Wednesday, 25 December 2024

कोई बौना 'उरूज पाएगी

ख़ुशी जब भी आएगी मुहँ  टेढ़ा कर के आएगी 
औ" साथ अपने कुछ गर्द-ओ-ग़ुबार भी लाएगी
 
मुबारकबाद की शक़्ल में रात सियाही छाएगी    
रुत बहारों की आएगी  तो साँसें पिघल जाएगी

एक रूह दूसरे रूह से कुछ ऐसे दूरी बनाएगी      
ग़र नज़र से नज़र मिली  आँख बहुत जलाएगी

रौशनी अँधेरे में खोकर वुजूद अपना मिटाएगी  
रात ख़ुर्शीद को दिन निकलने से पहले खाएगी

हर ज़ुबान सिर्फ़  ख़ुद ही का गीत गुनगुनाएगी
बाक़ी कोई नज़्म शान में गुस्ताख़ी फ़रमाएगी 
   
ज़िंदगी की बुलंदी "धरम" किसी को न भाएगी   
ख़ुद को निगलकर  कोई बौना 'उरूज पाएगी

Friday, 20 December 2024

टूटा शिखर था

वो ख़्वाब की दुनियाँ थी बड़ा तन्हा सफ़र था  
बाद एक घर के बहुत दूरी पर दूसरा घर था

घर की छत ऐसी जैसे कोई उजड़ा शहर था
ईंटें बे-जाँ खड़ी थी अम्न तिरा कैसा असर था
 
कि हरेक घर के सामने एक ही सा मंज़र था  
कुछ बिखरे सूखे पत्ते थे  एक ठूठा शजर था

महज़ एक बूँद पानी में कैसे इतना लहर था
कि जैसे एक चिंगारी में छुपा कोई क़हर था

हर बशर के जिस्म में लहू महज़ बूँद-भर था  
और न जाने क्यूँ  रंग आँखों का सुर्ख़-तर था

भाला पर लटकता कोई जिस्म बग़ैर सर था   
बुलंदी की दास्ताँ थी "धरम" टूटा शिखर था

Friday, 13 December 2024

फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

सितारों को क़ैद रखना  चाँद को चादर ओढ़ाना
कहाँ से सीखा तूने फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

वो गुलाबी शख़्सियत उसपर ये सतरंगी पैराहन
लगते तो हो ऐसे  जैसे कोई कुदरत का ख़ज़ाना

ये तिरे वतन की मिट्टी है  इसे तू माथे से लगाना  
बयाँ लहू भी न कर सके बनो कोई ऐसा दीवाना

ज़ेहन को नींद आती है  आँखों को सब्र आता है 
बड़ा अज़नबी इश्क़ है अजब है इसका फ़साना

सिर्फ़ दरख़्तों की साँसें थीं और वहाँ कोई न था
ज़मीं दरख़्तों से क्या पूछे ये दश्त क्यूँ है वीराना

चाँद तक फैला दरिया सफ़ीने में सिमटा ख़्वाब
बादबाँ में उलझी नींद "धरम"  सफ़र था पुराना

Sunday, 17 November 2024

किसी रिश्ते का भरम दिखता है

कि आईने में उसका चेहरा कुछ कम दिखता है
उसकी आँखों में झाँको तो कोई वहम दिखता है

दिलजलों की शागिर्दी है उदासी की रहनुमाई है       
कि उसके गिरेबाँ में  हमेशा कोई ग़म दिखता है

कि उसका वो लहज़ा वो सलीक़ा वो तौर-ए-बयाँ   
उसकी बातों में किसी रिश्ते का भरम दिखता है

वो रास्ता उसका था  वो नक़्श-ए-पाँ उसी का था
क्यूँ उस मंज़िल पर कोई और आदम दिखता है

दीवानों की महफ़िल है वहाँ इश्क़ का आलम है   
मगर उस फ़िज़ा में कोई और मौसम दिखता है

महज़ वो एक ही जवाल का ऐसा असर "धरम"         
रास्ता आसाँ ही क्यूँ न हो मगर दुर्गम दिखता है  

