Friday, 4 September 2026

बिना बात के ही लहरा रही थी

एक जैसी बहुत मंज़िलें  आपस में टकरा रही थी  
औ" रास्तों के हेर-फेर में नज़र भी चकरा रही थी

सारे शागिर्द अपनी-अपनी राह पर निकल रहे थे
कि यह देखकर वहाँ सबकी आँखें पथरा रही थी 

मातम जैसा कद-काठी था  ग़म जैसी शक़्ल थी  
न जाने किसको याद करके वो मुस्कुरा रही थी

परछाई कभी पास आकर तो कभी साथ रहकर  
कभी दूर जाकर बिना बात के ही लहरा रही थी

शक्ल पहली नज़र में ही  पहचान में आ गया था   
न जाने क्यूँ ज़ेहन में बातें उसकी बिसरा रही थी

वो बीमारी कैसी थी  और वो हवा कैसी चली थी   
अपनी शक़्ल अपनी ही बातें सबको डरा रही थी

जज़्बातों के चादर में ढेर सारे सूराख़ बन गए थे
जब भी कभी मिली बस वही बातें दोहरा रही थी

"धरम" जब ज़िक्र समंदर के उतरने का चला तो  
वहाँ बैठे सिकंदर की आवाज़ भी थरथरा रही थी

Tuesday, 21 July 2026

आदमी मानता नहीं है

बशर अब अपनी ही शक्ल आईने में पहचानता नहीं है
उसका अपना एक हाथ  दूसरे हाथ को जानता नहीं है

साथ निकला तो है मगर पता नहीं साथ जाएगा या नहीं  
क़ाफ़िले में रहना साथ चलना अब कोई ठानता नहीं है

सितारे यहाँ अब अपनी रौशनी से कभी चमकते नहीं हैं    
किसी का पता पाने को अब कोई ख़ाक छानता नहीं है

काग़ज़ की उड़ान है आसमाँ से कुछ बूँदें ही काफ़ी हैं  
कोई भी शिकारी वहाँ तीर-ओ-कमान तानता नहीं है

यहाँ कैसी मिट्टी है मलते ही कालिख़ जमने लगती है         
कि जान-बूझ कर कोई मिट्टी से चेहरा सानता नहीं है
 
बात कोई भी हो बस बयान की तरह ही दर्ज़ होती है
अब वह 'धरम' किसी और को आदमी मानता नहीं है

Friday, 12 June 2026

बेचैनी वैसी की वैसी ही रही

आँखों में झाँको तो सिर्फ़ दहशत नज़र आती है
यहाँ से वहाँ तक बस भागने की ख़बर आती है

यह मुसीबत फ़क़त कोई मौजूदा दौर का नहीं  
माज़ी के हरेक लम्हें में यह सज-सँवर आती है

मौजों को उरूज तक जाने दो बीच में न टोको 
ज़रा देखो तो सही बलंदी किस-क़दर आती है

अपनी बात भी अपने कानों तक नहीं पहुँचती
तहज़ीब से की गई हर बात बे-असर आती है

बैठना उठना चलना यूँ मुसलसल चलता रहा
बहार कब किसके साथ चलकर घर आती है

दिल को ग़र खोदोगे तो मलवा निकल आएगा
उन लम्हों के याद आने से आँखें भर आती है

कि इस बार भी बेचैनी वैसी की वैसी ही रही   
आँखों में नींद "धरम" कब वक़्त-पर आती है 

Tuesday, 14 April 2026

जुगनू ही उस्ताद रहा

वो रात जुगनुओं की थी  जुगनू ही उस्ताद रहा
बिसात पर उस रात में न कोई और नर्राद रहा

कतरा दरिया समंदर सब के सब बिखर गए   
उस ज़लज़ला में मगर वो लम्हा आबाद रहा

कैसे कह दूँ की वो इश्क़ मुकम्मल हुआ होगा
सब की जुबाँ पर  जो बनकर बस रूदाद रहा

हाथ मिलाकर  लेन-देन का मुआहिदा किया
वहाँ किसी को भी न याद पुराना फ़साद रहा

क़ितार पहले लम्बी लगी फिर गोल होते गई
अब पता ही नहीं की कौन किसके बाद रहा

न जाने साथ कैसा था  सफ़र तन्हा ही गुज़रा
कहने को तो साथ उसका बहुत नौशाद रहा

जिस्म और रूह दोनों की दुनियाँ अलग रही       
पता ही नहीं कि मिज़ाज कभी भी शाद रहा

