Wednesday, 13 June 2018

चंद शेर

1.
कि हर आलम मुझे नज़र आता तो है मगर लम्हा गुज़र जाने के बाद
मेरी आखों में लहू उतरता तो है "धरम" मगर ज़ख्म भर जाने के बाद

2.
कि मेरी याद 'धरम' उनके ज़हन में कब जा के उतरी
जब वो हर शख़्स से टूटे तन्हा हुए तब जा के उतरी

3.
इस बार की ये बेरुख़ी नाराज़गी क्या कहें जान लेकर जाएगी
औ" ग़र बच गए ज़िंदा "धरम" तो फिर ईमान लेकर जाएगी

Monday, 4 June 2018

चंद शेर

1.
हमने जिस-जिस को पनाह दिया "धरम" वह हर शख़्स नकाबपोश निकला
जब हटा नक़ाब तो हर शख़्स चेहरे का काला औ" ज़ुबाँ का ख़ामोश निकला 

2.
अब जो हम दोनों के दरम्याँ है "धरम" वो सिर्फ पर्दादारी है
जो बचा-खुचा रिश्ता का अवशेष है वो सिर्फ एक बीमारी है

3.
जब भी खुलती है आँख 'धरम' तो अंधेरे पर रौशनी का धोखा होता है
औ" ग़र खुल गई ज़ुबाँ तो बाद उसके जो होता है वो अनोखा होता है

4.
कि जब भी तुमने ज़ुबाँ खोली "धरम" मेरी इज़्ज़त को किया तार-तार 
जब मिलाया हाथ तो महज़ एक ज़ख्म के पीछे दिए ज़ख्म कई हज़ार

5.
कि बाद इस मुलाक़ात के जो भी बचा-खुचा भ्रम था वह टूट गया 
ज़ुल्म इतना हुआ 'धरम' की मेरे सब्र का अंतिम घड़ा भी फूट गया

Sunday, 3 June 2018

वो रिश्ता जो बे-आबरू होकर हलाक़ हुआ

तेरे साथ का वक़्त-ए-मुलाक़ात भी तो तन्हा ही गुजरता है 
आँखें बंद करूँ तो भी तस्सबुर में तेरा चेहरा नहीं उभरता है

तेरे हर रंग-ए-मिजाज़ को मैंने देखा औ" सीने से लगाया भी
वो रंग-ए-उल्फ़त तेरे चेहरे पर देर तलक़ क्यूँ नहीं ठहरता है

ख़ुद को ज़मीं पर रखकर ज़माने से नहीं अपने आप से पूछो
क्यूँ तेरा हर शाग़िर्द तेरे परछाहीं से भी मिलने से मुकरता है

न ही मेरे आखों को सुकूँ मिला न तश्ना-लब की प्यास बुझी
हर वक़्त-ए-मुलाक़ात में तेरा चेहरा ये किस तरह निखरता है

वो रिश्ता जो तेरे ही पहलू में बे-आबरू होकर हलाक़ हुआ था
मैं सोचता हूँ तो दिल मेरा टूटकर कई टुकड़ों में बिखरता है

कि मैं अब तो तुझसे फ़ासले पर ही क़याम करता हूँ "धरम"
तुझसे करीबी के बात पर तो जिस्म औ" रूह दोनों सिहरता है

Sunday, 20 May 2018

चंद शेर

1.
क्यूँ इन्तहाँ के बाद का ही मंज़र आखों में ठहरता है
ज़ुबाँ खामोश रहती है 'धरम' सिर्फ चेहरा उतरता है

2.
ये न तो कोई मंज़िल है न ही कोई रास्ता है "धरम" जहाँ अभी रुका हूँ मैं
ऐ! बीता वक़्त तू मुझे अब ये बता कि किस-किस के सामने न झुका हूँ मैं 

Sunday, 13 May 2018

एक और कब्र का उभर जाना हुआ

जिस इन्तहाँ के इंतज़ार में था उसका कई बार गुज़र जाना हुआ
मुझे एहसास भी न हो सका कि कैसे कई बार बिखर जाना हुआ

महफ़िल थी ख़्वाब था किरदार थे औ" थे मेरे कुछ कद्रदान भी
सिर्फ एक ही इन्तहाँ के बाद कैसे इस सब का उजड़ जाना हुआ

कभी तो ज़ख्मों तले भी मुझको कुछ ख़ुश-नुमा एहसास होता था
मगर ये कैसी ख़ुशी मिली कि ज़ख्म का ता-उम्र ठहर जाना हुआ 

कि बाद मेरे मरने के भी उस सितमगर का क़हर मुसलसल जारी था
नतीजा यह हुआ की मेरे कब्र पर एक और कब्र का उभर जाना हुआ

मेरी तलाश-ए-ज़िंदगी महज़ उस मौत के बाद ख़त्म नहीं हुई थी
मगर क्यूँकर उस रूह का बस एक ही ज़िस्म में ठहर जाना हुआ

वो वक़्त भी गया वो ज़िंदगी भी गई "धरम" कि वो ज़िस्म भी गया
क्यूँ फिर से पिछले ही ज़ख्मों का नई ज़िंदगी में उभर जाना हुआ

