Saturday, 30 March 2019

कभी ऐसे तो न चाहा तुमको

कभी ऐसे तो  न चाहा तुमको कि  तेरे जाने का  कोई मलाल होता
जब कोई अरमाँ  थी ही नहीं तो  ऐसा कुछ  न था जो  हलाल होता

हमारे ज़िस्म साथ  तो बसर करते मगर  रूह दोनों के अलग रहते
दरम्यां दोनों  अलग-अलग  रूह में  कहाँ कुछ था जो सवाल होता

यूँ तो बस  मन रखने को  हम दोनों ने  कह दिया था रिश्ता उसको 
रिश्ते को  ज़िस्म रूह  कुछ हासिल  न था तो कैसे वो पामाल होता 

साथ रहते दो  ज़िस्म जिसे  ख़ुद  अपनी-अपनी रूहों का पता नहीं
बिना जज़्बात  के ग़र वो दो ज़िस्म  मिलते भी तो क्या विसाल होता

अपनी-अपनी धुन में रहने वाले दो  ज़िस्मों के  अपने-अपने सवाल
ग़र किसी अनसुने सवाल का जवाब होता भी तो क्या कमाल होता

बिना किसी सवाल  के ग़र जवाब ढूंढती  ज़िंदगी भी तो क्या ढूंढती
उस बिना किसी सवाल वाले इम्तिहाँ का "धरम" क्या मआल होता  

Monday, 4 March 2019

चंद शेर

1.
जो कुछ भी मैंने लिखा "धरम" वो  लिखने का मुझे कोई हक़ न था
किताब मुक़म्मल तो हो गई थी मगर हाँ उसमें एक भी वरक़ न था

2.
मेरे कदमों का रिश्ता "धरम" न तो ज़मीं से था  न ही मंज़िल से था
ज़िंदगी तमाम उम्र मझधार में रही कहाँ कभी रिश्ता साहिल से था

3.
कि अब तो कोई भी दर्द "धरम" हद से गुज़रता नहीं है
बदन पर ज़ख्म का निशाँ भी बदन पर उभरता नहीं है

4.
कोई रंग जीवन में कब था "धरम"  जब हर कहानी बेरंग रही
कि सांस हर रात बुझता था जलकर औ" जवानी पूरी तंग रही

5.
कागज़ पर उपजे रिश्ते को "धरम" दिल में उतरने में एक उम्र लग जाती है
मैंने अक्सर देखा है दिल में उतरने के पहले ही कोई चिंगारी सुलग जाती है

6.
मेरे क़त्ल के ज़ुर्म का भी "धरम" मुझ ही से हिसाब मांगते हैं
ये कैसे लोग हैं  जो अपने किए हर ज़ुर्म पर  नक़ाब मांगते हैं 

7.
कब मेरा रूह 'धरम' मेरे ज़िस्म में था  कब मेरी साँसें मेरे सीने में थीं
कब मेरा लहू मेरी शिराओं में था औ" कब मेरी नज़र मेरी आँखों थीं 
 

Tuesday, 22 January 2019

चंद शेर

1.
वो जो मौत की नींद सो गई थी 'धरम' वो चाह फिर से क्यूँ जगी
जब ज़िस्म पूरा का पूरा ठंढा था तो फिर दिल में आग क्यूँ लगी

2.
हम साथ तो निकले थे 'धरम' पर मैं कहाँ तक चला तुम कहाँ तक चली
अपनी साँस रूह ज़िस्म नज़र इनमें कुछ भी तो कभी एक साथ न चली

3.
कि बाद उस क़रार के महज़ उसका ख़्याल भी चुभने लगा
दिल के साथ न जाने क्यूँ "धरम" पूरा ज़िस्म भी दुखने लगा

4.
जलती आखों में  हर मंज़र बस  राख बनकर रह गया
वो इश्क़ भी "धरम" महज़ एक ख़ाक बनकर रह गया

5.
एक ही मौत काफी नहीं होती 'धरम' इश्क़ को मुकम्मल होने में
मुझे तो कई बार  यूँ ही मरना पड़ता है  महज़ एक ग़ज़ल होने में 

