Wednesday, 26 February 2025

बची मेरी उमर न थी

बात ऐसी कौन सी थी जिसकी उसे ख़बर न थी 
मगर मेरे क़द-ओ-क़ामत की कोई क़दर न थी
 
किसी तंग-दिल की मुंसिफ़ी थी क्या ही कहना      
इतनी लम्बी सज़ा जितनी बची मेरी उमर न थी
   
जो इश्क़ के परिंदे थे मौसम ढ़लते ही चले गए 
वहाँ अब परिंदों के उड़ने की कोई लहर न थी

आँखों से आँखें तो मिली मगर दिल मिला नहीं  
कोई भी मुलाक़ात  कभी ऐसी ज़ख़्म-गर न थी

फ़ासला बस दोनों को हाथ मिलाने भर का था  
मगर वो कदम भर की दूरी भी मुख़्तसर न थी

आँख से ओझल था मगर हर वक़्त नज़र में था  
उसके नफ़रत की तो कोई पैक-ए-नज़र न थी

बुलंदी अक्स ने पाई  जिसे तारीक़ी निगल गई
उसकी शख़्सियत 'धरम' सफ़र-ए-हज़र न थी   
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ज़ख़्म-गर : ज़ख़मी करने वाला/वाली 
पैक-ए-नज़र : दृष्टि की सीमा
शख़्सियत : किसी व्यक्ति का अस्तित्व या व्यक्तित्व
सफ़र-ए-हज़र : हर समय 

Saturday, 15 February 2025

दिल में न कोई ऊल-जलूल रख

ग़र सर पर ताज़ रख  तो ताज़ पर थोड़ी सी धूल रख 
अपने वतन की धूल-मिट्टी के लिए शख़्त उसूल रख

दरिया को रास्ता बताना है  रुख़ हवा का बदलना है
मुफ़लिसों के हुक़ूक़ का हमेशा  रहनुमा-उसूल रख 

यह मु'आमला मज़लूमों का है चाँद-सितारों का नहीं  
फ़ैसला देने वक़्त सामने अपने चेहरा-ए-मक़्तूल रख

ख़ाक से मोहब्बत करनी है  ये राह कुछ आसाँ नहीं      
आँखों में समंदर रख इरादा ख़िलाफ़-ए-मा'मूल रख

ये क्या बात करते हो बात चाँद-ख़ुर्शीद की करते हो             
ग़र इश्क़ है तो सारे शर्त भी मुम्किन-उल-हुसूल रख
 
इस रिश्ते की नींब 'धरम' एक बात एक ईमान से है     
तूने अब ज़बाँ दी है दिल में न कोई ऊल-जलूल रख      
   
 
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रहनुमा-उसूल : क़ानून 
मक़्तूल : मृतक/क़त्ल होने वाला
ख़िलाफ़-ए-मा'मूल : असाधारण, ग़ैरमामूली
मुम्किन-उल-हुसूल : जिसको प्राप्त करना संभव हो
ऊल-जलूल : बेमानी 

Tuesday, 11 February 2025

हर किसी को वर्ग़ला देते हैं

मसीहाई के सबूतों को  बर-सर-ए-'आम जला देते हैं 
फ़िर ख़ुदाई की बात पर हर किसी को वर्ग़ला देते हैं

फ़िज़ा में ख़ामोशी है  ज़ब्र कुछ इस कदर से तारी है 
मज़दूरी की बात पर पसीने को पानी में मिला देते हैं

ये तज़ुर्बा ये इल्म ये अदाकारी सब को हैराँ करते हैं   
पहले ख़ूब हँसाते हैं बाद उसके ता-उम्र रुला देते हैं

ज़िंदगी-मौत का खेल है तहज़ीब-ओ-तमाशा देखिए   
जीतने वाले को ब-तौर इनाम ये दश्त-ए-बला देते हैं

अपने हक़ की बात कीजिए फिर ये रिवायात देखिये   
ताज़ शराफ़त का रखते हैं फ़ैसले में बद-बला देते हैं
     
यहाँ दिल लगाने की बात "धरम" कभी मत कीजिए 
यहाँ लोग ऐसे हैं जो रोज़ क़त्ल करते हैं भुला देते हैं

