Monday, 30 March 2015

पूछ लेता हूँ

अब मिल ही गए हो तो हाल पूछ लेता हूँ
तुमसे वो वर्षों पुराना सवाल पूछ लेता हूँ

दोनों जिस्म एक थे सासें तेज चल रही थी
तुमसे वो पुराने इश्क़ का ख्याल पूछ लेता हूँ

दिल की गहराई की अंदाजा तुम्हें तब तो न था
जो ढल गया है हुस्न तो ये मलाल पूछ लेता हूँ 

Saturday, 28 March 2015

और भी बवाल कर गए

मेरे सवाल पर वो फिर अपना सवाल कर गए
मेरे कटे जिस्म को वो फिर से हलाल कर गए

गर्दिश-ए-दौराँ से थककर बस घर लौटा ही था  
कि वो आकर मुझे तो और भी बेहाल कर गए

यूँ तो मेरा अपना ग़म-ए-ज़ीस्त कुछ कम न था
वो आकर तो मेरा जीना और भी मुहाल कर गए

ज़माने ने तो मुझे सिर्फ ज़ख्म ही दिए थे "धरम"
छिड़ककर नमक उसपर वो और भी बवाल कर गए

Wednesday, 18 March 2015

चंद शेर

1.
वो एक खुमारी थी उतर गई अब होश में हूँ
ज़िंदगी तू  दूर चला जा मैं पुराने जोश में हूँ

2.
मुद्दतों बाद उस ख्वाब को नज़र भर देखा भी दिल में उतरा भी
आज सुकूँ लौट कर मेरे पहलू में आया भी सर रखकर सोया भी

3.
ज़माना हँस देता है मेरे हर अक़ीदत के बात पर
मेरे ख्वाइशों को वो रखता है सिर्फ अपने लात पर

जो बुलंदी है तो सब का हाथ होता है मेरे हाथ पर
औ" मुफलिसी में छोड़ देता है खुद अपने हालात पर

Monday, 9 March 2015

ऐसा होने लगता है

जब भी कभी ज़ख्म-ए-दिल दुखने लगता है
लब पे आह होती है औ" सीना जलने लगता है

उम्मीद कहाँ है अब कि वो फिर लौट के आए
पौ फटता नहीं कि फिर अँधेरा घिरने लगता है

बेवाक़ मोहब्बत बेआबरू होकर नाचता है यहाँ
एक चिलमन गिरता है तो दूसरा उठने लगता है

मैं फ़क़त दिल का शहज़ादा था मेरी क्या मुराद थी
मुद्रा हर जगह मुफलिसी पर भारी पड़ने लगता है

आंधी में ये उम्मीद का दीपक कब तलक जलेगा
जो हवा के बस एक झोंके से ही बुझने लगता है

Monday, 2 March 2015

ज़ख्म बढ़ता भी नहीं घटता भी नहीं

दिल दुखता भी नहीं सुलगता भी नहीं
अश्क़ बहता भी नहीं सूखता भी नहीं

ये कैसा अरमाँ पल रहा है मेरे दिल में
कि ज़ख्म बढ़ता भी नहीं घटता भी नहीं

मेरे नक़ाब-ए-इश्क़ का हश्र कुछ ये हो गया है
कि अब तो ये उतरता भी नहीं चढ़ता भी नहीं

इश्क़ का चिराग इस मोड़ पर आ गया है "धरम"
कि अब तो ये जलता भी नहीं बुझता भी नहीं  

बिफर रहा है

उसके आने की खबर जब से फैली है
हरेक चेहरा इस शहर में संवर रहा है

हुस्न का दरिया मेरे दर पर जो ठहर रहा है
बरसाके खुशबू मौसम भी अब निखर रहा है

सब का चेहरा उसके चेहरे पर टिका हुआ है
हर कोई किसी को पहचानने से मुकर रहा है

कि लुटा के दौलत एक अजनबी पर "धरम"
हरेक शख्स अब तो यहाँ पर बिफर रहा है

Thursday, 26 February 2015

हुंकार

करतब करता बोल गया सिंघासन फिर से डोलेगा
जिसको तू मुर्दा समझे है वो अब फिर से बोलेगा

