Saturday, 27 April 2013

यादें


मैं वो यादें ले आया हूँ
जो तुम वहां छोड़ आई थी
तुम खुद से दफ़न कर दो इसे

मैं जब भी कभी
अपने जमीर की मिट्टी खोदता हूँ
मेरा हाथ कांपता है
यादों का कोई कद-काठी नहीं है
कब्र कितना लम्बा
कितना चौड़ा और कितना गहरा होगा
मुझे इसका कोई अंदाज़ा नहीं है

Wednesday, 24 April 2013

कैसा शहर

ये कैसा शहर है कि यहाँ बुत भी है परेशां 
दिल है पत्थर का और शीशे का है आशियाँ 

हर मजार पर रौशन है चमकता रहता है
और मन ही मन इन्शां दहकता रहता है 

वो खड़ा है लूटने फ़क़ीर को हर मोड़ पर यहाँ 
इन्शां के शक्ल में भेड़िए बच के जाओगे कहाँ 

दरख़्त की छाहँ भी किसी के जागीर में बसती है 
इस शहर में "धरम" कहाँ किसी इन्शां की हस्ती है

Sunday, 7 April 2013

बलात्कार के नए कानून पर एक टिपण्णी


बलात्कार एक जघन्य और घृणित अपराध है . संसद द्वारा बनाये गए बलात्कार के नए  कानून , जिसमें की अपराधी को आजीवन कारावास या मौत की सजा हो सकती है , से मैं सहमत हूँ .

किसी का पीछा करने को भी जुर्म माना गया है और इसके लिए अधिकतम सात साल की  सजा मुक्कर्रर की गई है. यह भी बिलकुल सही है. किसी को किसी की पीछा करने का कोई अधिकार नहीं है और होना भी नहीं चाहिए.

हमारे देश के कानून में जुर्म की सजा आर्थिक दंड / जेल / मौत है. जब जेल जाना एक सजा है तो किसी को झूठे आरोप में जेल भिजवाना भी एक "जुर्म" होना चाहिए.यदि किसी पर बलात्कार जैसा जघन्य और घृणित आरोप लगता है तो उस व्यक्ति को पुलिस अपने हिरासत में ले लेती है और अक्सर आरोपी को जेल भेज दिया जाता है. यदि यह आरोप बाद में गलत निकलता है तो माननीय न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति को आरोपमुक्त घोषित किया जाता है और यदि वह जेल में है तो जेल से रिहाई का आदेश दे दिया जाता है. बाद में वह व्यक्ति यदि चाहे तो मानहानि का मुकदमा न्यायालय में दर्ज कर सकता है. उस मानहानि पर न्यायालय तय करेगी की पुरुष (पुरुष लिखने का तात्पर्य यह है की सामान्यतः महिला ही पुरुष पर बलात्कार का आरोप लगाती है) के इज्जत का कितना आकलन होना चाहिए ?

मैं उस पुरुष के मनोस्थिति के बारे में सोचना चाहता हूँ जिसपर कोई बलात्कार का झूठा आरोप हो और वो जेल में हो. उसके लिए जेल जाना भी एक मानसिक बलात्कार ही तो है. वहां उसकी  सारी स्वतंत्रता खत्म हो जाती है. वह व्यक्ति वहां बार-बार मरता है. जब भी कभी समाज की बात उसके दिमाग में आती होगी तो वह जरुर सोचता होगा की न्यायालय से तो उसे आरोप से मुक्ति मिल ही जाएगी मगर क्या समाज में फिर से वही इज्जत ,वही सम्मान, वही प्रतिष्ठा मिलेगी ?? इस तरह की मानसिक पीड़ा और बलात्कार से वह व्यक्ति जूझता रहता है. किसी महिला का बलात्कार जो की संभवतः आधे घंटे में पूरा हो जाता होगा उससे कई गुणा ज्यादा समय तक उस पुरुष का जेल में मानसिक बलात्कार होता है.