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बर-सर-ए-'आम : सबके सामने
दश्त-ए-बला : desert of calamity
रिवायात : traditions
बद-बला : जान के लिए मुसीबत

Wednesday, 5 February 2025

जो शक़्ल पर कतीब था

काँटों से घिरा दिल था उसका बंज़र नसीब था 
न तो दिल-ए-खुशफ़हमी थी न ख़ुदा क़रीब था

क्या कह के पुकारते कि मुआमला अजीब था 
नुमाइश-ए-इश्क़ में गले पर दाग़-ए-सलीब था 

ज़बाँ खुली ही नहीं कि मु'आमला-ए-हबीब था 
फिर कहीं बिछड़ न जाये कुछ ऐसा नहीब था
   
रास्ते का कुछ ख़याल ही नहीं  ऐसे कबीब था
जहाँ से भी गुज़रा वो राह उसका अर्रक़ीब था

छुपाना भी मुश्किल था कि दिल ही लहीब था
वो हक़ीक़त था ऐसा  जो शक़्ल पर कतीब था

कि उन बातों का ही क्या  जो माज़ी-क़रीब था
वो गुज़रा ज़माना भी "धरम" कितना ग़रीब था  
   
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नहीब : भय, डर, आतंक
कबीब : औंधे मुंह पड़ा हुआ
अर्रक़ीब : रक्षक/ईश्वर का एक नाम
लहीब : अग्नि-ज्वाला, लपट, शोला
कतीब : लिखा हुआ
माज़ी-क़रीब : बीता हुआ समय या काल

Sunday, 26 January 2025

उजड़े दयार में रहने का

अजब इल्म है  दिल के दरार में रहने का
कि ता-उम्र एक उजड़े दयार में रहने का

'इल्म-ओ-फ़न को परखना  बोली लगाना  
अजब तौर-तरीका है  बाज़ार में रहने का

दौलत आबरू तबी'अत कुछ तो गँवाइये  
ऐसे ही नहीं मिलता अख़बार में रहने का

यहाँ से निकलना है औ" दश्त में जीना है     
जी नहीं करता यूँ चार-दीवार में रहने का

न कोई बिसात न कोई मोहरा खेल कैसा
फिर भी ख़ुद ही से तू-तुकार में रहने का

ज़मीं पर आओ अब कुछ बंदगी कर लो          
कब तक 'धरम' यूँ इश्तिहार में रहने का

Saturday, 18 January 2025

बयाबान बिफरने लगा

कुछ दूर तो वह सीढ़ी से चढ़ा फिर उड़ान भरने लगा  
मंज़िल तक पहुँचा भी न था की आसमान गिरने लगा

ग़म-गुसारों की महफ़िल थी  दिल जलने के किस्से थे  
कुछ देर तो वह ख़ामोश रहा  फिर बयान करने लगा

ज़ख़्म भी भर चुका था चमड़ी भी नई निकल आई थी   
वक़्त ने कुरेदा तो  फिर से  कुछ निशान उभरने लगा
 
बात मोहब्बत से करनी थी  बात इश्क़ की करनी थी 
सामने बस बैठे ही थे कि दिल में तूफ़ान गुज़रने लगा

पहले एक साया दो रूहों से अलग-अलग मिलता था    
अब वही साया दोनों रूहों के दरमियान उतरने लगा

दरख़्त की छाँह में 'धरम' हाथ मिलाया दिल-लगी की   
फिर दोनों को तन्हा देखा  तो बयाबान बिफरने लगा 

Monday, 13 January 2025

चेहरे पर जवाब बहुत गहरा है

लब की बात क्या कहें लब पर ख़ामोशी का पहरा है
आँखों झुकी रहती है चेहरे पर जवाब बहुत गहरा है

ख़ुदाई फिर से लौटेगी वक़्त को थोड़ा और ढ़लने दे 
लम्बे वक़्त तक पानी भला किसके दर पर ठहरा है

बात उसके मतलब की थी ही नहीं हवा में उड़ गई 
अपने लफ़्ज़ों को ज़ाया मत करो वह अभी बहरा है

