Sunday, 26 January 2025

उजड़े दयार में रहने का

अजब इल्म है  दिल के दरार में रहने का
कि ता-उम्र एक उजड़े दयार में रहने का

'इल्म-ओ-फ़न को परखना  बोली लगाना  
अजब तौर-तरीका है  बाज़ार में रहने का

दौलत आबरू तबी'अत कुछ तो गँवाइये  
ऐसे ही नहीं मिलता अख़बार में रहने का

यहाँ से निकलना है औ" दश्त में जीना है     
जी नहीं करता यूँ चार-दीवार में रहने का

न कोई बिसात न कोई मोहरा खेल कैसा
फिर भी ख़ुद ही से तू-तुकार में रहने का

ज़मीं पर आओ अब कुछ बंदगी कर लो          
कब तक 'धरम' यूँ इश्तिहार में रहने का

Saturday, 18 January 2025

बयाबान बिफरने लगा

कुछ दूर तो वह सीढ़ी से चढ़ा फिर उड़ान भरने लगा  
मंज़िल तक पहुँचा भी न था की आसमान गिरने लगा

ग़म-गुसारों की महफ़िल थी  दिल जलने के किस्से थे  
कुछ देर तो वह ख़ामोश रहा  फिर बयान करने लगा

ज़ख़्म भी भर चुका था चमड़ी भी नई निकल आई थी   
वक़्त ने कुरेदा तो  फिर से  कुछ निशान उभरने लगा
 
बात मोहब्बत से करनी थी  बात इश्क़ की करनी थी 
सामने बस बैठे ही थे कि दिल में तूफ़ान गुज़रने लगा

पहले एक साया दो रूहों से अलग-अलग मिलता था    
अब वही साया दोनों रूहों के दरमियान उतरने लगा

दरख़्त की छाँह में 'धरम' हाथ मिलाया दिल-लगी की   
फिर दोनों को तन्हा देखा  तो बयाबान बिफरने लगा 

Monday, 13 January 2025

चेहरे पर जवाब बहुत गहरा है

लब की बात क्या कहें लब पर ख़ामोशी का पहरा है
आँखों झुकी रहती है चेहरे पर जवाब बहुत गहरा है

ख़ुदाई फिर से लौटेगी वक़्त को थोड़ा और ढ़लने दे 
लम्बे वक़्त तक पानी भला किसके दर पर ठहरा है

बात उसके मतलब की थी ही नहीं हवा में उड़ गई 
अपने लफ़्ज़ों को ज़ाया मत करो वह अभी बहरा है

बातें सितम की हो या सनम की हो कोई फ़र्क़ नहीं    
अपनी फ़िज़ा में तो बस ख़ल्वत है दश्त है सहरा है

एक बेचैनी सी है दिल में यादों की क़ब्र ज़ेहन में है   
सीने में उठी महज़ लहर है या कोई दर्द सुनहरा है

कि सिर्फ़ वीरानी थी वहाँ कोई जज़्बात था ही नहीं     
दिल का क्या कहें "धरम" दिल ता'मीर-ए-सहरा है 

Sunday, 12 January 2025

बात डूब जाने की थी

वो बात कहाँ कोई कदम साथ रखने या उठाने की थी 
दरमियान दोनों के जो भी बात थी सिर्फ़ ज़माने की थी

कि समंदर तैर भी जाते मगर हासिल क्या ही होना था   
कि शुरू से ही  बात जब एक दूसरे को भुलाने की थी
    
इश्क़ मोहब्बत फ़रियाद तकल्लुफ़ कुछ भी बचा नहीं 
सब जलकर राख हो गया बात इसी आशियाने की थी

शाख़ें दरख़्तों की कट गई  घर परिंदों का उजड़ गया
बस जरा सी बात थी बात परिंदों के चहचहाने की थी

मिलें तो नज़र चुराना राख़ यादों का फूँककर उड़ाना   
अब दोनों में जो भी बातें बची थी  दिल दुखाने की थी

था तो वो एक समंदर मगर दोनों किनारा दिखता था
एक दरिया-ए-इश्क़ में "धरम" बात डूब जाने की थी  

Monday, 6 January 2025

एक धोखा था वहम था

ज़ंजीर सारे कागज़ के बने थे फंदा महज़ भरम था
कैसे कह दें की यह कोई सज़ा थी कोई सितम था

आसमाँ का झुकना  ज़मीं से मिलना हाथ मिलाना    
जब भी ऐसा देखा था  वह एक धोखा था वहम था

सदाएँ दिल को चुभती थी शक़्ल आँखें जलाती थी
कैसे कह दें कि साथ उसका फ़ज़्ल-ओ-करम था

यार पुराना वर्षों बाद मिला कैसी अजनबिय्यत थी    
मिलकर लगा ऐसा कि जैसे कोई दूसरा जनम था

कि वो हाथ मिलाना गले मिलना आँखें चार करना     
यह सब का सब तक़ल्लुफ़ यक़ीनन चार-ख़म था 
      
लिखी हुई कुछ बातें मिटाई भी गई जलाई भी गई   
ज़माने के निगाह में 'धरम' जो लौह-ओ-क़लम था 
 