यदि बलात्कार का आरोप झूठा साबित होता है तो जिस व्यक्ति (महिला/पुरुष) ने किसी पर बलात्कार का झूठा आरोप लगाया है उसके लिए भी क्यूँ नहीं एक निश्चित सजा मुकर्कर की गई ?? झूठा बलात्कार का आरोप लगाना भी बलात्कार करने जैसा ही एक जुर्म माना जाना चाहिए. झूठा बलात्कार का आरोप लगाने वाले/वाली को भी क्यूँ नहीं आजीवन कारावास हो या क्यूँ नहीं उसे भी मौत की सजा सुनाई जाए और यह सजा उस निर्दोष व्यक्ति के मानहानि के आरोप लगाने पर नहीं बल्कि कानून में ही होना चाहिए की यदि बलात्कार का आरोप झूठा साबित हुआ तो आरोप लगाने वाले/वाली व्यक्ति को भी पता चलना चाहिए की झूठा बलात्कार का आरोप भी बलात्कार के जैसा ही एक जुर्म है.

यह लेखक का अपना स्वतंत्र मत है.

Tuesday, 2 April 2013

प्यार मांगता है


वह कौन है जो मुझसे मेरा हिसाब  मांगता है
मेरे ख्वाब में आकर मेरा ही ख्वाब मांगता है

मैं जब भी रूठता हूँ वो मुझे मनाता है
और रूठने का मुझसे मेरा अंदाज़ मांगता है

चांदनी रात  ठंढी हवा  झील का किनारा
वो कौन है जो मुझसे मेरा प्यार मांगता है

घर की दीवार  दरख़्त की छाल और मानसपटल
वो कौन है जो मेरा नाम  नाम-ए-यार मांगता है

चेहरे पर मासूमियत  दिल में प्यार   बांह पसारे
वो कौन है जो लिपटने को मुझसे बार-बार मांगता है

वो हुस्न की अंगड़ाई  इश्क की गहराई "धरम"
भरे बाज़ार मुझसे सिपहसलार मांगता है

वो कौन है जो मुझसे मेरा प्यार मांगता है...


Monday, 1 April 2013

"अप्रैल फूल"

"अप्रैल फूल" का मजा ही अलग है .. अलग क्यूँ न हो इसमें पश्चिमी रंग जो है.. जी हाँ अपने देश में रहने वाले कुछ लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति से घोर असंतुष्टि है.. उनका मानना है की विदेशी रंग ही असली रंग है बाकि अपना रंग तो फींका है..कुछ लोग तो "फूल" का मतलब "पुष्प" समझते हैं और "बिपरीत लिंग" वाले मित्र को पुष्प अर्पित करते हैं और फिर उस पुष्प को पुष्पांजलि भी दे देते है और कहते हैं की ये "अप्रैल फूल" था..

मत खेल प्रिये


क्यूँ खेले है तू खेल प्रिये
अब दिल में कहाँ है मेल प्रिये
रख कर तुम वो वादे झूठे
क्यूँ ढूंढे है तू खुद में सच्चे

मुफलिस हूँ मैं खड़ा सड़क पर
देखता रहता तुझको छुपकर
रहना है किस्मत से दूर
हो गया मुझे ये भी मंजूर

Wednesday, 27 March 2013

प्रेमी-प्रेमिका की गोपनीय बातें


प्रेमिका प्रेमी से : तुम्हारा दिल पत्थर सा क्यूँ है ?
प्रेमी प्रेमिका से : तुम ही कहती थी न की दिल यदि पत्थर सा होता तो इसके टूटने का डर नहीं होता
प्रेमिका प्रेमी से : धत्त ये मैं तेरे लिए थोड़े न कही थी
प्रेमी प्रेमिका से : तो क्या तुम अपने लिए कही थी ?

