Tuesday, 7 March 2023

ग़ुर्बत-ए-ग़ुरूर तो नहीं था

सितारों का जहाँ  बहुत दूर तो नहीं था 
ये दिल कभी इतना मजबूर तो नहीं था
 
मैकशी में शरीक होना आँखों से पीना
ये कोई  मयकदा-ए-शऊर तो नहीं था

ग़म में डूबा रहना ग़म की बातें करना 
ये ज़िक्र एक जश्न-ए-सूरूर तो नहीं था 

जाम उठाकर बिना पिये ही  रख देना 
ये गुस्ताख़ी शौक़-ए-हुज़ूर तो नहीं था 

हाथ उठाना औ" कोई दुआ न माँगना
ये ब-तौर-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़ुरूर तो नहीं था 
 
हर बात "धरम" दिल पे ही लगती थी       
सीने में दिल  कोई नासूर तो नहीं था 


 
मैकशी : मद्यपान
शऊर : काम करने का ढंग 
सुरूर : मस्ती, हल्का सा नशा
गुस्ताख़ी : अशिष्टता
ब-तौर : के समान
ग़ुर्बत : ग़रीबी
ग़ुरूर : अभिमान
नासूर : एक प्रकार का घाव जो हमेशा रिस्ता रहता है

Monday, 6 March 2023

कभी दूर जाया नहीं जा सकता

कि ये ग़म महज़ एक शाम में  भुलाया नहीं जा सकता  
दिल को यूँ  किसी भी आग में जलाया नहीं जा सकता

अपनी गुस्ताख़ी अपना इंसाफ़ औ"अपनी ही मुंसिफ़ी   
कैसे कहें  ख़ुद पर कभी हाथ उठाया नहीं जा सकता 

ये कभी ना ख़त्म होने वाला सफ़र-ए-दश्त-ए-तारीक़ी
कैसे कह दें  कोई और कदम बढ़ाया नहीं जा सकता

ये तौर-ए-महफ़िल की  बोलने के लिए मजबूर करना
औ" ये हुक्म कि वापस फिर बिठाया नहीं जा सकता

बहार को ये वसूक़ की  रंग-ए-फ़िज़ा क़ायम ही रहेगा 
ख़िज़ाँ को ये मालूम और रंग  उड़ाया नहीं जा सकता

कुछ तो यूँ ही दिल के क़रीबी की ख़ुश-फ़हमी 'धरम'   
एक और ये भरम की कभी दूर जाया नहीं जा सकता 

Monday, 27 February 2023

ईजाद करना पड़ता है

ख़ुद से भी मिलने के लिए कभी फ़रियाद करना पड़ता है 
तन्हा वक़्त काटने के लिए  क्या क्या याद करना पड़ता है

ख़ुद के क़िरदार से यूँ आसाँ नहीं  ख़ुद को  अलग करना  
अपने रूह को  अपने जिस्म से  आज़ाद करना पड़ता है 

ग़म हर दिल में यूँ ही पनाह नहीं लेता सुकूँ से नहीं रहता  
ग़म को पनाह देने के लिए दिल को साद करना पड़ता है 

ख़्वाब में जीना रंज-ओ-ग़म को पीना कुछ आसाँ तो नहीं  
ये हुनर पाने के लिए कितना कुछ बर्बाद करना पड़ता है

कि बाद एक मर्तबा के दूसरे रुतबे की ख़्वाहिश नहीं हो   
इसके लिए  ख़ुद को ख़ुद ही से  फ़साद करना पड़ता है 
  
एक शक्ल दिखानी पड़ती है एक चेहरा छुपाना पड़ता है 
ख़ुद का ही चेहरा 'धरम' ख़ुद को ईजाद करना पड़ता है 

Thursday, 23 February 2023

ओढ़ता है कफ़न की तरह

आसाँ नहीं होता जीना एक बिरहमन की तरह  
हर लिबास को जो ओढ़ता है कफ़न की तरह
 
एक चेहरा एक नाम एक शख़्सियत एक काम 
यह ज़मीं आसमाँ है  जिसके नशेमन की तरह
  
ख़ुशी-ग़म आबरू-बेआबरू औ" ज़िंदगी-मौत  
सब साथ रखता है एक मुर्ग़-ए-चमन की तरह

एक नज़र साँसों को चैन दिल को सुकूँ देता है 
औ" ज़बाँ पर आता है वो एक सुख़न की तरह

