Monday, 25 August 2014

चंद शेर

1.
ज़ुस्तजू किसकी थी मुक़ाम क्या हासिल हुआ
जो ढल गई जवानी तो सोहरत भी चली गई

2.
अब कहाँ है दिल का सुकूँ और कहाँ है चैन की रातें
हर ओर उबल रहें है लोग अब नहीं है प्यार की बातें

Tuesday, 19 August 2014

मुफलिसों की बस्ती औ' सियासी चश्मा

हर ओर खूब छाई है मस्ती जल गई मुफलिसों की बस्ती
आग लगाने वाले क्यूँकर करें क़ुबूल उनकी बड़ी है हस्ती

लगाकर नक़ाब चेहरे पर वो बहुत खूब छुपा रहें हैं फरेब
सियासी चश्मे में से किसी को नहीं दीखता इनका ऐब 

Saturday, 16 August 2014

चंद शेर

1.
जब वो दर्द भरी दास्ताँ अपनी ज़ुबाँ से कह उठा
हर आँख डबडबा उठी औ' हर दिल कराह उठा

2.
कितने ज़ख्मों का असर है तेरे इस दर्द-ऐ-ज़ुबाँ में
गुलाब सी महक भी है और मिस्री सी मिठास भी

3.
तेरी इबादत में जुबाँ कटी औ' होठ भी सिले
कैसा हश्र-ए-इश्क़ है कि कराह भी न निकले

4.
जवानी की सारी हसरतें कब्र में दफ़न हो गई
किस्सा-ए-मोहब्बत बस याद-ए-सुखन हो गई 

Friday, 15 August 2014

मैं क्या करने चला हूँ

खुद प्यासा हूँ समंदर की प्यास बुझाने चला हूँ
खुद बुझा हूँ आफताब को रौशन दिखाने चला हूँ

खुद अँधा हूँ ज़माने को राश्ता दिखाने चला हूँ
सरापा डूबा हूँ औरों को डूबने से बचाने चला हूँ

अंधेर नगरी में मैं एक बुझा हुआ इश्क़ का चिराग हूँ
बाद इसके मैं ज़माने में मोहब्बत की लौ जलाने चला हूँ

मैं यूँ हीं धड़कता हूँ हर रोज किसी मुर्दे के दिल में
बाद इसके मैं ज़माने को ज़िंदा-दिली सिखाने चला हूँ

मैं ऐसी ईमारत हूँ जहाँ कोई घर बना हीं नहीं "धरम"
बाद इसके मैं ज़माने को दुनियादारी सिखाने चला हूँ

Thursday, 7 August 2014

मैं कौन हूँ

न मैं ख्वाब हूँ न मैं ख्याल हूँ
न गए वक़्त का कोई मिसाल हूँ

न मैं जिस्म हूँ न मैं जान हूँ
न दिल-ए-सुकूँ की पहचान हूँ

न मैं गीत हूँ न मैं साज़ हूँ
न किसी बज़्म की आवाज़ हूँ

न मैं इश्क़ हूँ न मैं हुस्न हूँ
न किसी महफ़िल का जश्न हूँ

न मैं ज़ख्म हूँ न मैं मरहम हूँ 
न किसी दिलरुबा का हमदम हूँ 

न मैं धड़कन हूँ न मैं स्वांस हूँ 
न आगाज़-ए-इश्क़ की आश हूँ 





Saturday, 2 August 2014

चंद शेर

1.
मिटाकर वज़ूद मेरा तुम मुझको भुलाने चले हो
आईने में खुद अपनी शक्ल को झुठलाने चले हो

2.
अपने बज़्म में हर रोज बरपा के क़हर मुझपर
किस्सा-ए-दरियादिली दुनियाँ को सुनाने चले हो

3.
आसमाँ का सितारा हूँ बस दूर से ही प्यारा हूँ
अपनी तपिश में जलता हूँ औ" खड़ा बेसहारा हूँ

4.
कद्र-ए-इश्क़ की "धरम" अब कहाँ किसे है होश
बस मय का चार प्याला और हो गए मदहोश  

5.
तुझसे मरासिम था तो क़त्ल-ए-आम हो गया
इस शहर का हर मकाँ अब तो वीरान हो गया

6.
जला के दिल इन्शाँ का बुत को रौशन कर दिया
तुमने तो पाक-ए-इश्क़ को भी ग़ारत कर दिया

7.
एक नई सुबह की आश है कुछ बचा अभी भी खास है
सारा जग है तेरा अपना रे मन! फिर तू क्यों उदास है





Thursday, 31 July 2014

मोहब्बत की इन्तिहाँ तक जाऊंगा

मैं तो मोहब्बत की इन्तिहाँ तक जाऊंगा
तेरे जिस्म से लेकर तेरी जाँ तक जाऊंगा

मेरे दिल में मिलन-ए-नज़र-ए-चिराग जल चुका है
तेरे इंतज़ार में ज़ीस्त के अंतिम ख़िज़ाँ तक जाऊंगा

ये मोहब्बत! है इसमें बे-सबब रुस्वाई तो होती ही है
तुझको पाने मैं तेरे अंतिम नक्श-ए-पाँ तक जाऊंगा

बिन तेरे मेरी ज़िंदगी बस एक तन्हाई की रात है "धरम"
रौशन-ए-ज़ीस्त के लिए हद-ए-सितम-ए-दौराँ तक जाऊंगा 

Tuesday, 15 July 2014

लब पे ताला पड़ गया

ज़रा सी बात थी मगर रंग गहरा पड़ गया
दिल टूटा ही था की ज़ख्म गहरा पड़ गया

अब तो कोई राज़ दफ़न भी नहीं है सीने में
दिल में झांक कर देखा जिस्म ठंढा पड़ गया

हसरत भरी निगाह भी अब काम नहीं आती
जो उतरा दरिया-ए-इश्क़ में तो सूखा पड़ गया

जब से मेरी ज़िंदगी का आफताब बे-वक़्त डूबा है
चौदवीं के महताब का भी रंग काला पड़ गया

इस शहर में अब तो हर कोई मुझसे खफ़ा है "धरम"
जो पूछा हाल-ए-दिल तो लब पे ताला पड़ गया 

Sunday, 6 July 2014

अब नहीं मिलता

दूर तलक अब कोई बूढ़ा सज़र नहीं मिलता
राह-ए-ज़िंदगी में कोई हमसफ़र नहीं मिलता

हम तो खड़े हैं कई सालों से चौहरे पर मगर
मुझे अपनी तबीयत का कोई डगर नहीं मिलता

पेश-ए-नज़र भी किये औरों का नज़राना भी लिया
मिले जो दिल को सुकूँ ऐसा कोई नज़र नहीं मिलता

मर्ज़-ए-इश्क़ में तो हरेक दवा नाकाम होती है "धरम"
कर दे जो तबीयत हरी ऐसा कोई ज़हर नहीं मिलता 

Saturday, 5 July 2014

चंद शेर

1.
दो दिलों का फ़ासला कुछ यूँ बढ़ता गया
गोया बुढ़ापे का रंग जवानी पर चढ़ता गया

2.
ज़ूनू-ए-इश्क़ में गर्क-ए-दरिया का सफर अभी बाकी है
एक रोज मुझको डूबना है मगर वो मंज़र अभी बाकी है