Sunday, 18 June 2017

अपना घर जला दिया था

तेरे पहलू में आने से पहले मैंने अपना घर जला दिया था
ऐ! ज़िंदगी तुझे पाने के लिए मैंने सब कुछ भुला दिया था

कि ढ़लते हुस्न की तरह ही तेरे भी लौटने की नाउम्मीदी
ना कुछ हुआ तो तूने रुख़्सत के वक़्त कील चुभा दिया था

अब यहाँ से मैं किसके पहलू में जाऊँ किसका दीदार करूँ
मैंने तो अपने हर रिश्ते को बहुत पहले ही दफ़ना दिया था

मेरे इश्क़ औ" तेरे हुस्न को कुछ भी तो मुकम्मल ना हुआ  
तूने मुझे तो बस सर-ए-आम एक तमाशा ही बना दिया था

ग़र खोल दूँ जुबाँ तो रुस्वाई चुप रहूं तो उम्र भर की तन्हाई
खुद अपने ही पहलू में तूने मुझे ये किस तरह गँवा दिया था

ज़िंदगी अब तुम क्यूँ आओ मेरे ख़्वाब में ही हक़ीक़त में ही
मैंने भी तुझे 'धरम' दिल-ओ-जां-ओ-ज़िस्म से हटा दिया था

Friday, 9 June 2017

चंद शेर

1.
कि उसका ख़्याल आने से पहले उसकी हर याद मिटा दो
अपनी बची-खुची ज़िंदगी "धरम" तुम इस तरह मिटा दो

2.
कहीं चैन न मिला सुकूँ भी ख़ुद "धरम" दम साध कर बैठा है
अब लिपट जाओ अपनी तन्हाई से तू क्यों अकेले लेटा है

3.
कि मेरी महफ़िल में होना भी औ" तन्हा भी रहना
तेरी बेदिली पर "धरम" मुझे अब और क्या कहना

4.
'धरम' ये जो कलम की चीख़ है वो दिल की पुकार भी है
मैं ऐसा शख़्स हूँ जो चलता भी हूँ और मेरा मज़ार भी है 

कहाँ कुछ दिखता सुहाना होगा

तेरे आंसुओं के एक-एक बूँद का हिसाब अब मुझे चुकाना होगा
मैं चाहे कितनी भी बार मरुँ कि बाद उसके एक बार जीना होगा

कि जो बात अदा से शुरू हुई थी वो कज़ा पर जाकर ख़त्म हुई
ऐ! मौत तुझको ख़ुद तेरी इस बेरूख़ी पर एक बार मरना होगा

अपने लहू के रंग में हमने दामन के हरेक दाग को छुपा दिया
कि तेरे इंसाफ के लिए मुझे ज़माने को हर दाग दिखाना होगा

ग़र तेरी नज़रों में गिरने से पहले मुझे अपने आप को बचाना है
तो तुझसे रुख़्सत के वक़्त मुझे ख़ुद अपना चेहरा छुपाना होगा

ये कैसे कह दूँ कि तेरा नाम सुनकर अब दिल मेरा नहीं भरता
हाँ! अफसोस मगर यह है ख़ुद मुझे ही तुमको ये बताना होगा

अच्छा है तुम अपनी उड़ान उड़ो औ" मैं अपने लिए ज़मीं तलाशूँ
कि आसमाँ से ज़मीं पर "धरम" कहाँ कुछ दिखता सुहाना होगा

Wednesday, 7 June 2017

तन्हाई लिपटती है

तन्हाई लिपटती है मुझसे मेरे बिस्तर पर
कोई शर्म नहीं उसको कोई हया भी नहीं
न वो रंग बदलती है औ" न ही चेहरा
उसके बदन की ख़ुश्बू आठो प्रहर एक सी है

उसका स्पर्श अतीत भी है और भविष्य भी
उसे कितना भी काटो कटती नहीं है
बांटो तो फिर बस बढ़ने लगती है
मानो ये कह रही हो की मुझे मत छेड़ो
मुझे अपने अंदाज़ में रहने दो जीने दो
तुम मुझसे और मैं तुझसे अलग तो नहीं
तुम्हारे और मेरे दरम्याँ कोई दूरी तो नहीं

