Friday, 20 October 2017

चंद शेर

1.
तेरे दर पर आए तो बेजार हुए क्या कहें कि हम किस तरह तार-तार हुए
खुद अपने ही हाथ से तराशे संग "धरम" अपने ही सीने के आर-पार हुए

2.
जब खो ही गया हूँ तो फिर खुद ही से अपना पता क्या पूछना
कि रखकर सामने आईना 'धरम' खुद ही से ख़ता क्या पूछना

3.
कि तेरी बज़्म-ए-उल्फ़त अब मेरे शरीक-ए-क़ाबिल न रहा
वहां जो मैं न रहा 'धरम' तो कोई भी मेरे मुक़ाबिल न रहा 

4.
"धरम" निकले थे इस ख़्याल से कि जाना बहुत है दूर
अब मंज़िल ही चल के आ गई इसमें मेरा क्या क़ुसूर

5.
इरादा मेरे क़त्ल का था "धरम" मगर बात वफ़ा की आ गई
कि बाद इसके ऐ! ज़ुल्फ़ तू खुद में सिमटी भी शर्मा भी गई 

Thursday, 12 October 2017

खिलौना खुद अपने किरदार का

तुम ख़ुद भी पूरा कब आई थी
बस एक किरदार आता था तुझमें
जो झटके से
अपने पसंद का खिलौना लेकर
कुछ दिन खेलता था
फिर किरदार बदला खिलौना भी बदल गया

ये नया किरदार पुराने खिलौने पसंद नहीं करता
बंद कर देना चाहता है अलमारी में उसे
ऐसी अलमारी जिसमें कांच की कोई दीवार न हो
खिलौने की शक़्ल दिखाई न पड़े
उसकी छटपटाहट महसूस न हो

अलमारी में अब बंद हैं कई खिलौने
तुम्हारा किरदार अब बदलने में वक़्त नहीं लेता
अलमारी से पुराने खिलौने भी कभी निकालता है
जरुरत के वक़्त एक बार मुस्कुराता है
खिलौना भी हँस देता है
पर उसे पता है कि अगला वक़्त क्या गुज़रेगा
मगर वक़्त जो भी है गुज़र जाता है

कभी एक खिलौने ने तुम्हारे किसी किरदार को
अपने अंदर पनाह दी थी
उसकी परछाहीं अब भी बंद हैं अलमारी में
तुम्हें वो दिखाई नहीं देगी
कि अब तुम्हारा फिर से किरदार बदल गया है

हाँ इतने खिलौने से खेलते-खेलते
अब तुम खुद अपने किरदार के हाथ का
एक खिलौना बन गई हो
शायद तुम्हें मालूम हो या न हो
हाँ मगर अब एक खिलौना हो तुम
खुद अपने ही किरदार का

क्या जानें कुछ कहना चाहते हैं

शायद कोई शाख़ टूटा होगा वहां
दरख़्तों के रोने की आवाज़ आ रही थी
ये आवाज़ हर कोई सुन नहीं सकता
ये बुलंद नहीं होती
बस एक सिसकी होती है निकल जाती है

दरख़्तों के अश्क़
आखों में ही सूख जाते हैं
चेहरे पर उगी झुर्रियों तक नहीं पहुंचते

कराह की आवाज़
हलक़ से ऊपर तक नहीं आती
होंठ बस काँप के रह जाते हैं
क्या जानें कुछ कहना चाहते हैं 

Tuesday, 10 October 2017

चंद शेर

1.
हमारे दरम्यां बात यदि छोटी सी थी तो बन ही क्यूँ न गई
औ" यदि वो बात अना की थी 'धरम' तो ठन ही क्यूँ न गई

2.
किस आरज़ू से बात रखूं "धरम" कि हर आरज़ू पे जी घबराता है
कि सामने तुम हो या तुम्हारा अक्स ये दिल समझ नहीं पाता है

3.
नहीं था चाहना तुमको टूटकर कि यूँ बिखरना मुझे गंवारा नहीं
अंजाम तो यही होना था "धरम" तुम मेरे नहीं मैं तुम्हारा नहीं

4.
उसकी अदाओं में बारूद है "धरम" वो बोलती है तो बम फटते हैं
औ" हमारी फितरत तो यही है कि बड़ी ख़ामोशी से हम कटते हैं

5.
कौन रुख़्सत हुआ है यहाँ से 'धरम' किसकी सारी यादें मिट गई हैं
कि अभी जो फैलीं थी चार-ओ-सू बस एक झटके में सिमट गई हैं

6.
पुराना ख़्वाब था 'धरम' खुली आखों में ही भर आया
कि गुज़रे लम्हों का ज़ख्म देखो फिर से उभर आया 

