Saturday, 30 July 2016

चंद शेर

1.
फासले घट गए दूरियां भी कम हुई "धरम"
ये क्या कम है की मजबूरियां भी कम हुई

2.
कि मेरा मुक़ाबला अपने ही दर-ओ-दीवार से था
औ" वो दर्द भी "धरम" मेरे पुराने आज़ार से था

3.
हर मुक़ाम पर मेरी हस्ती महज़ ख़ाक की हो जाती है
हर बार मेरी ही गर्दन "धरम" हलाक़ की हो जाती है

4.
आ की क़ुबूल कर "धरम" तू इलज़ाम मेरे क़त्ल का
औ" की उतार फेंक शराफत की चादर पाने शक्ल से

5.
मेरे यार के शक्ल में अब तो बस सियार नज़र आता है
यहाँ तो हर कोई "धरम" मुझसे होशियार नज़र आता है

6.
अब क्यों कर दिल में आरज़ू हो की वफ़ा करे कोई गैर
खुद अपनी जमात से ही "धरम" जब अपनी न हो खैर

7.
आ के लब पे मर गई तिश्नगी उस बीमार की
देखा जब उसने डूबकर आखों में अपने यार की

8.
ग़म से जब वास्ता न रहा मेरा मुझसे कोई रिश्ता न रहा
खुद अपने ही घर से "धरम" निकलने का कोई रास्ता न रहा

9.
ख़िज़्र सी तन्हाई है हयात एक पैर पर चलकर आई है
जहाँ मैं रहता हूँ "धरम" वहां हर गली में मेरी रुस्वाई है

10.
"धरम" तेरा नाम ज़ुबाँ पे आया तो तरन्नुम आया
की बाद उसके फैसला-ए-हयात पर जहन्नुम आया




Saturday, 23 July 2016

प्रथम प्रहर होना है

तुम तो तिमिर थे अब तुम्हें सहर होना है
हाँ इक छोटे से बीज को पूरा सज़र होना है

ज़माना तो हर रोज बरपाएगा क़हर तुझपर
मगर इस सब के साथ तुमको प्रखर होना है

ये मुमकिन है कि तेरी बात कोई भी न सुने
मगर तुमको तो ज़माने के सामने मुखर होना है

ग़ुर्बत में यहाँ हर मुफलिस की आँखें फूट गई हैं
तुमको तो मुफलिस-औ-मज़लूम की नज़र होनी है

यहाँ तो हर किसी का खुर्शीद डूबा हुआ है "धरम"
तुमको तो सबके दिवस का प्रथम प्रहर होना है

Wednesday, 20 July 2016

भूल जाओ ख्वाइशें हज़ार रखना

इधर जो लग गई आग इसे तुम अब याद रखना
कि जला के अपना दिल तुम भी अब तैयार रखना

अपने इश्क़ के दरम्याँ का चिलमन मैंने हटा दिया
तुझे तो अब भी ठीक लगता है इसमें दीवार रखना

हम खूब वाकिब हैं तेरे अंदाज़-ए-ज़ुल्म-औ-सितम से
ये तेरी ही फितरत है यहाँ हर किसी को बीमार रखना

तेरा ज़िक्र सुनकर यहाँ आ गए हैं कई और दिलफ़रेब
ये इल्तिज़ा है तुम भी अपने आप को होशियार रखना

अब तो तेरे महफ़िल में न रौनक है औ" न ही क़द्रदान
अब तुम भूल ही जाओ "धरम" ख्वाइशें हज़ार रखना 

Monday, 4 July 2016

नज़र आता है

रूठना तो भूल गया हूँ मैं मगर मनाने का हुनर आता है
तुझमे तो मुझे अब भी कोई पुराना यार नज़र आता है

वो और होंगे जिनके ज़िंदगी के रास्ते वीरां हो गए होंगें
मैं जब भी निकलता हूँ मेरे हर रास्ते में सजर आता है

वो और होंगे जो इन्सां के मक़तल पर जश्न मनाते होंगे
मुझे तो यूँ हीं हर किसी के दर्द पर दर्द-ए-जिगर आता है

वो और होंगे जो क़त्ल-औ-फ़रेब करके भी भूल गए होंगे
मेरे चेहरे पर तो किसी झूठे इल्ज़ाम का भी असर आता है

