Friday, 18 April 2014

ज़माने की मिशाल

मैं झुका भी और हर जोड़ से टूटा भी
मगर ज़माने को कभी खुश न कर सका 

Saturday, 12 April 2014

देते हो

करवाके क़त्ल ख़ुदकुशी का नाम देते हो
तुम तो जुर्म को भी नया आयाम देते हो

हर रोज नए गिरह बांधते हो खोलते भी हो
घोलकर ज़हर इंसानियत का नाम देते हो

हम तो ज़माने से जमीं पर रहने के शौक़ीन हैं
कुछ वक़्त के लिए क्यों आसमाँ की ऊडॉं देते हो

हमने सोचा तेरे आने से मुकद्दर जाग जायेगा
तुमतो आकर सोये मुकद्दर को भी मार देते हो

हवा देकर आपसी रंजिश को तुम "धरम"
हमें भीड़ में भी डर तन्हाई का दिखा देते हो

Tuesday, 8 April 2014

बना रखा है

अनगिनत ज़ख्म सीने में छुपा रखा है
हरेक दर्द को मैंने धड़कन से लगा रखा है

हरेक रिश्ता यहाँ पोसीदः होकर टूट गया है
फिर भी उससे भरम इख़लास का बना रखा है

अश्क़ का दरिया था अब सूखकर क़तरा हो गया है
आखों में उसके आने का ख्वाब अब भी छुपा रखा है

मुझसे बिछड़कर वो कुछ इसकदर रूठा है "धरम'
कि रुठने का वो अपना नया अन्दाज़ बना रखा है 

Friday, 4 April 2014

अच्छा नहीं लगता

हर रोज टूटना बिखरना अच्छा नहीं लगता
किसी को बार-बार मनाना अच्छा नहीं लगता

माना कि उससे रंजिश नई है मगर प्यार तो पुराना है
यकायक मिलें तो नज़र झुकाके निकलना अच्छा नहीं लगता

सुना है कि ऊपर वाला तंग दिल नहीं होता "धरम"
करम ख़ुदा का ग़र मुवाज़ी न बरसे तो अच्छा नहीं लगता


मुवाज़ी : बराबर-बराबर


Tuesday, 1 April 2014

चंद शेर

1.
तुम मुझे दर्द दो तो ज़िंदगी का एहसास हो जाए
हर वक़्त हर लम्हा अब मेरे लिए खास हो जाए

2.
यहाँ कोई नहीं जो मेरे दर्द-ए-दिल कि दवा करे
मैं जब भी गर्दिश में रहूँ वो मेरे लिए दुआ करे

3.
ये दर्द तो अपना है मगर ख्याल किसका है
जवाब तो मैं खुद हूँ मगर सवाल किसका है

4.
ग़र दिल न मचले तो धड़कने का सबब क्या है
मेरा साथ है तो फिर रूठने का मतलब क्या है



Thursday, 27 March 2014

एक तमन्ना

घुलकर लहू में मैं जो तेरे जिगर में उतर जाऊँ
मैं ताउम्र भटका हूँ अब तेरे दिल में बसर पाऊँ

यूँ ही एक रोज भटकते हुए मैं जो तेरे घर पहुंचा
लौटने लगा तो ये सोचा की जाऊँ तो कहाँ जाऊँ

एक तमन्ना है की तेरे सीने पे सर रखूं सुकूँ पाऊँ
ग़म-ए-दौरां से उब चुका हूँ अब थोड़ी ख़ुशी पाऊँ

ये जिस ख़ुशी की आहट पे मेरा ग़म सो रहा है "धरम"
ग़र वो हो तेरा नाम तो मैं इससे ज्य़ादा और क्या पाऊँ

Wednesday, 19 March 2014

एक सिलसिला जारी रहा

रूठने मनाने का सिलसिला  बदस्तूर जारी रहा
उन्हें हमारे दुश्मनो से मिलने का ऐतवारी रहा

ये खता किसकी है यह बताना तो मुश्किल है
उसका मुझपर हर रोज सितम ढाना जारी रहा

एक-एक वक़्त जोड़कर मैंने मोहब्बत बुलंद की थी
मगर उसका तो हरेक याद को झुठलाना जारी रहा

जोड़कर लम्हें मैं अपना मकाँ-ए-इश्क़ बनाता रहा
उसका मेरे ही चिराग से मेरा घर जलाना जारी रहा

जलती यादों को देखकर मैं बार-बार तड़पता रहा
उसका हरेक याद को ज़िंदा दफनाना जारी रहा

सबकुछ लुट गया "धरम" फिर भी मेरा ऐतवारी रहा
मगर उसका मेरे रकीब के बाँहों में बाहें डालना जारी रहा



Tuesday, 18 March 2014

कई चेहरे

एक चेहरे के पीछे कई चेहरे छुपाना
सीखा है कहाँ से ये इल्म मुझे भी बताना

अपनों पे सितम ढाना गैरों पे करम करना
मैं खूब जनता हूँ तेरा इल्म तुम मुझे न भरमाना

इश्क़ मोहब्बत यारी ये तेरी सब झूठी बातें हैं
तुम हरज़ाई बनकर अब मुझे न आज़माना

जो छुपे महताब आसमां में तो तेरा इश्क़ फरमाना
जो निकले आफताब तो तेरा सर-ए-आम शर्माना

उसके इश्क़ के चर्चे मैंने भी खूब सुना है "धरम"
कितनों को देखा है बहते दरिया से कतरा हो जाना


Thursday, 13 March 2014

कभी ऐसा भी हो

ये लाज़िमी नहीं कि हर बार दुआ-सलाम ही हो
क्यूँ न कभी-कभी हो तो क़त्ल-ए-आम भी हो

ये क्या कि हर बार बस पिलाते हो मय
जो हो तो कभी-कभी नज़र-ए-ज़ाम भी हो

तुम जो हर रोज गुजरती हो मेरी गली से दिन में
क्यूँ न ऐसा हो कि मेरी गली में तेरी शाम भी हो

ये क्या कि हर रोज का यूँ हीं छुप-छुप कर मिलना
अब मिलना हो तो मिलो वहाँ जो राह-ए-आवाम भी हो

वक़्त की पावंदी में हरेक मुलाक़ात मुख़्तसर लगती है
अब की मिलो तो दिन हो शाम हो और शब्-ए-जाम भी हो

यूँ तो तुम हमेशा मेहरबां होते हो हरेक दौलतमंद पर "धरम"
कभी ऐसा भी हो की तुम भी हो और गर्दिश-ए-अय्याम भी हो

Monday, 10 March 2014

ये क्या पाया

अपनी कब्र खोदी ज़िंदा ज़िस्म दफनाया
ज़न्नत की सैर की वहाँ भी न मज़ा पाया

अपना सीना चीरा खुद अपना ही लहू पीया
टुकड़ों में बांटकर ज़िस्म खुद मैंने बिखराया

ये किसकी आह! पर दिल मेरा धड़क आया
ये कौन है जो मेरे बिखरे ज़िस्म को समेट लाया

उड़ जाता हूँ एक फूंक से ये कैसा मैंने ज़िस्म पाया
टूट जाता है दो बे-दिली के हर्फ़ से कैसा मैने दिल पाया

जिसकी साँसों की गर्मी से बदन ठंढा हो जाता है
ऐ ख़ुदा! जो पाया भी तो उसने कैसा महबूब पाया

चीरे हुए दिल का तुम रफू खूब करते हो "धरम"
ख़ुदा से पाया भी ये इल्म तो क्या भला पाया