Sunday, 15 July 2018

काम-ए-शबाब नहीं कहना

कि अब किसमें कौन कितना ज़िंदा है इसका जवाब नहीं कहना
भरी दुपहरी में उग आए उस महताब को आफ़ताब नहीं कहना

कि जिसको दिल समझा था वो तो हक़ीक़त में मकतल निकला
वहां कितने अरमानों का क़त्ल हुआ उसका हिसाब नहीं कहना

कि वो पूरी मौत थी औ" बाद उसके ज़ख्मों का असर कुछ न था
मरने के बाद फिर ज़िंदा तो हुआ मगर अब आदाब नहीं कहना

कि अब फिर से मरना गँवारा नहीं की अब ये नागवार गुजरेगा 
फिर से क़त्ल के उस ज़ुर्म को 'धरम' काम-ए-शबाब नहीं कहना

Thursday, 12 July 2018

चंद शेर

1.
ये कैसी हिज़्र की किताब है "धरम" यहाँ बहता अश्क़ बेहिसाब है
कि किसी से किसी की कोई बात नहीं होती सिर्फ होता आदाब है

2.
जो निकले थे आसमाँ के तलाश में तो अपने हिस्से की ज़मीं भी खो गई
नतीजा यूँ हुआ "धरम" कि मुझे महज़ हवा का एक झोंका ही डुबो गई

3.
इश्क़ कहाँ था "धरम" जो था वो आधा हुस्न था बाकी आधा आज़ार था
कि मख़मली लिबास में जो लिपटा ज़िस्म था वो अंदर से खार-खार था

Friday, 22 June 2018

चंद शेर

1.
जब "धरम" पानी से पानी को जलाया आग से आग बुझाई
कि तब जाकर ग़म खा के ज़िंदगी खुद मेरे क़दमों में आई

2.
पिरोया था अपनी जां को "धरम" तेरी जां में इस कदर
कि ख़ुद को पा लेता था बस देखकर तुझको एक नज़र

3.
दोनों को "धरम"अब तो इस रिश्ते के मरने का इंतज़ार करना है
क्यूँकि दोनों को अब तो अलग-अलग सख़्श पर ऐतवार करना है

4.
कि सर मेरा जब भी झुका 'धरम' क़लम कर दिया गया
उस रिश्ते में पनपे गहराई को भी भरम कर दिया गया  

Sunday, 17 June 2018

अकेला मैं ही गुनाहग़ार था

मेरे आगोश में तुम कब थे जो था वो सिर्फ तुम्हारा एक किरदार था
वो घर भी तो एक भ्रम ही था मैं जहाँ रहता था वो तो एक बाज़ार था 

तू किसी और के ज़िस्म की तपन थी क्यूँ कर मेरे ज़िस्म में उतर गई
कि बाद इसके जो मुझमें तुम्हारा वज़ूद था वो सिर्फ एक आज़ार था 

आखँ से आँखें बोलती दिल से दिल बोलता साँसों से साँसें बात करती
मगर क्यूँ जब भी ज़ुबाँ खुलती हर प्रश्न का उत्तर सिर्फ़ ख़बरदार था

कि जहाँ तूफां था ग़ुबार भी था औ" थे मेरे चंद जाने पहचाने चेहरे भी
वहां भी उस चिराग़ के बुझाने के ज़ुर्म का अकेला मैं ही गुनाहग़ार था

कि अपनी दास्ताँ-ए-ज़िंदगी "धरम" तुझको अब मैं क्या बयां करूँ
हम तो वहाँ लुटे हैं जहाँ लोग भी अपने थे औ" साथ में पहरेदार था

Wednesday, 13 June 2018

चंद शेर

1.
कि हर आलम मुझे नज़र आता तो है मगर लम्हा गुज़र जाने के बाद
मेरी आखों में लहू उतरता तो है "धरम" मगर ज़ख्म भर जाने के बाद

2.
कि मेरी याद 'धरम' उनके ज़हन में कब जा के उतरी
जब वो हर शख़्स से टूटे तन्हा हुए तब जा के उतरी

3.
इस बार की ये बेरुख़ी नाराज़गी क्या कहें जान लेकर जाएगी
औ" ग़र बच गए ज़िंदा "धरम" तो फिर ईमान लेकर जाएगी

Monday, 4 June 2018

चंद शेर

1.
हमने जिस-जिस को पनाह दिया "धरम" वह हर शख़्स नकाबपोश निकला
जब हटा नक़ाब तो हर शख़्स चेहरे का काला औ" ज़ुबाँ का ख़ामोश निकला 