पहले उसकी ही ज़िंदगी की कहानी पढ़ लो         
जो ता-उम्र 'धरम' बनकर बस ना-मुराद रहा   
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नर्राद : चौसर खेलने का विशेषज्ञ
रूदाद : घटना का विवरण
मुआहिदा : समझौता, इक़रारनामा
नौशाद : सुंदर, खूबसूरत
शाद : प्रसन्न, ख़ुश

Tuesday, 17 March 2026

गवाही क़ुबूल नहीं होती

कि तिरे दर पे बात कोई भी फ़ुज़ूल नहीं होती  
वहाँ चाँद सितारों की गवाही क़ुबूल नहीं होती

किसी की बर्बादी पर यूँ चुप रहना मुँह मोड़ना
आँखों में पड़ी धूल महज़ कोई भूल नहीं होती

चराग़ों को न जाने क्यूँ तारीक़ी रास आने लगी
ये यारी कभी भी क़ाबिल-ए-क़ुबूल नहीं होती

यहाँ सबकी तबी'अत को  ये कैसी नज़र लगी  
अब तो यहाँ साँसें भी हवा में हुलूल नहीं होती

कभी ज़मीं निगल गई  कभी आसमाँ खा गया 
ख़ुद की तलाश में अब साँसें निर्मूल नहीं होती

एक झोंका था जो तूफ़ान में बदल गया 'धरम'
उसकी तलाश में अब आँखें मलूल नहीं होती

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हुलूल: एक चीज़ का दूसरी चीज़ में पूरी तरह घुल जाना
मलूल: उदास, खिन्न, दुखी, दुःखित, रंजीदा

Sunday, 1 February 2026

आसमाँ तो अब भी खुला है

आसमाँ को क्या होगा आसमाँ तो अब भी खुला है  
ज़मीं पर लगी किसी आग में कब आसमाँ जला है

हर कोई शक़्ल अपनी आईने में देखो औ" बताओ 
कि ख़ून को पानी में मिलाने को यहाँ कौन तुला है

वो एक शर्त न जाने कितनी शर्तों को साथ लाई थी
न जाने अलावा मेरे और कितनों का होंठ सिला है

ज़िद मत करो वक़्त को अपने हिसाब से ढलने दो  
चलो लौट चलें  कब ख़ुर्शीद वक़्त से पहले ढला है

एक तो तीरगी उसमें  आलम-ए-तन्हाई भी मौज़ूद 
ख़ुद से पूछो कि इसमें हुआ कब किसका भला है
   
न तो वहाँ ज़मीं ही थी "धरम" न तो आसमाँ ही था   
महज़ एक भरम था ज़मीं वहाँ आसमाँ से मिला है

Saturday, 10 January 2026

हालात भी बदलने लगे

जब ईमान बदला तो हालात भी बदलने लगे  
ख़ुद से पूछने वाले सवालात भी बदलने लगे
 
बस एक सवाल था अब्र बराबर क्यूँ न बरसे  
इस पर जुर्म भी किया  बात भी बदलने लगे

फ़िज़ा-ए-उल्फ़त में  तारीक़ी बात घोली गई   
फिर उस बात पर  जज़्बात भी बदलने लगे

कि बात अब हवा पानी रौशनी तक आ गई
बुनियादी सारे  मु'आमलात भी बदलने लगे

पहले तो सर-ए-आम इक़रार-ए-जुर्म कराये
फिर लगाने वाले  दफ़'आत भी बदलने लगे

वहाँ क़िमार-बाज़ की बड़ी लम्बी क़तार थी
बाज़ी आते-आते ता'ज़ीरात भी बदलने लगे

उस शख़्स की "धरम" अब हैसियत देखिए  
उसके इशारे पर दिन-रात भी बदलने लगे

Sunday, 21 December 2025

कितना आसमान आएगा

कि कितनी ज़मीं के हिस्से में  कितना आसमान आएगा  
फ़ैसला उसका भी होगा जो दोनों के दरमियान आएगा