मुलाक़ात का वक़्त तन्हा होता है गुज़र जाता है  
ख़याल में रहता है वो  अनमोल रतन की तरह 

कि बाद एक मंज़िल के दूसरी मंज़िल "धरम"  
मुसलसल चलता रहता है वो ज़मन की तरह    


नशेमन : निवास स्थल
मुर्ग़-ए-चमन : बाग़ की चिड़िया
सुख़न : शायरी
ज़मन : वक़्त

Monday, 20 February 2023

कोई उड़ान न दे सका

इंसाफ़ का तराजू भी कोई इनाम-ए-ईमान न दे सका  
'उरूज हासिल तो हुआ मगर कोई उड़ान न दे सका

ख़ुद से मिला तो चेहरे पर अदब ने ऐसा दस्तक़ दिया    
हादिसों का सिलसिला भी शक्ल-ए-वीरान न दे सका

वो जाना पहचाना अश्क भी जानी पहचानी आँखें भी    
ख़याल में शक्ल उभरा मगर कोई पहचान न दे सका 
 
हर्फ़ से हर्फ़ का जुड़ना औ" फ़ासला रूहों का बढ़ना 
एक भी मुलाक़ात कोई एहसास-ए-अंजान न दे सका 

कि अपने क़त्ल के बाद भी वो मुंसिफ़ तख़्त-नशीं था 
कैसा शख़्स था जो ताज को कोई अरमान न दे सका 

उजड़ा शजर दूर तक वो सन्नाटा बादल में छुपा चाँद     
एक भी लम्हा "धरम" वो ख़ुद को सुनसान न दे सका 

Monday, 13 February 2023

अपने चेहरे पर ख़ुशी बहाल करे

जो तुम थक चुके हो तो मंज़िल भी क्यूँ तिरा ख़याल करे
ग़र ख़याल करे भी तो फिर बची ज़िंदगी का ज़वाल करे

बीच का कोई रास्ता नहीं या साथ होना या तो मर जाना
इश्क़ अजीब है  क़रीब जाने का  कोई कैसे मजाल करे 
 
वफ़ाई का न कोई किरदार न कोई चेहरा नज़र आता है 
ये ऐसा मंज़र है ग़र कोई देखे तो आँखों का कलाल करे

मज़लूमों का कोई क़ाफ़िला जब भी तख़्त-नशीं से मिले    
क्या हुक्म है  हर कोई अपने चेहरे पर ख़ुशी बहाल करे

ये उनकी रहम-दिली की मौत इतनी आसान नसीब हुई 
औ" ये हुक्म भी की हर मुर्दा तौर-ए-क़त्ल का जलाल करे
 
अजीब प्यास है  ये गले से चढ़ती है  आँखों से उतरती है   
ख़्वाहिश-ए-लहू-ए-दरिया है 'धरम' कोई क्या सवाल करे  



ज़वाल - पतन
कलाल - किसी अंग या संवेदना का शुन्य हो जाना 
जलाल - महत्ता 

Thursday, 2 February 2023

बात अपनी कहने लगा

कि लहू जब भी ज़मीं पर उतरा रौशनाई बनकर बहने लगा    
फिर ज़माना उसमें कलम भिंगोकर बात अपनी कहने लगा
  
सिर्फ़ नज़रों का ही धोख़ा न था थोड़ी ख़ता साँसों की भी थी 
क़ाबिल-ए-क़त्ल-ए-रुस्वाई यार बनकर साथ अब रहने लगा 

कोई रिश्ते की बुलंदी न थी बस बीच का कोई वाक़ि'आ था 
बस नज़र मिलाकर मुस्कुराया  फिर हर सितम सहने लगा

वादे फ़िज़ाओं में घुलकर हवा को 'अजब इशारा करने लगे   
साँसों में आते-जाते वादों के जोर से कलेजा फिर ढ़हने लगा

