Wednesday, 30 January 2013

मैंने अपनाया है


बिखरे हुए रेत को मैंने फिर से सजाया है
वो लौट आई तो मैंने उसे फिर से अपनाया है
हाँ उसकी यादों को मैंने रह-रह के भुलाया है
मगर वो जब भी तन्हा थी उसे मैंने हँसाया है

Friday, 25 January 2013

इमां टूट गया


जिक्र-ए-यार हुआ
और ज़ख्म हरा हुआ
हाय! ये तेरी याद ने
सारे ग़म रौशन कर दिए

हुस्न भी था इश्क भी था
और मेरी वफाई भी थी
हाँ तेरे ही दिल में
मगर कुछ रुसवाई भी थी

दरख्त से कोई जवाँ पत्ता
बेमौसम क्यूँ टूट गया था

लहर तो यूँ उठा मानो मैं समंदर था
देखी तेरी वफाई तो कतरा भी न रहा
वो थी उसकी वफाई भी थी  "धरम"
मगर अब मेरे हिस्से उसका वो इमां न रहा




Wednesday, 16 January 2013

चंद शेर

1.

मुलाकात का मसला है 
जज्बात का मसला है 
दिल फिर से फिसला है 
मगर न जाने क्यूँ 
कदम पत्थर सा हो गया 
अब आगे बढ़ता ही नहीं

2.

मेरे मरने के बाद याद आई मेरी यारी 
वह रे तेरी यारी वह रे तेरी तलबगारी

3.

हिज़्र का फिर से मौसम आया 
वो तन्हा रोया ज़ार-ज़ार रोया 
अश्क की बूंदें समेटी 
नाम-ए-यार लिख दिया 
जीनतकद: वीरां हो गया 
दिल फिर से परीशां हो गया 

जीनतकद:- प्रेयषी का घर

4.

वो जो चाँद बन के मिली थी तू 
तू अज़ीज थी मेरे करीब थी 
ये गिला तुझसे क्यूँ हो गया
मेरा चाँद तन्हा फिर हो गया

5.

पुराने वादों का सफ़र अभी बाकी था
वो फ़िक्र-ए-यार भी अभी बाकी था 
मैं चला गया था अकेले उस गली की तरफ 
जहाँ उसके साथ जाना अभी बाकी था

6.

उदासी चेहरे से उसकी छुपी ही नहीं 
नज़र यूँ झुकी कि फिर उठी ही नहीं
वो खुद परेशां थी जुबां भी खामोश थी 
बस सिसकियों ने ही तो कुछ कहा था 
अश्क था या समंदर पता ही न चला 
गहरा इतना कि मैं माप ही न सका 
मैं बहता चला गया संभल ही न पाया 
डूबने लगा तो सहारा उसके बाहों का ही था







Sunday, 6 January 2013

चंद कदमों का सवारी


उम्र भर का साथ
रक्खा तो सही उसने निभाया ही नहीं
मिलकर साथ चले थे
मैं गिर पड़ा उसने उठाया ही नहीं
मैं खुद उठा चल पड़ा पास पहुंचा
मेरी आहट को उसने पहचाना ही नहीं

मेरा भरम अभी जिन्दा था
सामने ही मेरे वो परिंदा था
हाथ पकड़ा नाम पूछा
झटका हाथ मेरा और जुबां खामोश

मैं उसके साथ था खामोश था उदास था
अचानक एक और लम्हा आया
हलक में जाँ मेरी अटक गई थी
वो गैरों की बाँहों में लिपट गई थी

मेरे जज्बात पर हुस्न उसका भारी था
मैं तो बस चंद कदमों का सवारी था

Monday, 31 December 2012

फ़कीरी

जब तलक फ़कीरी मेरे साथ है 
किसी ग़म का न मुझे एह्शास है 
मुफलिसी दूर रहती है मुझसे 
अमीरी से मेरा कोई वास्ता नहीं 

चेहरे पर अब कोई फ़िक्र नहीं है 
ग़म का भी कोई जिक्र नहीं है 
मैं यूँ ही जमीं पर लेट जाता हूँ 
आसमां के तारे गिनता रहता हूँ

Thursday, 27 December 2012

"मूड आई "


आई आई टी बॉम्बे का "कल्चरल फेस्ट "
जी हाँ  यह "मूड इंडिगो "  है
किस "कल्चर" का "फेस्ट" है यह
मुझे पता ही नहीं चल पाया
और पता चले भी तो  कैसे
पहले कभी ऐसा देखा भी न था

