Monday, 11 August 2025

दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

यादों का झोंका कभी सुकूँ से सोने नहीं दिया
कि सलोने सपनों को कभी संजोने नहीं दिया

उसे बुत-ए-मसीहा के अलावा और क्या कहूँ 
वो जो तन्हाई में भी कभी मुझे रोने नहीं दिया

मेरे क़त्ल की गवाही वो ख़ंज़र ख़ुद देता रहा       
कैसा ख़ंज़र था दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

आज महताब नक़ाब में है रात भी शरमाई है  
महफ़िल ने चाँदनी को धूमिल होने नहीं दिया
  
उसका क़तरा पर कभी तो कोई एहसान था  
जो समंदर ने उसे ख़ुद को डुबोने नहीं दिया

अपने साये से बिछड़कर रौशनी खोजता है 
शख़्स जो कभी कोई  सूरज बोने नहीं दिया

दोस्ती की चादर  उसके साथ ओढ़ूँ तो कैसे 
वो तो एक भी सूत "धरम" पिरोने नहीं दिया 

Wednesday, 6 August 2025

गर्दन गुल-पोश है

मसीहा ही क़ातिल है हुक्मरान ख़ामोश है 
कि क़ातिल के लहू में बहुत गरम-जोश है

कभी फूलों को हटाईये गिरेबाँ तो देखिए  
कि बर्षों से तो आपकी गर्दन गुल-पोश है

आप न तो यहाँ आईये न ही दिल लगाईये    
सबकी तबी'अत तो यहाँ ख़ाना-ब-दोश है

कैसा क़र्ज़ है कि रस्म-अदायगी पता नहीं
अब खाली हो चुका अपना वफ़ा-कोश है 
 
पहले नज़दीक आईये फिर हाथ मिलाईये   
कि यहाँ हाथ मिलाना भी एक आग़ोश है

मंज़िल-ए-मक़सूद  जब नज़र में आ गया    
फिर बाद उसके बची ज़िंदगी बे-जोश है

अब क्या बात करें  किससे नज़र मिलायें  
यहाँ सबका चेहरा तो "धरम" रू-पोश है  

Saturday, 19 July 2025

दोनों अरमाँ निगलते हैं

जो लोग मरकर सितारे बनते हैं आसमाँ में मिलते हैं 
वो लोग उस जहाँ में भी एक दूसरे के होंठ सिलते हैं

सुबह कोई और सूरज था  शाम कोई और सूरज है 
कि ज़मीं हो या हो आसमाँ  दोनों अरमाँ निगलते हैं 

वक़्त ने जो भी मरज दिया मुसलसल बढ़ता ही गया  
कैसे कह दें कि वक़्त के मारे लोग कभी सँभलते हैं

जिन जुगनुओं की उम्मीद पर मैंने चिराग़ बुझा दिया
पता न था वो सारे मेरे दुश्मन के इशारों पर जलते हैं

वो जो सच्चाई है सब को पता है ज़मीं में दफ़्न भी है
लोग किस क़ब्र में गड़ते हैं किस क़ब्र से निकलते हैं 
    
इस बारिश के मौसम में "धरम" दो रंगों के बादल हैं  
दोनों साथ घिरते हैं  दोनों पानी औ" आग उगलते हैं 

Saturday, 12 July 2025

मिट्टी में समा गया

कैसे आँखों के आगे बादल सा कुछ छा गया
रूह जिस्म से निकलकर मिट्टी में समा गया
 
आवाज़ अनजानी थी चेहरा भी अनजाना था
न जाने क्यूँ आया औ" गीत ख़ुशी के गा गया

ख़ामोशी से आया शायद ख़ुदा का करम था     
आकर उजड़े गुलसन को फिर से बसा गया

ख़ामोशी ने शोर से न जाने क्या उधार लिया
सुकूँ के समंदर से भी अब सन्नाटा चला गया

ख़ुर्शीद का एहतराम करना चाँद को चूमना 
जाने क्यूँ इस बात पर दिल फिर पथरा गया
        
फूलों के क़त्ल का "धरम" कोई ग़वाह न था
बड़ी आसानी से बाग़बाँ बाग़ को भरमा गया

Saturday, 21 June 2025

आसमाँ के ऊपर छत देखना

ये ऐसी हक़ीक़त है कि इसको ख़्वाब में भी मत देखना 
कि मन का एक वहम है आसमाँ के ऊपर छत देखना
 