Sunday, 10 November 2024

खुल गया है बादबाँ फिर से

सीने में क्यूँ उठ रहा है धुआँ फिर से
क्या कोई दर्द दे रहा है बयाँ फिर से

कि वो ज़ख़्म हो गया है जवाँ फिर से  
लो बदल गया है तर्ज़-ए-बयाँ फिर से

सज़दे में आ गया है आसमाँ फिर से
किसकी छिड़ गई है  दास्ताँ फिर से

देख बिछड़ रहा है  हम-रहाँ फिर से
झोंका से खुल गया है बादबाँ फिर से
  
कर्बला में हो रहा है इम्तिहाँ फिर से 
यहाँ मिटने वाली है हस्तियॉं फिर से

"धरम" घटने लगी है दूरियाँ फिर से  
लो उजड़ने लगी है बस्तियाँ फिर से

Wednesday, 30 October 2024

कौन संभलने वाला है

यह ख़ुर्शीद अब कहीं  और निकलने वाला है
यहाँ से अब दूर चलो कि वक्त ढलने वाला है

कलम उठाओ तो आग ख़ुद बरसने लगती है 
काग़ज़ पर मत लिखो  काग़ज़ जलने वाला है

आरज़ू बलंदी की है तो हर क़त्ल मुनासिब है
बाद ठोकर के भी यहाँ कौन संभलने वाला है

यहाँ ख़ामोश रहो कि  नशा तख़्त का तारी है
यहाँ क़तरा  अब समंदर को निगलने वाला है

यहाँ कभी न आना  यहाँ का दरिया निराला है  
यहाँ आब-ए-हयात भी ज़हर में पलने वाला है
   
यहाँ अपनी शक़्ल आईने में मत देखो "धरम"
यहाँ किरदार हर आइना का बदलने वाला है 

Wednesday, 23 October 2024

माइक्रोग्रिड : एक संक्षिप्त परिचय

वो ज़माना था करेंट के एक तरफ़ा प्रवाह का  
पारंपरिक ईंधन के ख़त्म होने के आगाह का 
  
सुदूर लोड तक पहुँचने में गिरता था वोल्टेज
लॉस बहुत होता था वह मुद्दा था परवाह का

फिर मुद्दा आया पूरी क़ायनात की नेकी का       
जरुरत लगी इसमें शोधकर्त्ता के इत्माह का 

दौर था फिर ऊर्जा के वितरित उत्पादन का
साथ एक बंधन भी था क़ुदरत से निबाह का

बाद इसके जब और भी कुछ  जरूरतें बढ़ी   
भंडारण आया फिर उपभोक्ता की चाह का

इसके सर्वोत्तम उपयोग की चर्चा चलने लगी   
इल्म था नियंत्रण और प्रबंधन के अथाह का

हर वक़्त हुक्म की ग़ुलामी  जब खलने लगी 
तब ख़याल आया ख़ुद में छोटे बादशाह का

बग़ैर ग्रिड के  वह ख़ुद दे सकता है आपूर्ति
एक और दौर चला फिर वहाँ वाह-वाह का
 
स्टेब्लिटी रिलायबिलिटी प्रोटेक्शन या अन्य 
सारे के सारे पहलू पर सवाल था निर्वाह का

शोधक हर पहलू पर "धरम" लगे हैं ईमान से
तारीकी ख़त्म होगी होगा अंत हर सियाह का

...............................................................
इत्माह : नज़रबाज़ी, नज़र उठा कर देखना

Saturday, 19 October 2024

लहू उबाले उबलता नहीं

ये कैसा मोम है जो किसी भी आग में पिघलता नहीं
बड़ी हैरत की बात है कीचड़ उछाले उछलता नहीं 
 
अजीब मुलाक़ात थी  जो मरज़ मिला वो ऐसा मिला  
दर्द दिल में ऐसे समाया कि निकाले निकलता नहीं

इस बार का ये तूफ़ाँ पिछले सारे तूफ़ाँ से अलग था       
चराग़ इस तरह बुझा कि  फिर जलाये जलता नहीं

यादें बोझ हो चुकी थी  यादों को दफ़्न करना पड़ा        
उस क़ब्र से न जाने क्यूँ नज़र मिलाये मिलता नहीं

जुनूँ जब बलंदी पर पंहुचा हक़ीक़त ने राज़ खोला  
वो ठंढक आई ज़हन में  लहू उबाले उबलता नहीं

कि वो मसअला तो सिर्फ़ दो चराग़ों का था "धरम"
कैसी पसरी थी तारीकी शम' संभाले संभलता नहीं

Thursday, 17 October 2024

फ़लक ख़ुद ज़मीं से मिलते हैं

किरदार सारे आज़ाद तो हैं  मगर क़ैद रहते हैं 
सितम की बातें भी दूसरों की ज़बाँ से कहते हैं
 