है नाद समय का सुन ले तुम पग अब तो तेरा उखड़ेगा
हर ओर उठेगा हाहाकार विकराल काल मुख खोलेगा  



Wednesday, 25 February 2015

बीते अब ज़माना हो गया

मेरी मोहब्बत का किस्सा पुराना हो गया
जो अपना था वो कब का बेगाना हो गया

निगाहें मिलती थी आखों से पी लेता था
इन बातों को बीते अब ज़माना हो गया

इश्क़ दो रूहों का मिलन हुआ करता था कभी  
मोहब्बत का अब तो अलग पैमाना हो गया

जो कभी दिल में झांककर देखा करता था
वो अब तो पैसा देखकर दीवाना हो गया

देकर बाँहों में बाहें जो कभी घूमा करता था
आज मिला तो बस उलटे पांव रवाना हो गया

जहाँ हर रोज प्यार का मौसम हुआ करता था
वो बुलंद ईमारत तो कब का वीराना हो गया

उसके दिल को जब कुरेद कर देखा "धरम"
पता चला वहां तो अब कब्रखाना हो गया 

Monday, 23 February 2015

वो तेरा मेरा ख्वाब ...

आओ दोनों मिलकर अपने सपनों को रंग दें
तुम मेरे ख्वाब सजा दो और मैं तेरे सँवार दूँ
लिखकर दिलपर नाम तुम मुझे निखार दो
देकर गलबाहीं मुझे तुम भरपूर प्यार दो

बिना मेरे तुम और बिना तुम मेरे बस शून्य है
अकेले-अकेले में किसी का कोई वज़ूद नहीं है
मिलन सिर्फ दो जिस्मों तक सिमट नहीं सकता
दो रूहों का एकाकार होता है यह अद्भुत मिलन
कितना प्राकृतिक कितना आनंददायक कितना सुन्दर

इस रिश्ते में गिरह का कोई वज़ूद नहीं है
बस प्रेम का लेन-देन है कोई मूल-सूद नहीं है
हाँ मगर ये रिश्ता मुकम्मल तब होगा
जब अपने अक्स में मैं तुम्हारा चेहरा ढूंढ लूंगा

जीवन की सीढ़ी पर कदम साथ-साथ चलेंगे
न कभी तुम आगे होगे न कभी मैं पीछे होऊंगा
मंज़िल पर भी कदम साथ ही पड़ेंगे

तुम्हारी सफलता मुझसे कहाँ भिन्न है
सीढ़ी एक ही है रास्ता भी एक ही है
दूर चमकता सूरज भी तो एक ही है

जो हम साथ है तो मिलकर उठेंगे हाथ चार
मगर उन्नति के पथ पर होंगे सिर्फ एक विचार
मिलकर सहेंगे दृढ कदम कर हर प्रहार
तुम मुझसे कर और मैं तुझसे करूँ यह करार

तेरे जीवन का जो रूखापन है उसे मैं अब पी लेता हूँ
ये बहुत कड़वा स्वाद है मगर फिर भी जी लेता हूँ
इरादा अटल है अब दुखों का समंदर लाँघ ही लूंगा
बांध समंदर पर एकबार फिर बांध ही लूंगा

मेरे सपनो के आँगन में नाचता है तेरा ख्वाब
लुटाता है मुझपर वह खुशियां बेहिसाब
हर रोज मिलने का अंदाज़ होता है नायाब
मगर जब भी मिलता है तो मिलता है बेहिजाब

वो तेरा मेरा ख्वाब ...

Saturday, 21 February 2015

सुपुर्द-ए-ख़ाक कर गया

वक़्त दिल में अनगिनत सुराख़ कर गया
इंसानियत के रिश्ते को नापाक कर गया

हरेक अरमाँ को जलाकर राख कर गया
औ" मेरे रूह को सुपुर्द-ए-ख़ाक कर गया

मुझसे दिल भर गया तो इख़्लाक़ कर गया
खुद भी रोया और मुझे भी बेवाक कर गया