Sunday, 30 September 2018

चंद शेर

1.
सफर में कुछ ही दूर चलने के बाद बाकी बची दूरी का पता नहीं चला
कि उसकी मेहरबानी औ" ख़ुद अपनी ही मजबूरी का पता नहीं चला

2.
उसे किसी भी बात का 'धरम' अब कोई भी नहीं है मलाल
पहले तो सिर्फ ज़िस्म नंगा था अब बदन पर नहीं है खाल

3.
मेरा चिराग़-ए-जां बुझने से पहले एक बार जरूर देखना
कि मेरे मौत से पहले एक बार मुझको मेरे हुज़ूर देखना

4.
कि क्यूँ तेरा हर रिश्ता 'धरम' या तो बोझ या बनावटी होता है
रूह ज़िस्म जां हर किसी का मिलन सिर्फ दिखावटी  होता है

5.
बात दिल से ज़ुबाँ तक आते-आते कई बार हलक़ से चढ़ता उतरता रहा
कभी "धरम" नाउम्मीदी कभी बेख़्याली तो कभी पज़ीराई उभरता रहा 

Thursday, 6 September 2018

एक ही पैमाना है

तू किस महफ़िल से आया है तू कहाँ का दीवाना है
जो इस अंजुमन के हर तौर-तरीके से अनजाना है

यहाँ या तो हलक़ से मय उतरता है या फिर लहू
हाँ मगर इन दोनों के लिए यहाँ एक ही पैमाना है

दर-ओ-दीवार यहाँ पर्दा में रहता है हुस्न बेपर्दा है
यहाँ तो उठी औ" झुकी दोनों नज़रों का नज़राना है

बात चलती है तो दुआ के लिए हर हाथ उठता है
ग़र चले हुस्न तो यहाँ हर किसी को मर जाना है

यहाँ नशा हुस्न का मय का इश्क़ का सब बराबर है
ज्यादा या कम से हटकर यह एक अलग ज़माना है 

यहाँ किसी की ख्वाईश किसी और से नहीं मिलती 
औ" हर किसी का "धरम" अलग-अलग फ़साना है 

Tuesday, 4 September 2018

ख़ुद को तलाशने का सिलसिला

बीच से किनारा
औ" फिर किनारे से बीच का फलसफा   
जब निकला इससे
हासिल हुआ रेगिस्तां औ" जलजला

धूप और छाँह
दोनों के वज़ूद को अलग-अलग तराशते
मानो जड़ और चेतन के बीच
ख़ुद को तलाशने का सिलसिला 

अपने हिस्से का आसमाँ मिलने के बाद
ज़मीं की खोज में भटकता
कई बार उजड़े हुए गुलसन के गिर्द खो जाता
पर नहीं पाता कभी मरहला 

Friday, 10 August 2018

चंद शेर

1.
कि उदासी लब को चूमे औ" ज़ख्म दिल को रौशन करे
तो भला इस जहाँ में 'धरम' क्यूँ मेरा कोई व्यसन करे

2.
दरिया को बीच से काटकर "धरम" नया किनारा बनाया गया
किसी एक के सहारे के लिए कितनो को बेसहारा बनाया गया

3.
क्यूँ तेरे एक ख़्वाब के बाद "धरम" कभी भी कोई दूसरा ख़्वाब नहीं आता
कि दिल धड़क के रुक जाता है मगर हाँ कोई मुक़म्मल जवाब नहीं आता

4.
कि कितने गुनाहों के बाद हम उस वक़्त-ए-रुख़्सत के पनाह से निकले
खुद अपने ही सजाए क़ब्र से 'धरम' हम रंग-ए-चेहरा-ए-स्याह से निकले

5.
मैंने जब भी रास्ता बदला "धरम" मंज़िल को भी बदलते देखा
कि मैंने तो मील के पत्थर को भी मोम की तरह पिघलते देखा

6.
जब उसने जाने की ज़िद की "धरम" तो मैंने ख़ुद ही रास्ता बना दिया
बाद उसके फिर कभी न आह निकले दर्द पनपे ऐसा रिश्ता बना दिया

7.
इश्क़ का आगाज़ हुआ तो था हाँ! मगर हुस्न के ढल जाने के बाद
जैसे रात का मिलना हुआ "धरम" ख़ुर्शीद के निकल जाने के बाद

8.
परत दर परत खुलती गई नक़ाब दर नक़ाब सरकता गया
चरित्र औ" चेहरा दोनों 'धरम' कई आयाम में उभरता गया

Monday, 6 August 2018

अपने वज़ूद को बस तरशता रहा

कि हवा के रुख हुआ 'धरम' तो हवा उड़ा गई मुझे
औ" ग़र न हुआ हवा के रुख तो हवा तोड़ गई मुझे
मैं तो हर हाल में अपने वज़ूद को बस तरशता रहा 