फ़ज़्ल-ओ-करम : मेहरबानी-ओ-इनायत
चार-ख़म : कुश्ती का एक दांव
लौह-ओ-क़लम : तख्ती और उस पर लिखने का क़लम, वह तख्ती जिस पर भविष्य में होने वाली सारी घटनाएँ लिखी हुई हैं और वह लेखनी जिसने यह सब कुछ ईश्वर की आज्ञा से लिखा है

Wednesday, 25 December 2024

कोई बौना 'उरूज पाएगी

ख़ुशी जब भी आएगी मुहँ  टेढ़ा कर के आएगी 
औ" साथ अपने कुछ गर्द-ओ-ग़ुबार भी लाएगी
 
मुबारकबाद की शक़्ल में रात सियाही छाएगी    
रुत बहारों की आएगी  तो साँसें पिघल जाएगी

एक रूह दूसरे रूह से कुछ ऐसे दूरी बनाएगी      
ग़र नज़र से नज़र मिली  आँख बहुत जलाएगी

रौशनी अँधेरे में खोकर वुजूद अपना मिटाएगी  
रात ख़ुर्शीद को दिन निकलने से पहले खाएगी

हर ज़ुबान सिर्फ़  ख़ुद ही का गीत गुनगुनाएगी
बाक़ी कोई नज़्म शान में गुस्ताख़ी फ़रमाएगी 
   
ज़िंदगी की बुलंदी "धरम" किसी को न भाएगी   
ख़ुद को निगलकर  कोई बौना 'उरूज पाएगी

Friday, 20 December 2024

टूटा शिखर था

वो ख़्वाब की दुनियाँ थी बड़ा तन्हा सफ़र था  
बाद एक घर के बहुत दूरी पर दूसरा घर था

घर की छत ऐसी जैसे कोई उजड़ा शहर था
ईंटें बे-जाँ खड़ी थी अम्न तिरा कैसा असर था
 
कि हरेक घर के सामने एक ही सा मंज़र था  
कुछ बिखरे सूखे पत्ते थे  एक ठूठा शजर था

महज़ एक बूँद पानी में कैसे इतना लहर था
कि जैसे एक चिंगारी में छुपा कोई क़हर था

हर बशर के जिस्म में लहू महज़ बूँद-भर था  
और न जाने क्यूँ  रंग आँखों का सुर्ख़-तर था

भाला पर लटकता कोई जिस्म बग़ैर सर था   
बुलंदी की दास्ताँ थी "धरम" टूटा शिखर था

Friday, 13 December 2024

फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

सितारों को क़ैद रखना  चाँद को चादर ओढ़ाना
कहाँ से सीखा तूने फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

वो गुलाबी शख़्सियत उसपर ये सतरंगी पैराहन
लगते तो हो ऐसे  जैसे कोई कुदरत का ख़ज़ाना

ये तिरे वतन की मिट्टी है  इसे तू माथे से लगाना  
बयाँ लहू भी न कर सके बनो कोई ऐसा दीवाना

ज़ेहन को नींद आती है  आँखों को सब्र आता है 
बड़ा अज़नबी इश्क़ है अजब है इसका फ़साना

सिर्फ़ दरख़्तों की साँसें थीं और वहाँ कोई न था
ज़मीं दरख़्तों से क्या पूछे ये दश्त क्यूँ है वीराना

चाँद तक फैला दरिया सफ़ीने में सिमटा ख़्वाब
बादबाँ में उलझी नींद "धरम"  सफ़र था पुराना

Sunday, 17 November 2024

किसी रिश्ते का भरम दिखता है

कि आईने में उसका चेहरा कुछ कम दिखता है
उसकी आँखों में झाँको तो कोई वहम दिखता है

दिलजलों की शागिर्दी है उदासी की रहनुमाई है       
कि उसके गिरेबाँ में  हमेशा कोई ग़म दिखता है

कि उसका वो लहज़ा वो सलीक़ा वो तौर-ए-बयाँ   
उसकी बातों में किसी रिश्ते का भरम दिखता है

वो रास्ता उसका था  वो नक़्श-ए-पाँ उसी का था
क्यूँ उस मंज़िल पर कोई और आदम दिखता है

दीवानों की महफ़िल है वहाँ इश्क़ का आलम है   
मगर उस फ़िज़ा में कोई और मौसम दिखता है

महज़ वो एक ही जवाल का ऐसा असर "धरम"         
रास्ता आसाँ ही क्यूँ न हो मगर दुर्गम दिखता है  

Sunday, 10 November 2024

खुल गया है बादबाँ फिर से

सीने में क्यूँ उठ रहा है धुआँ फिर से
क्या कोई दर्द दे रहा है बयाँ फिर से

कि वो ज़ख़्म हो गया है जवाँ फिर से  
लो बदल गया है तर्ज़-ए-बयाँ फिर से

सज़दे में आ गया है आसमाँ फिर से
किसकी छिड़ गई है  दास्ताँ फिर से

देख बिछड़ रहा है  हम-रहाँ फिर से
झोंका से खुल गया है बादबाँ फिर से
  
कर्बला में हो रहा है इम्तिहाँ फिर से 
यहाँ मिटने वाली है हस्तियॉं फिर से

"धरम" घटने लगी है दूरियाँ फिर से  
लो उजड़ने लगी है बस्तियाँ फिर से