Saturday, 24 November 2018

बे-वफ़ा औ" बे-ईमान बनकर मिलेंगे

कभी तो हम  यार थे  मगर अब जो मिलेंगे तो अनजान बनकर मिलेंगे
एक ही  ज़िस्म में क्यूँ न रहें  मगर अलग-अलग  जान  बनकर मिलेंगे

न कभी  मैं तेरे पंख लगाकर उड़ूँ  न कभी तुम ही  मेरे ज़िस्म में उतरना
आमने सामने  भी दोनों अब  तो अलग-अलग  पहचान  बनकर मिलेंगे

न तुम मुझे  कभी आँखों से पिलाना  न मैं कभी तेरे रूह  को महसूस करूँ 
ग़र अकेले में भी मिलेंगे  तो दोनों बदन की  साँसें बेजान  बनकर मिलेंगे

महज़ रिश्ता के मरने से  सिर्फ नजदीकी ही घटती है फ़ासला नहीं बढ़ता 
अब जो हम दोनों मिलेंगे 'धरम' तो बे-वफ़ा औ" बे-ईमान बनकर मिलेंगे 

Tuesday, 13 November 2018

चंद शेर

1.
उससे हर मुलाक़ात के बाद ख़ाक सहरा का उड़ाना पड़ता है
कि क्या कहें 'धरम' दिल लगाने के बाद दिल जलाना पड़ता है

2.
वहाँ अब आग जल रही है जहाँ से पहले कभी दरिया निकलता था
वहाँ अब सिर्फ खाई है "धरम" जहाँ पहले कभी दिल फिसलता था

3.
कहाँ  कभी नींद आई "धरम" जो उसके  उड़ने का एहसास हो
कोई रिश्ता कभी पनपा ही नहीं तो कैसे कोई दिल के पास हो

4.
चिराग़-ए-दिल से अब कोई रौशनी नहीं होती सिर्फ़ धुआँ निकलता है
ज़िन्दगी ऐसे मुक़ाम पर है "धरम" जो ना तो गुज़रता है न ठहरता है

5.
मुझमें अब कहाँ  कोई रहा "धरम" जो  मुझको जानता हो
वह शख़्स अब तो ज़िंदा भी नहीं जो मुझको पहचानता हो

6.
कि बाद उसके एक बार फिर से ज़िंदगी की एक शुरुवात करनी है
मौत में पेवस्त एक ज़िंदगी से "धरम" फिर से मुलाक़ात करनी है

7.
ग़र बारिश न बची हो "धरम" तो अब आग ही बरसे
बदन की यह प्यास बुझने को अब तो और न तरसे

Monday, 12 November 2018

अपना आक़ा भूल गया

जो जल के  फिर से बुझा  तो बुझने  का  सलीका भूल गया
रौशनी के  दर पर  उपजा अँधेरा  अपना  ईलाका भूल गया

जिसको तराशा  इन्सां बनाया  तालीम दी आसमाँ दिखाया
आज महज़  एक ही बुलंदी  पाई वो  अपना आक़ा भूल गया

दिल-ए-समंदर में  जब भी  हलचल हुई तासीर रूह तक हुई
निगल कर  रूह को  सैलाब ख़ुद अपना ही  ख़ाका भूल गया

दिल मोम था तपिश अपनी थी साथ ज़माना था तो यूँ हुआ 
मोम ख़ुद से  तपकर "धरम" पिघलने  का तरीका भूल गया

Friday, 2 November 2018

चंद शेर

1.
अपनी प्यास का अंदाजा लगाये बिना वह दरिया में उतर गया
दरिया के बहाव में बहकर 'धरम' फिर न जाने वह किधर गया

2.
मेरे दिल में लगी आग 'धरम' किसी दश्त-ए-आग से कम तो न थी
वह आग सबकुछ जला गई दिल में उपजे एक सन्नाटे को छोड़कर