यह बोरिया-बिस्तर औ" यह निवाला सारा यहीं रहने दो 
सफ़र बहुत ही लम्बा है काँधे पर कितना सामान आएगा

शर्त-ए-मोहब्बत  न जाने क्यूँ हमेशा इसी पावंदी में रही
कि दिल में वही उतरेगा  जो सरापा लहू-लुहान आएगा

कभी उधर से गुज़रो जहाँ सिर्फ़ दिल-जलों की तुर्बतें हैं    
वो एहसास होगा कि दिल में न कभी इत्मिनान आएगा

जिधर मंज़िल-ए-'उरूज है उस रास्ते पर नहीं जाना है 
कि उस रास्ते में हर कदम पर लिखा सावधान आएगा

वो गुज़रा ज़माना है 'धरम' अब उसे क्यूँ ही याद करना 
कि ज़ेहन में या तो तारीक़ी आएगी या बयाबान आएगा  

Tuesday, 21 October 2025

रहबर का तमाशा देखिए

सफ़र में निकले हैं रहबर का तमाशा देखिए
मंज़िल फ़तह करने वालों की हताशा देखिए

तख़्त मिलते ही ज़ेहन में जिन्न पैवस्त हो गया
लहू में सना है ये ताज़ कैसे बे-तहाशा देखिए

मंज़िल ख़ुद ही हैरान है कौन उसको खा गया
फ़लक़ की आँखों में छाई यह निराशा देखिए

गूँगों की आवाज़ में आज ऐसी ताक़त आ गई
बहरों के कानों तक पहुँची इर्ति'आशा देखिए

अभी तो उम्र शुरू हुई है हयात पूरी बाक़ी है 
अभी से ज़मीं में गड़ने का मत तहाशा देखिए

इंसानों की जमात है इंसानियत की ही बात है 
सबके ज़ेहन में छुपा 'धरम' एक रा'शा देखिए

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इर्ति'आशा: प्रतिध्वनि
तहाशा : भय / डर
रा'शा : कंपन / थरथराहट

Monday, 13 October 2025

सफ़ीना मस्ती में टहलता है

फ़लक में ख़ुर्शीद पहले की तरह कहाँ निकलता है 
मग़रिब-ओ-मशरिक़ किसी के इशारे पर चलता है
 
ये दिल भी तो अब कहाँ पहले की तरह उबलता है 
सीने में घुसकर  अब कहाँ कोई दिल को मलता है 

उरूज यहाँ ख़ुद ही जवाल की तरफ़ फिसलता है
बशर मंज़िल पाकर अपनी ही हस्ती को छलता है

यहाँ चिलमन शक़्ल  देखकर रंग अपना उगलता है   
आलम-ए-पस-ए-चिलमन है कहाँ कोई संभलता है

माज़ी मौजूदा मुस्तक़बिल एक दूसरे को निगलता है
मगर संगीन कलम को अपनी चुटकी में मसलता है

कि लहरों के चढ़ाव पर सफ़ीना मस्ती में टहलता है 
यह देखकर 'धरम' समंदर अब और भी उछलता है

Monday, 15 September 2025

साज़िश कराई जा रही थी

मरज़ का पता नहीं मगर दवा दी जा रही थी 
कि सर-ए-आम ये बात भी बताई जा रही थी

बात कुछ और थी कलाम किसी और का था   
औ" सूरत किसी और की दिखाई जा रही थी

यहाँ क़त्ल के गुनाह को रहमत बताया गया
हर रोज़ ये कैसी साज़िश कराई जा रही थी
    
महफ़िल में ख़ामोशी वैसी की वैसी ही रही 
कैसे कहें उसके आने से तन्हाई जा रही थी

वो मु'आमला सिर्फ़ दिल का नहीं रहा होगा
क्या जाने वहाँ वो जश्न क्यूँ मनाई जा रही थी

