Friday, 27 April 2018

ज़हर पिला दिया मैंने

जब भी ख़्याल दिल-ए-आबाद हुआ उसे जला दिया मैंने
औ" बाद उसके मौत के बाद की नींद भी सुला दिया मैंने 

कि जिस किरदार को मैंने पैदा किया पाला मशहूर किया
खुद अपनी मौत से पहले उसको ज़हर पिला दिया मैंने

ये इश्क़ हुआ कि क्या जाने मेरी मौत का तमाशा ही हुआ
क्यूँ कर खुद ही अपनी हस्ती को मिट्टी में मिला दिया मैंने 

एक तो तू उजड़ा चमन औ" उसपर तेरी बातों में भी बेरुखी
हाय! ये किसके इंतज़ार में खुद अपनी हड्डी गला दिया मैंने

इस रात के ढल जाने के बाद एक और सुबह की उम्मीद है
इस बात पर अपने दिल में एक और चिराग़ जला दिया मैंने

मुझे अब भी रौशन हैं उम्मीदें कि ज़हाँ मेरा भी आबाद होगा
हरेक ग़म को ठोकर मारकर अपने पहलू से भगा दिया मैंने

तेरे दामन में सिर्फ कांटे ही आबाद होंगे फूल कभी न आएगा
कि ये लो तेरे मुकद्दर का फैसला आज तुमको सुना दिया मैंने 

जिस बुझते हुए लौ को कभी सींचा था अपने ही खून से मैंने
आज खुद "धरम" अपने एक ही फूँक से उसे बुझा दिया मैंने

Thursday, 26 April 2018

चंद शेर

1.
जो हक़ीक़त है वो कोई ख़्वाब न था औ" जो ख़्वाब था वो कभी हक़ीक़त न हुआ
कि तेरी ज़िंदगी का ऐसा कौन सा लम्हा है 'धरम' जो तेरे लिए गनीमत न हुआ

2.
ऐ! ज़िंदगी अब तू न मेरे ज़िस्म में उतर न मेरे लहू में दौड़ कि पूरा बदन दुखता है
कि मौत के दस्तक का एहसास "धरम" अब तो जी को बिल्कुल ही नहीं चुभता है

3.
हमने जो बात रखनी थी "धरम" हमने रख दी थी कि बारी अब तुम्हारी थी
महज़ एक ही झटके में तुमने टाल दी थी वाह क्या खूब तेरी समझदारी थी

4.
जब तुझको देखता हूँ 'धरम' अंदाज़-ए-ज़माना याद आता है
औ" बाद उसके तेरे ज़ुर्म का एक-एक फ़साना याद आता है 

Sunday, 22 April 2018

कि वो क़त्ल भी हमारा नहीं हुआ

कि तेरी नज़र में रहकर भी मैं कभी तेरा नहीं हुआ
क्यूँ एक भी बार मेरी ज़िंदगी में कोई सवेरा नहीं हुआ

तेरे हर लफ्ज़ में उलझन थी औ" थी हर नज़र पशेमाँ
तू ये कैसी दरिया है जिसका कोई किनारा नहीं हुआ

जाम के सहारे यारों कभी हम भी चलते तो थे मगर
रुख़्सत-ए-जाम के बाद कभी कोई सहारा नहीं हुआ

कि ख़ुद अपनी गलतियों का अब क्या हिसाब करूँ
जब सही फैसले पर भी मेरा कहीं गुज़ारा नहीं हुआ

उजड़े हुए गुलसन पर ख़ुद क़त्ल कर तो दी ज़िंदगी
क्या कहें "धरम" कि वो क़त्ल भी हमारा नहीं हुआ

Monday, 2 April 2018

किसी का किसी से कोई रिश्ता नहीं

कि दिल किस ज़ख्म से आबाद होगा इसका अंदाजा नहीं
तेरे जी को क्या चाहिए इसका ख़ुद तेरे जी को पता नहीं
 