2.
अब जो हम दोनों के दरम्याँ है "धरम" वो सिर्फ पर्दादारी है
जो बचा-खुचा रिश्ता का अवशेष है वो सिर्फ एक बीमारी है

3.
जब भी खुलती है आँख 'धरम' तो अंधेरे पर रौशनी का धोखा होता है
औ" ग़र खुल गई ज़ुबाँ तो बाद उसके जो होता है वो अनोखा होता है

4.
कि जब भी तुमने ज़ुबाँ खोली "धरम" मेरी इज़्ज़त को किया तार-तार 
जब मिलाया हाथ तो महज़ एक ज़ख्म के पीछे दिए ज़ख्म कई हज़ार

5.
कि बाद इस मुलाक़ात के जो भी बचा-खुचा भ्रम था वह टूट गया 
ज़ुल्म इतना हुआ 'धरम' की मेरे सब्र का अंतिम घड़ा भी फूट गया

Sunday, 3 June 2018

वो रिश्ता जो बे-आबरू होकर हलाक़ हुआ

तेरे साथ का वक़्त-ए-मुलाक़ात भी तो तन्हा ही गुजरता है 
आँखें बंद करूँ तो भी तस्सबुर में तेरा चेहरा नहीं उभरता है

तेरे हर रंग-ए-मिजाज़ को मैंने देखा औ" सीने से लगाया भी
वो रंग-ए-उल्फ़त तेरे चेहरे पर देर तलक़ क्यूँ नहीं ठहरता है

ख़ुद को ज़मीं पर रखकर ज़माने से नहीं अपने आप से पूछो
क्यूँ तेरा हर शाग़िर्द तेरे परछाहीं से भी मिलने से मुकरता है

न ही मेरे आखों को सुकूँ मिला न तश्ना-लब की प्यास बुझी
हर वक़्त-ए-मुलाक़ात में तेरा चेहरा ये किस तरह निखरता है

वो रिश्ता जो तेरे ही पहलू में बे-आबरू होकर हलाक़ हुआ था
मैं सोचता हूँ तो दिल मेरा टूटकर कई टुकड़ों में बिखरता है

कि मैं अब तो तुझसे फ़ासले पर ही क़याम करता हूँ "धरम"
तुझसे करीबी के बात पर तो जिस्म औ" रूह दोनों सिहरता है

Sunday, 20 May 2018

चंद शेर

1.
क्यूँ इन्तहाँ के बाद का ही मंज़र आखों में ठहरता है
ज़ुबाँ खामोश रहती है 'धरम' सिर्फ चेहरा उतरता है

2.
ये न तो कोई मंज़िल है न ही कोई रास्ता है "धरम" जहाँ अभी रुका हूँ मैं
ऐ! बीता वक़्त तू मुझे अब ये बता कि किस-किस के सामने न झुका हूँ मैं 

Sunday, 13 May 2018

एक और कब्र का उभर जाना हुआ

जिस इन्तहाँ के इंतज़ार में था उसका कई बार गुज़र जाना हुआ
मुझे एहसास भी न हो सका कि कैसे कई बार बिखर जाना हुआ

महफ़िल थी ख़्वाब था किरदार थे औ" थे मेरे कुछ कद्रदान भी
सिर्फ एक ही इन्तहाँ के बाद कैसे इस सब का उजड़ जाना हुआ

कभी तो ज़ख्मों तले भी मुझको कुछ ख़ुश-नुमा एहसास होता था
मगर ये कैसी ख़ुशी मिली कि ज़ख्म का ता-उम्र ठहर जाना हुआ 

कि बाद मेरे मरने के भी उस सितमगर का क़हर मुसलसल जारी था
नतीजा यह हुआ की मेरे कब्र पर एक और कब्र का उभर जाना हुआ

मेरी तलाश-ए-ज़िंदगी महज़ उस मौत के बाद ख़त्म नहीं हुई थी
मगर क्यूँकर उस रूह का बस एक ही ज़िस्म में ठहर जाना हुआ

वो वक़्त भी गया वो ज़िंदगी भी गई "धरम" कि वो ज़िस्म भी गया
क्यूँ फिर से पिछले ही ज़ख्मों का नई ज़िंदगी में उभर जाना हुआ

Tuesday, 1 May 2018

निकलेगा कोई नतीजा नहीं

तेरा मुझ पर कोई रहम-ओ-क़रम नहीं औ" कोई वफ़ा नहीं
दिल किस तरह से टूटा मेरा इसका तुझे कोई अंदाजा नहीं

मेरे इस टूटे दिल को तो "धरम" अब हिज़्र ही मजा देता है 
अब फिर से न बढ़ाओ हाथ कि निकलेगा कोई नतीजा नहीं