छोटा सा मसला था मगर बात गिरेबां तक पहुंच गई "धरम"
यहाँ तो हर किसी को अपने आप में पैग़म्बर नज़र आता है

Sunday, 26 June 2016

बहुत ज़्यादा है

न जाने क्यों उसे अपने क़द का गुमान बहुत ज़्यादा है
उसे दिखता नहीं उससे भी ऊँचा मकान बहुत ज़्यादा है

उसके दरवाजे से जाकर लौटा तो कंगाल हो गया था मैं
औ" लोग कहते थे कि उसके पास ईमान बहुत ज़्यादा है

ये पसंद उसकी थी कि उस कमरे में कुछ भी न पसंद आई
हाँ! उस कमरे में अब भी बुजुर्गों का सामान बहुत ज़्यादा है

जो शराफत की चादर ओढ़कर नफ़रत करते हैं हम रिन्दों से
इस शहर में उसकी मय-ओ-हुस्न की दुकान बहुत ज़्यादा है

तुम्हें तो बोलने की बीमारी है तुम उसके यहाँ कभी मत जाना
काट दी जाती है "धरम" जिसकी चलती जुवान बहुत ज़्यादा है

Tuesday, 7 June 2016

समझ बैठे थे

हम तो तेरे ज़ुल्फ़ को ही दामन-ए-यार समझ बैठे थे
औ" तेरे आरिज़ को ही बोसा-ए-रुख़सार समझ बैठे थे

हमें तो धोखा हुआ था कि हम तुझे दिलदार समझ बैठे थे
औ" महज उन चंद मुलाकातों को ही प्यार समझ बैठे थे

जो नज़र का चिराग जला तो हम तुम्हें यार समझ बैठे थे
औ" वो बस तेरी एक नज़र को ही हम दीदार समझ बैठे थे

वो तेरी दिल बहलाने वाली बातों को हम क़रार समझ बैठे थे
हाय! तुम सा कुलूख को "धरम" हम माहपार: समझ बैठे थे

शब्दार्थ
आरिज़ - गाल
बोसा-ए-रुख़सार - चूमने वाला गाल
कुलूख - ढेला, मिट्टी का टुकड़ा
माहपार: - चाँद का टुकड़ा



Sunday, 29 May 2016

चंद शेर

1.
हम वो हैं जो कलम से अपने हाथ की लकीर लिखते हैं
बड़े अदब से "धरम" हम अपने नाम में फ़क़ीर लिखते हैं

2.
आज बरक्कत मिली तो हर किसी से कद तुम्हारा ऊँचा हो गया
वक़्त का खेल देखो "धरम" हर कोई तेरी नज़र से नीचे हो गया

3.
तेरे आने से ग़र कहर ही न बरपा "धरम" तो तेरा क्या आना हुआ
हुस्न की तपिश से ग़र खुर्शीद न जले तो हुस्न का मर जाना हुआ

4.
ग़र यही तेरा फैसला हो तो ज़माने को इसकी खबर हो जाए
ख़ुदा करे मुझपर "धरम" तेरे हरेक बद-दुआ का असर हो जाए  

अब आ गया हूँ मैं

क्या जाने किस मुकाम तक अब आ गया हूँ मैं
कि जिस्म में उतरकर जान तक अब आ गया हूँ मैं

वफ़ा की बात है तुम्हारी तुम खुद अपना जानो
कि अपनी तरफ से ईमान तक अब आ गया हूँ मैं

अब ये तुझ पर है कि मुझे पी लो या फिर छोड़ दो
कि बनकर शराब तेरे ज़ाम तक अब आ गया हूँ मैं

बातें बेरुखी कि थी तुम याद रखो या फिर भूल जाओ
कि सब छोड़कर दुआ-सलाम तक अब आ गया हूँ मैं

तुम चाहो तो पनाह दो मुझे या फिर कर दो दरकिनार
कि तेरे हुस्न के इस मकान तक अब आ गया हूँ मैं

तुम चाहो तो पलकों पे रखो या मुझसे फेर ही लो नज़र
कि तेरी मोहब्बत में इस अंजाम तक अब आ गया हूँ मैं