हुस्न की दहलीज़ पर जाकर भी तुम तश्ना-लब लौट आए
अब ख़ुद ही से तुम ये पूछो की क्या ये भी तेरी ख़ता नहीं 

ऐ! ख़ुशी तू मेरे पहलू में आते ही एक मातम बन जाती है
इस बात का मुझे एहसास है तू मुझे और कुछ भी बता नहीं

क्यूँकर बुलंदी की हर राह एक सन्नाटे पर ही ख़त्म होती है
कि क्या इसके अलावा कहीं भी बचा कोई और रास्ता नहीं

आज वो ज़ाम भी धोखा दे गया जिसमें कल तक ज़हर था
पूछा तो पता चला की उसका मुझसे अब कोई वास्ता नहीं

क्यूँ महज़ एक मौत के बाद फिर कोई सितमगर नहीं आया 
इस ज़हाँ में तो "धरम" किसी का किसी से कोई रिश्ता नहीं 

Monday, 26 March 2018

बुझते दिये को मैंने फिर से जलाया है

कि मुरझाया फूल भी यदि मेरे दामन में आया है
मैंने उसे भी इज़्ज़त से अपने माथें पर सजाया है

निकालकर दिल से मुझे जब तुमने ठोकर मार दी
न जाने कितने हाथों ने मेरे ज़ख्मों के सहलाया है

मेरे नाम से जुड़ने का अब तो कोई शौक नहीं तुझे
तुमने उस गुज़रे ज़माने के हर याद को भुलाया है

वो मेरे वफ़ा का क़त्ल भी था औ" थी तेरी मेहरबानी
तेरे उस सितम ने तो मुझे बिना दरिया के डुबाया है

मेरे उम्मीद को फेरने के लिए तेरे पास तो समंदर था
जब भी प्यास लगी उससे एक बूँद भी पानी न पाया है

मैंने बढ़ाया है हाथ फिर से चाहो तो गले लगा लो मुझे
कि एक बुझते दिये को "धरम" मैंने फिर से जलाया है 

चंद शेर

1.
हमने ढ़ेर सारे ज़ख्मों को 'धरम' नासूर बनते देखा है
एक तरफ़ा प्यार में बिना बात के हुज़ूर बनते देखा है

2.
ये मेरे तस्सबुर के चाँद के टुकड़े हैं कि तू आ तुझे इसमें लपेट दूँ
तेरे इस बेपनाह हुस्न को 'धरम' मैं अपने हाथों से चाँद में समेट दूँ

3.
मुझे चाहने वाले भी कुछ लोग हैं "धरम" जिसके लिए ज़िंदा हूँ मैं
मगर तेरी नज़र में तो बस क्या कहूँ भटकता हुआ एक रिंदा हूँ मैं 

4.
कि मेरी उड़ान तेरी ज़िंदगी की उड़ान से कुछ कम तो न थी 
मगर फिर भी तेरे लिए तो महज बिना पंख का परिंदा हूँ मैं

Friday, 16 March 2018

अब फिर से मेरी मौत नहीं होगी

कि आपके शान में मेरी तरफ से अब कोई और गुस्ताख़ी नहीं होगी
मुझे पता है कि बाद इस माफ़ी के अब कोई और माफ़ी नहीं होगी 

कि ये एहसास मुझे तब हुआ जब अरसा बाद हम दोनों रु-ब-रु हुए
जो तुम में वो किरदार ही न रहा तो अब फिर वो महफ़िल नहीं होगी

कि किस इरादे से बात रखे थे और किस मुक़ाम पर तुम मुझे ले आए
बाद इस मंज़िल के तेरे बताए किसी और मंज़िल की ज़ुस्तज़ू नहीं होगी

कि ग़र मेरे क़त्ल की ही तमन्ना थी तो मुझे कह दिए होते मैं जां दे देता
मगर हाँ! तेरे बख्शे इस मौत के बाद अब फिर से मेरी मौत नहीं होगी 

कि ग़र वक़्त ने यदि ये दौर बख्शा है तो हालात ने मुझे सिखाया भी है
हाँ! रिश्ता ज़िस्म जां और रूह हर किसी की मौत एक जैसी नहीं होगी

