Saturday, 20 July 2013

क्यों सो रहे हो...

मेरा मन न जाने कहाँ खो रहा था
ऐसा लगा कि मै अचानक सो रहा था
फिर संचार हुआ एक शक्ति का
मन में भाव आया एक भक्ति का

ऐसा लगा जैसे कि कोई कह रहा हो
और मेरे ही साथ जैसे रह रहा वो
कहता है, तुम मानव हो
तुम ही हो मेरे विशिष्ट कृति
तुम्हारी अनुपम है प्रकृति

फिर क्यों ये खेल खेला जा रहा है
मानव से मानव को तौला जा रहा है
मैंने तो सबको बनाया था समान
फिर क्यों होता है किसी का अपमान
मानवता सब जगह हो रहा है खंडित
निर्दोष क्यों हो रहे हैं दण्डित

अपनी मर्यादा का कुछ तो भान करो
मेरे इस कृति का कुछ तो सम्मान करो
बंद करो यह लूट-पाट
बंद करो यह जात-पात
बंद करो यह रंग-भेद
बंद करो यह लिंग-बिभेद
इतना कह कर वो हुए गंभीर
और मैं फिर हो गया अधीर
अगले ही पल वे विलीन
मेरा ही तेज कुछ हुआ मलीन

ऐसा लगा कि कोई झकझोर गया है
लगा अपनी भुजा का मुझ पर जोर गया है
मैं हो गया पुनः कुछ अशांत
और मन भी हो गया कुछ अधिक क्लांत...

परिवर्तन... सही या गलत

जग बदला , मन बदला , बदला जमाना कुछ ऐसा
नकली सोने को भी कहे, लगता है यह असली जैसा
लोग कहे पुरानी सभ्यता को , है यह कैसा पिछड़े जैसा
पुरानी संस्कृति के संस्कृत को , कहता है यह पिछड़े जैसा

सभ्यता गोरों का है इनके लिए आदर्श
नहीं चाहिये इनको किसी सभ्य बुजुर्ग का परामर्श
कहते हैं बदलते समय में हो रहा इनका उत्कर्ष
व्यवशायिक जिंदगी में ये तो हैं बहुत दुर्घर्ष

जिंदगी के ख्याल में है इनका अपना स्वछन्द विचार
पुरानी सभ्यताओं का बोझ इनको लगता है अत्याचार
धार्मिक स्वतंत्रता का जग में करना है इनको प्रचार
जात-पात और धर्म से उपर उठकर इनका है अपना विचार

संतुष्टि हो तन की या संतुष्टि हो मन की
संतुष्टि हो अपनेपन की या संतुष्टि हो धन की
नहीं चाहिये कोई बंदिश अपने उपर इनको
अन्यथा हो जाएगी रंजिश आपके उपर इनको

कहते हैं मिलाना है इनको एक-दुसरे का रसायन
तभी हो सकता है इनका जाकर कहीं पाणी-ग्रहण
मिलाना है इनको एक-दुसरे के सोच की आवृति
नहीं चाहिये इनको किसी पुराने प्रथा की पुनरावृति...

गिद्ध और चमगादड़

गरुड़ की खाल ओढ़े गिद्ध
सभा में नाचता
मद में फूलता
घोर गर्जन कर
छुपाता अपने पैने नुकीले चोंच
लगा है रक्त मानव का

अनेक चमगादड़ हैं उसके जासूस
रात के अँधेरे में
चुपके से घर में घुसकर देखता
कहीं कोई भर पेट खाया तो नहीं

बिलखता भूख से बच्चा
माँ की गोद में सिसकियाँ लेता
बस खाकर स्नेह की थपकी
रात्रि के अँधेरे में खो जाता
पछताता
भला यह जन्म ही क्यूँ हुआ
देखकर ऐसी बात
तृप्त होता चमगादड़

चमगादड़ ढूंढता है
कहीं कोई हो ऐसा मानव
कि जिसने पाया भूख पर विजय
पाकर ऐसी विलक्षण बात
भला चमगादड़ तब क्यूँ  छुपा रहता
सटकर कान से मानव के गुजरता
फुसफुसाता धमकियों भरा शब्द
और कराता अपने होने का एहसास

मगर वह मानव भी अकड़कर बोलता
कि मैंने पा लिया अब भूख पर विजय
लपेटकर अपने पंख में चमगादड़
मानव को डराता
पहचानो इस घुटन को
हवा मुफ्त में नहीं मिलती यहाँ
चीरकर चमगादड़ के पंख
मुक्त होता मानव
लेता जीवन दायिनी स्वांस

करता आश्चर्य चमगादड़
कि इस मरघट में यह है कौन
वह चमगादड़, मानव के
उस नस्ल को नहीं पहचानता
उड़कर चला वह गिद्ध को बतलाने
कि मुर्दा बोलता है

Monday, 15 July 2013

गुजरा वक़्त

गुजरे वक़्त का एक भी पल हँसीं नहीं देता
मैं ग़म में डूब चुका हूँ कोई ख़ुशी नहीं देता

जलते चराग को हवा का एक झोंका बुझा गया
बुझा हुआ चराग कहीं कोई रौशनी नहीं देता

उसका स्पर्श अन्तः मन को शांति देता था
अब कोई भी स्पर्श वैसी अनुभूति नहीं देता

ज़माने ने मुझपे इतनी मेहरबानियाँ की है
की अब तो कोई ख़ुशी भी ख़ुशी नहीं देता


Wednesday, 26 June 2013

प्रकृति का अपमान

प्रकृति का अपमान करते जब नर-नारी
भुवन पर होता है तब अति विपद भारी
नरता जब होता है पशुत्व में परिणत
धरा पर दीखता है मानव छत-विछत