Saturday, 12 January 2019

उजाला छा न सका

नज़र से पिया  हलक़ में उतारा  मगर दिल  में बसा न सका
रिश्ते के  रूह को उसके ज़िस्म से  कभी अलग पा न सका

वो नाम  जब भी  ज़ुबाँ पर आए  तो आह! क्या तरन्नुम आए  
ज़ुबाँ तो खुले  मगर उसे  कभी गुनगुना न सका  गा न सका

मौसम बहार  का खिज़ा का  इश्क़ का  या फिर तन्हाई का
इनमें कोई भी  मौसम मेरे  दहलीज़ तक  कभी आ न सका 

ख़ुर्शीद चिराग़ जुगनू हर किसी के  रौशनी  की नुमाईश हुई
बाबजूद इसके "धरम" कभी मेरे घर में उजाला छा न सका

Saturday, 5 January 2019

चंद शेर

1.
कि हर किसी को  मुक़ाम हासिल हो  हर ख़ामोशी को ज़ुबान हासिल हो 
अब वहाँ चलो "धरम" जहाँ हर दर्द को अपनी अलग पहचान हासिल हो

2.
वादों से ऊब के अब जां निकले  हम तो ख़ुद  अपने ही घर में मेहमाँ निकले
जब भी मंज़िल की ओर निकले "धरम" तो पता नहीं फिर कहाँ-कहाँ निकले

3.
अल्फाज़ मोहब्बत के कब के बदल गए अब तो दिल भी दुखाने लगे
मिले जो नज़र से नज़र "धरम" तो सिर्फ बेवफाई ही सामने आने लगे 

4.
अब न तो मरने का हुनर ही है 'धरम' न ही जीने का कोई इरादा रहा
एक ही पहलू में आधी मौत आधी ज़िंदगी रही दूसरा पहलू सादा रहा 


Thursday, 3 January 2019

मोहब्बत का भरम-ए-फ़साना बाकी है

मुन्सिफ़ का फैसला हो चुका मोहर भी लग गई सिर्फ सुनाना बाकी है 
मगर क्यूँ अब भी लगता है कि  उसकी यादों का आना-जाना बाकी है 

दरख़्त के सूखे डाल पर अनजाने में बे-मौसम कोई पत्ता उग आया था 
पत्ता साख़ से टूट चुका है  मगर उसका अभी ज़मीं पर गिरना बाकी है

मेरे ये मोहब्बत के फूल यूँ ही  सूख गए कुबूल किसी के भी न हो सके  
मगर एक उम्मीद  ज़िंदा है कि इसका  अब फिर से निखरना बाकी है 

न कभी इशारा  हुआ न आहट हुई  न किसी ने मुझको पलटकर देखा 
बिना जंग के  ही हार  हुई बाद इसके  भी मुझमें कोई दीवाना बाकी है 

हो सके कि फिर  से ज़ख्मों में जान  आए दिल में दर्द बढ़े आह निकले 
लगता ऐसा है "धरम" कि अभी मोहब्बत का भरम-ए-फ़साना बाकी है

Tuesday, 4 December 2018

चंद शेर

1.
मेरे  सब्र को "धरम" अब और क्या ही आज़माना
कि गुज़रते गुज़रते अब तो गुज़र गया हर ज़माना

2.
वहीं से  ज़ख्म मिला "धरम" जहाँ से  ज़ख्म भरना था
कि बाद उत्तर मिलने के अब उपयुक्त प्रश्न करना था

3.
चैन की  एक  नींद  "धरम" मौत के  पहले भी आनी चाहिए
मौत के पहले भी एक रात कब्र-ए-मुक़र्रर में बितानी चाहिए

4.
न कोई यार है मेरा न तो किसी नज़र को इंतज़ार है मेरा
ख़ुद अपने आप से भी तो 'धरम' नहीं कोई क़रार है मेरा

5.
बज़्म-ए-उल्फ़त की रौनक-ए-महफ़िल "धरम" एक उसके जाने से घटती नहीं
वो एक बार गुजरी तो क्या गुजरी मुझ पे की अब तो  कोई भी याद मिटती नहीं

6.
पीकर समंदर को  नशा सुबह  तक चारो  आखों में बनाए रखा
एक ही आग से लिपटकर "धरम" दोनों ज़िस्मों को जलाए रखा