आदमी सिर्फ़ एक ही था लिबास ढेर सारे थे  
औ" फिर सूरत पर सूरत पहनाई जा रही थी

जाने क्यूँ "धरम" बात तू-तू मैं-मैं पर आ गई  
फ़िज़ा में धुलकर सारी आशनाई जा रही थी

Wednesday, 3 September 2025

प्रथम गुरु होती है माता

प्रथम शिक्षा शिशु माता के गर्भ में ही है पाता
प्रथम गुरु होती है माता 
पाकर स्नेह पिता का शिशु गर्भ में है इठलाता 
प्रथम गुरु होती है माता

बात अनोखी भेद चक्रव्यूह का 
अजन्मा अभिमन्यु  कैसे है पाता
प्रथम गुरु होती है माता    

पश्चात् जन्म शिशु धरा के संपर्क में है आता
प्रकृति से अनायास ही बहुत कुछ है पाता 
प्रथम गुरु होती है माता

छात्र जीवन में विद्यालय की भूमिका है अद्भुत 
यहाँ आचार्यों के मार्गदर्शन में शिशु 
शिक्षा के सागर में गोता है लगाता 
ज्ञान के मोती चुनता 
अपने ललाट पर पिरोता 
प्रथम गुरु होती है माता

महाविद्यालय के प्रांगण में बन वयस्क जब आता 
ज्ञान की महिमा का अनुभव कर गर्वित होता 
गुरु के चरणों में शीश नवाता ज्ञान अलौकिक पाता 
प्रथम गुरु होती है माता

विश्वविद्यालय के प्रांगण में दर्शन जब उसे भाता 
पठन-पाठन के साथ रहस्य शोध के भी पाता
प्रथम गुरु होती है माता

गुरु के मुख से निकली विद्या संग सदा ही रहती 
चाहे कोई चुने तपोवन या चुने गृहस्थी
धर्म अधर्म के संकट से भी मिल जाती है मुक्ति  

मगर शिक्षा का ऋण यूँ ही नहीं उबरता
माथे पर यह ऋण अगर बच जाये तो  
बार बार धरा पर आना है पड़ता

लेकर ब्रह्मराक्षस का रूप 
भटकना पड़ता शिष्य की तलाश में
और यह ऋण ज्ञान देकर ही उबरता 
प्रथम गुरु होती है माता 

Monday, 11 August 2025

दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

यादों का झोंका कभी सुकूँ से सोने नहीं दिया
कि सलोने सपनों को कभी संजोने नहीं दिया

उसे बुत-ए-मसीहा के अलावा और क्या कहूँ 
वो जो तन्हाई में भी कभी मुझे रोने नहीं दिया

मेरे क़त्ल की गवाही वो ख़ंज़र ख़ुद देता रहा       
कैसा ख़ंज़र था दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

आज महताब नक़ाब में है रात भी शरमाई है  
महफ़िल ने चाँदनी को धूमिल होने नहीं दिया
  
उसका क़तरा पर कभी तो कोई एहसान था  
जो समंदर ने उसे ख़ुद को डुबोने नहीं दिया

अपने साये से बिछड़कर रौशनी खोजता है 
शख़्स जो कभी कोई  सूरज बोने नहीं दिया

दोस्ती की चादर  उसके साथ ओढ़ूँ तो कैसे 
वो तो एक भी सूत "धरम" पिरोने नहीं दिया 

Wednesday, 6 August 2025

गर्दन गुल-पोश है

मसीहा ही क़ातिल है हुक्मरान ख़ामोश है 
कि क़ातिल के लहू में बहुत गरम-जोश है

कभी फूलों को हटाईये गिरेबाँ तो देखिए  
कि बर्षों से तो आपकी गर्दन गुल-पोश है

आप न तो यहाँ आईये न ही दिल लगाईये    
सबकी तबी'अत तो यहाँ ख़ाना-ब-दोश है

कैसा क़र्ज़ है कि रस्म-अदायगी पता नहीं
अब खाली हो चुका अपना वफ़ा-कोश है 
 
पहले नज़दीक आईये फिर हाथ मिलाईये   
कि यहाँ हाथ मिलाना भी एक आग़ोश है

मंज़िल-ए-मक़सूद  जब नज़र में आ गया    
फिर बाद उसके बची ज़िंदगी बे-जोश है

अब क्या बात करें  किससे नज़र मिलायें  
यहाँ सबका चेहरा तो "धरम" रू-पोश है  

Saturday, 19 July 2025

दोनों अरमाँ निगलते हैं

जो लोग मरकर सितारे बनते हैं आसमाँ में मिलते हैं 
वो लोग उस जहाँ में भी एक दूसरे के होंठ सिलते हैं

