ज़िंदगी की डोर भी बड़ी अजीब होती है
जितनी सुलझाओ उतनी उलझती चली जाती है
जब भी कभी ज़ख्म पर मरहम लगाता हूँ
तो और भी गहरा ज़ख्म उभर कर आता है
जब भी दिल में अपने लहू का चिराग जलाता हूँ
न जाने क्यूँ आँखों के सामने अंधेरा छा जाता है
चांदनी रात भी अब अमावस सा क़हर बरपा जाती है
ज़ख्म-ए-दिल अब तो हर मौसम में तेरी याद भुला जाती है
अब न तो दर्द की दवा करता हूँ और न ही दर्द-ए-बेदवा पाता हूँ
ज़िंदगी कैसी हो गई हो तुम हर कदम पर तुमको बेवफा पाता हूँ
हर चेहरा एक पहाड़ सा दीखता है और आँख समंदर सा दीखता है
दिल में एक तूफाँ सा दीखता है और ज़िस्म खंड़हर सा दीखता है
मैं तो "धरम" अब रिश्तों में यूँ ही उलझना छोड़ दिया हूँ
ज़िंदगी को थाम कर तो रखा हूँ मगर जीना छोड़ दिया हूँ
जितनी सुलझाओ उतनी उलझती चली जाती है
जब भी कभी ज़ख्म पर मरहम लगाता हूँ
तो और भी गहरा ज़ख्म उभर कर आता है
जब भी दिल में अपने लहू का चिराग जलाता हूँ
न जाने क्यूँ आँखों के सामने अंधेरा छा जाता है
चांदनी रात भी अब अमावस सा क़हर बरपा जाती है
ज़ख्म-ए-दिल अब तो हर मौसम में तेरी याद भुला जाती है
अब न तो दर्द की दवा करता हूँ और न ही दर्द-ए-बेदवा पाता हूँ
ज़िंदगी कैसी हो गई हो तुम हर कदम पर तुमको बेवफा पाता हूँ
हर चेहरा एक पहाड़ सा दीखता है और आँख समंदर सा दीखता है
दिल में एक तूफाँ सा दीखता है और ज़िस्म खंड़हर सा दीखता है
मैं तो "धरम" अब रिश्तों में यूँ ही उलझना छोड़ दिया हूँ
ज़िंदगी को थाम कर तो रखा हूँ मगर जीना छोड़ दिया हूँ