कि इस क़रीबी के दरम्यां पसरे सन्नाटे को मर जाने तक छोड़ देना है 
हाँ! रूह के ज़िंदा रहने तलक "धरम" अब कोई और बात नहीं होगी 

Wednesday, 7 March 2018

चंद शेर

1.
हर हवा के सामने "धरम" मेरा ही चिराग़ है
हाँ मगर इसमें मेरे जलते लहू की आग है

2.
हमारे दरम्या बात वफ़ा की कब थी जो था परस्पर का सहारा था
कि न कभी तुम ही हमारे थे 'धरम' और न ही मैं कभी तुम्हारा था

3.
कि हो पंख उड़ो तब गरुड़ सदृश औ" बोलो तो निकले दहाड़
हर हीन भावना पर "धरम" तुम खुलकर करो प्रचंड प्रहार

4.
कि अब बताओ तेरे लिए कौन सी गली बाकी है कौन सा द्वार बाकी है
ये भी बताओ "धरम" की तेरे बुलंद हौशले का कितना पारावार बाकी है

5.
वसीयत के नाम पर स्थाई ज़ख्म मिला औ" मिली कई तस्वीर
जब भी ज़माने से किया नेकी "धरम" अपने हिस्से आया जंज़ीर

6.
सब ताज़ उछाले जाएँ सब तख्त गिराए जाएँ
सारे चेहरों से "धरम" अब नक़ाब हटाए जाएँ

7.
इस सुकूँ के बाद "धरम" अब बाकी कोई सुकूँ नहीं
तुम जब मिल ही गए तो अब बाकी कोई जुनूँ नहीं

8.
एक ही रास्ता एक ही मंज़िल औ" दरम्याँ हमारे कोई फ़ासला भी नहीं "धरम"
फिर न जाने क्यूँ तुम चलते चलते रुक गए थे मैं बोलते बोलते चुप हो गया था

Saturday, 17 February 2018

चंद शेर

1.
कि दो महज ज़िस्म "धरम" कब तलक एक साथ रह सकते हैं
दोनों के दरयमां कोई तीसरा न आ जाए तब तलक रह सकते हैं

2.
उसके वफ़ा की बात जब जफ़ा तक आ गई तो हमने किनारा कर लिया
जब ज़िंदगी की उम्मीद ही न बची 'धरम' तो ख़ुद को बेसहारा कर लिया

3.
उसकी नज़र में तुम कब न थे 'धरम' तेरी नज़र में वो कब न था
जब तक रिश्ते ने दम न तोड़ा था दोनों एक दूसरे के नज़र में था

4.
बात लगातार बिगड़ती रही फिर भी उम्मीद-ए-लुत्फ़ ज़िंदा रहा
अंतिम नतीजा यह हुआ 'धरम' कि मैं बिना पंख का परिंदा रहा 

5.
तेरा हर अंदाज़ "धरम" ऐसा लगता है कि अंदाज़-ए-ज़माना है
मगर फिर भी क्यूँ ऐसा लगता है कि तेरा-मेरा कोई फ़साना है

6.
अपने क़त्ल पर "धरम" आपको रुस्वा नहीं होंगे ये मेरा आपसे वादा है
आप ये बताएं कि क़त्ल के अलावा क्या आपका कोई और भी इरादा है 

