Friday, 6 January 2023

कुछ यूँ साँसों ने भी बोल दिया

तख़्त ने फ़रियादी के लहू को जब फ़िज़ा में घोल दिया
ज़माने ने उसके लहू को भी  पानी के मोल-तोल दिया  

कब वफ़ा की क़सम में बंधे एक चराग़ की लौ में जले  
कब तिरे दिल ने  मेरे दिल को  बराबर का मोल दिया 

वफ़ा-ए-इश्क़ को आँखों में उतारा सीने में दफ़्न किया  
फिर क्यूँ ज़माने के सामने  अपना कलेजा  खोल दिया   

वो वफ़ा की बात हुई एक चराग़-ए-वफ़ा जलाया गया  
फिर हर वफ़ा की राह में वीरान कोई एक जोल दिया

जब भी ज़बाँ ख़ामोश रही  तब चेहरा बस जलता रहा     
कुछ तो नज़रों ने कहा कुछ यूँ साँसों ने भी बोल दिया 
 
कि "धरम" तेरी बातें तेरी नज़र तिरा चेहरा तिरा जादू 
ख़ुदा ने पूरी काइनात को ये भरम ख़ूब अनमोल दिया

Wednesday, 21 December 2022

तिरा कहीं ठिकाना तो हो

दिलों के फ़ासले को मापने का कोई पैमाना तो हो   
मैं दो कदम चल भी लूँ  कोई अपना ज़माना तो हो 

किसी नज़्म को  ग़र शक्ल  देना भी हो तो कैसे दूँ
आँखों में कोई इल्म ख़याल में कोई फ़साना तो हो  

कलेजे से दिल निकालकर हाथ में लिए फिरता हूँ 
दिल दूँ भी तो किसे दूँ  कोई मुझसा दीवाना तो हो 

उस एक शाम के ख़ातिर कितने शाम को जलाऊँ 
कि ख़्वाब ख़याल नज़र तिरा कहीं ठिकाना तो हो  

रास्ता ख़त्म हो गया मंज़िल का कोई पता न चला  
कैसे कहूँ की होश में था  ऐसा कोई बहाना तो हो 

अपने चेहरे पर "धरम" अपना ही  चेहरा चढ़ाना  
ख़ुद को कभी इस तरह तन्हाई में सजाना तो हो 

Thursday, 17 November 2022

हर फ़ैसला मंज़ूर रहता है

कि हर वक़्त ख़ामोश रहता है नशे में चूर रहता है
ये दिल धड़कता तो है मगर बहुत मजबूर रहता है

इल्म है पहले इश्क़ करता है फिर क़त्ल करता है 
वो एक ऐसा क़ातिल तो जो बहुत मशहूर रहता है 

सादा काग़ज़ पर बिना वादा के दस्तख़त करता है    
वो कैसा शख़्स है  जिसे हर फ़ैसला मंज़ूर रहता है

जो आग़ोश में होकर भी  एक फ़ासले पर रहता है 
वो ऐसा मर्ज़ है जैसे बिना ज़ख़्म के नासूर रहता है  

गर्म साँसें थी  थोड़ी उलफ़त थी थोड़ा फ़साना था  
ये कैसा ख़्वाब है हक़ीक़त से हमेशा दूर रहता है  

"धरम" कितनी भी सफ़ाई से क्यूँ न मिलूं किसी से 
बाद मुलाक़ात के चेहरे पर  ग़ुबार जरूर रहता है 

Monday, 7 November 2022

सबका निवाला होने दे

कोई रौशनी को क़ैद न करे पूरा उजाला होने दे 
सरज़मीं जो भी पैदा करे सबका निवाला होने दे 

ऐ ख़ुदा कुछ और इल्म दे इंसानियत काफ़ी नहीं   
जिस्म को तू कर काशी दिल को शिवाला होने दे 

कि तख़्तनशीं ग़र भूल बैठे धर्म क्या है तख़्त का 
तू खींच ले रहमत अपनी उसका दिवाला होने दे 

हर्फ़ है या है ज़िंदगी तू कर फ़ैसला इंकार न कर 
ग़र तू नहीं तो ख़ुद को ख़ुद का रखवाला होने दे 

फ़िज़ा में घोलकर ख़ुशबू रंग बहार का दे 'धरम'
क़यामत तक इंसानियत का एक प्याला होने दे 

Tuesday, 25 October 2022

आख़िरी आदाब अभी बाक़ी है

नींद पूरी हो चुकी है  मगर ख़्वाब अभी बाक़ी है 
कि मौत के बाद का कुछ हिसाब अभी बाक़ी है

दिल धड़कने का कुछ सबब तो चाहिए ही हुज़ूर 
कि साँसों में थोड़ी सी जान जनाब अभी बाक़ी है 

दिल का हर मामला ख़ुद से एक जंग है ख़ुद का 
ख़ुद से  ख़ुद का आख़िरी आदाब अभी बाक़ी है 

दिन ढल गया रात निकल आई चाँद उग आया 
फिर भी आसमाँ में वो आफ़ताब अभी बाक़ी है 

हाथ भी थाम कर रखा फ़ासला भी बनाये रखा  
होश में हैं मगर आँखों में शराब अभी बाक़ी है  

