Friday, 4 April 2025

पत्थरों के बयान और भी होंगे

आगे बढ़ो कि ज़ख़्मों के निशान और भी होंगे 
राह में मील के पत्थरों के बयान और भी होंगे
  
बुलंदी की मंज़िल पर  तू अभी पहुँचा कहाँ है  
बस बढ़ते चलो की आगे ढलान और भी होंगे
 
वो बात महज़ उस एक लम्हे की न रही होगी      
पुराने लम्हे  दोनों के दरमियान और भी होंगे

ख़बर न थी बज़्म में रात ख़ामोशी में गुजरेगी
यूँ महफ़िल में शामिल बे-ज़बान और भी होंगे

दिल में कोई याद नहीं ज़ख़्म सारा भर चुका
अब तो इस दिल के इम्तिहान और भी होंगे

एक ही बार में तीर निशाने तक नहीं पहुँचा  
कि दरमियान दोनों के कमान और भी होंगे

जो तख़्त-नशीं थे उनको कभी यकीं न हुआ        
कि उन आक़ाओं के हुक्मरान और भी होंगे

समंदर अभी पूरी तरह से सोया नहीं "धरम" 
कि लहरें और भी होंगीं उफान और भी होंगे 

Thursday, 27 March 2025

सूरज ने दमकना छोड़ दिया

क्या हुआ कि सितारों ने चमकना छोड़ दिया
चाँदनी मुरझाई सूरज ने दमकना छोड़ दिया

मक्कारी, फ़रेबी, बे-ईमानी बातें कैसी भी हो 
इन बातों को कहने में झिझकना छोड़ दिया

साक़ी का क़हर हो कि हो रिन्दों की बे-सब्री    
ऐसी बातों पर साग़र ने छलकना छोड़ दिया

मंज़र ज़ुल्म-ओ-सितम का हो या 'उरूज का      
अंदर किसी भी आग ने दहकना छोड़ दिया

बाद चैन-ओ-सुकूँ के भी आँखों में नींद नहीं 
थकन में पलकों ने भी  झपकना छोड़ दिया

आँखों में न अश्क़ रहा न ही लहू रहा 'धरम' 
तन्हाई में साँसों ने भी सिसकना छोड़ दिया 

Tuesday, 18 March 2025

कलियाँ लगती है झुलसाई

जो आँख खुलती है तो बजने लगती है तन्हाई
फूल झड़ जाते हैं  कलियाँ लगती है झुलसाई
 
आँखें जब मिलती है  नज़र लगती है मुरझाई
दरमियाँ दोनों के  कि बातें लगती है बिसराई

जाने किस बात पर चिड़िया लगती है इतराई
शाख को बैठी चिड़िया बस लगती है भरपाई

पहले-पहल पायल उसी ने लगती है झनकाई
कि उसने जो कही वो बातें लगती है दोहराई

वो पुरानी यादें उसकी अब लगती है दफ़नाई 
कि ख़याल आने पर साँसें लगती है अकुलाई 
   
लो उसने कह दी दोनों में लगती है आशनाई
'धरम' जिसकी बातें सबको लगती है भरमाई

Saturday, 8 March 2025

सवालों के घेरे में रहा है

उसका हरेक जवाब सवालों के घेरे में रहा है 
उसे ख़बर न थी कि वो ख़ुद भी अँधेरे रहा है

वहाँ बज़्म में सिर्फ़ इस बात की ही चर्चा रही  
कैसे मुफ़लिस के घर ख़ुर्शीद सवेरे में रहा है

दरमियान दोनों के फ़ासला  आसमाँ जितना 
तो फिर लहज़ा  क्यूँ हमेशा तेरे-मेरे में रहा है

तेरे दर से जब निकला  एक बेचैनी बनी रही  
दिल में सुकूँ रहा जब भी तेरे बसेरे में रहा है