बातें सितम की हो या सनम की हो कोई फ़र्क़ नहीं    
अपनी फ़िज़ा में तो बस ख़ल्वत है दश्त है सहरा है

एक बेचैनी सी है दिल में यादों की क़ब्र ज़ेहन में है   
सीने में उठी महज़ लहर है या कोई दर्द सुनहरा है

कि सिर्फ़ वीरानी थी वहाँ कोई जज़्बात था ही नहीं     
दिल का क्या कहें "धरम" दिल ता'मीर-ए-सहरा है 

Sunday, 12 January 2025

बात डूब जाने की थी

वो बात कहाँ कोई कदम साथ रखने या उठाने की थी 
दरमियान दोनों के जो भी बात थी सिर्फ़ ज़माने की थी

कि समंदर तैर भी जाते मगर हासिल क्या ही होना था   
कि शुरू से ही  बात जब एक दूसरे को भुलाने की थी
    
इश्क़ मोहब्बत फ़रियाद तकल्लुफ़ कुछ भी बचा नहीं 
सब जलकर राख हो गया बात इसी आशियाने की थी

शाख़ें दरख़्तों की कट गई  घर परिंदों का उजड़ गया
बस जरा सी बात थी बात परिंदों के चहचहाने की थी

मिलें तो नज़र चुराना राख़ यादों का फूँककर उड़ाना   
अब दोनों में जो भी बातें बची थी  दिल दुखाने की थी

था तो वो एक समंदर मगर दोनों किनारा दिखता था
एक दरिया-ए-इश्क़ में "धरम" बात डूब जाने की थी  

Monday, 6 January 2025

एक धोखा था वहम था

ज़ंजीर सारे कागज़ के बने थे फंदा महज़ भरम था
कैसे कह दें की यह कोई सज़ा थी कोई सितम था

आसमाँ का झुकना  ज़मीं से मिलना हाथ मिलाना    
जब भी ऐसा देखा था  वह एक धोखा था वहम था

सदाएँ दिल को चुभती थी शक़्ल आँखें जलाती थी
कैसे कह दें कि साथ उसका फ़ज़्ल-ओ-करम था

यार पुराना वर्षों बाद मिला कैसी अजनबिय्यत थी    
मिलकर लगा ऐसा कि जैसे कोई दूसरा जनम था

कि वो हाथ मिलाना गले मिलना आँखें चार करना     
यह सब का सब तक़ल्लुफ़ यक़ीनन चार-ख़म था 
      
लिखी हुई कुछ बातें मिटाई भी गई जलाई भी गई   
ज़माने के निगाह में 'धरम' जो लौह-ओ-क़लम था 
 

फ़ज़्ल-ओ-करम : मेहरबानी-ओ-इनायत
चार-ख़म : कुश्ती का एक दांव
लौह-ओ-क़लम : तख्ती और उस पर लिखने का क़लम, वह तख्ती जिस पर भविष्य में होने वाली सारी घटनाएँ लिखी हुई हैं और वह लेखनी जिसने यह सब कुछ ईश्वर की आज्ञा से लिखा है

Wednesday, 25 December 2024

कोई बौना 'उरूज पाएगी

ख़ुशी जब भी आएगी मुहँ  टेढ़ा कर के आएगी 
औ" साथ अपने कुछ गर्द-ओ-ग़ुबार भी लाएगी
 
मुबारकबाद की शक़्ल में रात सियाही छाएगी    
रुत बहारों की आएगी  तो साँसें पिघल जाएगी

एक रूह दूसरे रूह से कुछ ऐसे दूरी बनाएगी      
ग़र नज़र से नज़र मिली  आँख बहुत जलाएगी

रौशनी अँधेरे में खोकर वुजूद अपना मिटाएगी  
रात ख़ुर्शीद को दिन निकलने से पहले खाएगी

हर ज़ुबान सिर्फ़  ख़ुद ही का गीत गुनगुनाएगी
बाक़ी कोई नज़्म शान में गुस्ताख़ी फ़रमाएगी 
   
ज़िंदगी की बुलंदी "धरम" किसी को न भाएगी   
ख़ुद को निगलकर  कोई बौना 'उरूज पाएगी