अब तक मैं ही तुझसे लिपटती आई हूँ
अब तुम भी मुझसे लिपटो
मेरा आलिंगन करो
यकीं मानो मैं तुझको धोखा नहीं दूंगी
मैं तुम्हारे दिल का वो हिस्सा हूँ
जो हमेशा तुम्हारे साथ रहता है

Friday, 2 June 2017

श्रम करो कठिन

परीक्षा परिणाम गड़बड़ाया तो लगे अब चिल्लाने
कि खुद अपनी ही करनी पर अब लगे छात्र भरमाने

कि अब लगे छात्र भरमाने की गलती है यह किसकी
हंगामा करें जहाँ तहाँ और सर फोड़े जिसका तिसका

फोड़ के सर जिसका तिसका से अब नहीं बनेगी बात
ग़र सुधरना है तो खुद से मारो अपने सीने पर लात

मारे अपने सीने पर लात तो दिखेगी खुद की गलती
कि कठिन समय में कभी मत मढ़ो दूसरों पर गलती

मत मढ़ो दूसरों पर गलती तब ही बन पाओगे पक्का
अहो! नहीं तो रह जाओगे बाबू तुम जीवन भर कच्चा

जीवन भर रहना है कच्चा या छूना है तुमको आसमान
कि चाहिए तुमको हाथ में लाठी या उत्थान हेतु सामान

उत्थान हेतु पकड़ो तुम दोनों हाथ से विद्वानों के पैर
और गहो चरण उनकी नहीं तो अब न रहेगी तेरी खैर

न रहेगी खैर कि सरकार बस वहां अलापेगी अपनी राग
इस राक्षश पेट के खातिर वतन से पड़ना सकता है भाग

पड़ना सकता है भाग यदि तुम नहीं बने मंत्री का भड़वा
सत्य यही है बाबू चाहे लगे तुमको यह कितना भी कड़वा 

हाँ कड़वा है यह भी सत्य कि शिक्षकों के गुणवत्ता के नाम
बहाल हुए है कई नर-पिशाच सरकार से पाते भी हैं ईनाम

कि पाते भी हैं ईनाम मगर तुम उन पर अपना मत दो ध्यान
खोजो निज भविष्य तो मिलेंगे गुदड़ी में भी गुरु कोई महान

यदि मिलें गुरु कोई महान तो बाबू बस बन जाएगा तेरा काम
और श्रम करो कठिन ध्यान में रखकर अपने पूर्वजों के नाम

आओ अब सब मिलकर बोलें "जय श्री राम जय श्री राम"

Sunday, 28 May 2017

हँस के टाल देता है

कि दरिया अनगिनत छोटे तरंगो को हँस के टाल देता है
कतरा एक छोटे तरंग से ही अपने आप को उबाल लेता है

कि कहीं तो भरी महफ़िल में भी कई चेहरा उदास रहता है
कहीं तो लोग हिज़्र में भी ढेर सारी खुशियाँ निकाल लेता है

कि एक तो मतलबी दुनियाँ औ" उसपर ये दौर-ए-इलज़ाम
अहा! ऐसे में भी कुछ लोग खुद अपनी गर्दन हलाल लेता है

कि कहीं तो वक़्त कुछ तारीख़ी ज़ख्मों को बखूबी भर देता है
कहीं तो वक़्त कुछ पुराने ज़ख्मों पर भी इस्तेहार डाल लेता है

कि कुछ लोग यहाँ तो गैरों के धक्का-मुक्की से भी गिर जाते हैं
कुछ तो "धरम" अपनो के धक्के पर भी खुद को सँभाल लेता है 

Saturday, 27 May 2017

चंद शेर

1.
ग़र ज़माने के नज़रिया में "धरम" मेरा दो चेहरा है
तो लो मेरे नज़रिया में ज़माने का भी दस चेहरा है

2.
मेरे गिरेबाँ में ज़माने वालो तुम यूँ ही मत झाँकों
कालिख़ वाला चेहरा "धरम" खुद अपना भी ताको

3.
ये तेरी ही तो ख़ुदाई है जो मुझसे वसूली जाती पाई-पाई है
कि मुझको लूटे ज़माना "धरम" औ" सज़ा मैंने ही पाई है