कुछ याद नहीं कि ये दिल किसका मुंतज़िर है  
दिल में ढ़ेर सारे जज़्बात एक ही साथ बहते हैं
  
मंज़िल को ये गुमाँ  की वो बलंदी की इंतिहा है
ये पता नहीं दीवाने फ़लक के सर पर चलते हैं

बलंदी की दास्ताँ हक़ीक़त से मिलती ही नहीं            
इधर देख  यहाँ फ़लक ख़ुद ज़मीं से मिलते हैं

तहज़ीब ये कि दावत-ए-सुख़न सब को देते हैं    
तमाशा ऐसा कि  एक दूसरे के होंठ सिलते हैं

उस किरदार ने साँसें अपनी बेच दी  "धरम"   
अब उसकी आँखों में ग़ैरों के ख़्वाब पलते हैं  

Wednesday, 16 October 2024

ज़मीं पर कुछ आसमाँ बोता है

समंदर अपनी मर्ज़ी से  कब किनारा डुबोता है 
लहरें तब आती हैं जब कोई जज़्बात चुभोता है

उसे उरूज औ" ज़वाल से कोई फ़र्क़ ही कहाँ    
वो एक ही धागे में ज़मीं औ" आसमाँ पिरोता है
 
कहानी कैसी थी जिसमें हर किरदार ज़िंदा था
यूँ मोहब्बत में ऐसा  कब किसके साथ होता है

दरख़्तों की आँखें भी नम होकर झुक जाती हैं   
इस वीराने दश्त में इतना टूटकर कौन रोता है
 
कि दरमियाँ  दो ज़िस्मों के  ये रूह किसकी है 
बड़े इल्म से जो ज़मीं पर कुछ आसमाँ बोता है

मुफ़लिसी के इस आलम  को किससे बयाँ करे     
वो अपने काँधे पर "धरम" ग़ैरों का सर ढोता है      

Thursday, 10 October 2024

सूरज को जला दूंगा

जब भी याद आयेगी तुरत भुला दूंगा   
सोये हुए गुलशन को और सुला दूंगा

ग़र नज़र मिलेगी चाँदनी रौशन होगी    
हँसती हुई आँखों को फिर रुला दूंगा

ग़र चाँदनी डूबेगी साँसें सुलग उठेंगी      
दिल के शोलों से सूरज को जला दूंगा

तिरे बज़्म में ग़र तुझपे कुछ गुजरेगी 
हुस्न हो या इश्क़ मिट्टी में मिला दूंगा

साँसें अभी ही टूटी हैं कि जरा ठहरो   
साँसों को सीने में  फिर से बुला दूंगा

कभी ख़ुद भी चल तू मेरे पास तो आ   
यहाँ दिल में एक आसमाँ खुला दूंगा

पहले कुछ बात शुरू तो हो "धरम" 
कुछ तीर नज़रों से फिर चला दूंगा  

Sunday, 6 October 2024

ख़ंज़र निगल लेगा

धुंध की आढ़ में अपने घर से निकल लेगा
वापस आएगा तो पता  अपना बदल लेगा

रिश्ते में नाराज़गी ऐसी कि ग़र बिछड़ें तो       
साथ जिस्म के ख़ुद ही दिल भी चल लेगा