सूरत उसकी याद है या भूल गया  पता नहीं 
कि चेहरे पर अँधेरा हर वक़्त घनेरे में रहा है

बज़्म में जाने से पहले ख़ुद को तौलना 'धरम'
ये इश्क़ भी एक खेल है साँप-सपेरे में रहा है

Wednesday, 5 March 2025

'अजीब मंज़र बना है

जब से क़तरा से कटकर  वो समंदर बना है
क्या कहें अपने माज़ी से भी बे-ख़बर बना है

इसे हाथ का जादू न कहें तो और फिर क्या
सारे मुखौटों का चेहरा  इतना सुंदर बना है

तीर उसने जो चलाया सब निशाने पर लगा 
मत पूछ ये इल्म उसमें किस-क़दर बना है

वहाँ दरख़्तों में अब फ़क़त कील फलते हैं  
ये मत पूछ वहाँ क्या ज़मीं के अंदर बना है

हर मुबारकबाद में ख़ंज़र भी साथ आया है        
दिल ऐसे ही नहीं  ज़ख़्मों का भँवर बना है

बाद मौत के 'धरम' मुर्दों में रूह तलाशना
जिधर भी देखो यही 'अजीब मंज़र बना है 

Monday, 3 March 2025

ख़ुद को निगलकर बना है

ये कैसी तपन है ये क्या पिघलकर बना है 
वो अपनी ही शक़्ल को  बदलकर बना है
  
बुलंदी की हवस है कौन किसका है यहाँ    
ऐसा क़िरदार ख़ुद को निगलकर बना है

आसाँ नहीं होता मंज़िल-ए-मक़्सूद बनना      
वो कितने मंज़िलों को  कुचलकर बना है

वहाँ आसमाँ तक जाने की सीढ़ी लगी है 
वो राह उसके घर से  निकलकर बना है

कील चुभाए रखना हवा का रुख मोड़ना  
वो हुनर है  जो काँटों पर चलकर बना है

ये ऐसी ढ़लान है जहाँ सिर्फ़ फिसलना है 
यहाँ कौन है 'धरम' जो सँभलकर बना है

Wednesday, 26 February 2025

बची मेरी उमर न थी

बात ऐसी कौन सी थी जिसकी उसे ख़बर न थी 
मगर मेरे क़द-ओ-क़ामत की कोई क़दर न थी
 
किसी तंग-दिल की मुंसिफ़ी थी क्या ही कहना      
इतनी लम्बी सज़ा जितनी बची मेरी उमर न थी
   
जो इश्क़ के परिंदे थे मौसम ढ़लते ही चले गए 
वहाँ अब परिंदों के उड़ने की कोई लहर न थी

आँखों से आँखें तो मिली मगर दिल मिला नहीं  
कोई भी मुलाक़ात  कभी ऐसी ज़ख़्म-गर न थी

फ़ासला बस दोनों को हाथ मिलाने भर का था  
मगर वो कदम भर की दूरी भी मुख़्तसर न थी

आँख से ओझल था मगर हर वक़्त नज़र में था  
उसके नफ़रत की तो कोई पैक-ए-नज़र न थी

बुलंदी अक्स ने पाई  जिसे तारीक़ी निगल गई
उसकी शख़्सियत 'धरम' सफ़र-ए-हज़र न थी   
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ज़ख़्म-गर : ज़ख़मी करने वाला/वाली 
पैक-ए-नज़र : दृष्टि की सीमा
शख़्सियत : किसी व्यक्ति का अस्तित्व या व्यक्तित्व
सफ़र-ए-हज़र : हर समय 

Saturday, 15 February 2025

दिल में न कोई ऊल-जलूल रख

ग़र सर पर ताज़ रख  तो ताज़ पर थोड़ी सी धूल रख 
अपने वतन की धूल-मिट्टी के लिए शख़्त उसूल रख

दरिया को रास्ता बताना है  रुख़ हवा का बदलना है
मुफ़लिसों के हुक़ूक़ का हमेशा  रहनुमा-उसूल रख 