Sunday, 5 August 2018

तो समझो रिश्ता मुकम्मल हुआ

रिश्ता महज़ दो ज़िस्मों के दरम्यां नहीं पनप सकता
दोनों रूहों का बराबर जुड़ना जरूरी होता है

संवेदनाओं की तरंगें जब दिल से निकलकर
बदन के हर रोम-कूप को जागते सहलाते
अपने होने का एहसास कराते
सर से पैर तक को सिहरन में डुबोते
सुख के अथाह सागर का देर तक अनुभव कराते
दिल और ज़िस्म के फ़ासले को मिटाते
दो सासों को एक करते

ज़हाँ के होने न होने के एहसास से इतर
दूर सितारों में कहीं घूमते हुए खो जाते
दोनों ज़िस्मों के अंदर संवेदना के
एक तीसरे ज़िस्म का निर्माण करते
और फिर उसमें दोनों समा जाते

संवेदना रूपी जिस्म के
अन्तः मन के उपजे किरण से
जब गैरों को
दो अलग-अलग जिस्मों का
बिब्म एक दिखने लगे

तो समझो रिश्ता मुकम्मल हुआ

Tuesday, 31 July 2018

चंद शेर

1.
बदन में यूँ ही तो आग न लगी होगी दिल में यूँ ही तो धुआँ न उठा होगा
कि क़फन में लिपटे जज़्बातोँ को 'धरम' जरूर कुछ न कुछ हुआ होगा

2.
कि किताब तो मुकम्मल हो गई मगर हाँ! उसके कई वरक़ कोरे रह गए
मानो ऐसा 'धरम' की मौत के बाद भी ज़िंदगी के कई सपने अधूरे रह गए

3.
ऐसा क्या ख़्याल करूँ की ग़म और पैदा हो ज़ख्म और गहरा हो
औरों के लिए वहॉँ बाग़ हो "धरम" मगर मेरे लिए सिर्फ सहरा हो

4.
साक़ी तू पैमाने में अब ग़म मिला न तो दरार-ए-दिल मिट न सकेगा
क्या कहूं "धरम" कि ये ऐसा दरार है जो बिना ग़म के जुट न सकेगा

Sunday, 15 July 2018

काम-ए-शबाब नहीं कहना

कि अब किसमें कौन कितना ज़िंदा है इसका जवाब नहीं कहना
भरी दुपहरी में उग आए उस महताब को आफ़ताब नहीं कहना

कि जिसको दिल समझा था वो तो हक़ीक़त में मकतल निकला
वहां कितने अरमानों का क़त्ल हुआ उसका हिसाब नहीं कहना

कि वो पूरी मौत थी औ" बाद उसके ज़ख्मों का असर कुछ न था
मरने के बाद फिर ज़िंदा तो हुआ मगर अब आदाब नहीं कहना

कि अब फिर से मरना गँवारा नहीं की अब ये नागवार गुजरेगा 
फिर से क़त्ल के उस ज़ुर्म को 'धरम' काम-ए-शबाब नहीं कहना

Thursday, 12 July 2018

चंद शेर

1.
ये कैसी हिज़्र की किताब है "धरम" यहाँ बहता अश्क़ बेहिसाब है
कि किसी से किसी की कोई बात नहीं होती सिर्फ होता आदाब है

2.
जो निकले थे आसमाँ के तलाश में तो अपने हिस्से की ज़मीं भी खो गई
नतीजा यूँ हुआ "धरम" कि मुझे महज़ हवा का एक झोंका ही डुबो गई

3.
इश्क़ कहाँ था "धरम" जो था वो आधा हुस्न था बाकी आधा आज़ार था
कि मख़मली लिबास में जो लिपटा ज़िस्म था वो अंदर से खार-खार था

Friday, 22 June 2018

चंद शेर

1.
जब "धरम" पानी से पानी को जलाया आग से आग बुझाई
कि तब जाकर ग़म खा के ज़िंदगी खुद मेरे क़दमों में आई

2.
पिरोया था अपनी जां को "धरम" तेरी जां में इस कदर
कि ख़ुद को पा लेता था बस देखकर तुझको एक नज़र

3.
दोनों को "धरम"अब तो इस रिश्ते के मरने का इंतज़ार करना है
क्यूँकि दोनों को अब तो अलग-अलग सख़्श पर ऐतवार करना है

4.
कि सर मेरा जब भी झुका 'धरम' क़लम कर दिया गया
उस रिश्ते में पनपे गहराई को भी भरम कर दिया गया