सितारे महफ़िल में अब उदास रहने लगे   
कैसे यक़ीं करें कि  दिल ख़ुद बहल लेगा

तबी'अत को अब तो कुछ भी भाता नहीं  
बहार को ये यक़ीं है कि मन मचल लेगा

रूहानी बातें भी दिल तक पहुँच न पाई
ऐसा क्या करें  जिसपर वो 'अमल लेगा
 
मुझे इस बात पर बिल्कुल यकीं "धरम"  
वो क़त्ल करेगा औ" ख़ंज़र निगल लेगा  
 

Wednesday, 2 October 2024

नहीं है ए'तिबार यहाँ

कि हर तरफ फैला है धुएँ का ग़ुबार यहाँ  
सब कुछ हो चुका आग का शिकार यहाँ

पता नहीं कौन है किसका क़िरदार यहाँ 
ख़ुद के शक्ल पर कौन पाता वक़ार यहाँ 

दरमियाँ दो घरों के  खड़ी है दीवार यहाँ
जिसके दोनों तरफ रखे हैं हथियार यहाँ

ख़ूनी कौन है  किसका है इक़्तिदार यहाँ  
हर कोई जानता कौन है गुनाहगार यहाँ

मंज़िल का रास्ते से  कैसा है क़रार यहाँ 
बुलंदी के रास्ते में मिलता है उतार यहाँ

ये काँटे कैसे हैं कैसी फैली है बहार यहाँ
चमन को फूल पर नहीं है ए'तिबार यहाँ

पीठ में ख़ंज़र घोपते हैं ग़म-गुसार यहाँ
आस्तीन के साँप होते हैं राज़-दार यहाँ

ये "धरम" कैसी फ़ज़ा है इस बार यहाँ
आँखों में दर्द अब भी है बरक़रार यहाँ

-----------------------------------------      
वक़ार : मान-मर्यादा
इक़्तिदार : आतंक
ग़म-गुसार : दुख-दर्द का बाँटने वाला / हमदर्द

Sunday, 29 September 2024

पतंग बदल लेगा

किसे ख़बर थी की वो ख़ुद ही रंग बदल लेगा  
कुछ देर तो साथ रहेगा  फिर ढंग बदल लेगा

जिसे बुलंदी की चाहत है उसका इश्क़ कैसा  
एक पतंग कटेगा तो दूसरा पतंग बदल लेगा

जो टूट गये वो सारे त'अल्लुक़ात तिजारती थे
अब महफ़िल में आने का आहंग बदल लेगा

उसके कोई उसूल थे ही नहीं बस छलावा था   
हरेक बात पर वो  मुद्द'आ-ए-जंग बदल लेगा

रिश्ते को भी उसने उसूलों की तरह ही रखा    
ग़र दिल पर चोट लगेगी  तो शंग बदल लेगा

जब एक पत्थर में दुआ का कोई असर न हो
"धरम" वो फिर कोई  दूसरा संग बदल लेगा
   
--------------------------------------------------------

आहंग : तौर तरीक़ा
शंग : दिल लगी करने वाला
संग : पत्थर

Sunday, 15 September 2024

ख़ंज़र कई सारे दाख़िल थे

अलावा दो जिस्मों के कई और रूह भी शामिल थे
उस क़त्ल में शरीक़ न जाने कितने सारे क़ातिल थे

उस ज़ख़्म के अलावा और कोई ज़ख़्म था ही नहीं    
एक ही सुराख़ था मगर ख़ंज़र कई सारे दाख़िल थे

क़ातिल ने अपना पता बदला भी महफूज़ भी रखा 
शिकार उसके सारे के सारे इस बात से ग़ाफ़िल थे
    
आँखों में मायूसी संभल न सकी ख़ुशी छलक आई
रिश्ता कैसा टूटा जिसमें दोनों के दोनों ला-ज़िल थे

महज़ एक मसअला पर हर किसी की आबरू गई   
कहने को तो महफ़िल में सारे के सारे इफ़ाज़िल थे

वो इलाक़ा कैसा था "धरम" वहाँ रिवायतें कैसी थी       
सारे के सारे नक़ाब-पोश वहाँ शान-ए-महफ़िल थे  
 
------------------------------------
ग़ाफ़िल : बेख़बर
ला-ज़िल : वह सोना जिसमें ज़रा भी खोट न हो
इफ़ाज़िल : प्रतिष्ठित जन / बड़े लोग

Sunday, 8 September 2024

ख़ाक ख़ूब उड़ाया था

यकीं तो नहीं था  मगर फिर भी हाथ बढ़ाया था
इश्क़ था तो नहीं मगर फिर भी ख़ूब जताया था

उस रिश्ते को छुपाया फिर झँकझोर कर देखा    
तिरे लुटने से पहले हाँ ख़ुद को ख़ूब लुटाया था

उस रहबर ने मंज़िल की राह दिखाने से पहले       
याद नहीं घूँट लहू का कितनी बार पिलाया था

ज़िंदा रिश्ता जब दफ़्न किया तो उसके पहले  
न तो ख़ुद से बात किया  न ही मुझे बताया था

कुछ यादें जो क़ैद थी कुछ साँसें जो दफ़्न थी          
उस अँधेरी कोठरी में किसने उसे बसाया था

कि शाख़ें आसमाँ में हैं जड़ दिल में पैवस्त है   
बिना मिट्टी हवा पानी के बाग़ एक लगाया था

सबने सारी ख्वाहिशों को जलाया राख किया    
फिर तिरे नाम का वहाँ ख़ाक ख़ूब उड़ाया था