Monday, 2 October 2017

जान से मारा नहीं मुझे

तुमने भी कभी शौक से पुकारा नहीं मुझे
औ" यूँ ही कहीं भी जाना गँवारा नहीं मुझे

तुम क्यों ही पूछते हो मेरे उदासी का सबब
जब तुमने कभी रूककर सँवारा नहीं मुझे

ज़माना तो चाहता था की मैं ज़िंदा ही रहूं
पर तुमने भी क्यूँ  जान से मारा नहीं मुझे

ज़माने के बिसात पर मैं तो एक मोहरा ही था
क्या कहें की किस किस ने उतारा नहीं मुझे

वफ़ा तुम्हारे नाम की जलन आँख की रही
ऐसे आग से करना कोई किनारा नहीं मुझे

कि इसबार गिर के मैं तो खुद से ही उठा हूँ
"धरम" चाहिए अब कोई सहारा नहीं मुझे 

Saturday, 23 September 2017

चंद शेर

1.
जिस जहाँ के तुम खरीददार थे वहाँ तो हम बिक न सके
किसी और दूसरे ज़हाँ में 'धरम' मुझे बिकना गँवारा नहीं

2.
आज जरा हौशले से सुनो मुझे 'धरम' कि हाँ महज़ एक चीख ही हूँ मैं
मैं भूला नहीं हूँ कि तेरे दामन को मिला एक अनचाही भीख ही हूँ मैं

3.
कि ख़ुद मेरे ही घर में "धरम" कितनी वीरानी लगी मुझे
जब सोचने लगा तो तेरी सारी बातें आसमानी लगी मुझे

4.
कोई और वादा नहीं चाहिए तेरे इस वादा-ए-सुखन के बाद
कि अब कोई जहाँ नहीं चाहिए "धरम" इस कफ़न के बाद

5.
बाद तेरे नाम के "धरम" मैंने जो भी लिखा वो इबादत है
कि ये कुछ और नहीं हर हर्फ़ में लिपटी तेरी मोहब्बत है

Thursday, 21 September 2017

हर होंठ गुनगुनाने लगे मुझे

कि जो खुली किताब तो हर होंठ गुनगुनाने लगे मुझे
एक के बाद एक मेरे सारे दुश्मन अपनाने लगे मुझे

कि बात हवा के रुख़ की थी तो मैं भी साथ हो लिया
बाद इसके न जाने क्यूँकर लोग समझाने लगे मुझे

कि सिवा एक मेरे इश्क़ के तू किसी और की मुरीद नहीं
तेरी महफ़िल में इस बात पर लोग झुठलाने लगे मुझे

कि बाद तेरे जाने के भी वहाँ महफ़िल-ए-जॉ बाकी थी
न जाने क्यूँ लोग मुझको रोककर ये बतलाने लगे मुझे

उस मोहब्बत की कीमत 'धरम' मैं अब और क्या बताऊँ
तन्हाई से लिपटकर रोने में भी कितने हर्ज़ाने लगे मुझे

Thursday, 14 September 2017

चंद शेर

1.
कि जब वक़्त ने तोड़ी थी चुप्पी मेरे दिल में सिर्फ तन्हाई थी
मोहब्बत में मैं वहां रुक गया "धरम" बाद जिसके रुस्वाई थी

2.
अपने ज़ख्म-ए-दिल का 'धरम' ये मंज़र तो देखो
किस अंदाज़ से सीने में चुभा है ये खंज़र तो देखो

3.
कि किस ख़्याल को दिल में रखूं किसको निकाल दूँ
जी तो करता है 'धरम' कि खुद अपना दिल हलाल दूँ

4.
ज़ख्मों को अभी और सर होना है कि और भी दुखते-जिगर होना है
जो ख्वाब कभी देखा ना था 'धरम' हक़ीक़त ही उसका क़हर होना है

Friday, 1 September 2017

चंद शेर

1.
खुद से खुद ही रूठे 'धरम' फिर खुद मना भी लिए
कि खुद ही अपना दिल बुझाये औ" जला भी लिए

2.
वक़्त बदला फ़ासला बढ़ा औ" बूढ़ी हो गई राह तकती आखें
क्या कहें "धरम" ज़माने में किस-किस को भुलाना पड़ता है

3.
हर किसी को 'धरम' आसमाँ से इस ज़मीं पर आना पड़ता है
कि ख़ुद ही अपना दिल निकालकर उसे दफ़नाना पड़ता है

4.
तेरे बज़्म में रुस्वा होने के बाद ही 'धरम' मुझे सुकूँ मिलता है
क्या कहें कि मौत के बाद ही ज़िंदगी जीने का जुनूँ मिलता है

