Friday, 13 December 2024

फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

सितारों को क़ैद रखना  चाँद को चादर ओढ़ाना
कहाँ से सीखा तूने फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

वो गुलाबी शख़्सियत उसपर ये सतरंगी पैराहन
लगते तो हो ऐसे  जैसे कोई कुदरत का ख़ज़ाना

ये तिरे वतन की मिट्टी है  इसे तू माथे से लगाना  
बयाँ लहू भी न कर सके बनो कोई ऐसा दीवाना

ज़ेहन को नींद आती है  आँखों को सब्र आता है 
बड़ा अज़नबी इश्क़ है अजब है इसका फ़साना

सिर्फ़ दरख़्तों की साँसें थीं और वहाँ कोई न था
ज़मीं दरख़्तों से क्या पूछे ये दश्त क्यूँ है वीराना

चाँद तक फैला दरिया सफ़ीने में सिमटा ख़्वाब
बादबाँ में उलझी नींद "धरम"  सफ़र था पुराना

Sunday, 17 November 2024

किसी रिश्ते का भरम दिखता है

कि आईने में उसका चेहरा कुछ कम दिखता है
उसकी आँखों में झाँको तो कोई वहम दिखता है

दिलजलों की शागिर्दी है उदासी की रहनुमाई है       
कि उसके गिरेबाँ में  हमेशा कोई ग़म दिखता है

कि उसका वो लहज़ा वो सलीक़ा वो तौर-ए-बयाँ   
उसकी बातों में किसी रिश्ते का भरम दिखता है

वो रास्ता उसका था  वो नक़्श-ए-पाँ उसी का था
क्यूँ उस मंज़िल पर कोई और आदम दिखता है

दीवानों की महफ़िल है वहाँ इश्क़ का आलम है   
मगर उस फ़िज़ा में कोई और मौसम दिखता है

महज़ वो एक ही जवाल का ऐसा असर "धरम"         
रास्ता आसाँ ही क्यूँ न हो मगर दुर्गम दिखता है  

Sunday, 10 November 2024

खुल गया है बादबाँ फिर से

सीने में क्यूँ उठ रहा है धुआँ फिर से
क्या कोई दर्द दे रहा है बयाँ फिर से

कि वो ज़ख़्म हो गया है जवाँ फिर से  
लो बदल गया है तर्ज़-ए-बयाँ फिर से

सज़दे में आ गया है आसमाँ फिर से
किसकी छिड़ गई है  दास्ताँ फिर से

देख बिछड़ रहा है  हम-रहाँ फिर से
झोंका से खुल गया है बादबाँ फिर से
  
कर्बला में हो रहा है इम्तिहाँ फिर से 
यहाँ मिटने वाली है हस्तियॉं फिर से

"धरम" घटने लगी है दूरियाँ फिर से  
लो उजड़ने लगी है बस्तियाँ फिर से

Wednesday, 30 October 2024

कौन संभलने वाला है

यह ख़ुर्शीद अब कहीं  और निकलने वाला है
यहाँ से अब दूर चलो कि वक्त ढलने वाला है

कलम उठाओ तो आग ख़ुद बरसने लगती है 
काग़ज़ पर मत लिखो  काग़ज़ जलने वाला है

आरज़ू बलंदी की है तो हर क़त्ल मुनासिब है
बाद ठोकर के भी यहाँ कौन संभलने वाला है

यहाँ ख़ामोश रहो कि  नशा तख़्त का तारी है
यहाँ क़तरा  अब समंदर को निगलने वाला है

यहाँ कभी न आना  यहाँ का दरिया निराला है  
यहाँ आब-ए-हयात भी ज़हर में पलने वाला है
   
यहाँ अपनी शक़्ल आईने में मत देखो "धरम"
यहाँ किरदार हर आइना का बदलने वाला है 

Wednesday, 23 October 2024

माइक्रोग्रिड : एक संक्षिप्त परिचय

वो ज़माना था करेंट के एक तरफ़ा प्रवाह का  
पारंपरिक ईंधन के ख़त्म होने के आगाह का 
  
सुदूर लोड तक पहुँचने में गिरता था वोल्टेज
लॉस बहुत होता था वह मुद्दा था परवाह का

फिर मुद्दा आया पूरी क़ायनात की नेकी का       
जरुरत लगी इसमें शोधकर्त्ता के इत्माह का 

दौर था फिर ऊर्जा के वितरित उत्पादन का
साथ एक बंधन भी था क़ुदरत से निबाह का

बाद इसके जब और भी कुछ  जरूरतें बढ़ी   
भंडारण आया फिर उपभोक्ता की चाह का

इसके सर्वोत्तम उपयोग की चर्चा चलने लगी   
इल्म था नियंत्रण और प्रबंधन के अथाह का

हर वक़्त हुक्म की ग़ुलामी  जब खलने लगी 
तब ख़याल आया ख़ुद में छोटे बादशाह का

बग़ैर ग्रिड के  वह ख़ुद दे सकता है आपूर्ति
एक और दौर चला फिर वहाँ वाह-वाह का
 
स्टेब्लिटी रिलायबिलिटी प्रोटेक्शन या अन्य 
सारे के सारे पहलू पर सवाल था निर्वाह का