जब साँस टूटी दिल ने भी धड़कना बंद किया
साँस का दिल पर 'धरम' यह कैसा बक़ाया था

Thursday, 29 August 2024

मर कर किधर जाते हैं

पता नहीं जज़्बात सारे  मर कर किधर जाते हैं  
किताबों में कभी-कभी कुछ हर्फ़ उभर जाते हैं

दरमियाँ गुफ़्तगू के आँखें दोनों की बंद ही रही    
फिर नज़र मिलाते हैं  औ" दोनों बिखर जाते हैं

तन्हाई भी आकर चली गई अश्क़ भी सूख गए 
ये किसके इन्तिज़ार में तिरे आठों-पहर जाते हैं

सारे ज़ख़्मों के निशाँ जो चेहरे पर थे मिट चुके  
तू ऐसी दवा बता जिससे दाग़-ए-जिगर जाते हैं

नज़र औ" दिल दोनों के जहाँ अलग-अलग हैं    
मस'अले दिल के सारे मावरा-ए-नज़र जाते हैं

इंसां की मंज़िल दोज़ख़ या जन्नत ही है 'धरम'   
कौन लोग हैं जो मरकर महबूब-नगर जाते हैं
 
-------------------------------------------------
दाग़-ए-जिगर : प्रेम की आग का दाग़
मावरा-ए-नज़र : दृष्टि से परे

Wednesday, 21 August 2024

बे-इरादा करना है

पहले हरेक लौ को चराग़ से जुदा करना है  
फिर अपने आप को सबका ख़ुदा करना है

अज़नबी शहर है  सारी गलियाँ अज़नबी हैं  
पता ही नहीं दिल को कहाँ फ़िदा करना है

नज़र भी मिलाना है साँसों में बसाना भी है 
फिर मोहब्बत में ता-उम्र ए'तिदा करना है

पूरा जिस्म छलनी है  दिल ज़ख़्म-ज़ख़्म है        
इस रिश्ते में अब और क्या वादा करना है

इरादतन जो भी किया सिर्फ़ ठोकर खाया  
आगे जो भी करना है  बे-इरादा करना है

रूह को जिस्म में क्यूँ क़ैद रखना "धरम" 
अब रूह को जिस्म का लिबादा करना है 

--------------------  
ए'तिदा: ज़ुल्म
लिबादा: परिधान

Monday, 12 August 2024

रास्ते सारे एक-तरफ़ा थे

कि रास्ते जितने भी थे वो सारे एक-तरफ़ा थे
औ" उस सफ़र के सारे रहनुमा पुर-जफ़ा थे
   
हर सॉंस पर मंज़िल का पता बदल जाता था 
सारे के सारे  मुसाफ़िर औ" रहबर  ख़फ़ा थे
 
कि अक्स पर आँखों को कभी यक़ीं न हुआ   
आईने जितने भी थे  सारे के सारे बे-वफ़ा थे

वक़्त बुझता ही नहीं दर्द कम होता ही नहीं
कि इस बात पर  दोस्त सारे रू-ब-क़फ़ा थे

हाथ मिलाया तो  नज़रों ने  कई इशारे किये 
कैसे कह दें की इशारे सारे 'अर्ज़-ए-वफ़ा थे

यहाँ करम सारे क़हर ही बरपाते थे "धरम"  
कि सितम सारे-के-सारे उम्मीद-ए-शिफ़ा थे  


----------------------------------------------

पुर-जफ़ा: अत्याचारी, निर्दयी
रू-ब-क़फ़ा: पीछे मुँह किये हुए
'अर्ज़-ए-वफ़ा: निष्ठा की अभिव्यक्ति 
उम्मीद-ए-शिफ़ा: इलाज की उम्मीद

Monday, 29 July 2024

जो भी आया है उम्र-भर आया है

कि क़ब्र से निकलकर  वो फिर से घर आया है  
उसकी यादों का सैलाब फिर से नज़र आया है

इन्सां रास्ते नसीब  तिरे हर ठोकर का शुक्रिया
जो सौ बार गिरकर भी उठने का हुनर आया है

वक़्त का तक़ाज़ा है की वो तिरे दहलीज़ आया   
कब किसके दर पर यूँ माँगने मो'तबर आया है

बे-दर्दी है  दिल पर छा जाता है हुक़्म करता है   
तिरा नाम जब भी आया है  इस कदर आया है

हर बज़्म में मोहब्बत की एक ही सी दास्ताँ है   
सब के सीने में दिल  पिरोने शीशागर आया है

