Thursday, 8 September 2022

लहू कभी उबलता नहीं

रास्ते बदलते हैं  मगर वाक़ि'आ बदलता नहीं 
कि क्यूँ बुलंदी से फ़ासला कभी बदलता नहीं 

ठोकर मारी गले लगाया  कोई वास्ता न रखा    
वो एक ऐसा पत्थर है जो कभी पिघलता नहीं 

शम'-ए-महफ़िल उसके सामने लाया ही नहीं  
वो ज़हर पीता तो है मगर कभी उगलता नहीं 

सहरा रात तन्हाई मोहब्बत कई ज़माने देखे  
इश्क़ ऐसा समंदर है जो कभी मचलता नहीं 

सुबह दोपहर शाम रात बस जलता रहता है 
लहू में ये कैसी ठंढक है कभी उबलता नहीं

न तो चलने सलीक़ा  न ही मंज़िल का 'उबूर      
ठोकर भी खाता है और कभी संभलता नहीं 

यार की बातें प्यार की बातें तकरार की बातें 
कैसा दिल है की "धरम" कभी बहलता नहीं 

Saturday, 20 August 2022

फिर कोई चुभन खलती नहीं

सुकून को जब दिल में क़ैद किया तो एक दरार उभर आया
वा'दा-ख़िलाफ़ी का ख़याल आया तो एक क़रार उभर आया

उस एक आवाज़ पर सीने में मातम छा गया गला भर आया  
औ" साथ इसके  दिल में यादों का  एक मज़ार  उभर आया
 
मुफ़लिसी हो या हो कोई और दौलत तन्हा कभी नहीं आया  
दामन का दाग से ये एक कैसा रिश्ता बे-क़रार उभर आया
 
क़ुदरत ने रिश्ता 'अता किया औ" दो रूहों ने सींचा उसको 
फिर क्या बात हुई साँसों में क्यूँ नज़रों में ग़ुबार उभर आया
 
वो एक चिंगारी थी मगर रूह को उसकी तपन अच्छी लगी 
कि बाद इसके ख़ुद को जलाने का  एक शरार उभर आया
  
वक़्त का जब ढ़लान देखा तो फिर कोई चुभन खलती नहीं 
औ" ता-उम्र के लिए 'धरम' दिल में एक सहार उभर आया    

Monday, 8 August 2022

कब रिश्ते को दौलत-ए-ईमान दे सका

कि साँसों का ग़ुलाम  तख़ईल को कब उड़ान दे सका
ख़ुद को सफ़र में  कब वो जरुरत का सामान दे सका   

बस एक चिंगारी उठी औ" दिल सुलगकर जलने लगा  
न दिल को संग बनाया न कोई 'इल्म-ए-वीरान दे सका

रूह को दिल में क़ैद करना एक क़त्ल से कम न रहा 
दिल-ए-सल्तनत  रूह को कब कोई फ़रमान दे सका

इश्क़ में या तो क़त्ल हो जाना या फिर क़त्ल कर देना 
अलावा इसके ख़ुद को कोई और न अरमान दे सका 

साँसों में साँसें क्यूँ उलझी क्यूँ सीने में मर्ज़ उभरता रहा 
इसका न कोई तबीब ही हुआ न कोई दरमान दे सका
  
"धरम" रूह में झाँका  दिल में उतरा  साँसों में समाया 
बाद इसके भी कब रिश्ते को दौलत-ए-ईमान दे सका 

Thursday, 4 August 2022

क़त्ल दुबारा कर दिया

सीने में ख़ुद ही से दिल को किनारा कर दिया
नज़रें जब मिलीं एक धुँधला नज़ारा कर दिया
 
एक ही क़त्ल पर  जवानी  कहाँ ख़त्म होती है   
आगोश में फिर लेकर क़त्ल दुबारा कर दिया
 
सर पर ताज रखा फिर अंदाज़-ए-नायाब रखा
जलाकर ताज चार सू नायाब शरारा कर दिया

घूँट में समंदर पिया  अश्क़ से फिर बना दिया
अंदाज़ा अपने कद का  ऐसे इशारा कर दिया

जनाज़ों की सीढ़ी  इंसां के लहू में तैरता तख़्त
हरेक क़त्ल  सर-ए-महफ़िल गवारा कर दिया

लेकर साँस मेरे सीने की  तेरे सीने में डाल दी
जो मेरा था "धरम"  उसको तुम्हारा कर दिया

Monday, 1 August 2022

वो ताज पिघलाता रहा

जब उड़ाकर ग़ुबार इंसान आईना देखता रहा 
शक्ल तो धुँधली रही मगर चेहरा दिखाता रहा

रिश्ता जब दफ़्न हुआ  एक कसक बचती रही  
क़ब्र की ज़मीं छोटी रही मुर्दा पैर फैलाता रहा   
  
जब मायने  उनके क़त्ल के  मुर्दों से पूछा गया   
हर ओर फैली ख़ामोश रही हल्क़ सुखाता रहा

आग़ाज़-ए-इश्क़ की चिंगारी बुझने के बाद भी 
वो एक तपन होती रही जो दिल सुलगाता रहा 

बुलंदी तब मिली जब आसमाँ और ऊँचा हुआ 
ख़ुर्शीद अपनी उम्र तक वो ताज पिघलाता रहा 

हुस्न को बुलंदी पर "धरम"  तन्हाई खलती रही 
जिस्म से लिपटने को   एक साया लहराता रहा 

