़्त का बस तकाज़ा था  तुम मेरी   तुर्बत देख लेना 

ख़ुद से भी  अहद-ए-रु-ब-रु  करने  से पहले "धरम" 
ज़िंदगी से  ख़ुद के लिए  पाई हुई मोहलत देख लेना 

Sunday, 20 December 2020

मंज़िल को ही ज़मीं निंगल गई हो

रास्ते कल के  क्या होंगे  जब मंज़िल को ही ज़मीं  निंगल गई हो 
चीख को समंदर खा गया हो रौशनी आसमाँ कहीं में खो गई हो

एक मुद्दत से चेहरे पर मायूसी का राज है जो अब भी आबाद है 
कोई भी ख़ुशी वापस कैसे आए जब सब के सब कहीं खो गई हो 

महज साँस लेने को ही एक पूरी मुकम्मल ज़िंदगी कहना पड़ता है 
जब हरेक ख्वाईश चादर ओढ़े अपने कब्र-ए-मुक़र्रर में सो गई हो  

अँधेरा ऐसा है की सूरज के निकलने से कोई फ़र्क पड़ता ही नहीं 
गोया शाम रात के आगोश में ऐसे सोई की जैसे कहीं खो गई हो

हर लम्हा ऐसा बीतता है मानो साँस टूटने से पहले दम टूट जाता है  
ख़ुद अपनी ही नज़रों में अपनी ही नज़र "धरम" कहीं  खो  गई  हो

Tuesday, 8 September 2020

चंद शेर

 1.

वो चिराग़ ग़र जले तो घर जले  न तो बस बुझा रहे 
वो ख़ार जब भी उपजे "धरम" तो सीने में चुभा रहे 


2.

हरेक ख्वाहिश "धरम" रात सिरहाने से लुढ़ककर  क़दमों में पहुँचती है 
दिन भर पैरों तले कुचलाती है औ" फिर शाम ढ़लते ही सर चढ़ जाती है

Tuesday, 2 June 2020

न ही शक्ल नायाब हुई

जब भी कुछ लिखा  कागज़ की  शक्ल खराब हुई
औ" ग़र खुल गई ज़ुबाँ  तो ज़िंदगी ही  अज़ाब हुई

ज़िंदगी जब तलक  ग़म के साये में थी महफूज़ थी
वो ग़म न था  ख़ुशी थी  जिससे  ज़िंदगी यबाब हुई

वो एक ख्वाईश थी  जो मिल भी गई तो कुछ नहीं
पहले भी  न कभी दिल जला न ज़िंदगी बेताब हुई 

ख़ुद ही के दो अलग-अलग  किरदार को मिलाया 
न तो सूरत-ए-कलम हुआ न सीरत-ए-ज़काब हुई

उसके हर बात पर अड़ा रहने का नतीजा 'नीरस' 
न तो ओहदा ऊँचा हुआ  न ही शक्ल  नायाब हुई 

Thursday, 30 April 2020

चंद शेर

1.
कि एक उम्र से ठहरी है  ये किस मोड़ पर ज़िंदगी
'धरम' क्यूँकर रास आ ही नहीं रही कोई भी बंदगी

2.
ग़र बात आपके जान की होती तो लहू अपना छलका देता
कि उतारकर आसमाँ से चाँद  आपके माथे पर चस्पा देता

3.

वो  शख़्स कौन था  "धरम"  उसकी उम्र कितनी थी
वो एक चाँद था औ" उम्र उसकी सितारों जितनी थी

4.
दरम्यां ज़िंदगी और मौत के फ़ासला सिर्फ़ एक सांस का कभी न था
हर दरिया मोम का था  कदम आग के थे औ" रास्ता उम्र भर का था

5.
कि कल का ख्याल कर कभी आज को जी न सका
हर घूँट गले में उतारा मगर एक भी घूँट पी न सका

Monday, 13 April 2020

ख़ुद अपने ही सफर ने मुझको

कई बार  यूँ ही लूटा है  ख़ुद  अपने ही  शहर ने मुझको
कि सरापा  डुबोया है  ख़ुद  अपने  ही  क़हर ने मुझको

वर्षों तक खुली ऑंखें औ" नींद का बिल्कुल ही न आना 
ये आलम भी दिखाया है  ख़ुद अपने ही नज़र ने मुझको 

एक बार मंज़िल पहुंचाया  और  फिर ता-उम्र भटकाया
ये अपने ही हाथों सजाये  ख़ुद अपने ही डगर ने मुझको

मौत से कदम भर का फ़ासला  औ"  उम्र भर का वास्ता
क्या खूब सिखाया 'धरम' ख़ुद अपने ही सफर ने मुझको