तिरे दिल में  किसी ज़ख़्म के निशाँ  हैं ही नहीं 
कि पास तिरे जो भी आया है उम्र-भर आया है

कैसे कह दूँ कि ज़िंदगी पर तेरा एहसान नहीं     
अब सितम जो भी आया है मुख़्तसर आया है
   
दिल को इस  बात पर तो  बिल्कुल यकीं नहीं  
कि टूट-कर "धरम" इसबार वो इधर आया है

Tuesday, 2 July 2024

जिस्म अपना पिरोने लगा था

कोई दवा न दी गई थी मगर मरज़ ठीक होने लगा था
चाँद आसमाँ से उतरकर  सीने में कहीं खोने लगा था

बरसों की बेचैनी थी यकायक दूर तो न हो सकी मगर 
उसके हाथों में जादू था वो आँखों में नींद बोने लगा था 

वो आख़िरी मुलाक़ात थी  बस साथ बैठे आँखें मिलाई
फिर न जाने क्यूँ  दोनों बिना बात के ही  रोने लगा था

उन लम्हों को बुनते सिलते काफ़ी वक़्त गुज़र गया था 
आँखों में नींद तो न थी मगर न जाने क्यूँ सोने लगा था

वो सफ़ीना-समंदर का इश्क़ था वहाँ होना ही क्या था
समंदर सफ़ीने को आँखों में बिठाकर डुबोने लगा था

आधी उम्र बीतने के बाद "धरम" वो मुलाक़ात हुई थी  
दोनों बाँहों की कैंची में  जिस्म अपना पिरोने लगा था

Sunday, 16 June 2024

अब हवा के साथ जलना है

दिये की लौ को अब हवा के साथ जलना है 
तौर-ए-ज़िंदगी को वक़्त के साथ बदलना है
 
समंदर को अब क़तरा के मानिंद चलना है
सैलाब को पानी बस बूँदों में ही उझलना है

बदन की आग में सिर्फ़ आँख का जलना है
क़लम की आग को  काग़ज़ में कुचलना है

दाग दामन का  कुछ इस तरह से धुलना है 
एक सादे काग़ज़ पर स्याही का मचलना है

वक़्त के इशारों को बस उम्र भर छलना है  
एक चेहरे पर  दूसरे चेहरे का निकलना है

आँखों में बस  एक ही सवाल का पलना है
दिल को इश्क़ से "धरम" कैसे संभलना है 

Thursday, 9 May 2024

ख़त में लिखा क्या है

अदीब को कुछ मालूम नहीं की ख़त में लिखा क्या है 
क़लम को बिल्कुल पता नहीं की उसकी ख़ता क्या है

दोनों का साथ में साँस लेना औ" हाथ थामकर चलना    
इस बीमारी के 'अलावा दरमियाँ दोनों में बता क्या है

राही जिस शजर तले आराम करते  उसे काट देते थे         
मंज़िल हर राही से यह पूछ रहा की मेरा पता क्या है

कालिख तस्वीर में क़ैद रहता है  चेहरा धुल जाता है  
हर तस्वीर बशर से यह पूछता की तेरा जाता क्या है

तौर-ए-सितम कितने देखे हैं  तुम्हारी उम्र कितनी है 
किसी सूखे हुए दरख़्त के बारे में तुम जानता क्या है  
    
वक़्त ने मोहलत तो दी थी मगर चिराग़ जला न सके  
कि ज़मीं औ" आसमाँ को 'धरम' अब देखता क्या है  

Wednesday, 24 April 2024

पहचान अब इल्ज़ाम से होने लगी

हर बात की शुरुआत  यहाँ अंजाम से होने लगी
हर शख़्स की पहचान अब इल्ज़ाम से होने लगी
 
ज़माने में ख़ुलूस-ए-दिल से कहाँ कोई यारी रही 
कि मक्कारों में दोस्ती अब आराम से होने लगी 

क़लम की बात पर पहले  पूरी सियाही गिर गई 
फिर क़लम तोड़ी गई ये चर्चा शाम से होने लगी 

जो तख़्त की हक़ीक़त को बे-आबरू होते देखा  
फिर दिल में नफ़रत हर एहतिराम से होने लगी

वो सुनहरी शाम देखा  फिर फ़िज़ा का रंग देखा   
इसके बाद में घुटन बहार-ए-तमाम से होने लगी
    
तौर-ए-महफ़िल पर 'धरम' तब्सिरा होने के बाद   
हर शायरी की शुरुआत फिर जाम से होने लगी