Saturday, 23 July 2022

ख़ुद से एक भी चराग़ बुझा न सका

क्यूँ कभी एक भी दर्द  इंतिहा तक  आ न सका 
ऐसा क्यूँ की एक भी साँस सीने में समा न सका
 
यूँ  ख़ून-ओ-पसीना  साथ-साथ कई बार निकला 
कभी अपना ख़ून अपने पसीने से मिला न सका
 
चेहरे के एक-एक हर्फ़ को पढ़ा भी  भुलाया भी  
मगर एक भी हर्फ़-ए-ख़ुफ़्ता कभी भुला न सका 

किसी का कद बढ़ा दिया किसी का छोटा किया 
मगर एक कद को वो दूसरे कद से मिला न सका 
 
यूँ तो अनगिनत लम्हें दिल की पनाह में थे मगर  
किसी एक भी लम्हा को  सुकूँ से  सुला न सका 

यूँ तो वो सारा चराग़ हवा की ज़द में न था मगर 
कभी ख़ुद से 'धरम' एक भी चराग़ बुझा न सका 

Thursday, 21 July 2022

एक ऐसा भी सहारा कर लिया

उस एक बिखरी याद से जब किनारा कर लिया 
बज़्म में गया भी नहीं मगर हाँ नज़ारा कर लिया
 
कि शिकस्त-ओ-फ़त्ह का ख़याल आया ही नहीं  
जब उस शख़्स से  मोहब्बत  क़ज़ारा कर लिया

दुश्मन के कंधे पर सर रखा फिर न ख़बर रखा 
ज़िंदगी में कभी  एक ऐसा भी सहारा कर लिया 
 
दरमियान दो दिलों के जब फ़ासला बढ़ता गया  
वो नज़र झुकाने से पहले एक इशारा कर लिया 

जहाँ बैठे थे मुंतज़िर सारे  क़यामत के दीदार में 
जब वहाँ शरीक हुए दिल को आवारा कर लिया 
 
जब दश्त-ब-दश्त बीतता गया तन्हाई बढ़ती गई  
तब सफ़र में "धरम"  ख़ुद को पुकारा कर लिया


Sunday, 17 July 2022

वो कैसा मआ'ल था

न मैंने कभी  बुलाया था  न ही  तुम ख़ुद  आये थे 
वो एक  लम्हें की बेबसी थी  वो कैसा विसाल था 
 
राख हो चुकी  सारी यादों  को हवा  उड़ा रही थी 
दिल में  तिरे कैसी  अगन थी वो कैसा ख़याल था 
 
अश्क़ औ" लहू   एक दूसरे के  क़र्ज़दार बन गए 
 ख़ुद से  वो कैसी गुफ़्तगू थी   वो कैसा सवाल था 

ख़ामोशी की उम्र दराज़ हुई चीख सुकूँ से सो गया 
दरमियाँ ज़िंदगी और मौत के वो कैसा मआ'ल था 

तन्हाई की  क़ब्र पर  उपजी और  फैलती  ज़िंदगी 
सुकूँ को  बेचैनी पर  "धरम" वो  कैसा  'अयाल था  

Friday, 15 July 2022

काग़ज़ ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जायेगा

समंदर की  ख़ामोशी  अपनी गहराई को  बयाँ करती है 
औ" उसके बवंडर की दास्ताँ  दूसरे की  ज़बाँ करती है 

जब इश्क़ होता है तो प्याला-ए-हुस्न बे-वजूद हो जाता है 
ख़ुलूस-ए-दिल से जलाई गई आग अँधेरा कहाँ करती है 

क़लम की दौलत है तो काग़ज़ ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जायेगा 
दास्ताँ इसकी हर संग पर लिखी बातें यहाँ-वहाँ करती है 
 
उलफ़त के लफ़्ज़  बंद क़िताबों में  क़ैद  नहीं रह सकते 
दास्ताँ इसकी  धरती आसमाँ  औ" सारा जहाँ  करती है 
 
इंसाफ़ का सिर्फ़ एक तराजू  औ"  हर तन से  जुदा सर   
बड़ी शिद्दत से  इंतिज़ार "धरम" नज़र-ओ-जाँ करती है   

Saturday, 9 July 2022

कोई और इनाम नहीं देंगे

क़त्ल को इलाही ये  क़त्ल का नाम नहीं देंगे 
ये हुक्मरान अब तो कोई भी पैग़ाम नहीं देंगे 
 
सज्दे में गर्दनें  झुकी रहेंगी  क़त्ल भी  होंगी 
अलावा ज़ब्र के  कोई और  इनाम  नहीं देंगे 
 
करम की  बातें होंगी  होंठ भी  सिले जाएँगे  
ख़ुद आपको  आपका ही   कलाम नहीं देंगे 

आपके लहू की क़ीमत किसी मोल का नहीं        
आपकी शहादत पर भी वो सलाम नहीं देंगे 

न शिकस्त न फ़त्ह न ही दरमियाँ  की बुलंदी
हाथ थामकर भी 'धरम' कोई मक़ाम नहीं देंगे