जंग दो दिलों के दरमियान है यह कोई ख़ूनी खेल नहीं 
ऐ! तुर्बतों में दफ़्न एहसासात  तुम अपनी बढ़त देखना
   
परिंदों ने आशियाँ सजाया था  तुमने दरख़्त काट दिया 
ऐ! आदम-ज़ाद तू अब यहॉँ हर मंज़र में ख़ल्वत देखना

दोनों अपने जज़्बात को एक साथ सिलना जूड़ा बनाना   
ये बातें किताबी हैं अपने यार की बाँहों में जन्नत देखना

यह कोई मामूली मरज़ तो नहीं है मक्कारी का नशा है  
बाद फ़रेबी के आईने में अपना क़द्द-ओ-क़ामत देखना 
  
छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते का क़त्ल यह गुमाँ कैसा है
दिल को पसंद नहीं  औरों की शान-ओ-शौकत देखना

कि वक़्त ढल चुका है अब वहाँ से क़याम करो "धरम"
बाद में नफ़ा'-नुक़सान खोजना अपनी तबी'अत देखना

Friday, 30 May 2025

परिंदा कोई बेनाम यारो

आसमाँ को गिरने दो इसे और न अब थाम यारो
हो जाने दो अपने भरम का तश्त-अज़-बाम यारो

इमां तो बिक चुका है मगर डर अब भी ज़िंदा है 
यहाँ अब काम कोई होता नहीं खुले-'आम यारो

कोई तो सितम हुआ की गर्दन उसकी झुक गई  
यहाँ कौन करता है  सर-ए-आम एहतिराम यारो

ख़ुशी या ग़म जो भी हो एक चराग़ रौशन करना 
कभी ज़िंदगी में ग़र हो कोई सुब्ह या शाम यारो

जिस्म ज़िंदा है मगर रूह तो सबका मर चुका है
कुछ तो बताओ यहाँ कैसे करते हो क़याम यारो  
        
अभी तो क़ाफ़िला चला ही है मंज़िल अभी दूर है
अभी से इतना मत किया करो दुआ-सलाम यारो

अभी तो सिर्फ़ ज़ुबाँ कटी है और सब सलामत है    
ठहरो की अभी कुछ और भी मिलेगा इनाम यारो

ख़याल नहीं "धरम" मगर उसका कुछ नाम तो है   
ख़ुद को तो वो कहता है परिंदा कोई बेनाम यारो       


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तश्त-अज़-बाम : भेद खुलना
एहतिराम : सम्मान

Tuesday, 27 May 2025

राष्ट्र प्रथम पर एक कविता

धर्म पूछ कर मारा जिसने 
माँ भारती को ललकारा जिसने 

वे मानवता पर हैं कलंक हैं नर-पिचाश के वंश 
अपने इस कुकृत्य का झेलना होगा इन्हें दंश 

ये सनातनी परंपरा है सिन्दूर है अनमोल 
इसे किसी भी तुला पर न पाओगे तोल 

छेड़ा है तुमने तो मोल चुकाना होगा 
आसमाँ से बरसेगी आग तुम्हें बस पछताना होगा 

जहाँ हो नारी शक्ति, वीर सपूत और धर्म भी हो साथ 
उस पवन धरती का अपमान करोगे तो काट जायेगा हाथ 

यहाँ तुमने मासूमों का अकारण रक्त बहाया है 
ऐ आतंकियों तुमने तो मानवता को भी भरमाया है 

कायरों की भाँति तुमने वार किया है आम जनों पर 
अब तो बरसानी होगी आग तुझ जैसे सर्पों के फनों पर 

तुझ जैसे पापियों को न्याय क्या है बतलाना होगा 
अदम्य साहस शौर्य पराक्रम का परिचय देना होगा 

लो ये बरसी आग तुझपर इससे अब न बच पाओगे 
अगर बच भी गए तो जीवन में और क्या पाओगे 

यह भारतवर्ष है सर्पों से भी युद्ध में धर्म नहीं छोड़ेगा 
"जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे" से युक्तियुक्त संधान करेगा 

नमन है यहाँ की सेना को उन सशस्त्र बल को 
जिन्होंने कुचला है आतंकियों को और उसके शीश महल को 

विश्व को धर्म का मार्ग बतलाते हैं यहाँ के सपूत 
सब मिलकर इन्हें नमन करें ये हैं मानवता के दूत 

इनके साहस शौर्य पराक्रम की गाथा का बार-बार करें गुणगान 
और शहीदों को दें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि और सम्मान 

!! भारत माता की जय !! 
!! जय हिन्द की सेना !!