सुबह कोई और सूरज था  शाम कोई और सूरज है 
कि ज़मीं हो या हो आसमाँ  दोनों अरमाँ निगलते हैं 

वक़्त ने जो भी मरज दिया मुसलसल बढ़ता ही गया  
कैसे कह दें कि वक़्त के मारे लोग कभी सँभलते हैं

जिन जुगनुओं की उम्मीद पर मैंने चिराग़ बुझा दिया
पता न था वो सारे मेरे दुश्मन के इशारों पर जलते हैं

वो जो सच्चाई है सब को पता है ज़मीं में दफ़्न भी है
लोग किस क़ब्र में गड़ते हैं किस क़ब्र से निकलते हैं 
    
इस बारिश के मौसम में "धरम" दो रंगों के बादल हैं  
दोनों साथ घिरते हैं  दोनों पानी औ" आग उगलते हैं 

Saturday, 12 July 2025

मिट्टी में समा गया

कैसे आँखों के आगे बादल सा कुछ छा गया
रूह जिस्म से निकलकर मिट्टी में समा गया
 
आवाज़ अनजानी थी चेहरा भी अनजाना था
न जाने क्यूँ आया औ" गीत ख़ुशी के गा गया

ख़ामोशी से आया शायद ख़ुदा का करम था     
आकर उजड़े गुलसन को फिर से बसा गया

ख़ामोशी ने शोर से न जाने क्या उधार लिया
सुकूँ के समंदर से भी अब सन्नाटा चला गया

ख़ुर्शीद का एहतराम करना चाँद को चूमना 
जाने क्यूँ इस बात पर दिल फिर पथरा गया
        
फूलों के क़त्ल का "धरम" कोई ग़वाह न था
बड़ी आसानी से बाग़बाँ बाग़ को भरमा गया

Saturday, 21 June 2025

आसमाँ के ऊपर छत देखना

ये ऐसी हक़ीक़त है कि इसको ख़्वाब में भी मत देखना 
कि मन का एक वहम है आसमाँ के ऊपर छत देखना
 
जंग दो दिलों के दरमियान है यह कोई ख़ूनी खेल नहीं 
ऐ! तुर्बतों में दफ़्न एहसासात  तुम अपनी बढ़त देखना
   
परिंदों ने आशियाँ सजाया था  तुमने दरख़्त काट दिया 
ऐ! आदम-ज़ाद तू अब यहॉँ हर मंज़र में ख़ल्वत देखना

दोनों अपने जज़्बात को एक साथ सिलना जूड़ा बनाना   
ये बातें किताबी हैं अपने यार की बाँहों में जन्नत देखना

यह कोई मामूली मरज़ तो नहीं है मक्कारी का नशा है  
बाद फ़रेबी के आईने में अपना क़द्द-ओ-क़ामत देखना 
  
छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते का क़त्ल यह गुमाँ कैसा है
दिल को पसंद नहीं  औरों की शान-ओ-शौकत देखना

कि वक़्त ढल चुका है अब वहाँ से क़याम करो "धरम"
बाद में नफ़ा'-नुक़सान खोजना अपनी तबी'अत देखना

Friday, 30 May 2025

परिंदा कोई बेनाम यारो

आसमाँ को गिरने दो इसे और न अब थाम यारो
हो जाने दो अपने भरम का तश्त-अज़-बाम यारो

इमां तो बिक चुका है मगर डर अब भी ज़िंदा है 
यहाँ अब काम कोई होता नहीं खुले-'आम यारो

कोई तो सितम हुआ की गर्दन उसकी झुक गई  
यहाँ कौन करता है  सर-ए-आम एहतिराम यारो

ख़ुशी या ग़म जो भी हो एक चराग़ रौशन करना 
कभी ज़िंदगी में ग़र हो कोई सुब्ह या शाम यारो