7.
बात को जब आगे निकलनी थी तो हर दीवार टूटी  कई रास्ता बना
बुनियाद मोहब्बत की थी "धरम" मगर उसपर ये कैसा वास्ता बना

8.
इस एक सख़्श को "धरम" अब और कितना आजमाना है तुम्हें
कि क्या मोहब्बत को इसी के साथ अंजाम तक ले जाना है तुम्हें

9.
सासें बोलती रहीं "धरम" सिहरन दोनों ज़िस्मों को ज़िन्दा करता रहा
बाहों से बाहें लिपटी रहीं घूँट इश्क़ का हलक़ में  चढ़ता उतरता रहा


Saturday, 24 November 2018

बे-वफ़ा औ" बे-ईमान बनकर मिलेंगे

कभी तो हम  यार थे  मगर अब जो मिलेंगे तो अनजान बनकर मिलेंगे
एक ही  ज़िस्म में क्यूँ न रहें  मगर अलग-अलग  जान  बनकर मिलेंगे

न कभी  मैं तेरे पंख लगाकर उड़ूँ  न कभी तुम ही  मेरे ज़िस्म में उतरना
आमने सामने  भी दोनों अब  तो अलग-अलग  पहचान  बनकर मिलेंगे

न तुम मुझे  कभी आँखों से पिलाना  न मैं कभी तेरे रूह  को महसूस करूँ 
ग़र अकेले में भी मिलेंगे  तो दोनों बदन की  साँसें बेजान  बनकर मिलेंगे

महज़ रिश्ता के मरने से  सिर्फ नजदीकी ही घटती है फ़ासला नहीं बढ़ता 
अब जो हम दोनों मिलेंगे 'धरम' तो बे-वफ़ा औ" बे-ईमान बनकर मिलेंगे 

Tuesday, 13 November 2018

चंद शेर

1.
उससे हर मुलाक़ात के बाद ख़ाक सहरा का उड़ाना पड़ता है
कि क्या कहें 'धरम' दिल लगाने के बाद दिल जलाना पड़ता है

2.
वहाँ अब आग जल रही है जहाँ से पहले कभी दरिया निकलता था
वहाँ अब सिर्फ खाई है "धरम" जहाँ पहले कभी दिल फिसलता था

3.
कहाँ  कभी नींद आई "धरम" जो उसके  उड़ने का एहसास हो
कोई रिश्ता कभी पनपा ही नहीं तो कैसे कोई दिल के पास हो

4.
चिराग़-ए-दिल से अब कोई रौशनी नहीं होती सिर्फ़ धुआँ निकलता है
ज़िन्दगी ऐसे मुक़ाम पर है "धरम" जो ना तो गुज़रता है न ठहरता है

5.
मुझमें अब कहाँ  कोई रहा "धरम" जो  मुझको जानता हो
वह शख़्स अब तो ज़िंदा भी नहीं जो मुझको पहचानता हो

6.
कि बाद उसके एक बार फिर से ज़िंदगी की एक शुरुवात करनी है
मौत में पेवस्त एक ज़िंदगी से "धरम" फिर से मुलाक़ात करनी है

7.
ग़र बारिश न बची हो "धरम" तो अब आग ही बरसे
बदन की यह प्यास बुझने को अब तो और न तरसे

Monday, 12 November 2018

अपना आक़ा भूल गया

जो जल के  फिर से बुझा  तो बुझने  का  सलीका भूल गया
रौशनी के  दर पर  उपजा अँधेरा  अपना  ईलाका भूल गया

जिसको तराशा  इन्सां बनाया  तालीम दी आसमाँ दिखाया
आज महज़  एक ही बुलंदी  पाई वो  अपना आक़ा भूल गया

दिल-ए-समंदर में  जब भी  हलचल हुई तासीर रूह तक हुई
निगल कर  रूह को  सैलाब ख़ुद अपना ही  ख़ाका भूल गया

दिल मोम था तपिश अपनी थी साथ ज़माना था तो यूँ हुआ 
मोम ख़ुद से  तपकर "धरम" पिघलने  का तरीका भूल गया