Thursday, 15 May 2025

ज़मीं से निकाल कर लिया

ज़िंदगी पर जो फ़ैसला लिया सिक्का उछाल कर लिया
दोस्ती हो या दुश्मनी जो मिला  ख़ुश-ख़याल कर लिया

रंग-ए-मिज़ाज़ रंग-ए-फ़िज़ा ही रहा  और आरज़ू न रही
रंग-ए-स्याह को भी क़ुबूल अबीर-ओ-गुलाल कर लिया

यहाँ इंसाफ़ के तराजू का एक पलड़ा हमेशा भारी रहा   
बग़ैर जुर्म के भी ग़र कोई सज़ा मिली हलाल कर लिया

वो महज़ जुर्म न था बर्बरता की एक जागती मिशाल थी    
माज़ी का हिसाब मौजूदा ने ज़मीं से निकाल कर लिया

वह ईमान का सौदा था वहाँ ज़मीं भी थोड़ी धँस गई थी
इंसानियत जो मंज़र कभी न देखा था बहाल कर लिया
     
आरज़ूओं की महफ़िल थी वहाँ मोहरों की नुमाइश थी 
इम्तिहाँ ऐसा कि "धरम" बर्फ़ को भी उबाल कर लिया

Wednesday, 30 April 2025

दिल को कभी हैरत में न रखना

आँसुओं को बरसने देना यूँ किसी सियासत में न रखना  
दुनियाँ बड़ी ज़ालिम है दिल को कभी हैरत में न रखना

जज़्बात दिल-ओ-दिमाग की खेती है अनमोल फसल है  
तिरे जज़्बात तेरे अपने हैं  ग़ैरों की हिरासत में न रखना

आरज़ू-ए-दिल है मोहब्बत बुलँद है कोई ख़ौफ़ भी नहीं 
इस बार तू क़ुबूल कर यूँ इसे फिर से तुर्बत में न रखना

उरूज़ बढ़ता गया कदम मुसलसल मुख़्तसर होते गये 
तन्हाई ही मंज़िल है मगर दिल को ख़ल्वत में न रखना

कि आने वाली फ़िज़ा में मौसम सारे एक साथ आयेंगे
ये वक़्त का क़हर है मज्लिस-ए-'अदालत में न रखना

कि यहाँ आईना तीरगी में भी शक्ल दिखाता है "धरम" 
तुम अपनी शक्ल से ख़ुद को अजनबिय्यत में न रखना 

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तुर्बत : कब्र
ख़ल्वत : तन्हाई

Friday, 4 April 2025

पत्थरों के बयान और भी होंगे

आगे बढ़ो कि ज़ख़्मों के निशान और भी होंगे 
राह में मील के पत्थरों के बयान और भी होंगे
  
बुलंदी की मंज़िल पर  तू अभी पहुँचा कहाँ है  
बस बढ़ते चलो की आगे ढलान और भी होंगे
 
वो बात महज़ उस एक लम्हे की न रही होगी      
पुराने लम्हे  दोनों के दरमियान और भी होंगे

ख़बर न थी बज़्म में रात ख़ामोशी में गुजरेगी
यूँ महफ़िल में शामिल बे-ज़बान और भी होंगे

दिल में कोई याद नहीं ज़ख़्म सारा भर चुका
अब तो इस दिल के इम्तिहान और भी होंगे

एक ही बार में तीर निशाने तक नहीं पहुँचा  
कि दरमियान दोनों के कमान और भी होंगे

जो तख़्त-नशीं थे उनको कभी यकीं न हुआ        
कि उन आक़ाओं के हुक्मरान और भी होंगे

समंदर अभी पूरी तरह से सोया नहीं "धरम" 
कि लहरें और भी होंगीं उफान और भी होंगे