सुबह का नाश्ता लिया भी नहीं
काम का वक़्त हो चला था
कुदाल कंधे पर लेकर वह
खेत की ओर चल पड़ा
मिट्टी कोड़ना कोई आसन काम नहीं
हर एक प्रहार पर वो उतना कटता था
जितनी की मिट्टी नहीं कटती थी
उस मिट्टी से उसका माँ का रिश्ता था
वो जानता था माँ अपने बच्चे को
कोई भी कीमत अदा कर के पालती है
हम सब इस मिट्टी की संतान तो हैं
और वो आंसू पोछ लेता था
वक़्त हो चला था मिट्टी को पानी पिलाने का
मिट्टी भींगी है सेंधी खुसबू बिखेर रही है
वह मिट्टी में पूरा यूँ सना हुआ था
जैसे मानो माँ की आँचल से लिपटा हो
अब बारी थी बीज छिडकने की
बीज भी तो मिट्टी के अंक से ही निकला था
फसल यूँ लहलहाया जैसे कह रहा हो
भला माँ भी कभी अपने बच्चे से नाराज़ रहती है
अब वक़्त है फसल काटने का
मिट्टी खुश है,अपने बच्चे का आहार देखकर
वह खुश भी है और थोडा सिसक भी रहा है
इस फसल के बाद उसे ही तो
फिर से चीरना है मिट्टी के सीने को