जिस्म ज़िंदा है मगर रूह तो सबका मर चुका है
कुछ तो बताओ यहाँ कैसे करते हो क़याम यारो  
        
अभी तो क़ाफ़िला चला ही है मंज़िल अभी दूर है
अभी से इतना मत किया करो दुआ-सलाम यारो

अभी तो सिर्फ़ ज़ुबाँ कटी है और सब सलामत है    
ठहरो की अभी कुछ और भी मिलेगा इनाम यारो

ख़याल नहीं "धरम" मगर उसका कुछ नाम तो है   
ख़ुद को तो वो कहता है परिंदा कोई बेनाम यारो       


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तश्त-अज़-बाम : भेद खुलना
एहतिराम : सम्मान

Tuesday, 27 May 2025

राष्ट्र प्रथम पर एक कविता

धर्म पूछ कर मारा जिसने 
माँ भारती को ललकारा जिसने 

वे मानवता पर हैं कलंक हैं नर-पिचाश के वंश 
अपने इस कुकृत्य का झेलना होगा इन्हें दंश 

ये सनातनी परंपरा है सिन्दूर है अनमोल 
इसे किसी भी तुला पर न पाओगे तोल 

छेड़ा है तुमने तो मोल चुकाना होगा 
आसमाँ से बरसेगी आग तुम्हें बस पछताना होगा 

जहाँ हो नारी शक्ति, वीर सपूत और धर्म भी हो साथ 
उस पवन धरती का अपमान करोगे तो काट जायेगा हाथ 

यहाँ तुमने मासूमों का अकारण रक्त बहाया है 
ऐ आतंकियों तुमने तो मानवता को भी भरमाया है 

कायरों की भाँति तुमने वार किया है आम जनों पर 
अब तो बरसानी होगी आग तुझ जैसे सर्पों के फनों पर 

तुझ जैसे पापियों को न्याय क्या है बतलाना होगा 
अदम्य साहस शौर्य पराक्रम का परिचय देना होगा 

लो ये बरसी आग तुझपर इससे अब न बच पाओगे 
अगर बच भी गए तो जीवन में और क्या पाओगे 

यह भारतवर्ष है सर्पों से भी युद्ध में धर्म नहीं छोड़ेगा 
"जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे" से युक्तियुक्त संधान करेगा 

नमन है यहाँ की सेना को उन सशस्त्र बल को 
जिन्होंने कुचला है आतंकियों को और उसके शीश महल को 

विश्व को धर्म का मार्ग बतलाते हैं यहाँ के सपूत 
सब मिलकर इन्हें नमन करें ये हैं मानवता के दूत 

इनके साहस शौर्य पराक्रम की गाथा का बार-बार करें गुणगान 
और शहीदों को दें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि और सम्मान 

!! भारत माता की जय !! 
!! जय हिन्द की सेना !!

Thursday, 15 May 2025

ज़मीं से निकाल कर लिया

ज़िंदगी पर जो फ़ैसला लिया सिक्का उछाल कर लिया
दोस्ती हो या दुश्मनी जो मिला  ख़ुश-ख़याल कर लिया

रंग-ए-मिज़ाज़ रंग-ए-फ़िज़ा ही रहा  और आरज़ू न रही
रंग-ए-स्याह को भी क़ुबूल अबीर-ओ-गुलाल कर लिया

यहाँ इंसाफ़ के तराजू का एक पलड़ा हमेशा भारी रहा   
बग़ैर जुर्म के भी ग़र कोई सज़ा मिली हलाल कर लिया

वो महज़ जुर्म न था बर्बरता की एक जागती मिशाल थी    
माज़ी का हिसाब मौजूदा ने ज़मीं से निकाल कर लिया

वह ईमान का सौदा था वहाँ ज़मीं भी थोड़ी धँस गई थी
इंसानियत जो मंज़र कभी न देखा था बहाल कर लिया
     
आरज़ूओं की महफ़िल थी वहाँ मोहरों की नुमाइश थी 
इम्तिहाँ ऐसा कि "धरम" बर्फ़ को भी उबाल कर लिया