चिंगारी चराग़-ए-दिल ने दी जिससे एक आग बदन में लगी    
फिर न जाने क्यूँ 'धरम' जिस्म के बदले दिल ही दहने लगा 

Tuesday, 31 January 2023

कभी न फिर दाख़िला होगा

ख़्वाब में सिर्फ़ मक़्तल ख़याल में कर्बला होगा    
ऐ! मौला कैसे फिर  इंसानियत का भला होगा 

पहले भी जिनका ऐसा एक मिज़ाज रहा होगा 
उन्हौंने हाथ अपना कुछ कम नहीं मला होगा 

वह उजाला  सिर्फ़ चराग़-ए-रौशनी की न थी  
उस वक़्त दिल भी कुछ कम नहीं जला होगा

कैसी ख़ामोशी थी सन्नाटा न था एक शोर था
ग़ुर्बत में होंठ भी  कुछ कम नहीं सिला होगा 
     
हर गुस्ताख़ी के बाद  ख़ुद से फिर वही वादा  
मुस्तक़बिल में फिर कभी न कोई गिला होगा

हाथ बढ़ाया दिल मिलाया कुछ ज़ुबान भी दी 
टूटने का अब फिर वहाँ एक सिलसिला होगा 

'धरम' साँसों का कलेजे से क्यूँ ऐसा वादा कि 
ख़ुद का ख़ुद में कभी न फिर दाख़िला होगा 

Saturday, 21 January 2023

जिस्म से हमेशा मरदूद रहा

कभी हमशक्ल बनकर कभी साया बनकर मौजूद रहा 
ख़ुद अपने उरूज-ओ-ज़वाल में कब अपना वुजूद रहा

कि क्यूँ कोई भी साँस  सीने में कभी पूरी न उतर सकी  
वक़्त को कलेजे से न लिपटने का हमेशा एक ज़ूद रहा  

कि इस दिल की बे-क़रारी को चैन कभी आए भी कैसे  
जब ये दिल ख़ुद अपने भी जिस्म से हमेशा मरदूद रहा

आईने ने शक्ल पहचाना भी औ" नज़र भी मिलाए रखा     
मगर दरमियाँ आईने और चेहरे के गुफ़्तुगू मस्दूद रहा  

न तो कभी दिखाई दिया न ही किसी को महसूस हुआ  
फिर भी एक मुंसिफ़ की हुक्मरानी में  वो मशहूद रहा  
 
वो शख़्स कौन था जिसने अपनी साँसें मेरे कलेजे में दी   
औ" जिस्म में उतरकर भी 'धरम' ता-उम्र मफ़क़ूद रहा


वुजूद - अस्तित्व
ज़ूद - जल्दी
मरदूद - बहिष्कृत
मस्दूद - रुका हुआ
मशहूद - जो उपस्थित किया गया हो
मफ़क़ूद - अज्ञात

Friday, 6 January 2023

कुछ यूँ साँसों ने भी बोल दिया

तख़्त ने फ़रियादी के लहू को जब फ़िज़ा में घोल दिया
ज़माने ने उसके लहू को भी  पानी के मोल-तोल दिया  

कब वफ़ा की क़सम में बंधे एक चराग़ की लौ में जले  
कब तिरे दिल ने  मेरे दिल को  बराबर का मोल दिया 

वफ़ा-ए-इश्क़ को आँखों में उतारा सीने में दफ़्न किया  
फिर क्यूँ ज़माने के सामने  अपना कलेजा  खोल दिया   

वो वफ़ा की बात हुई एक चराग़-ए-वफ़ा जलाया गया  
फिर हर वफ़ा की राह में वीरान कोई एक जोल दिया

जब भी ज़बाँ ख़ामोश रही  तब चेहरा बस जलता रहा     
कुछ तो नज़रों ने कहा कुछ यूँ साँसों ने भी बोल दिया 
 
कि "धरम" तेरी बातें तेरी नज़र तिरा चेहरा तिरा जादू 
ख़ुदा ने पूरी काइनात को ये भरम ख़ूब अनमोल दिया