Sunday, 11 February 2018

सलमा और नूरज़हाँ का कोठा

कल सलमा नाची नहीं थी| उसके पैर में थोड़ा सूजन था| नूरज़हाँ थोड़ी ख़फा थी सलमा पर| सलमा वर्तमान में उस कोठे की नूर थी जिस कोठे पर कभी नूरज़हाँ के कई कद्रदान दमभर के दौलत लुटाते थे| यूँ तो सलमा नूरज़हाँ की औलाद न थी मगर उसकी बहुत प्यारी थी| सलमा, नूरजहां के कोठे की एक कनीज़ और उस शहर के एक नामी रईस की पैदाईश थी| यूँ तो नूरज़हाँ अब ढल गई थी मगर हुस्न अब भी उसके कैद में था| उसके शौक अब भी वैसे के वैसे ही थे जैसे जवानी में हुआ करते थे| हो भी क्यूँ नहीं? नूरज़हाँ को सलमा जैसी नूर मिल गई थी जिसे मानो ख़ुदा ने ख़ुद अपने हाथ से सजाया हो| बला की ख़ूबसूरत| नूरज़हाँ, सलमा में अपनी जवानी देखती थी| शहर के लौंडों को नूरज़हाँ अब भी ऊँगली पर नचाती थी| नूरज़हाँ के कई शौक थे| एक से एक रईसज़ादे, सरकारी अफ़सर, हट्ठे-कट्ठे नौजवान, हुस्न के कद्रदान सब के सब नूरज़हाँ के नज़ाकत के अब भी शिकार थे| सलमा का बीमार पड़ना नूरज़हाँ को बिलकुल ही पसंद नहीं था| मगर तबीयत पर नूरज़हाँ के हुस्न का कोई ज़ोर नहीं चल सकता था| बात सलमा के बीमार होने की थी| नूरज़हाँ ने शहर के सबसे बड़े डॉक्टर को बुलावा भेजा| डॉक्टर साहब आए और नूरज़हाँ के क़दमों में अपनी हाज़िरी पेश किए| नूरज़हाँ ने अपने पुराने अंदाज़ में ही डॉक्टर साहब का ख़िदमत किया| डॉक्टर साहब अब सलमा की नब्ज़ टटोल रहे थे|   बीमारी बिल्कुल ही मामूली थी| डॉक्टर साहब सलमा को दवाई और नूरज़हाँ को दिलाशा देकर चले गए| कोठे की 3-4 लौंडियाँ अब सलमा के क़दमों में पेश-ए-ख़िदमत थी|

अगले दिन के मुज़रे का न्योता नूरज़हाँ बहुत दिन पहले ही शहर के ढेर सारे नए-पुराने रईसों को भिजवा चुकी थी| नूरज़हाँ को उस रात नींद नहीं आ रही थी| उसके साख की बात थी| सलमा का अचानक से बीमार होना नूरज़हाँ का सरदर्द बन गया था| मगर अब क्या हो सकता था, नूरज़हाँ बार-बार उठकर सलमा को देखने जाती थी| सलमा को चैन की नींद सोते देख नूरज़हाँ को काफी तस्सली हुई| रात्रि के अंतिम प्रहर में नूरज़हाँ भी नींद के आगोश में खो गई| सुबह सलमा थोड़ी देर से उठी और नूरज़हाँ उससे भी और थोड़ी देर से उठी|  नूरज़हाँ सुबह उठकर सलमा का नज़र उतारती है और फिर महफ़िल के तैयारिओं का मुआयना करने चली जाती है| नूरज़हाँ चिंतित है की उसके पुराने कद्रदानों को किसी चीज़ की कमी महसूस न हो जाए| इस बात को लेकर कोठे पर के कई लौंडियों को नूरज़हाँ कई बार आँख दिखा चुकी है| दोपहर अपनी जवानी से बुढ़ापे की ओर ढल रही थी| उस शाम के आने की थोड़ी-थोड़ी आहट हो रही थी जो की नूरज़हाँ के कोठे पर एक साल में एक बार ही आती है| इसी बीच में नूरज़हाँ एक बार सलमा को निहार लेती है| सलमा के तबियत को लेकर नूरज़हाँ अब पूरी तरह से निश्चिंत हो जाती है| ढेर सारे रंग के फूल, मदहोशी ख़ुश्बू वाले इत्र, पीकदान, पान, शाही अंदाज़ वाले बैठक, कालीन और कई ढेर सारे चीज़ों का नूरज़हाँ ख़ुद ध्यान रख रही थी| ये सारी चीज़ें उस शाम के रौनक को और हसीं बनाने वाले हैं| अब वक़्त आ चला था, उस शाम की शहनाई बज उठी| नूरज़हाँ पूरे साज़-ओ-सामान के साथ महफ़िल में आ गई|