3.
सन्नाटा जब भी जलता है तो न राख़ बनता है न ही ग़ुबार उड़ता है
सिर्फ साँसें सुलगती हैं "धरम" दिल में एक अलग निगार बनता है

4.
ख़ुद अपनी ही लगाई आग को "धरम" क्यूँ बुझाने लगा
वो फिर से मुझे बे-वक़्त मौत की नींद क्यूँ सुलाने लगा

5.
एक ऐसा दिया जले दिल के अंदर "धरम" जिसकी रौशनी से बहार हो
क़रम ऐसा बरसे की दामन भर जाए खुशियों से औ" पूरा हर क़रार हो 

Friday, 26 October 2018

फ़ासले को बढ़ने का एक इशारा मिला

कि कब दरिया में डूबा  किसकी कश्ती से लगकर  कैसा किनारा मिला
कुछ भी पता न चला  किसके हाथों डूबते रिश्ते  को कैसा सहारा मिला

कि ख़ुद की किताब-ए-हिज़्र पर जब अपनी ही तन्हाई की रौशनी डाली
हर वरक़ में मुझे  सिर्फ़ चाँद की परछाहीं  मिली सूरज का अँधेरा मिला

कि ज़माने के महफ़िल में लौ के बुझने तलक हर दिये को निहारा गया
बाद उसके किसी के हिस्से में न कभी रौशनी आई न कोई बसेरा मिला

कि जब कभी किसी एक ख़्वाब  को तोड़कर दूसरे  ख़्वाब से जोड़ा गया
तो दरम्याँ दोनों  ख़्वाब के ग़ुबार भर आया सिर्फ  धुंधला नज़ारा मिला

कि जब हर सन्नाटा  सिर्फ़ सिसकी से टूटे तो कौन  किससे सवाल करे
दो ज़िस्म के  दरम्याँ उग आए फ़ासले को  बढ़ने का  एक इशारा मिला

कि जब भी ख़ुद  को पलट  कर देखा वीरान  दश्त का एक  पत्थर पाया
अपना नक्श-ए-पाँ तो न पाया मगर हाँ! हर ज़ख्म "धरम" ठहरा मिला 

Friday, 5 October 2018

चंद शेर

1.
यदि मैं ज़मीं भी देखूँ "धरम" तो खुला आसमान दिखता है
मुझे तो हर ओर सिर्फ अपने ही मौत का सामान दिखता है 

2.
कि यह तय कर दिया कि वो मौत नहीं तमाशा था
क्यूंकि मरने वाले का भार "धरम" महज माशा था

3.
हमारे कोष के जो भी बचे-खुचे सितारे गर्दिश में थे अब वो भी डूब गए
अब तो किस्मत के अलावा 'धरम' हम ख़ुद अपने आप से भी ऊब गए

4.
ख़ुर्शीद कल भी निकलेगा दोनों ज़िस्म कल भी जलेंगे मगर वो तपिश न होगी
हम साथ भी रहेंगे बातें भी होंगी "धरम" दरम्यां हमारे मगर वो कशिश न होगी

5.
हर हद से ऊँची उड़ान उड़ना ज़मीं तो ज़मीं तुम पूरा आसमान उड़ना
एक ही ज़िंदगी में 'धरम' तुम मौत के बाद का भी सारा ज़हान उड़ना

6.
यहाँ किसको ख़्याल था कि हर बात पर मेरा दिल बैठता है
अब तो यहाँ किसी से भी मिलना 'धरम' मुश्किल बैठता है


Sunday, 30 September 2018

चंद शेर

1.
सफर में कुछ ही दूर चलने के बाद बाकी बची दूरी का पता नहीं चला
कि उसकी मेहरबानी औ" ख़ुद अपनी ही मजबूरी का पता नहीं चला

2.
उसे किसी भी बात का 'धरम' अब कोई भी नहीं है मलाल
पहले तो सिर्फ ज़िस्म नंगा था अब बदन पर नहीं है खाल

