Saturday, 6 January 2018

चंद शेर

1.
हक़ीक़त में भी मेरी ज़िंदगी में 'धरम' तुम तुम न थे मैं मैं न था
औ" बाद मरने के भी मेरी कब्र में तुम न थे तेरी कब्र में मैं न था

2.
कि अभी तो मैंने बात रखी थी अभी ही उसने टाल दी
मेरे पैदा होने से पहले ही 'धरम' उसने गर्दन हलाल दी

3.
खुद तेरी ही महफ़िल में "धरम" तेरे नाम का कोई जाम भी नहीं
ये तेरी ज़िंदगी में कैसा मुक़ाम है कि अब तुम बदनाम भी नहीं

4.
कि तुमको आवाज़ दूँ तो दिल दुखता है न दूँ तो जी घबराता है
देखूँ जो गैरों से बात करते "धरम" तो पूरा बदन जल जाता है 

5.
हरेक दिलाशा महज़ एक भरम है हर जोड़ से टूटता करम है
बात तो सब के डूबने की थी पर क्यूँ डूबता सिर्फ "धरम" है

6.
कि दिल से दिल मिलाकर भी जब उसने वफ़ाई छोड़ दी
नज़र से नज़र मिलाकर "धरम" हमने भी बात मोड़ दी

Tuesday, 26 December 2017

खुद को भटकते दर-बदर देखना है

मुझे अब तो अगले वक़्त का आलम औ" सफर देखना है 
गुजरे वक़्त में जो पाया इल्म अब उसका असर देखना है

खड़ा रहूँगा चट्टान के मानिंद या उड़ जाऊँगा ग़ुबार बनकर
अपने कद-औ-कामत औ" गैरों के फूँक का असर देखना है

उठना चलना गिर जाना फिर उठना ऐसी ही मेरी फितरत है
वक़्त तू फिर बरस कि मुझे तो और खून-ए-जिग़र देखना है

पैरों तले ज़मीं खिसकना सर के ऊपर से आसमाँ निकलना
कि कितने और ज़हाँ में खुद को भटकते दर-बदर देखना है

सिर्फ चंद मौतें थोड़ी ज़मीं निगल लेना थोड़ा ज़हर उगल देना 
ऐ! समंदर मुझे तेरी उफ़ान का कुछ और भी क़हर देखना है

घूंट ज़हर का पीना औ" पचा लेना जिस ज़हाँ में मयस्सर नहीं
मुझे तो ऐसे ही किसी ज़हाँ में "धरम" अपना गुज़र देखना है

Sunday, 17 December 2017

चंद शेर

1.
महज़ एक ही ज़िंदगी में कितने और ज़िंदगी निकल जाते हैं
आँखें बंद ही रह जाती हैं "धरम" ख़्वाब सारे निकल जाते हैं 

2.
जब कभी "धरम" ख़्वाब में क़ातिल के शक्ल में मसीहा आए
मेरी बाहों में तेरी बाहें आए तस्सबुर में सिर्फ तेरा चेहरा आए

3.
कि जहाँ कुछ भी नहीं होता वहां मेरा ज़माना होता है
वहां के हरेक सन्नाटे से "धरम" मेरा फ़साना होता है 

4.
ऐ! मौत तुझे मुक़म्मल होने के लिए अभी कई और बुलंदी छूनी है
कि ऐसी मौत मरने की चाहत "धरम" ज़माने को तुझसे दुगुनी है 

Sunday, 10 December 2017

सारे अरमाँ हलाक़ हो गए

कि जिनसे उम्मीद-ए-लुत्फ़ थी अब वही ख़ाक हो गए
बस एक उसके जाने से मेरे सारे अरमाँ हलाक़ हो गए

कि ख़ुद बिखर के टूटे भी औ" टूट के फिर बिखर भी गए
खुद को क्या सिलें क्या छोड़ें जब खुद ही से चाक हो गए

