Sunday, 28 July 2013

धुंधला दीखता है

नींद मुझे अपने आगोश में लेकर
एक वीरां जंगल में छोड़ आया है
जहाँ से सब कुछ धुंधला दीखता है
ठीक उसी दिवा स्वप्न की तरह
जहाँ एक बेशक्ल की बाहों में मैं झूलता
जिंदगी की थोड़ी बहुत खुशियाँ महशूस करता हूँ

जब भी कभी कागज़ और पेन्सिल लेकर
उस बेशक्ल की स्केच बनाता हूँ
पता नहीं क्यूँ  स्केच पूरा नहीं हो पाता
स्केच को अधूरा छोड़कर
मैं गहन चिंतन में डूब जाता हूँ
कई तरह के विचारों का उफान
अंतर्मन झेलता रहता है

मैं भला स्केच क्यूँ बनाता हूँ
क्या हमेशा ख़ुशी को शक्ल देना जरुरी होता है ?
यह प्रश्न निरुत्तर ही रह जाता है
वीरां जंगल में सब कुछ धुंधला दीखता है

Friday, 26 July 2013

छोड़ गए

ये कैसे लोग हैं क्या शमां छोड़ गए
जिस्म तो लेते गए मगर जां छोड़ गए

Saturday, 20 July 2013

क्यों सो रहे हो...

मेरा मन न जाने कहाँ खो रहा था
ऐसा लगा कि मै अचानक सो रहा था
फिर संचार हुआ एक शक्ति का
मन में भाव आया एक भक्ति का

ऐसा लगा जैसे कि कोई कह रहा हो
और मेरे ही साथ जैसे रह रहा वो
कहता है, तुम मानव हो
तुम ही हो मेरे विशिष्ट कृति
तुम्हारी अनुपम है प्रकृति

फिर क्यों ये खेल खेला जा रहा है
मानव से मानव को तौला जा रहा है
मैंने तो सबको बनाया था समान
फिर क्यों होता है किसी का अपमान
मानवता सब जगह हो रहा है खंडित
निर्दोष क्यों हो रहे हैं दण्डित

अपनी मर्यादा का कुछ तो भान करो
मेरे इस कृति का कुछ तो सम्मान करो
बंद करो यह लूट-पाट
बंद करो यह जात-पात
बंद करो यह रंग-भेद
बंद करो यह लिंग-बिभेद
इतना कह कर वो हुए गंभीर
और मैं फिर हो गया अधीर
अगले ही पल वे विलीन
मेरा ही तेज कुछ हुआ मलीन

ऐसा लगा कि कोई झकझोर गया है
लगा अपनी भुजा का मुझ पर जोर गया है
मैं हो गया पुनः कुछ अशांत
और मन भी हो गया कुछ अधिक क्लांत...

परिवर्तन... सही या गलत

जग बदला , मन बदला , बदला जमाना कुछ ऐसा
नकली सोने को भी कहे, लगता है यह असली जैसा
लोग कहे पुरानी सभ्यता को , है यह कैसा पिछड़े जैसा
पुरानी संस्कृति के संस्कृत को , कहता है यह पिछड़े जैसा

सभ्यता गोरों का है इनके लिए आदर्श
नहीं चाहिये इनको किसी सभ्य बुजुर्ग का परामर्श
कहते हैं बदलते समय में हो रहा इनका उत्कर्ष
व्यवशायिक जिंदगी में ये तो हैं बहुत दुर्घर्ष

जिंदगी के ख्याल में है इनका अपना स्वछन्द विचार
पुरानी सभ्यताओं का बोझ इनको लगता है अत्याचार
धार्मिक स्वतंत्रता का जग में करना है इनको प्रचार
जात-पात और धर्म से उपर उठकर इनका है अपना विचार

संतुष्टि हो तन की या संतुष्टि हो मन की
संतुष्टि हो अपनेपन की या संतुष्टि हो धन की
नहीं चाहिये कोई बंदिश अपने उपर इनको
अन्यथा हो जाएगी रंजिश आपके उपर इनको

कहते हैं मिलाना है इनको एक-दुसरे का रसायन
तभी हो सकता है इनका जाकर कहीं पाणी-ग्रहण
मिलाना है इनको एक-दुसरे के सोच की आवृति
नहीं चाहिये इनको किसी पुराने प्रथा की पुनरावृति...