शोधक हर पहलू पर "धरम" लगे हैं ईमान से
तारीकी ख़त्म होगी होगा अंत हर सियाह का

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इत्माह : नज़रबाज़ी, नज़र उठा कर देखना

Saturday, 19 October 2024

लहू उबाले उबलता नहीं

ये कैसा मोम है जो किसी भी आग में पिघलता नहीं
बड़ी हैरत की बात है कीचड़ उछाले उछलता नहीं 
 
अजीब मुलाक़ात थी  जो मरज़ मिला वो ऐसा मिला  
दर्द दिल में ऐसे समाया कि निकाले निकलता नहीं

इस बार का ये तूफ़ाँ पिछले सारे तूफ़ाँ से अलग था       
चराग़ इस तरह बुझा कि  फिर जलाये जलता नहीं

यादें बोझ हो चुकी थी  यादों को दफ़्न करना पड़ा        
उस क़ब्र से न जाने क्यूँ नज़र मिलाये मिलता नहीं

जुनूँ जब बलंदी पर पंहुचा हक़ीक़त ने राज़ खोला  
वो ठंढक आई ज़हन में  लहू उबाले उबलता नहीं

कि वो मसअला तो सिर्फ़ दो चराग़ों का था "धरम"
कैसी पसरी थी तारीकी शम' संभाले संभलता नहीं

Thursday, 17 October 2024

फ़लक ख़ुद ज़मीं से मिलते हैं

किरदार सारे आज़ाद तो हैं  मगर क़ैद रहते हैं 
सितम की बातें भी दूसरों की ज़बाँ से कहते हैं
 
कुछ याद नहीं कि ये दिल किसका मुंतज़िर है  
दिल में ढ़ेर सारे जज़्बात एक ही साथ बहते हैं
  
मंज़िल को ये गुमाँ  की वो बलंदी की इंतिहा है
ये पता नहीं दीवाने फ़लक के सर पर चलते हैं

बलंदी की दास्ताँ हक़ीक़त से मिलती ही नहीं            
इधर देख  यहाँ फ़लक ख़ुद ज़मीं से मिलते हैं

तहज़ीब ये कि दावत-ए-सुख़न सब को देते हैं    
तमाशा ऐसा कि  एक दूसरे के होंठ सिलते हैं

उस किरदार ने साँसें अपनी बेच दी  "धरम"   
अब उसकी आँखों में ग़ैरों के ख़्वाब पलते हैं  

Wednesday, 16 October 2024

ज़मीं पर कुछ आसमाँ बोता है

समंदर अपनी मर्ज़ी से  कब किनारा डुबोता है 
लहरें तब आती हैं जब कोई जज़्बात चुभोता है

उसे उरूज औ" ज़वाल से कोई फ़र्क़ ही कहाँ    
वो एक ही धागे में ज़मीं औ" आसमाँ पिरोता है
 
कहानी कैसी थी जिसमें हर किरदार ज़िंदा था
यूँ मोहब्बत में ऐसा  कब किसके साथ होता है

दरख़्तों की आँखें भी नम होकर झुक जाती हैं   
इस वीराने दश्त में इतना टूटकर कौन रोता है
 
कि दरमियाँ  दो ज़िस्मों के  ये रूह किसकी है 
बड़े इल्म से जो ज़मीं पर कुछ आसमाँ बोता है

मुफ़लिसी के इस आलम  को किससे बयाँ करे     
वो अपने काँधे पर "धरम" ग़ैरों का सर ढोता है      

Thursday, 10 October 2024

सूरज को जला दूंगा

जब भी याद आयेगी तुरत भुला दूंगा   
सोये हुए गुलशन को और सुला दूंगा

ग़र नज़र मिलेगी चाँदनी रौशन होगी    
हँसती हुई आँखों को फिर रुला दूंगा

ग़र चाँदनी डूबेगी साँसें सुलग उठेंगी      
दिल के शोलों से सूरज को जला दूंगा

तिरे बज़्म में ग़र तुझपे कुछ गुजरेगी 
हुस्न हो या इश्क़ मिट्टी में मिला दूंगा

साँसें अभी ही टूटी हैं कि जरा ठहरो   
साँसों को सीने में  फिर से बुला दूंगा

कभी ख़ुद भी चल तू मेरे पास तो आ   
यहाँ दिल में एक आसमाँ खुला दूंगा

पहले कुछ बात शुरू तो हो "धरम" 
कुछ तीर नज़रों से फिर चला दूंगा  

Sunday, 6 October 2024

ख़ंज़र निगल लेगा

धुंध की आढ़ में अपने घर से निकल लेगा
वापस आएगा तो पता  अपना बदल लेगा

रिश्ते में नाराज़गी ऐसी कि ग़र बिछड़ें तो       
साथ जिस्म के ख़ुद ही दिल भी चल लेगा

सितारे महफ़िल में अब उदास रहने लगे   
कैसे यक़ीं करें कि  दिल ख़ुद बहल लेगा

तबी'अत को अब तो कुछ भी भाता नहीं  
बहार को ये यक़ीं है कि मन मचल लेगा

रूहानी बातें भी दिल तक पहुँच न पाई
ऐसा क्या करें  जिसपर वो 'अमल लेगा
 
मुझे इस बात पर बिल्कुल यकीं "धरम"  
वो क़त्ल करेगा औ" ख़ंज़र निगल लेगा