4.
मेरे महफ़िल में "धरम" अब तेरा आना कम होता है
कि ये बात तो अच्छी है मगर देखकर ग़म होता है

5.
जो भी बची खुची बातें हैं "धरम" सिर्फ बेमानी है
न सीने में धड़कता दिल है न आखों में पानी है

6.
बुझते बुझते जल उठा "धरम" मन में फिर से भाव
हाँ! मगर इस भाव में था संवेदना का घोर अभाव

7.
मुझे कोई रौशनी मयस्सर नहीं "धरम" मेरा सूरज ही खुद अँधेरे में है
जिधर भी देखूं सिर्फ अंधकार है कि मेरा मुक़द्दर ही डूबता सवेरे में है

8.
मुँह पर पूरी पुती है कालिख़ फिर भी गाते रहते अपने उसूल
कि बात अगर नहीं माने तो "धरम" सीने में चुभा देते है शूल

9.
छद्म भिखारी बनकर लूटते औ" गाते अपना गुणगान
कि कौड़ी के भाव यहाँ "धरम" अब बिक रहा सम्मान

10.
कि एक लाठी के सामने सब ज्ञान है तेज बिहीन
अहो! "धरम" अब यहाँ कौन है ज्ञानी से भी दीन

11.
अजब खेल देखो ज़माने का यहाँ सब कुछ चल रहा है उल्टा
कि चरित्र प्रमाण पत्र "धरम" अब तो यहाँ बाँट रही है कुलटा

Friday, 26 May 2017

रूह के आकार का आंकलन

तुम्हारा रूह विहीन भौतिक उपस्थिति
मेरे लिए बस एक भ्रम ही है तुम्हारे होने का
हाँ! तुम मेरे होने या न होने के भ्रम से
बहुत पहले ही निकल चुकी हो
यह मानकर कि मेरे रूह में
अब तुम्हारे रूचि का कुछ भी नहीं

मेरे रूह के प्रति तुम्हारा यह दर्शन सतही है
तुमने हमेशा मेरे रूह में उगे हुए
ऊंचाई के परछाँही को देखा हैं
सतह पर परछाँही दिखाई देती है
तुम्हें ये परछाँही देखने में
कोई मस्सकत नहीं करनी पड़ी
ऊंचाई का अक़्स सिर्फ धोखा है
प्रकाश के ख़त्म होने के साथ
वह विलीन हो जाता है

रूह के अंदर घुसकर देखना जरूरी होता है
संवेदनाएं तैरती हैं यहाँ
ढेर सारा आकार लेकर
कुछ रूह में बने गड्ढों में अटक जाती हैं
और कुछ ऊंचाई के पीछे छुप जाती हैं
ऐसी सारी संवेदनायें बाहर दिखाई नहीं देती
और न ही इनका अक़्स सतह पर दिखाई देता है
इन्हें महसूस करने के लिए
तुझे अपने रूह को मेरे रूह में उतरना पड़ता
यह एक कठिन काम है
खासकर उनके लिए
जो रूह को जिस्म से हमेशा कमतर आंकते हैं
और रूह के आभाषी आकर को देखकर
अपने रूचि की चींज़े खोजते हैं

रूह के अंदर गड्ढों में फंसी
वैसी ढेर सारी संवेदनाओं का चीत्कार
सतह तक नहीं पहुंच पाती
और ऊंचाई के पीछे फंसी संवेदनाएं
अपने होने का एहसास नहीं करा सकती
खासकर उन्हें
जो सतह को ही पूर्ण सत्य मानते हैं

तेरे रूह के आकार का आंकलन करना
मुझसे तो कदापि संभव नहीं
हाँ! मगर मेरे रूह का आभाषी आकार
अब तुमको मुबारक़ हो

पथिक हो तुम

पथिक हो तुम
और मैं तो बस एक पड़ाव था
तुम्हारे जीवन काल के रास्ते का
शायद बीच का ही कोई हिस्सा कह लो तुम
मैं अपने से पिछले पड़ाव को जानता हूँ
जहाँ तुम कभी ठहरी थी ठंढी सांस ली थी
और साथ में ज़िंदगी के चंद यादगार लम्हें भी