बाबू राम खेलावन सिंह उनके कोठे से सबसे पुराने रईस थे| वो अपने चार लौंडों को दोपहर में ही नूरज़हाँ के कोठे पर अपने आने की सूचना देकर भेज थे| वो चारो लौंडे शाम की शहनाई बजते ही नूरज़हाँ के कोठे की सीढ़ी पर उपस्थित हो गए| बाबू राम खेलावन सिंह अपनी बैलगाड़ी पर बैठे चले आ रहे थे| उनकी अगुवाई में नूरज़हाँ अपने दो लौंडे भेज चुकी थी| कोठे से 50 मीटर की दूरी से ही वो दोनों लौंडे बाबू राम खेलावन सिंह के ख़िदमत में पेश थे| बाबू राम खेलावन सिंह अब कोठे की सीढ़ी तक पहुंच गए थे| नूरज़हाँ की दो लौड़ियाँ कालीन के ऊपर अपना दुपट्टा बिछा देती है और नूरज़हाँ ख़ुद चलकर बाबू राम खेलावन सिंह को उनके बैठक तक पहुँचाती है| पूरी तहज़ीब के साथ बाबू राम खेलावन सिंह भी नूरज़हाँ के क़दमों में एक शेर पेश करते हैं:
                                            तेरे ख़्याल के बाद भी सिर्फ तेरा ही ख़्याल था
                                            कि ऐ! नूरज़हाँ बिन तेरे मेरा जीना मुहाल था 

बाबू राम खेलावन सिंह के इस शेर पर नूरज़हाँ झुककर आदाब पेश करती है और फिर बाबू राम खेलावन सिंह सोने के दो सिक्के नूरज़हाँ के क़दमों में रख देते हैं|

कामता प्रसाद और अम्बिका प्रसाद सगे भाई थेl यूँ तो दोनों मुश्किल से ही कभी एक साथ बैठते थे मगर नूरज़हाँ के कोठे पर यौवन का आनंद दोनों एक साथ उठाते थेl नूरज़हाँ उन दोनों भाइयों के आखों की नूर थीl उनके भी आने का वक़्त हो चला थाl नूरज़हाँ की लौंड़ियाँ कोठे के दरवाजे से लग कर उनकी राह देख रही थीl कामता प्रसाद अपने घोड़ा-गाड़ी और अम्बिका प्रसाद अपने बैल-गाड़ी पर दूर से आते दिखाई दिएl जो लौंडियाँ उनकी राह देख रही थीं उनके इंतज़ार का वक़्त ख़त्म हुआl नूरज़हाँ को दोनों भाइयों के आने की ख़बर लेकर एक लौंड़ी दौड़ पड़ती हैl नूरज़हाँ दोनों भाइयों का भव्य स्वागत करती हैl नूरज़हाँ ख़ुद अपने हाथों से दोनों भाईयों के कुर्ते पर इत्र लगाती है, गिलौरी पान खिलाती है और मटककर उनको अपने-अपने बैठक तक ले जाती हैl कामता प्रसाद दिल से शायर भी थेl नूरजहां के लिए एक शेर उन्हौंने भी पढ़ा: 
                              ऐ! नूरज़हाँ मैं यही दुआ करता हूँ कि ये रात मुख़्तसर न हो
                              बाहें तेरी हो औ" उसमे मेरे अलावा किसी और का सर न हो

कामता प्रसाद के इस शेर पर बाबू राम खेलावन सिंह की भृकुटि तन गई थी जिसे नूरज़हाँ ने बड़ी अच्छी तरह से भांफ लिया थाl बाद इसके नूरज़हाँ के इशारे पर एक लौंड़ी बाबू राम खेलावन सिंह को अपने हुस्न की थोड़ी सी चटनी चटा देती हैl  ..............अभी जारी है लिखना......