Thursday, 23 November 2017

चंद शेर

1.
अपने रूह का जनाज़ा खुद अपने ही कंधे पर ढोता हूँ
मैं ऐसा सख़्श हूँ "धरम" खुद ही से खुद को खोता हूँ

2.
जब भी वक़्त को पकड़ा "धरम" ज़िंदगी रेत की तरह हाथ से निकल गई
किस्मत थोड़ी ही सी फिसली हाँ! ज़िंदगी उसके साथ और भी फिसल गई

3.
अपने अंदर के किस आग को जलने दूँ 'धरम' किस आग को बुझाऊँ
ऐ! वक़्त ये तेरी कैसी मार है कि मैं खुद अपने को भी न समझा पाऊँ

4.
वो तारा अभी पूरा टूटा नहीं 'धरम' तुझे खुद उसे तोड़ना होगा
कि अभी तो बस थोड़ा ही चले हो तुझे अभी और चलना होगा

5.
कि एक प्यास अभी और बुझानी है एक प्यास अभी और लगानी है     
ज़िंदगी एक ऐसा दरिया है "धरम" जिसकी हर वक़्त यही कहानी है

Sunday, 19 November 2017

एक दरिया सुकूँ का हो

एक दरिया सुकूँ का हो
और मैं उसमें बह जाऊँ
किनारा बीच और फिर किनारा
इस एहसास से परे
ज़िंदगी के कुछ लम्हों का सफर
ऐसा भी हो
कि दरिया पार भी कर जाऊँ
और पता भी न चले

कोई हलचल नहीं न ही कोई शोर
एक समान चाल एक लय एक ही रंग
होश-ओ-हवास खोकर
पहलू में सर रखूं
चिर निद्रा की चादर ओढूँ
खुद को खो जाऊँ सो जाऊँ

Wednesday, 25 October 2017

ज़िंदगी के फ़ासले पर मेरी पज़ीराई है

ऐ! ज़िंदगी तू कितने हिस्सों में कट-कट कर मेरे पास आई है
ये बता ऐसा क्यूँ है कि जो भी कोई मेरे क़रीब है वो हरजाई है 

ख़्वाब का पुलिंदा हर रात मेरे सिरहाने आकर लौट जाता है
ये बात क्या है कि मेरे आखों में कभी नींद क्यूँ नहीं आई है

मेरी रूह मेरी साँसें औ" मेरा पूरा ज़िस्म ये सब तुम्हारे ही हैं 
ऐ! मेरी मोहब्बत कि बाद इसके तू क्यूँ ख़ुद ही से शरमाई है

मैं कहाँ हूँ इसपर क्या कहूँ तुझसे कि वो बस एक ही बात है
मैं जहाँ हूँ वहाँ से पूरी ज़िंदगी के फ़ासले पर मेरी पज़ीराई है

ये तेरी हुस्न-ए-सल्तनत है यहाँ तो हर कोई तेरा ग़ुलाम है
कि बाद इसके भी क्यूँ तेरे दिल में अब भी सिर्फ तन्हाई है 

कि 'धरम' इस ज़िंदगी के बारे में मुझे और कहना ही क्या है 
मैं उसे देखूं या कि उसके अक्स को दिखती सिर्फ बेवफ़ाई है

Friday, 20 October 2017

चंद शेर

1.
तेरे दर पर आए तो बेजार हुए क्या कहें कि हम किस तरह तार-तार हुए
खुद अपने ही हाथ से तराशे संग "धरम" अपने ही सीने के आर-पार हुए

2.
जब खो ही गया हूँ तो फिर खुद ही से अपना पता क्या पूछना
कि रखकर सामने आईना 'धरम' खुद ही से ख़ता क्या पूछना

3.
कि तेरी बज़्म-ए-उल्फ़त अब मेरे शरीक-ए-क़ाबिल न रहा
वहां जो मैं न रहा 'धरम' तो कोई भी मेरे मुक़ाबिल न रहा 

4.
"धरम" निकले थे इस ख़्याल से कि जाना बहुत है दूर
अब मंज़िल ही चल के आ गई इसमें मेरा क्या क़ुसूर

5.
इरादा मेरे क़त्ल का था "धरम" मगर बात वफ़ा की आ गई
कि बाद इसके ऐ! ज़ुल्फ़ तू खुद में सिमटी भी शर्मा भी गई 

Thursday, 12 October 2017

खिलौना खुद अपने किरदार का

तुम ख़ुद भी पूरा कब आई थी
बस एक किरदार आता था तुझमें
जो झटके से
अपने पसंद का खिलौना लेकर
कुछ दिन खेलता था
फिर किरदार बदला खिलौना भी बदल गया

ये नया किरदार पुराने खिलौने पसंद नहीं करता
बंद कर देना चाहता है अलमारी में उसे
ऐसी अलमारी जिसमें कांच की कोई दीवार न हो
खिलौने की शक़्ल दिखाई न पड़े
उसकी छटपटाहट महसूस न हो

अलमारी में अब बंद हैं कई खिलौने
तुम्हारा किरदार अब बदलने में वक़्त नहीं लेता
अलमारी से पुराने खिलौने भी कभी निकालता है
जरुरत के वक़्त एक बार मुस्कुराता है
खिलौना भी हँस देता है
पर उसे पता है कि अगला वक़्त क्या गुज़रेगा
मगर वक़्त जो भी है गुज़र जाता है

