तू किस महफ़िल से आया है तू कहाँ का दीवाना है
जो इस अंजुमन के हर तौर-तरीके से अनजाना है
यहाँ या तो हलक़ से मय उतरता है या फिर लहू
हाँ मगर इन दोनों के लिए यहाँ एक ही पैमाना है
दर-ओ-दीवार यहाँ पर्दा में रहता है हुस्न बेपर्दा है
यहाँ तो उठी औ" झुकी दोनों नज़रों का नज़राना है
बात चलती है तो दुआ के लिए हर हाथ उठता है
ग़र चले हुस्न तो यहाँ हर किसी को मर जाना है
यहाँ नशा हुस्न का मय का इश्क़ का सब बराबर है
ज्यादा या कम से हटकर यह एक अलग ज़माना है
यहाँ किसी की ख्वाईश किसी और से नहीं मिलती
औ" हर किसी का "धरम" अलग-अलग फ़साना है
जो इस अंजुमन के हर तौर-तरीके से अनजाना है
यहाँ या तो हलक़ से मय उतरता है या फिर लहू
हाँ मगर इन दोनों के लिए यहाँ एक ही पैमाना है
दर-ओ-दीवार यहाँ पर्दा में रहता है हुस्न बेपर्दा है
यहाँ तो उठी औ" झुकी दोनों नज़रों का नज़राना है
बात चलती है तो दुआ के लिए हर हाथ उठता है
ग़र चले हुस्न तो यहाँ हर किसी को मर जाना है
यहाँ नशा हुस्न का मय का इश्क़ का सब बराबर है
ज्यादा या कम से हटकर यह एक अलग ज़माना है
यहाँ किसी की ख्वाईश किसी और से नहीं मिलती
औ" हर किसी का "धरम" अलग-अलग फ़साना है