Friday, 30 December 2011

हाय रे सरकार...

अर्पित बलि पर है मानव का सुविचार 
फिर क्यूँ ख़त्म हो यह भ्रष्टाचार
चलते रहने दो यू ही व्यभिचार
मत करो इस पर पुनः विचार
हाय रे सरकार,   हाय रे सरकार...

मंत्री ही करे जनता पर अत्याचार
फिर करे संसद में भी विचार
और कहे बंद करो यह भ्रष्टाचार
हम सब लड़ने को हैं तैयार
हाय रे सरकार,   हाय रे सरकार...

मंत्री ही रखवाते हैं अबैध हथियार
करवाते हैं मानव जीवन का व्यापार
कभी जाने जाती हैं, कभी मानवता होती है शर्मशार
और फिर कहते हैं, उनके हैं अद्भुत विचार
हाय रे सरकार,   हाय रे सरकार...

Thursday, 15 December 2011

वह अब भी जवां था...

अपनी ही सूरत देखकर हैरां हो गया
आइना देखा और फिर परेशां हो गया
चेहरे पर पड़ी झुर्रियां भी ढीली हो गई
लब्ज़ भी कुछ लडखडा सा गया
एक आह! सी निकली जुबां से
हाय! क्या उसका चेहरा हो गया


वह चेहरा जिसे कभी
ओस की बूंद पिलाता था
चन्दन का लेप लगता था
कभी गुलाब जल में रुई भिंगो कर रगड़ता था
तो कभी मर्द पार्लर में संजोता था
और न जाने क्या क्या करता था

फिर एहसास हुआ उसे अपने बुढ़ापे का
मगर जब उसने अपने दिल से पूछा
तो उत्तर कुछ और ही पाया
फिर वह शरमाया, घबराया, बलखाया
और फिर बीते लम्हों को
पुनः जिंदा करने के लिए चल पड़ा
उन्हीं गलिओं में, उन्हीं सड़कों पर ........ 

Monday, 28 November 2011

बर्षों पहले जब कभी

बर्षों पहले जब कभी मैं
अपने आँगन के धुल में लेट कर
माँ माँ कहकर पुकारता था
तब माँ अपने आँचल से
मेरे बदन पर लगे धुल को झाड़ती थी
और फिर धुल लगे उस आँचल को
अपने कमर में लपेट लेती थी


बर्षों पहले जब कभी मैं
पिताजी की ऊँगली पकड़ कर स्कूल जाता था
और गर्मी के दिनों में जब
वो छाता लेना भूल जाते थे
तब वो मुझसे कहते थे
कि तुम मेरे परछाही में चलो
तुम्हे धुप नहीं लगेगी 

Wednesday, 23 November 2011

मंजिल का पता

जब उसने अपने मंजिल का पता पूछा
फिर से वही सड़क पाया
फिर से वही गली पाया
फिर से वही मकां पाया

जिसके साथ वह जीवन के सपने बुनता था
कभी संग चलता था, कभी रंग भरता था
और फिर कभी उसकी बाहों में सर रख कर
बिलकुल खामोश हो जाता था

ऐसा हो ...

ऐसा हो
मेरे जीवन में
तुम फिर रंग भरो
कभी शर्माओ
कभी घबराओ
कभी मुस्काओ
कभी इठलाओ
कभी बलखाओ
कभी सज कर आओ

ऐसा हो
तुम फिर
मुलाकात करो
कुछ बात करो
सौगात करो
जज्बात भरो

ऐसा हो
तुम फिर
उस बाट चलो
उस घाट चलो
छप छप करते पानी पर
पनघट के उस पर चलो
भीगी हुई उस रेत पर
मुझ जैसा एक मूरत गढ़ों
फिर उसके दिल में
तुम आपना नाम भरो

ऐसा हो
तुम फिर
इकरार करो
इज़हार करो
प्यार करो
मुझको अपने अंक भरो 

ऐसा हो...  

Monday, 21 November 2011

टूटते रिश्ते ...