कभी एक खिलौने ने तुम्हारे किसी किरदार को
अपने अंदर पनाह दी थी
उसकी परछाहीं अब भी बंद हैं अलमारी में
तुम्हें वो दिखाई नहीं देगी
कि अब तुम्हारा फिर से किरदार बदल गया है

हाँ इतने खिलौने से खेलते-खेलते
अब तुम खुद अपने किरदार के हाथ का
एक खिलौना बन गई हो
शायद तुम्हें मालूम हो या न हो
हाँ मगर अब एक खिलौना हो तुम
खुद अपने ही किरदार का

क्या जानें कुछ कहना चाहते हैं

शायद कोई शाख़ टूटा होगा वहां
दरख़्तों के रोने की आवाज़ आ रही थी
ये आवाज़ हर कोई सुन नहीं सकता
ये बुलंद नहीं होती
बस एक सिसकी होती है निकल जाती है

दरख़्तों के अश्क़
आखों में ही सूख जाते हैं
चेहरे पर उगी झुर्रियों तक नहीं पहुंचते

कराह की आवाज़
हलक़ से ऊपर तक नहीं आती
होंठ बस काँप के रह जाते हैं
क्या जानें कुछ कहना चाहते हैं 

Tuesday, 10 October 2017

चंद शेर

1.
हमारे दरम्यां बात यदि छोटी सी थी तो बन ही क्यूँ न गई
औ" यदि वो बात अना की थी 'धरम' तो ठन ही क्यूँ न गई

2.
किस आरज़ू से बात रखूं "धरम" कि हर आरज़ू पे जी घबराता है
कि सामने तुम हो या तुम्हारा अक्स ये दिल समझ नहीं पाता है

3.
नहीं था चाहना तुमको टूटकर कि यूँ बिखरना मुझे गंवारा नहीं
अंजाम तो यही होना था "धरम" तुम मेरे नहीं मैं तुम्हारा नहीं

4.
उसकी अदाओं में बारूद है "धरम" वो बोलती है तो बम फटते हैं
औ" हमारी फितरत तो यही है कि बड़ी ख़ामोशी से हम कटते हैं

5.
कौन रुख़्सत हुआ है यहाँ से 'धरम' किसकी सारी यादें मिट गई हैं
कि अभी जो फैलीं थी चार-ओ-सू बस एक झटके में सिमट गई हैं

6.
पुराना ख़्वाब था 'धरम' खुली आखों में ही भर आया
कि गुज़रे लम्हों का ज़ख्म देखो फिर से उभर आया 

Monday, 2 October 2017

जान से मारा नहीं मुझे

तुमने भी कभी शौक से पुकारा नहीं मुझे
औ" यूँ ही कहीं भी जाना गँवारा नहीं मुझे

तुम क्यों ही पूछते हो मेरे उदासी का सबब
जब तुमने कभी रूककर सँवारा नहीं मुझे

ज़माना तो चाहता था की मैं ज़िंदा ही रहूं
पर तुमने भी क्यूँ  जान से मारा नहीं मुझे

ज़माने के बिसात पर मैं तो एक मोहरा ही था
क्या कहें की किस किस ने उतारा नहीं मुझे

वफ़ा तुम्हारे नाम की जलन आँख की रही
ऐसे आग से करना कोई किनारा नहीं मुझे

कि इसबार गिर के मैं तो खुद से ही उठा हूँ
"धरम" चाहिए अब कोई सहारा नहीं मुझे 

Saturday, 23 September 2017

चंद शेर

1.
जिस जहाँ के तुम खरीददार थे वहाँ तो हम बिक न सके
किसी और दूसरे ज़हाँ में 'धरम' मुझे बिकना गँवारा नहीं

2.
आज जरा हौशले से सुनो मुझे 'धरम' कि हाँ महज़ एक चीख ही हूँ मैं
मैं भूला नहीं हूँ कि तेरे दामन को मिला एक अनचाही भीख ही हूँ मैं

3.
कि ख़ुद मेरे ही घर में "धरम" कितनी वीरानी लगी मुझे
जब सोचने लगा तो तेरी सारी बातें आसमानी लगी मुझे

4.
कोई और वादा नहीं चाहिए तेरे इस वादा-ए-सुखन के बाद
कि अब कोई जहाँ नहीं चाहिए "धरम" इस कफ़न के बाद

5.
बाद तेरे नाम के "धरम" मैंने जो भी लिखा वो इबादत है
कि ये कुछ और नहीं हर हर्फ़ में लिपटी तेरी मोहब्बत है

Thursday, 21 September 2017

हर होंठ गुनगुनाने लगे मुझे

कि जो खुली किताब तो हर होंठ गुनगुनाने लगे मुझे
एक के बाद एक मेरे सारे दुश्मन अपनाने लगे मुझे

कि बात हवा के रुख़ की थी तो मैं भी साथ हो लिया
बाद इसके न जाने क्यूँकर लोग समझाने लगे मुझे

कि सिवा एक मेरे इश्क़ के तू किसी और की मुरीद नहीं
तेरी महफ़िल में इस बात पर लोग झुठलाने लगे मुझे

कि बाद तेरे जाने के भी वहाँ महफ़िल-ए-जॉ बाकी थी
न जाने क्यूँ लोग मुझको रोककर ये बतलाने लगे मुझे

उस मोहब्बत की कीमत 'धरम' मैं अब और क्या बताऊँ
तन्हाई से लिपटकर रोने में भी कितने हर्ज़ाने लगे मुझे