कि फिर से जल उठने रौशन होने की उम्मीद ही बुझ गई
जब से हम हवा के महज़ एक ही झोकें के ख़ुराक़ हो गए

कि ये आप को मुबारक़ हो ये आप ही के दामन-ए-पाक़ हैं   
आपके पहलू में आकर हाय! मेरे सारे इरादे नापाक़ हो गए

कि न तो कोई ग़म ठहरता है न कोई ख़ुशी ही ठहरती है
क्यूँ कर मेरे दामन में "धरम" इतने सारे सुराख़ हो गए 

Sunday, 3 December 2017

चंद शेर

1.
ऐसा कर के मैंने "धरम" पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी
जब भी हिस्से में ख़ुशी आई मैंने ठोकर मार दी

2.
यहाँ अब न तो पैरों तले ज़मीं है न ही सर के ऊपर आसमाँ
कि "धरम" अब तुम निकलो यहाँ से ढूंढो कोई दूसरा जहाँ

3.
कि तुम्हारे दर्द-ए-दिल पर "धरम" सिर्फ तुम्हारा ही हक़ नहीं था
वो मेरी भी किताब-ए-ज़िंदगी का जलता हुआ आखिरी वरक़ था

4.
बिना ज़ुर्म के सजा न हो औ" न ही हो कोई सजा-ए-माफ़
सब को मिलनी चाहिए "धरम" अब यहाँ एक सा इन्साफ

5.
हर रोज सुबह से शाम तलक "धरम" अँधेरे की ही चाहत है
हम ख़ुद को क्या बताएँ कि क्यूँ दिल इस तरह से आहत है

6.
कि मैं ग़ुबार था "धरम" मुझे बस फूंक के उड़ा दिया गया 
औ" छिड़क के पानी बचा-खुचा वज़ूद भी मिटा दिया गया

Thursday, 23 November 2017

चंद शेर

1.
अपने रूह का जनाज़ा खुद अपने ही कंधे पर ढोता हूँ
मैं ऐसा सख़्श हूँ "धरम" खुद ही से खुद को खोता हूँ

2.
जब भी वक़्त को पकड़ा "धरम" ज़िंदगी रेत की तरह हाथ से निकल गई
किस्मत थोड़ी ही सी फिसली हाँ! ज़िंदगी उसके साथ और भी फिसल गई

3.
अपने अंदर के किस आग को जलने दूँ 'धरम' किस आग को बुझाऊँ
ऐ! वक़्त ये तेरी कैसी मार है कि मैं खुद अपने को भी न समझा पाऊँ

4.
वो तारा अभी पूरा टूटा नहीं 'धरम' तुझे खुद उसे तोड़ना होगा
कि अभी तो बस थोड़ा ही चले हो तुझे अभी और चलना होगा

5.
कि एक प्यास अभी और बुझानी है एक प्यास अभी और लगानी है     
ज़िंदगी एक ऐसा दरिया है "धरम" जिसकी हर वक़्त यही कहानी है

Sunday, 19 November 2017

एक दरिया सुकूँ का हो

एक दरिया सुकूँ का हो
और मैं उसमें बह जाऊँ
किनारा बीच और फिर किनारा
इस एहसास से परे
ज़िंदगी के कुछ लम्हों का सफर
ऐसा भी हो
कि दरिया पार भी कर जाऊँ
और पता भी न चले

कोई हलचल नहीं न ही कोई शोर
एक समान चाल एक लय एक ही रंग
होश-ओ-हवास खोकर
पहलू में सर रखूं
चिर निद्रा की चादर ओढूँ
खुद को खो जाऊँ सो जाऊँ

Wednesday, 25 October 2017

ज़िंदगी के फ़ासले पर मेरी पज़ीराई है

ऐ! ज़िंदगी तू कितने हिस्सों में कट-कट कर मेरे पास आई है
ये बता ऐसा क्यूँ है कि जो भी कोई मेरे क़रीब है वो हरजाई है 