गिद्ध और चमगादड़

गरुड़ की खाल ओढ़े गिद्ध
सभा में नाचता
मद में फूलता
घोर गर्जन कर
छुपाता अपने पैने नुकीले चोंच
लगा है रक्त मानव का

अनेक चमगादड़ हैं उसके जासूस
रात के अँधेरे में
चुपके से घर में घुसकर देखता
कहीं कोई भर पेट खाया तो नहीं

बिलखता भूख से बच्चा
माँ की गोद में सिसकियाँ लेता
बस खाकर स्नेह की थपकी
रात्रि के अँधेरे में खो जाता
पछताता
भला यह जन्म ही क्यूँ हुआ
देखकर ऐसी बात
तृप्त होता चमगादड़

चमगादड़ ढूंढता है
कहीं कोई हो ऐसा मानव
कि जिसने पाया भूख पर विजय
पाकर ऐसी विलक्षण बात
भला चमगादड़ तब क्यूँ  छुपा रहता
सटकर कान से मानव के गुजरता
फुसफुसाता धमकियों भरा शब्द
और कराता अपने होने का एहसास

मगर वह मानव भी अकड़कर बोलता
कि मैंने पा लिया अब भूख पर विजय
लपेटकर अपने पंख में चमगादड़
मानव को डराता
पहचानो इस घुटन को
हवा मुफ्त में नहीं मिलती यहाँ
चीरकर चमगादड़ के पंख
मुक्त होता मानव
लेता जीवन दायिनी स्वांस

करता आश्चर्य चमगादड़
कि इस मरघट में यह है कौन
वह चमगादड़, मानव के
उस नस्ल को नहीं पहचानता
उड़कर चला वह गिद्ध को बतलाने
कि मुर्दा बोलता है

Monday, 15 July 2013

गुजरा वक़्त

गुजरे वक़्त का एक भी पल हँसीं नहीं देता
मैं ग़म में डूब चुका हूँ कोई ख़ुशी नहीं देता

जलते चराग को हवा का एक झोंका बुझा गया
बुझा हुआ चराग कहीं कोई रौशनी नहीं देता

उसका स्पर्श अन्तः मन को शांति देता था
अब कोई भी स्पर्श वैसी अनुभूति नहीं देता

ज़माने ने मुझपे इतनी मेहरबानियाँ की है
की अब तो कोई ख़ुशी भी ख़ुशी नहीं देता


Wednesday, 26 June 2013

प्रकृति का अपमान

प्रकृति का अपमान करते जब नर-नारी
भुवन पर होता है तब अति विपद भारी
नरता जब होता है पशुत्व में परिणत
धरा पर दीखता है मानव छत-विछत

मानवता के नाम पर जब कोई लूटता है
घड़ा विष का तब कुछ यूँ ही फूटता है
गरल न सिर्फ मानव को ही लीलता है
धरा को भी कलंकित कर वह फूलता है

जब मनुज खुद लील लेता धर्म-ग्रन्थ
तब भला क्यूँ चुप रहें दिग-दिगंत
हर ओर भयंकर यूँ ही प्रलय होगा
देव-स्थल का मरघट में विलय होगा

चुपचाप सहेगा मानव जाति ये कोहराम
मुख से तो निकल भी न सकेगा हे राम!
हर ओर व्याप्त विलाप-क्रंदन होगा
कलयुग पर मानवता का रुदन होगा 

Tuesday, 11 June 2013

फेंका गया मुझे

हर बार मेरे ही ज़ख्म में पिरोया गया मुझे
जो कराहा तो फिर से सताया गया मुझे
अपने बदन के टुकड़ों को जो मैंने समेटा
तो फिर से दुगुने टुकड़ों में काटा गया मुझे

हर बार मेरे ही लहू में डुबाया गया मुझे
जो बच के निकला तो तडपाया गया मुझे 
जंग-ए-तख़्त-ए-सियासत में यहाँ  
अपनी ही मिट्टी से मरहूम किया गया मुझे

हर बार निगाह-ए-हिकारत से देखा गया मुझे  
जो नज़र मिलाया तो बेसबब झुकाया गया मुझे 
फरमान हद-ए-निगाह से दूर जाने का दे दिया गया
जो फिर से देखा गया तो नंगा घुमाया गया मुझे

हर बार मेरे ही आग में जलाया गया मुझे
जो बुझ गया तो फिर से सुलगाया गया मुझे 
कब्र-ए-मुक़र्रर की जमीं भी न दी गई "धरम"
जो मर गया तो काट के फेंका गया मुझे

Saturday, 8 June 2013

ख्वाब देखा

उजड़े घर में फिर से पुराना ख्वाब देखा
अमावास की रात में मैंने आफताब देखा
धडकता पत्थर फिर से दिल हो चला था
उसके लौटने का मैंने फिर से ख्वाब देखा

डूबने का डर

मुझे उसके जाने का डर लगा रहता है
ख्वाब में भी उसके पर लगा रहता है
वो मुस्कुराये फिर भी न जाने क्यूँ
मुझे अनजाना सा डर लगा रहता है

बातें उसकी मेरे समझ में नहीं आती
इश्क में भी गुरुर-ए-हुस्न नजर आता है
रिश्ता-ए-पाक-ए-मोहब्बत में भी "धरम"
मुझे तो अब डूबने का डर लगा रहता है