पथिक हो तुम
एक ही पड़ाव पर पूरी ज़िंदगी बिताना
तुम्हारे रूचि का नहीं
हाँ! तुम्हारे लिए
जीवन के यात्रा में बदलाव जरूर है
तुम्हारे कदम आगे बढ़े
अब तुम अगले पड़ाव पर थी
और तुम्हारा वो पड़ाव मैं था
मैंने स्वागत किया तुम्हारा
हाँ! मगर जब भी
पिछले पड़ाव का ख़्याल आता था
मेरा मन दुखता था
मुझे ऐसा लगता था की मैंने
पिछले पड़ाव से उसका पथिक छीन लिया
ये ज़द्दोज़हद मुझे बहुत दिनों तक कौंधता रहा
मगर मैं भी तो एक पड़ाव ही था
एक पड़ाव दूसरे पड़ाव से पथिक कैसे छीन सकता है
पड़ाव स्थिर है और पथिक चलायमान
यह बात मुझे तस्सली देती थी
बाद इसके
हाँ ख़ुशी इस बात की थी
की मेरे पड़ाव पर एक पथिक का
चंद दिनों के लिए ठहराव था

पथिक हो तुम
तुझमे बदलाव को भाफने इल्म है
और बाद चंद दिनों के
तुमने खुद मुझमें बदलाव देखा था
तुम्हारे लिए मुझ पड़ाव पर के
सारे फूल सुगंध विहीन हो गए थे
सारे दरख्ते छाहँ विहीन हो गए थे
सारे पक्षी सुर विहीन हो गए थे
निर्मल जल अब पीने लायक नहीं था
बूढ़े दरख़्तों के फल सड़ने लगे थे
इतने बदलाव महशूस करने के बाद
तुमने मुझ पड़ाव का त्याग कर
और कदम अगले पड़ाव के लिए बढ़ा दिया

पथिक हो तुम
तुझमे पड़ाव के दर्द को महशूस करने की आदत नहीं
पड़ाव का दर्द तुम्हारे जीवन के गति को रोक देगा
और तुम हमेशा "कुछ नया" का अनुभव नहीं कर पाओगी

पथिक हो तुम
मैं तुम्हारे अगले पड़ाव को पहचानता हूँ
आत्मविश्वास के साथ यह नहीं कह सकता
की उसको अच्छी तरह से जानता हूँ
हाँ मगर वह पड़ाव तुम्हें अभी आनंद जरूर देगा
निश्चित ही तुम "कुछ नया" का अनुभव कर पाओगी
मुझे पता है पथिक स्वभावबस चलायमान होता है
जिस दिन मेरे से अगले पड़ाव पर तुमको
मुझ जैसा पड़ाव का ही अनुभव होने लगेगा
तुम्हारे कदम फिर से उसके अगले पड़ाव की ओर चल पड़ेंगे
तुम्हारे ज़िंदगी का रास्ता बहुत लम्बा है
और इसमें ढेर सारे पड़ाव भी आएंगे
तुम स्वभावबस एक के बाद एक पड़ाव को
पीछे छोड़ते हुए अपने जीवन में आगे बढ़ते जाओगी

हाँ! वास्तव में एक पथिक हो तुम 

Friday, 19 May 2017

खूब हुआ बकवास

कि शूली पर यहाँ झूलते हैं माई के लाल
औ" खादी में हैं छुपे एक से एक दलाल

कि एक से एक दलाल करते हैं ता ता थैया
जहाँ भी देखो हैं इन्हीं के बाप या तो भैया

कि बाप हो या भैया हैं पकडे सबके ये रोटी
कहते कि चाहिये रोटी तो देना होगा बोटी

कि देना होगा बोटी नहीं तो ना गलेगी दाल
तेरे लिए तो है यहाँ अब सूखा और अकाल

कि सूखा और अकाल ग़ज़ब है इनकी माया
जनता भी लगी सोचने क्यूँ इससे भरमाया

कि क्यूँ इससे भरमाया अब नहीं सुनेंगे इसकी
चाहे बन जाये सरकार यहाँ अब जिसकी तिसकी

कि जिसकी तिसकी झोली में भी भरा हुआ है सांप
अपनी जनता सोचकर इस पर जाती है अब काँप

कहत कवि धरम हुआ खूब विकाश पर हास-परिहास
सब चलें अब अपने काम पर कि खूब हुआ बकवास