एक टूटा पुराना रिश्ता
जिसे फिर से जोड़ा गया था
जिसके गाँठ स्पष्ट दिखाई दे रहे थे
अब उस रिश्ते की गिरह भी
ढीली हो चली है
बीते हुए लम्हों की कसक भी
तमाम यादों को दफनाकर
ठंढी हो चली है

वो हवाएँ जो अपने साथ
ढेर सारी खुश्बू समेटकर लाती थी
अब इधर नहीं आती
कि उसके भी रुख अब
बदले-बदले से नज़र आते हैं

वह ख़ामोशी
जो नर्म साँसों कि गर्माहट में
कभी सुकूं देती थी
अब दर्द-ए-बेजुबाँ हो गई है

Tuesday, 15 November 2011

चंद लम्हे


1.

      बादल के कुछ टुकड़े आसमां में छाये थे
      एक चांदनी रात थी,वो मुझसे मिलने आये थे
      फूलों कि खुश्बू थी,कुछ सितारे भी छाये थे
      हम कुछ दूर-दूर बैठे थे, वो फिर भी हमारे थे

2.


देर से ही सही मेरी याद तो आई
रफ्ता-रफ्ता तू करीब तो आई
ये तेरी मोहब्बत है या ज़रूरत
मुझे पता नहीं ए दिल-ए-हुकूमत
बस सुकूं सिर्फ इतना है
कुछ पल के लिए ही सही
तुम्हे मेरी याद तो आई

मुझे मत छेड़ो

मेरी जां मुझे और न छेड़ो
इल्जाम तेरे ही सर जायेगा
टूटे हुए को और न तोड़ो
वरना वह और बिखर जायेगा

वह शख्स जो जिंदा दिल था
बड़ी प्यारी बातें करता था
उसकी बातें अब बेजां हो गई
वह गुफ्तगू भी अब बेजुबां हो गई

उसे मिला तेरी चाहत का सिला
उसके सपने टूटे वह हुआ बावला
उसके अपने छूटे सबसे हुआ फासला
और फिर मिला तुमसे भी गिला

रहने दे उसे अपने हाल पर
न तुम उससे कोई सवाल कर
करना हो तो बस इतना ख्याल कर
कि रहने दे उसे अपने हाल पर

Saturday, 29 October 2011

एक छोटी सी चाहत

थोड़ी नादानी ही सही तुमसे
थोड़ी बैमानी ही सही तुमसे
मिजाज़-ए-इश्क मचल गया है
कि दिल ज़रा बहक गया है

आओ मैं तेरा आलिंगन करूँ
फिर तुझको मैं चुम्बन करूँ
हवस का इसे तुम नाम न दो
मेरे आगोश में तुम्हे भी सुकूँ होगा ........

तलब

निगाह-ए-यार की क्या बात है ....
रुखसार-ए-यार की क्या बात है ..
इजहार-ए-यार की क्या बात है...
उस दिलदार की क्या बात है...

वह हमसुखन है, वह दिलनशी है
उसकी ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी है
इकरार है उससे , इजहार है उससे
अपनी तलब तो बस उसकी आशिकी है ..... 


Friday, 28 October 2011

पुराना ख़त


एक शायर था, जो कभी आशिक भी था
थोडा प्यासा भी था और दीवाना भी था
एक रोज़ मैंने देखा उसको
पुराने ख़त को नए लिफाफे में
महफूज़ कर के रख रहा था
पुरानी संदूक में, किताबों के भीतर


मैंने पूछा कि ये क्या है
जबाब में मैंने देखा कि
वह निकलता है उस लिफाफे को
कभी होठों से चूमता है
कभी आखों पे रखता है
कभी सीने से लगता है
और फिर कहीं खो जाता है
शायद किसी पुरानी यादों में


फिर मैंने उसे जगाया
तब उसने मुझे बताया
यह ख़त मेरे महबूब की है
बात भी बहुत खूब की है
यह एहसास दिलाती है
मुझको मेरी जिंदगी का

इतना कहते कहते
उसकी चौड़ी पेशानी पर
भाव के कुछ लकीर दिखाई देते हैं
जिसे मैं शायद समझ नहीं पा रहा था
की वह फिर बोल गया
यह ख़त मेरे महबूब की है
बात भी बहुत खूब की है 


फिर वह आखें बंद करता है
दुबकी लगाता है पुराने यादों के समंदर में
कभी मुस्कुराता है, कभी खिलखिलाता है
कभी आपने दोनों हाथों को यूँ पकड़ता है
मानो किसी को गले लगा रहा हो
और फिर कहता है
यह ख़त मेरे महबूब की है
बात भी बहुत खूब की है

इसके आगे वह कुछ बोल न सका
मुझे लगा मैंने कर दी है खता
छेडकर इनकी पुरानी यादों को
जिसमे एक ज़ख्म था
जिसे मैं कुरेद गया था !!!!