प्रेमिका प्रेमी से : खैर जाने दो ... तुम तो यूँ ही बात बनाते हो.  अब तुम ये बताओ की तुम कभी-कभी गधे की        
                          तरह क्यूँ करते हो ....मुझे अच्छा नहीं लगता है...
प्रेमी प्रेमिका से : मुझे जब भी एहसास होता है कि तुम आज गधी कि तरह लग रही हो तो मैं सोचता हूँ कि अब
                        तो मुझे गधे के  तरह ही बात करना पड़ेगा नहीं तो तुमको बुरा लगेगा न !!

प्रेमिका प्रेमी से : तुम मुझे कभी-कभी गिद्ध कि तरह क्यूँ घूरते हो ?
प्रेमी प्रेमिका से :  जब तुम कोयल कि तरह सजकर कौवे की तरह बोली बोलती हो तो मुझे लगता है की मुझे
                          भी एक पक्षी की तरह ही व्यव्हार करना चाहिए...

प्रेमिका प्रेमी से : तुम बिल्कुल उल्लू हो ....
प्रेमी प्रेमिका से : हाँ ! यदि मैं उल्लू न होता तो मुझे ये कभी पता नहीं चल पाता की रात के अँधेरे में तुम मेरे
                         अलावा और कितनों से मिलती हो ...

प्रेमिका प्रेमी से : मेरी एक सहेली कविता (काल्पनिक नाम) का प्रेमी कितना अच्छा है .. वह उसकी हरेक बात
                         मानता है.."ही इज सो क्यूट"..
प्रेमी प्रेमिका से :  मुझे तो तुम्हारे अलावा अपने सारे मित्रों की प्रेमिकाएँ बहुत अच्छी लगती है.. पता नहीं
                         भगवान ने तुम्हारे अलावा बाकी सबों को इतना अच्छा क्यूँ बनाया... "ओह माई गॉड" !!!

Tuesday, 26 March 2013

हरजाई

तुम तो मुझे जिंदगी की दुआ न दो 
तुम हरजाई हो मुझे झूठी वफ़ा न दो 
रिश्ते जोड़ना रिश्ते तोडना 
तुम्हारे लिए खेल सतरंज सा है
प्यार तो ऐसा है की सिर्फ रंज सा है 
उससे वफ़ा की बात पर "धरम" 
अब तो हर सक्श तंग सा है

Friday, 15 March 2013

कमर टूट जाती है


मेरी कमर टूट जाती है
उधारी की लाठी पकड़कर खड़ा होता हूँ
मगर जब फ़क्त सूद
मूलधन से जियादा हो जाता है
मेरी कमर टूट जाती है

सड़क के किनारे खड़ा होकर
कातर निगाह से
बड़ी बड़ी गाड़ियों में झांकता हूँ
शाही कुत्तों को देखता हूँ
मेरी कमर टूट जाती है

महंगाई की मार ऐसी  है
की मुझ मुफलिस के पास
न "वायफ" है न "तवायफ" है
खाली थैली और खोखला दिल
हाँ मेरी कमर टूट जाती है

Saturday, 9 March 2013

जिंदगी और रिश्ता


औरों के शिकस्त पर मुस्कुराना ठीक नहीं
खुद अपनी शिकस्त पर रोना  भी ठीक नहीं
जिंदगी है, यह बहुत कुछ दिखाती है
यह कर्म भूमि भी यह धर्म भूमि भी
यह कर्त्तव्य भूमि भी यह रणभूमि भी

यहाँ रिश्ते बनते भी है टूटते भी हैं
कुछ रिश्ते गांठ के सहारे चलते भी हैं
अर्थ के नींब पर टिके रिश्ते
जरा सी चूक पर बिखर जाते हैं
कुछ ठिठुरते रिश्ते कुछ उबलते रिश्ते
मानो शर्द भी गर्म भी और हवा भी
मन यूँ उलझता है कि अब क्या करें


प्रेम की परिभाषा भी कुछ बदल सी गई है
जैसे मानो की प्रेम कोई व्यापार हो
आह!अगर प्रेम निःस्वार्थ और निश्छल हो
तो जीवन सुखी भी और सफल भी हो