कई तरह की  सुंदरियों के हुजूम थे
कुछ "मिनी स्कर्ट्स " में तो
कुछ "माइक्रो स्कर्ट्स " में थे
मेरे एक साथी ने कहा
अब तो नेनो का ज़माना है

अपने जीवन में इतनी सारी सुंदरियाँ
और वो भी  इतने कम कपडे में  
जी हाँ .. मैंने आज तक न देखा था

देशी बोल और उस पर बिदेशी धुन
शायद गधा भी इतना बेसुरा न हो
सिर्फ इतना ही नहीं
उस धुन पर लोगों का बेवाक हो जाना
कभी उछलना कभी झूमना
और कभी "यो - यो " करना
और भी कई तरह की हरकतें

षोडशी बालाओं का तो कुछ कहना ही नहीं
"फेविकोल" से चिपकने वाले गाने को
पूर्ण रूपेण चरितार्थ करते हुए
सबों का मनोरंजन कर रही थी


सुना था आई आई टी बॉम्बे का
"एक्सपोजर" बहुत अच्छा है
जो अब कुछ दिख भी रहा है
जी हाँ , दो साल मैंने
आई आई टी खड़गपुर में भी बिताया
"एक्सपोजर" वहां  भी था मगर
 वाकई बॉम्बे के जितना न था


Sunday, 16 December 2012

मेरा कद


पुस्तैनी मंजिल की सीढ़ी चढ़ा था
एक सुखद एहसास हुआ
यहाँ तो हर पीढ़ी चढ़ा था
नक़्शे-पॉ ढूंढने लगा था मैं
बुजुर्गों के कद से
मेरा कद छोटा लगा था

Friday, 14 December 2012

चंद शेर


   रात का जुगनू कितना रौशनी लुटायेगा 
   प्यास समंदर का हो तो क्या कतरा बुझा पायेगा
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  अब तो मयखाना भी सुकूँ नहीं देता 
  जिक्र-ए-जम्हूरियत वहाँ भी होने लगा
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   मेरे घर के दीवारों से भी 
   मुफलिसी दिखाई देती है 
   प्लास्टर सारे झड़ गए हैं
   अब सिर्फ ईट दिखाई देती है
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  इश्क में खाई शिकस्त याद आ गई 
  एक बार फिर उसकी याद आ गई
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  मैं तन्हा था अकेला था ठीक था 
  भीड़ में निकला तो लोगों ने लूट लिया
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  सागर के किनारे बैठा जलजला का खुराक हो गया 
  उसको चाहने वाला आज सुपुर्द-ए-खाक हो गया 
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  एक अजब दास्ताँ कुछ यूँ हुआ 
  अपने मकाँ को वह समाँ कह गया 
  औरों के दुकाँ को मकाँ कह गया
  नज़र मिली तो उसने नज़र झुका ली 
  और झुकी नज़र से ग़म-ए-दास्ताँ कह गया
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  मेरा भरम अभी रहने देना 
  तुम जब भी मुझको देखो 
  थोड़ा मुस्कुरा देना 
  मेरा भरम अभी रहने देना

Sunday, 9 December 2012

एक अनुभूति


जज्बात की लाठी का खटखट
और फिर उसके आने की आहट
मानो ठंढी हवा का बदन से लिपटना
और फिर वो सिहरन जो सुकूँ देता हो

ख़ामोशी की जुबां
मानो कह रहा हो
लिपट कर चूम लो मुझको

सलोनी चेहरे की ख़ुशी
नज़र का थोड़ा झुकना
फिर यूँ ही कुछ बुदबुदाना
मानो कुछ कहना भी
और कुछ ना कहना भी

उसके हाथ पर अपना हाथ रखना
उसके कंधे पर अपना सिर रखना
ठंढी सासें लेना
और फिर खो जाना
दूर कहीं सितारों में

Saturday, 8 December 2012

तुम सिकंदर हो


मुकद्दर का फैसला है
तुम्हें मानना ही पड़ेगा
तुम सिकंदर हो
तुम्हें जीतना ही पड़ेगा

तुम क्यूँ फंस रहे हो कतरे में
जब दरिया खड़ा है तेरे दीदार के लिए
भुला दो, वो कल की बातें थी
देखो समंदर लहरा रहा है तेरे इंतज़ार में