तन्हाई

अकेला हूँ, तनहा हूँ
इंसानों का मेला है
उसमे दिल अकेला है
हिज्र कि बातें मुझसे न पूछो
यहाँ कहा कोई मेला है

कल साथ चले थे चंद कदम
फिर बिछड़ गए तुम से हमदम
यादें तो केवल यादें है
मन भारी है कुछ यादों से
खुद तनहा हूँ कुछ वक्तों से


वो बातें क्या बईमानी थी
जो तुम मुझ से कुछ कहती थी
वो निगाहों का जो मिलना था
मिल कर फिर झुक जाना था
फिर उठता था नई उमंगो से
ख़ामोशी रौशन होती थी
एक बार पुनः निगाहों का मिलन
लगता था जैसे आलिंगन

तुम कहा गई कुछ पता नहीं
कोई क्या पूछे किससे पूछे
तुम आओगी तो मैं जागूँगा
मन फिर से पुलकित होगा
हर्षित होगा, खिल जायेगा
फिर साथ चलेंगे कुछ दुरी तक
जहाँ अपना आशियाँ होगा
फिर मिलकर जीवन जियेंगे

ख्वाइश, जिंदगी से

ऐ जिंदगी
मैं तुझसे कुछ भी नहीं मांगूंगा
और न ही तुम्हारे सामने हाथ भी फैलाऊंगा
मुझे तुझ से कुछ शिकायत भी नहीं
बस चाहत सिर्फ इतनी सी है
कि जो चेहरा मेरे अन्दर का है
वही चेहरा मेरे बाहर का भी रहे

वह चेहरा
जो निर्दोष भी है
थोडा नासमझ भी है
और थोडा नादाँ भी है
बस कभी अनजाने में
थोड़ी सी शरारत करता है
इसकी कोई बहुत बड़ी ख्वाइश भी नहीं है
बस हमेशा खुश रहना चाहता है
समझना चाहता है, सार्थकता जिंदगी की

एक शायरी ....

हकीकत बयां करना आसां नहीं होता
आइने के सामने चेहरा छुपाना आसां नहीं होता
पुराने यादों को भुलाना आसां नहीं होता
महबूब से नजरे चुराना आसां नहीं होता

आओ मनाये दिवाली

अंधकार है दूर करना , अन्तः मन का
कुछ बुझा हुआ सा , धूमिल हुआ मानस पटल का
दीये की रौशनी में  दूर होगा मन का अँधेरा
यकीं मानो अपने भी मन में होगा सवेरा

अपनी इस पावन मिट्टी से , हम मिलकर दीप बनाते हैं
अंधकार को दूर है करना , हम घी के दीये जलाते हैं
मुसीबतों से नहीं है डरना, हम मिलकर कस्मे खाते हैं
हम हाथ से हाथ मिलते हैं, हम मिलकर कदम बढ़ाते हैं

Thursday, 27 October 2011

एक अरमां तुझसे

तुम्हारी नज़रों से घायल हुआ जाता है ये दिल
तुम्हारी ही बातों से पागल हुआ जाता है ये दिल
तुम्हारी ही ख़यालों में खोया जाता है ये दिल
तुम्हारी ही सवालों में उलझ जाता है ये दिल

एक तेरी बे-दिली है कि तू याद भी करती नहीं
मैं एक संग-दिल हूँ कि हमेशा तुझे याद करता हूँ
मेरी ख्वाइश मेरी तमन्ना हो तुम ऐ जाने वफ़ा
बड़ी चाहत है कि तुम भी कभी मुझे याद करो ....