मानवता के नाम पर जब कोई लूटता है
घड़ा विष का तब कुछ यूँ ही फूटता है
गरल न सिर्फ मानव को ही लीलता है
धरा को भी कलंकित कर वह फूलता है

जब मनुज खुद लील लेता धर्म-ग्रन्थ
तब भला क्यूँ चुप रहें दिग-दिगंत
हर ओर भयंकर यूँ ही प्रलय होगा
देव-स्थल का मरघट में विलय होगा

चुपचाप सहेगा मानव जाति ये कोहराम
मुख से तो निकल भी न सकेगा हे राम!
हर ओर व्याप्त विलाप-क्रंदन होगा
कलयुग पर मानवता का रुदन होगा 

Tuesday, 11 June 2013

फेंका गया मुझे

हर बार मेरे ही ज़ख्म में पिरोया गया मुझे
जो कराहा तो फिर से सताया गया मुझे
अपने बदन के टुकड़ों को जो मैंने समेटा
तो फिर से दुगुने टुकड़ों में काटा गया मुझे

हर बार मेरे ही लहू में डुबाया गया मुझे
जो बच के निकला तो तडपाया गया मुझे 
जंग-ए-तख़्त-ए-सियासत में यहाँ  
अपनी ही मिट्टी से मरहूम किया गया मुझे

हर बार निगाह-ए-हिकारत से देखा गया मुझे  
जो नज़र मिलाया तो बेसबब झुकाया गया मुझे 
फरमान हद-ए-निगाह से दूर जाने का दे दिया गया
जो फिर से देखा गया तो नंगा घुमाया गया मुझे

हर बार मेरे ही आग में जलाया गया मुझे
जो बुझ गया तो फिर से सुलगाया गया मुझे 
कब्र-ए-मुक़र्रर की जमीं भी न दी गई "धरम"
जो मर गया तो काट के फेंका गया मुझे

Saturday, 8 June 2013

ख्वाब देखा

उजड़े घर में फिर से पुराना ख्वाब देखा
अमावास की रात में मैंने आफताब देखा
धडकता पत्थर फिर से दिल हो चला था
उसके लौटने का मैंने फिर से ख्वाब देखा

डूबने का डर

मुझे उसके जाने का डर लगा रहता है
ख्वाब में भी उसके पर लगा रहता है
वो मुस्कुराये फिर भी न जाने क्यूँ
मुझे अनजाना सा डर लगा रहता है

बातें उसकी मेरे समझ में नहीं आती
इश्क में भी गुरुर-ए-हुस्न नजर आता है
रिश्ता-ए-पाक-ए-मोहब्बत में भी "धरम"
मुझे तो अब डूबने का डर लगा रहता है

Saturday, 25 May 2013

"चंद शेर"

1.
आओ अब कहीं दूर चलें
बाँहों में बाहें डालें झूमें, इठलायें 
भर किलकारी खूब हसें 
सारे ग़म को झुठलायें 
आओ अब ...

2.

मुक्कमल है तुम फिर याद भी आओ 
मगर वो सिर्फ अजनबी अहसास ही होगा 
बेसबब तुम्हारे रूठने का सबब "धरम"
मेरे लिए तो सिर्फ बकवास ही होगा

3.

तन्हाई से डर नहीं लगता सूनापन काटता भी नहीं
दर्द खुद बन गया है दवा अब तो दिल दुखता भी नहीं

4.

सुलगता जिस्म था आखों में लहू उतरा था 
सीने को चीरकर दिल बाहर निकला था

5.

उस वीरां सन्नाटे को दिल से लगाया 
आहिस्ता आहिस्ता धड़कन ठहराया 
बहार की बू न आए उससे 
ये सोचकर दिल फिर घबराया ...

6.

उजड़े हुए खंडहर को महल बनाते हैं 
हम बीते हुए कल को वापस बुलाते हैं 
पुरानी बीती बातों को समेटकर अब 
हम फिर से अपना युगल बनाते हैं 

7.

दामन छूट भी जाये तो भी चराग-ए-इश्क जलाए रखना 
गर मन का दिया बुझ भी जाये तो दिल को जलाए रखना 

8.

समंदर के जैसा ही तेरा प्यार भी बेसहारा निकला 
देखने में तो दरिया था मगर चखा तो खारा निकला


Sunday, 5 May 2013

मिट्टी


सुबह का नाश्ता लिया भी नहीं
काम का वक़्त हो चला था
कुदाल कंधे पर लेकर वह
खेत की ओर चल पड़ा

मिट्टी कोड़ना कोई आसन काम नहीं
हर एक प्रहार पर वो उतना कटता था
जितनी की मिट्टी नहीं कटती थी
उस मिट्टी से उसका माँ का रिश्ता था

वो जानता था माँ अपने बच्चे को
कोई भी कीमत अदा कर के पालती है
हम सब इस मिट्टी की संतान तो हैं
और वो आंसू पोछ लेता था

वक़्त हो चला था मिट्टी को पानी पिलाने का
मिट्टी भींगी है सेंधी खुसबू बिखेर रही है
वह मिट्टी में पूरा यूँ सना हुआ था
जैसे मानो माँ की आँचल से लिपटा हो

अब बारी थी बीज छिडकने की
बीज भी तो मिट्टी के अंक से ही निकला था
फसल यूँ लहलहाया जैसे कह रहा हो
भला माँ भी कभी अपने बच्चे से नाराज़ रहती है

अब वक़्त है फसल काटने का
मिट्टी खुश है,अपने बच्चे का आहार देखकर
वह खुश भी है और थोडा सिसक भी रहा है
इस फसल के बाद उसे ही तो
फिर से चीरना है मिट्टी के सीने को