Tuesday, 1 May 2018

निकलेगा कोई नतीजा नहीं

तेरा मुझ पर कोई रहम-ओ-क़रम नहीं औ" कोई वफ़ा नहीं
दिल किस तरह से टूटा मेरा इसका तुझे कोई अंदाजा नहीं

मेरे इस टूटे दिल को तो "धरम" अब हिज़्र ही मजा देता है 
अब फिर से न बढ़ाओ हाथ कि निकलेगा कोई नतीजा नहीं 

Friday, 27 April 2018

ज़हर पिला दिया मैंने

जब भी ख़्याल दिल-ए-आबाद हुआ उसे जला दिया मैंने
औ" बाद उसके मौत के बाद की नींद भी सुला दिया मैंने 

कि जिस किरदार को मैंने पैदा किया पाला मशहूर किया
खुद अपनी मौत से पहले उसको ज़हर पिला दिया मैंने

ये इश्क़ हुआ कि क्या जाने मेरी मौत का तमाशा ही हुआ
क्यूँ कर खुद ही अपनी हस्ती को मिट्टी में मिला दिया मैंने 

एक तो तू उजड़ा चमन औ" उसपर तेरी बातों में भी बेरुखी
हाय! ये किसके इंतज़ार में खुद अपनी हड्डी गला दिया मैंने

इस रात के ढल जाने के बाद एक और सुबह की उम्मीद है
इस बात पर अपने दिल में एक और चिराग़ जला दिया मैंने

मुझे अब भी रौशन हैं उम्मीदें कि ज़हाँ मेरा भी आबाद होगा
हरेक ग़म को ठोकर मारकर अपने पहलू से भगा दिया मैंने

तेरे दामन में सिर्फ कांटे ही आबाद होंगे फूल कभी न आएगा
कि ये लो तेरे मुकद्दर का फैसला आज तुमको सुना दिया मैंने 

जिस बुझते हुए लौ को कभी सींचा था अपने ही खून से मैंने
आज खुद "धरम" अपने एक ही फूँक से उसे बुझा दिया मैंने

Thursday, 26 April 2018

चंद शेर

1.
जो हक़ीक़त है वो कोई ख़्वाब न था औ" जो ख़्वाब था वो कभी हक़ीक़त न हुआ
कि तेरी ज़िंदगी का ऐसा कौन सा लम्हा है 'धरम' जो तेरे लिए गनीमत न हुआ

2.
ऐ! ज़िंदगी अब तू न मेरे ज़िस्म में उतर न मेरे लहू में दौड़ कि पूरा बदन दुखता है
कि मौत के दस्तक का एहसास "धरम" अब तो जी को बिल्कुल ही नहीं चुभता है

3.
हमने जो बात रखनी थी "धरम" हमने रख दी थी कि बारी अब तुम्हारी थी
महज़ एक ही झटके में तुमने टाल दी थी वाह क्या खूब तेरी समझदारी थी

4.
जब तुझको देखता हूँ 'धरम' अंदाज़-ए-ज़माना याद आता है
औ" बाद उसके तेरे ज़ुर्म का एक-एक फ़साना याद आता है 

Sunday, 22 April 2018

कि वो क़त्ल भी हमारा नहीं हुआ

कि तेरी नज़र में रहकर भी मैं कभी तेरा नहीं हुआ
क्यूँ एक भी बार मेरी ज़िंदगी में कोई सवेरा नहीं हुआ

तेरे हर लफ्ज़ में उलझन थी औ" थी हर नज़र पशेमाँ
तू ये कैसी दरिया है जिसका कोई किनारा नहीं हुआ

जाम के सहारे यारों कभी हम भी चलते तो थे मगर
रुख़्सत-ए-जाम के बाद कभी कोई सहारा नहीं हुआ

कि ख़ुद अपनी गलतियों का अब क्या हिसाब करूँ
जब सही फैसले पर भी मेरा कहीं गुज़ारा नहीं हुआ

उजड़े हुए गुलसन पर ख़ुद क़त्ल कर तो दी ज़िंदगी
क्या कहें "धरम" कि वो क़त्ल भी हमारा नहीं हुआ

Monday, 2 April 2018

किसी का किसी से कोई रिश्ता नहीं

कि दिल किस ज़ख्म से आबाद होगा इसका अंदाजा नहीं
तेरे जी को क्या चाहिए इसका ख़ुद तेरे जी को पता नहीं
 
हुस्न की दहलीज़ पर जाकर भी तुम तश्ना-लब लौट आए
अब ख़ुद ही से तुम ये पूछो की क्या ये भी तेरी ख़ता नहीं 

ऐ! ख़ुशी तू मेरे पहलू में आते ही एक मातम बन जाती है
इस बात का मुझे एहसास है तू मुझे और कुछ भी बता नहीं

क्यूँकर बुलंदी की हर राह एक सन्नाटे पर ही ख़त्म होती है
कि क्या इसके अलावा कहीं भी बचा कोई और रास्ता नहीं

आज वो ज़ाम भी धोखा दे गया जिसमें कल तक ज़हर था
पूछा तो पता चला की उसका मुझसे अब कोई वास्ता नहीं

क्यूँ महज़ एक मौत के बाद फिर कोई सितमगर नहीं आया 
इस ज़हाँ में तो "धरम" किसी का किसी से कोई रिश्ता नहीं