Wednesday, 10 April 2024

कोई निबाह न था

महज़ ख़्वाब का क़त्ल था कोई गुनाह न था  
आँखों के सामने लाश थी कोई गवाह न था 

उम्मीद के उतरते-उतरते रात चढ़ आई थी
लौ को बुझना था कोई जश्न-ए-सियाह न था 

रिश्ते की हक़ीक़त सूखे हुए गुलाब की थी  
हर वस्ल एक आग़ोश था कोई पनाह न था
 
दिल और दिमाग महज़ जिस्म के हिस्से थे   
दोनों को साथ रहना था कोई निबाह न था

ज़मीं सरकने लगी क़दम लड़खड़ाने लगा
अब और सितम ढाने का  कोई राह न था

उम्र भर ख़ुद से फ़ासले पर रहना "धरम"       
एक ख़्वाहिश ही थी  कोई इकराह न था 

--------------------------------------------
इकराह : मजबूरी, बेचारगी

Thursday, 7 March 2024

अब दर्द कहाँ होता है

वो वक़्त अब कहीं नहीं जिसमें ख़याल जवाँ होता है  
दिल ज़ख़्म-ज़ख़्म तो है मगर अब दर्द कहाँ होता है

कमरे में यूँ ही बैठे रहे ख़ामोशी से कुछ गुफ़्तगू की 
कोई सवाल जवाब नहीं मगर एक इम्तिहाँ होता है

एक ही क़ातिल एक ही ख़ंजर एक ही तौर-ए-क़त्ल     
फिर भी हरेक क़त्ल का कोई अलग निशाँ होता है
 
ये कैसी महफ़िल है यहाँ हर क़िरदार बर्फ़-नशीं है
कोई लफ्ज़ निकले तो मंज़र शो'ला-फ़िशाँ होता है

सफ़र में निकले तो मील के पत्थर से रहनुमाई ली
ये ख़बर न थी की रहबर ख़ुद यहाँ गुमरहाँ होता है

उससे गुफ़्तगू की हक़ीक़त "धरम" क्या बयाँ करूँ  
आग़ाज़ जैसा भी हो अंजाम शोर-ए-फ़ुग़ाँ होता है 
      


.......................................................................
शो'ला-फ़िशाँ : आग उगलने वाला
गुमरहाँ : जो अपना रास्ता खो दिया, विकृत व्यक्ति
शोर-ए-फ़ुग़ाँ : विलाप, मातम

Saturday, 24 February 2024

इश्क़ में शह-मात के पहले

कि मंज़र ऐसा कभी न था इस मुलाक़ात के पहले 
चेहरे पर कोई निशाँ न था  तिरे इस घात के पहले
 
रात को कुछ पता नहीं सुब्ह भी पूरी बे-ख़बर रही
किस शु'ऊर से बुझाई थी आग उस रात के पहले

कि ख़ंजर के नोक पर  हाथ बढ़ाया  दिल मिलाया
अजब तौर-तरीक़ा है  इश्क़ में शह-मात के पहले

रहमत भी बरसती है  तो कोई दाग  छोड़ जाती है    
क़त्ल होते हैं अरमाँ कश्फ़-ओ-करामात के पहले

यह दुनियाँ कैसी  यहाँ कौन ख़ुदा  यहाँ दीन कैसा     
कि घूँट लहू का पीना पड़ता है ज़ियारात के पहले

यह ख़याल किसका है "धरम" ये बातें किसकी हैं  
आँखों में क्यूँ उतर जाता है लहू जज़्बात के पहले    



'अलामत: निशान, चिह्न, छाप
कश्फ़-ओ-करामात: चमत्कार
ज़ियारात: किसी पवित्र स्थान या वस्तु या व्यक्ति को देखने की क्रिया   
जज़्बात : भावनाएँ, ख़यालात, विचार, एहसासात

Friday, 2 February 2024

क़लम शाम-ओ-सहर देखे

ऐ! मौला आँखें फिर से  कभी न ये मंज़र देखे 
कि एक अदना सफ़ीने में डूबता समंदर देखे

सहरा से लिपटी ज़मीं आग से लिपटा आसमाँ 
ग़र ख़्वाब भी कुछ देखे तो सिर्फ़ बवंडर देखे 

कि सितम के धागे से बनाए रहमत की चादर 
ओढ़ाकर उसे क्या ख़ूब हर ज़ुल्म-परवर देखे

ये बुलंदी किसकी रहमत है ये ने'मत कैसी है     
पाकर जिसे ख़ुद को वहाँ  ख़ाक-बर-सर देखे