अतीत का रिश्ता

अतीत एक भोगा हुआ सत्य होता है जिसे भुला पाना मुझ जिसे लोगों के लिए बहुत कठिन है| मुझे तो अतीत का भोगा हुआ दुःख भी भविष्य में आने वाले किसी भी सुख के कल्पना से ज्यादा आनंद देता है| तुमको अभी मैं अपना वर्तमान तो नहीं कह सकता हाँ मेरा एक अतीत जरूर हो तुम| एक ऐसा अतीत जिसमें मुझे सुख और दुःख दोनों की अनुभूति हुई| तुम्हारे साथ बिताये हुए सुख के पल यदि रोमांचित करते हैं तो दुःख के पल भी आनंद ही देते हैं| इस पर मैं एक शेर कुछ इस तरह कहना चाहता हूँ:

                                        तेरे पहलू में जो बीते मेरे पल हैं मेरे लिए अनमोल
                                       ये लो तेरे सामने राज दिया मैं अपने दिल का खोल

तुम भविष्य के तरफ जिस अंदाज़ से देखती हो मैं ठीक उसी अंदाज़ में अतीत की तरफ देखता हूँ| मेरी नज़र में मेरे अतीत की शुरुवात और तुम्हारे भविष्य का अंतविंदु एक ही है| तो फिर हमारे जिस्म के दरम्याँ वर्तमान में इतनी दूरी क्यूँ है? हमारे रूह के दरम्याँ इतना सन्नाटा क्यूँ है? हमारे साँसों के दरम्याँ इतनी ठंढी क्यूँ है? तुम से रुख़्सत के वक़्त मैंने अतीत से जुड़े रिश्ते का एक धागा बुना था| उस धागे के एक सिरे को मैं अब भी पकड़ा हूँ और दूसरा सिरा तेरे इंतज़ार में अब भी सज़दे में झुका है| ग़र तुम भूल गई वो वाक़्या तो लो मैं तुम्हें याद दिला देता हूँ

                       मैंने तो तुझसे रुख़्सत के वक़्त अतीत को वर्तमान से जोड़ना चाहा था
                        मगर पता नहीं क्यूँ तुम्हारे दिल में मेरे लिए सिर्फ फैला सन्नाटा था

तुम्हारे लिए अतीत से वर्तमान में आकर भविष्य में झांकना, खो जाना बहुत आसान प्रतीत होता है| क्या अतीत का प्रेम ऐसे मर सकता है? यदि हाँ तो वो प्रेम नहीं महज एक छलावा है| और यदि नहीं तो क्यूँ तुम्हारे आखों के अश्क़ सूख गए? लब ख़ामोश हो गए? जिस्म रूह विहीन हो गए? संवेदनाओं में कोई कराह नहीं? आवाज़ में कोई आह नहीं? इशारों में कोई आहट नहीं? मौन में कोई चीत्कार नहीं? सन्नाटे में कोई शोर नहीं? तुम्हें यकीं न हो तो न हो मगर मैं तुम्हारे रूह को हर वक़्त ढूंढता हूँ:

                                       तेरे रूह की खोज में मैं खुद ही कहीं खो रहा हूँ            
                                     ये लो तुम्हारे ही बनाये कब्र में अब मैं सो रहा हूँ    

तुम्हारे सुनहरे भविष्य की सबसे छोटी कूद भी अतीत के सबसे ऊँची दीवार से भी ऊँची होती है| इसलिए कोई भी अतीत तुम्हारे भविष्य का रोड़ा नहीं बन सकता| तुमने अतीत की कई ऐसी दीवारें लाँघी हैं| खूब इल्म है तुमको ऐसे कूदने का|

                               लाँघो हर प्रेम की दीवार कि तेरे लिए तो हैं आसमाँ हज़ार
                              तुम क्यूँ कर याद करो उस अतीत को जो रिश्ता था बीमार
                               बाहों की वो कैची होती थी और होती थीं अपनी आँखें चार
                               जब प्रेम ही था झूठा तो अब क्यूँकर इसपर करना विचार

मुझे अब भी मेरा हर अतीत प्यारा है| तुम भी याद करो, अपने सीने में अपना दिल रखो, रूह को स्पर्श करो, शायद कुछ याद आ जाए| हाँ जब भी तुम ऐसा करना, अपनी आखें बंद रखना| खुली आखों से तुम्हें अतीत में तो सिर्फ ग़ुबार ही दिखता है| उस अतीत को याद कर तुम्हारी स्मृति में ये शेर:

                            क्यूँ मैं अब भी अतीत के झूले में झूल रहा हूँ इसका मुझे पता नहीं
                           किसी अतीत का इतना व्यसन भी किसी के लिए होता अच्छा नहीं