मेरी रुस्वाई हर जुबाँ पर है औ" हिकारत हर नज़र में है
कि ज़माने में "धरम" इस अंजाम तक अब आ गया हूँ मैं

Monday, 23 May 2016

ये दिन भी कट ही गया

आधा जीवन तो भसड़ में ही कट गया सिर्फ एक ही पोटली ढोते-ढोते. घर से जब निकला था तब पास में सिर्फ दसवीं कक्षा का अंक पत्र था. पोटली बहुत हल्की थी इसलिए मन भी हल्का रहता था. साल-दर-साल पोटली में कागज़ के अंक पत्र, चरित्र प्रमाण पत्र और न जाने कैसे-कैसे पत्र जुड़ते गए. हक़ीक़त अब यह है की पोटली के साथ-साथ मन भी भारी हो गया है. शरीर स्थूल हो चला है. तोंद हर वक़्त अपने होने का एहसास कराते रहता है. हड्डी वक़्त-बे-वक़्त कट-कट की आवाज़ करते रहता है. पता नहीं क्या कहना चाहता है: तुम्हारा कट चुका है या कट रहा है या फिर तुम चूतिये हो और ज़िंदगी भर तुम्हारा ऐसे ही कटने वाला है? कभी-कभी मन दार्शनिक भाव से ओत-प्रोत होता है तो यह आत्मबोध होता है कि आदमी अपना खुद जितना काटता है दुनियाँ में उसका उतना कोई भी दूसरा नहीं काट सकता है. तो फिर इतना भसड़ क्यूँ? इतना ग़दर क्यूँ? इतनी बेचैनी क्यूँ? इतनी बेवाकी क्यूँ? ऐसे-ऐसे अनगिनत ढेर सारे प्रश्न उठने लगते हैं. बाद इसके पता चलता है कि दार्शनिक मन इतना खिन्न क्यूँ होता है. घोर खिन्नता में भी यदि करवट बदलता हूँ तब भी हड्डी कट-कट करने से बाज नहीं आता है. लेकिन इसबार हड्डी का कटकटाना ठीक लगता है क्यूंकि वह अकिंचन दार्शनिक हुए मन को काटता है और फिर मनःस्थिति सामान्य हो जाती है. रात में सोने के वक़्त एहसास होता है कि ये दिन भी कट ही गया.

Sunday, 22 May 2016

चंद शेर


1.
जिसे चिलमन के पीछे रहना था उसकी खूब नुमाईश हो रही है
अब तो ज़माने को "धरम" न जाने कैसी-कैसी ख्वाइश हो रही है

2.
अब की जो लगी प्यास तो बदन के शराब से ही बुझेगी
जिस्म की आग है "धरम" जिस्म की आग से ही बुझेगी

3.
अब जाकर पता चला तेरे इश्क़ का रंग है स्याह
तुझे तो "धरम" जहन्नुम में भी न मिले पनाह

4.
कभी मुझपे तो कभी ज़माने पे "धरम" तुको हँसी आई
मुझे ये बात अच्छी लगी की तुमको कभी तो ख़ुशी आई

5.
कोई भी दावत-ए-सुखन कम है तेरे नज़र उठाने के बाद
महफ़िल में अब कौन रुकता है "धरम" तेरे जाने के बाद

6.
लब उदास है "धरम" औ" हैं चेहरे पर झुर्रियां
इस नेकी की सजा मुझे कुछ इस तरह मिली

7.
सिवा तेरे इस नफरत की आग को हवा कौन दे सकता है
कि बाद मरने के भी "धरम" मुझे सजा कौन दे सकता है

8.
उदासी इस क़दर उसके चेहरे पर घर कर गई "धरम"
कि कोई भी फूल उसके दामन में अब महकता नहीं

9.
उसके बज़्म में "धरम" अब कोई पैमाना छलकता नहीं
कि ज़िक्र-ए-यार पर भी अब उसका दिल बहकता नहीं

10.
तेरे नामुराद इश्क़ के खातिर हम ता-उम्र बस जलते रहे
बेवाक यूँ हुए "धरम" कि दुश्मनों से ही गले मिलते रहे

11.
ग़र हम तेरे न हुए "धरम" तो ज़माने में किसी के न हुए
फासलों को अब मुद्दत हो गया मगर किस्से पुराने न हुए