ये कैसे अहल-ए-दानिश हैं ये ता'लीम कैसी है 
लहू उगलता हुआ क़लम शाम-ओ-सहर देखे   

हद-ए-नज़र फैली कैसी तहज़ीब-ए-तमाशा है         
हाथों में "धरम" ख़ंजर लिए 'इज्ज़-गुस्तर देखे  
 
----------------------------------------------
ज़ुल्म-परवर : अत्याचारी
ने'मत : सम्मान का पद या पदवी
ख़ाक-बर-सर : निराश्रित, बेसहारा
'इज्ज़-गुस्तर : विनती करने वाला 

Sunday, 28 January 2024

कभी आतिश-ए-'इश्क़-ए-बला हो न सका

अपने वुजूद का कोई मुकम्मल फ़ैसला हो न सका 
बेचैनी ऐसी थी कि इश्क़ कभी मश्ग़ला हो न सका

नज़ारा हर ख़्वाब के क़त्ल का नज़रों में घूमता रहा 
ज़ेहन में कभी आतिश-ए-'इश्क़-ए-बला हो न सका 

सितम को शबाब हासिल था  गर्दन बस झुकी रही   
औ" ज़ुबान से कभी भी  कोई क़ल्क़ला हो न सका

मुसलसल ख़्वाब ख़याल नज़र सिर्फ़ जलजला रहा  
किसी और फ़र्ज़ के लिए सीने में ख़ला हो न सका

संग को तराशना रूह देना सीने में महफ़ूज़ रखना 
ऐसा वाक़ि'आ है कि इससे कभी भला हो न सका

तिजारत के सारे इल्म-ओ-फ़न बस नाकाम ही रहे 
मोहब्बत कभी "धरम" ख़ुश-मु'आमला हो न सका  


 

मश्ग़ला : शौक़
क़ल्क़ला : बोलना
जलजला : कष्टदायक
ख़ला : ख़ाली जगह
ख़ुश-मु'आमला : लेन देन में अच्छा 

Monday, 15 January 2024

रिश्ते की रा'नाई गई

ये कैसी तपन थी जिसे आग ही से बुझाई गई  
किसकी वफ़ा थी जो सर-ए-'आम लुटाई गई

ज़िंदगी महज कोई नाटक खेल तमाशा जैसा   
बस एक पर्दा गिरा कि पूरी जल्वा-नुमाई गई
 
कि हाल-ए-दिल बयाँ करे भी तो किससे करे
मुलाक़ात जैसी भी हो हमेशा दिलरुबाई गई 
    
रिश्ता ख़ामोशी का था लफ़्ज़ बस इशारा था  
जब भी कोई गुफ़्तगू हुई मानो पा-बजाई गई
 
वो किसका रास्ता था वो किसकी मंज़िल थी 
फ़तह होते ही उस मंज़िल की आशनाई गई
  
ख़ुशी ने तबीयत से जब भी कोई रिश्ता बुना  
चंद कदम में ही 'धरम' रिश्ते की रा'नाई गई
   
 ----------------------------------------------------
जल्वा-नुमाई : अपने-आप को दिखाना
दिलरुबाई : माशूक़ाना अंदाज़
पा-बजाई : भरपाई
आशनाई : परिचय
रा'नाई : सुंदरता, सौंदर्य

Monday, 1 January 2024

चाँदनी फिर मचल जाएगी

पता न था बज़्म में बात ऐसी भी चल जाएगी  
मायूसी  किसके दर पर पहले-पहल जाएगी
 
ख़ुशी का दामन अब और कितना थामना है 
थोड़ी देर और ठहर की शक्ल बदल जाएगी 

उन्हें गुमाँ है की बुलंदी उनके क़दमों तले है  
यकीं मान वो ज़मीं क़दमों से निकल जाएगी
 
जो रात आज आई है कल फिर वही आएगी
एक ख़बर थी कि चाँदनी फिर मचल जाएगी 

जो वादा था की अब ये मुलाक़ात आख़िरी है 
किसे ख़बर थी कि वो बात फिर टल जाएगी 

दो नज़रों का चिराग़ था रौशनी शबाब पर थी 
यक़ीं न था वो कि बुझने से पहले ढल जाएगी

दुआ की कुछ बात मुँह से निकल गई 'धरम' 
ये ख़याल न था की ज़ुबाँ ऐसे फिसल जाएगी