यह मु'आमला मज़लूमों का है चाँद-सितारों का नहीं  
फ़ैसला देने वक़्त सामने अपने चेहरा-ए-मक़्तूल रख

ख़ाक से मोहब्बत करनी है  ये राह कुछ आसाँ नहीं      
आँखों में समंदर रख इरादा ख़िलाफ़-ए-मा'मूल रख

ये क्या बात करते हो बात चाँद-ख़ुर्शीद की करते हो             
ग़र इश्क़ है तो सारे शर्त भी मुम्किन-उल-हुसूल रख
 
इस रिश्ते की नींब 'धरम' एक बात एक ईमान से है     
तूने अब ज़बाँ दी है दिल में न कोई ऊल-जलूल रख      
   
 
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रहनुमा-उसूल : क़ानून 
मक़्तूल : मृतक/क़त्ल होने वाला
ख़िलाफ़-ए-मा'मूल : असाधारण, ग़ैरमामूली
मुम्किन-उल-हुसूल : जिसको प्राप्त करना संभव हो
ऊल-जलूल : बेमानी 

Tuesday, 11 February 2025

हर किसी को वर्ग़ला देते हैं

मसीहाई के सबूतों को  बर-सर-ए-'आम जला देते हैं 
फ़िर ख़ुदाई की बात पर हर किसी को वर्ग़ला देते हैं

फ़िज़ा में ख़ामोशी है  ज़ब्र कुछ इस कदर से तारी है 
मज़दूरी की बात पर पसीने को पानी में मिला देते हैं

ये तज़ुर्बा ये इल्म ये अदाकारी सब को हैराँ करते हैं   
पहले ख़ूब हँसाते हैं बाद उसके ता-उम्र रुला देते हैं

ज़िंदगी-मौत का खेल है तहज़ीब-ओ-तमाशा देखिए   
जीतने वाले को ब-तौर इनाम ये दश्त-ए-बला देते हैं

अपने हक़ की बात कीजिए फिर ये रिवायात देखिये   
ताज़ शराफ़त का रखते हैं फ़ैसले में बद-बला देते हैं
     
यहाँ दिल लगाने की बात "धरम" कभी मत कीजिए 
यहाँ लोग ऐसे हैं जो रोज़ क़त्ल करते हैं भुला देते हैं

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बर-सर-ए-'आम : सबके सामने
दश्त-ए-बला : desert of calamity
रिवायात : traditions
बद-बला : जान के लिए मुसीबत

Wednesday, 5 February 2025

जो शक़्ल पर कतीब था

काँटों से घिरा दिल था उसका बंज़र नसीब था 
न तो दिल-ए-खुशफ़हमी थी न ख़ुदा क़रीब था

क्या कह के पुकारते कि मुआमला अजीब था 
नुमाइश-ए-इश्क़ में गले पर दाग़-ए-सलीब था 

ज़बाँ खुली ही नहीं कि मु'आमला-ए-हबीब था 
फिर कहीं बिछड़ न जाये कुछ ऐसा नहीब था
   
रास्ते का कुछ ख़याल ही नहीं  ऐसे कबीब था
जहाँ से भी गुज़रा वो राह उसका अर्रक़ीब था

छुपाना भी मुश्किल था कि दिल ही लहीब था
वो हक़ीक़त था ऐसा  जो शक़्ल पर कतीब था

कि उन बातों का ही क्या  जो माज़ी-क़रीब था
वो गुज़रा ज़माना भी "धरम" कितना ग़रीब था  
   
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नहीब : भय, डर, आतंक
कबीब : औंधे मुंह पड़ा हुआ
अर्रक़ीब : रक्षक/ईश्वर का एक नाम
लहीब : अग्नि-ज्वाला, लपट, शोला
कतीब : लिखा हुआ
माज़ी-क़रीब : बीता हुआ समय या काल