शक्ल को न तो ज़माना पढ़ पाया न ही आईना   
कि चेहरे पर 'धरम' और हिजाब अभी बाक़ी है

Friday, 21 October 2022

निगाह कभी पढ़ न सका

महज़ एक कदम चला बाद उसके बढ़ न सका 
ये कैसी बुलंदी है कि कोई भी वहाँ चढ़ न सका

आँखों में जब भी आँखें डाली नज़रें झुकने लगी   
रु-ब-रु तो हुआ मगर निगाह कभी पढ़ न सका

इश्क़ ने जब चेहरा खोला फ़न सारा नाकाम रहा 
सिर्फ़ चादर लटकाया मूरत उसकी गढ़ न सका  

धुवाँ होने लगा सब हर्फ़  क़लम दम तोड़ने लगा 
कोई भी नज़्म 'धरम' चेहरा उसका मढ़ न सका 

Sunday, 16 October 2022

फिर ज़माना संभलने लगा

कुछ देर तो साथ अच्छा रहा फिर चेहरा जलने लगा 
पहले हाथ से हाथ छूटा  फिर क़दम  फिसलने लगा
  
न तो नज़रों ही से कह पाया  न ही होठों से बयाँ हुई 
औ" काग़ज़ पर जो लिखा  वो कलाम पिघलने लगा  

जो अपनी हद में रहा  वो हर किसी की  ज़द में रहा  
दीवार हद की गिराई तो फिर ज़माना संभलने लगा 

होठों पे तबस्सुम था औ" चेहरा भी उसका साफ़ था  
सितमगर करके सितम ख़ुद हाथ अपना मलने लगा 

जब ज़मीं के  ख़्वाब को कोई  अपना आसमाँ मिला 
तब होंठ आधा खुला रहा  मगर आधा  सिलने लगा   

जब हक़ीक़त मर गई 'धरम' सिर्फ़ वहम ज़िंदा रहा
तब हर लाश को लहराता  एक कारवाँ चलने लगा 

Monday, 10 October 2022

वो ख़ूब रुलाने लगे

नींद बोझिल होने लगी कुछ ख़्वाब ऐसे आने लगे 
कैसे रुई से पत्थर तोड़कर बर्फ़ से पिघलाने लगे 

क्यूँ कोई भी चेहरा दुबारा कभी नज़र नहीं आया  
तेरी महफ़िल से निकलकर लोग कहाँ जाने लगे

ख़्वाबों से बनी दीवारें  ढ़ेर सारे ख़त से ढ़ला छत  
किसी मुंतज़िर को कब चैन की नींद सुलाने लगे 

आईने ने धीरे से कुछ कहा अक्स से नज़रें मिली 
फिर आँखों से आँखें चूमकर वो ख़ूब रुलाने लगे 

दिल में था तो दश्त था क़दमों से उतरी ख़ाक थी
ख़ुद के अंदर लोग न जाने  क्यूँ आग जलाने लगे   

सितारे अर्श के "धरम" अब ज़मीं को तकते नहीं    
सिरहाने में ख़ुद चाँद रखकर  नींद सुलगाने लगे  

Friday, 7 October 2022

मैं कुछ दर्द गढ़ता हूँ

न तो मसरूफ़ रहता हूँ न ही फ़ुर्सत में रहता हूँ
अपना त'आरुफ़ मैं कुछ इस तरह से कहता हूँ
 
जब भी ज़ख़्म मोहब्बत का ढ़लने लगता है तब 
रखकर कलेजा कील पर  मैं कुछ दर्द गढ़ता हूँ

एक तो तन्हा आईना उसमें मेरा वो तन्हा शक्ल
अक्स औ" आईने को मैं एक धागे में सिलता हूँ 

आँखों से आँखें जब मिली रूह तक पथरा गई 
कि किसके चेहरे में  मैं अपना चेहरा पढ़ता हूँ

मिलें तो ख़फ़ा होना  न मिलें तो  बे-वफ़ा होना 
हरेक इश्क़ में ये इनाम  मैं दिन-रात सहता हूँ

ग़र कोई कल हो तो  क्यूँकर हो  किसलिए हो 
उम्र भर का दर्द 'धरम' जब मैं आज रखता हूँ 

Tuesday, 27 September 2022

कि क़र्ज़ बढ़ने लगा

चाँद ख़ुद अब अपनी चाँदनी को रास्ता नहीं देता 
मोहब्बत में अब कोई किसी को वास्ता नहीं देता 

टूटे हुए लम्हों का समंदर  दिल से लपेटकर रखा   
एक भी लम्हा दिल में उफान आहिस्ता नहीं देता  

क्यूँ ख़ुद से भी यदि रु-ब-रु होता हूँ तो वो विसाल      
एक मुस्तक़बिल देता है  कोई गुज़िश्ता नहीं देता

हर वाक़ि'आ  मोहब्बत का  ज़ुबाँ पर है तो मगर  
वो बयान तो देता है हाँ! कभी नविश्ता नहीं देता

तेरा हाथ थामा तो ऐसा लगा कि क़र्ज़ बढ़ने लगा
ये एहसास 'धरम' क्यूँ कोई और रिश्ता नहीं देता