कि अब किसमें कौन कितना ज़िंदा है इसका जवाब नहीं कहना
भरी दुपहरी में उग आए उस महताब को आफ़ताब नहीं कहना
कि जिसको दिल समझा था वो तो हक़ीक़त में मकतल निकला
वहां कितने अरमानों का क़त्ल हुआ उसका हिसाब नहीं कहना
कि वो पूरी मौत थी औ" बाद उसके ज़ख्मों का असर कुछ न था
मरने के बाद फिर ज़िंदा तो हुआ मगर अब आदाब नहीं कहना
कि अब फिर से मरना गँवारा नहीं की अब ये नागवार गुजरेगा
फिर से क़त्ल के उस ज़ुर्म को 'धरम' काम-ए-शबाब नहीं कहना
भरी दुपहरी में उग आए उस महताब को आफ़ताब नहीं कहना
कि जिसको दिल समझा था वो तो हक़ीक़त में मकतल निकला
वहां कितने अरमानों का क़त्ल हुआ उसका हिसाब नहीं कहना
कि वो पूरी मौत थी औ" बाद उसके ज़ख्मों का असर कुछ न था
मरने के बाद फिर ज़िंदा तो हुआ मगर अब आदाब नहीं कहना
कि अब फिर से मरना गँवारा नहीं की अब ये नागवार गुजरेगा
फिर से क़त्ल के उस ज़ुर्म को 'धरम' काम-ए-शबाब नहीं कहना