ख़्वाब का पुलिंदा हर रात मेरे सिरहाने आकर लौट जाता है
ये बात क्या है कि मेरे आखों में कभी नींद क्यूँ नहीं आई है

मेरी रूह मेरी साँसें औ" मेरा पूरा ज़िस्म ये सब तुम्हारे ही हैं 
ऐ! मेरी मोहब्बत कि बाद इसके तू क्यूँ ख़ुद ही से शरमाई है

मैं कहाँ हूँ इसपर क्या कहूँ तुझसे कि वो बस एक ही बात है
मैं जहाँ हूँ वहाँ से पूरी ज़िंदगी के फ़ासले पर मेरी पज़ीराई है

ये तेरी हुस्न-ए-सल्तनत है यहाँ तो हर कोई तेरा ग़ुलाम है
कि बाद इसके भी क्यूँ तेरे दिल में अब भी सिर्फ तन्हाई है 

कि 'धरम' इस ज़िंदगी के बारे में मुझे और कहना ही क्या है 
मैं उसे देखूं या कि उसके अक्स को दिखती सिर्फ बेवफ़ाई है

Friday, 20 October 2017

चंद शेर

1.
तेरे दर पर आए तो बेजार हुए क्या कहें कि हम किस तरह तार-तार हुए
खुद अपने ही हाथ से तराशे संग "धरम" अपने ही सीने के आर-पार हुए

2.
जब खो ही गया हूँ तो फिर खुद ही से अपना पता क्या पूछना
कि रखकर सामने आईना 'धरम' खुद ही से ख़ता क्या पूछना

3.
कि तेरी बज़्म-ए-उल्फ़त अब मेरे शरीक-ए-क़ाबिल न रहा
वहां जो मैं न रहा 'धरम' तो कोई भी मेरे मुक़ाबिल न रहा 

4.
"धरम" निकले थे इस ख़्याल से कि जाना बहुत है दूर
अब मंज़िल ही चल के आ गई इसमें मेरा क्या क़ुसूर

5.
इरादा मेरे क़त्ल का था "धरम" मगर बात वफ़ा की आ गई
कि बाद इसके ऐ! ज़ुल्फ़ तू खुद में सिमटी भी शर्मा भी गई 

Thursday, 12 October 2017

खिलौना खुद अपने किरदार का

तुम ख़ुद भी पूरा कब आई थी
बस एक किरदार आता था तुझमें
जो झटके से
अपने पसंद का खिलौना लेकर
कुछ दिन खेलता था
फिर किरदार बदला खिलौना भी बदल गया

ये नया किरदार पुराने खिलौने पसंद नहीं करता
बंद कर देना चाहता है अलमारी में उसे
ऐसी अलमारी जिसमें कांच की कोई दीवार न हो
खिलौने की शक़्ल दिखाई न पड़े
उसकी छटपटाहट महसूस न हो

अलमारी में अब बंद हैं कई खिलौने
तुम्हारा किरदार अब बदलने में वक़्त नहीं लेता
अलमारी से पुराने खिलौने भी कभी निकालता है
जरुरत के वक़्त एक बार मुस्कुराता है
खिलौना भी हँस देता है
पर उसे पता है कि अगला वक़्त क्या गुज़रेगा
मगर वक़्त जो भी है गुज़र जाता है

कभी एक खिलौने ने तुम्हारे किसी किरदार को
अपने अंदर पनाह दी थी
उसकी परछाहीं अब भी बंद हैं अलमारी में
तुम्हें वो दिखाई नहीं देगी
कि अब तुम्हारा फिर से किरदार बदल गया है

हाँ इतने खिलौने से खेलते-खेलते
अब तुम खुद अपने किरदार के हाथ का
एक खिलौना बन गई हो
शायद तुम्हें मालूम हो या न हो
हाँ मगर अब एक खिलौना हो तुम
खुद अपने ही किरदार का