3.
मेरा चिराग़-ए-जां बुझने से पहले एक बार जरूर देखना
कि मेरे मौत से पहले एक बार मुझको मेरे हुज़ूर देखना

4.
कि क्यूँ तेरा हर रिश्ता 'धरम' या तो बोझ या बनावटी होता है
रूह ज़िस्म जां हर किसी का मिलन सिर्फ दिखावटी  होता है

5.
बात दिल से ज़ुबाँ तक आते-आते कई बार हलक़ से चढ़ता उतरता रहा
कभी "धरम" नाउम्मीदी कभी बेख़्याली तो कभी पज़ीराई उभरता रहा 

Thursday, 6 September 2018

एक ही पैमाना है

तू किस महफ़िल से आया है तू कहाँ का दीवाना है
जो इस अंजुमन के हर तौर-तरीके से अनजाना है

यहाँ या तो हलक़ से मय उतरता है या फिर लहू
हाँ मगर इन दोनों के लिए यहाँ एक ही पैमाना है

दर-ओ-दीवार यहाँ पर्दा में रहता है हुस्न बेपर्दा है
यहाँ तो उठी औ" झुकी दोनों नज़रों का नज़राना है

बात चलती है तो दुआ के लिए हर हाथ उठता है
ग़र चले हुस्न तो यहाँ हर किसी को मर जाना है

यहाँ नशा हुस्न का मय का इश्क़ का सब बराबर है
ज्यादा या कम से हटकर यह एक अलग ज़माना है 

यहाँ किसी की ख्वाईश किसी और से नहीं मिलती 
औ" हर किसी का "धरम" अलग-अलग फ़साना है 

Tuesday, 4 September 2018

ख़ुद को तलाशने का सिलसिला

बीच से किनारा
औ" फिर किनारे से बीच का फलसफा   
जब निकला इससे
हासिल हुआ रेगिस्तां औ" जलजला

धूप और छाँह
दोनों के वज़ूद को अलग-अलग तराशते
मानो जड़ और चेतन के बीच
ख़ुद को तलाशने का सिलसिला 

अपने हिस्से का आसमाँ मिलने के बाद
ज़मीं की खोज में भटकता
कई बार उजड़े हुए गुलसन के गिर्द खो जाता
पर नहीं पाता कभी मरहला 

Friday, 10 August 2018

चंद शेर

1.
कि उदासी लब को चूमे औ" ज़ख्म दिल को रौशन करे
तो भला इस जहाँ में 'धरम' क्यूँ मेरा कोई व्यसन करे

2.
दरिया को बीच से काटकर "धरम" नया किनारा बनाया गया
किसी एक के सहारे के लिए कितनो को बेसहारा बनाया गया

3.
क्यूँ तेरे एक ख़्वाब के बाद "धरम" कभी भी कोई दूसरा ख़्वाब नहीं आता
कि दिल धड़क के रुक जाता है मगर हाँ कोई मुक़म्मल जवाब नहीं आता

4.
कि कितने गुनाहों के बाद हम उस वक़्त-ए-रुख़्सत के पनाह से निकले
खुद अपने ही सजाए क़ब्र से 'धरम' हम रंग-ए-चेहरा-ए-स्याह से निकले

5.
मैंने जब भी रास्ता बदला "धरम" मंज़िल को भी बदलते देखा
कि मैंने तो मील के पत्थर को भी मोम की तरह पिघलते देखा

6.
जब उसने जाने की ज़िद की "धरम" तो मैंने ख़ुद ही रास्ता बना दिया
बाद उसके फिर कभी न आह निकले दर्द पनपे ऐसा रिश्ता बना दिया

7.
इश्क़ का आगाज़ हुआ तो था हाँ! मगर हुस्न के ढल जाने के बाद
जैसे रात का मिलना हुआ "धरम" ख़ुर्शीद के निकल जाने के बाद

8.
परत दर परत खुलती गई नक़ाब दर नक़ाब सरकता गया
चरित्र औ" चेहरा दोनों 'धरम' कई आयाम में उभरता गया