Wednesday, 21 December 2022

तिरा कहीं ठिकाना तो हो

दिलों के फ़ासले को मापने का कोई पैमाना तो हो   
मैं दो कदम चल भी लूँ  कोई अपना ज़माना तो हो 

किसी नज़्म को  ग़र शक्ल  देना भी हो तो कैसे दूँ
आँखों में कोई इल्म ख़याल में कोई फ़साना तो हो  

कलेजे से दिल निकालकर हाथ में लिए फिरता हूँ 
दिल दूँ भी तो किसे दूँ  कोई मुझसा दीवाना तो हो 

उस एक शाम के ख़ातिर कितने शाम को जलाऊँ 
कि ख़्वाब ख़याल नज़र तिरा कहीं ठिकाना तो हो  

रास्ता ख़त्म हो गया मंज़िल का कोई पता न चला  
कैसे कहूँ की होश में था  ऐसा कोई बहाना तो हो 

अपने चेहरे पर "धरम" अपना ही  चेहरा चढ़ाना  
ख़ुद को कभी इस तरह तन्हाई में सजाना तो हो 

Thursday, 17 November 2022

हर फ़ैसला मंज़ूर रहता है

कि हर वक़्त ख़ामोश रहता है नशे में चूर रहता है
ये दिल धड़कता तो है मगर बहुत मजबूर रहता है

इल्म है पहले इश्क़ करता है फिर क़त्ल करता है 
वो एक ऐसा क़ातिल तो जो बहुत मशहूर रहता है 

सादा काग़ज़ पर बिना वादा के दस्तख़त करता है    
वो कैसा शख़्स है  जिसे हर फ़ैसला मंज़ूर रहता है

जो आग़ोश में होकर भी  एक फ़ासले पर रहता है 
वो ऐसा मर्ज़ है जैसे बिना ज़ख़्म के नासूर रहता है  

गर्म साँसें थी  थोड़ी उलफ़त थी थोड़ा फ़साना था  
ये कैसा ख़्वाब है हक़ीक़त से हमेशा दूर रहता है  

"धरम" कितनी भी सफ़ाई से क्यूँ न मिलूं किसी से 
बाद मुलाक़ात के चेहरे पर  ग़ुबार जरूर रहता है 

Monday, 7 November 2022

सबका निवाला होने दे

कोई रौशनी को क़ैद न करे पूरा उजाला होने दे 
सरज़मीं जो भी पैदा करे सबका निवाला होने दे 

ऐ ख़ुदा कुछ और इल्म दे इंसानियत काफ़ी नहीं   
जिस्म को तू कर काशी दिल को शिवाला होने दे 

कि तख़्तनशीं ग़र भूल बैठे धर्म क्या है तख़्त का 
तू खींच ले रहमत अपनी उसका दिवाला होने दे 

हर्फ़ है या है ज़िंदगी तू कर फ़ैसला इंकार न कर 
ग़र तू नहीं तो ख़ुद को ख़ुद का रखवाला होने दे 

फ़िज़ा में घोलकर ख़ुशबू रंग बहार का दे 'धरम'
क़यामत तक इंसानियत का एक प्याला होने दे 

Tuesday, 25 October 2022

आख़िरी आदाब अभी बाक़ी है

नींद पूरी हो चुकी है  मगर ख़्वाब अभी बाक़ी है 
कि मौत के बाद का कुछ हिसाब अभी बाक़ी है

दिल धड़कने का कुछ सबब तो चाहिए ही हुज़ूर 
कि साँसों में थोड़ी सी जान जनाब अभी बाक़ी है 

दिल का हर मामला ख़ुद से एक जंग है ख़ुद का 
ख़ुद से  ख़ुद का आख़िरी आदाब अभी बाक़ी है 

दिन ढल गया रात निकल आई चाँद उग आया 
फिर भी आसमाँ में वो आफ़ताब अभी बाक़ी है 

हाथ भी थाम कर रखा फ़ासला भी बनाये रखा  
होश में हैं मगर आँखों में शराब अभी बाक़ी है  

शक्ल को न तो ज़माना पढ़ पाया न ही आईना   
कि चेहरे पर 'धरम' और हिजाब अभी बाक़ी है

Friday, 21 October 2022

निगाह कभी पढ़ न सका

महज़ एक कदम चला बाद उसके बढ़ न सका 
ये कैसी बुलंदी है कि कोई भी वहाँ चढ़ न सका

आँखों में जब भी आँखें डाली नज़रें झुकने लगी   
रु-ब-रु तो हुआ मगर निगाह कभी पढ़ न सका

इश्क़ ने जब चेहरा खोला फ़न सारा नाकाम रहा 
सिर्फ़ चादर लटकाया मूरत उसकी गढ़ न सका  

धुवाँ होने लगा सब हर्फ़  क़लम दम तोड़ने लगा 
कोई भी नज़्म 'धरम' चेहरा उसका मढ़ न सका 

Sunday, 16 October 2022

फिर ज़माना संभलने लगा

कुछ देर तो साथ अच्छा रहा फिर चेहरा जलने लगा 
पहले हाथ से हाथ छूटा  फिर क़दम  फिसलने लगा
  
न तो नज़रों ही से कह पाया  न ही होठों से बयाँ हुई 
औ" काग़ज़ पर जो लिखा  वो कलाम पिघलने लगा  

जो अपनी हद में रहा  वो हर किसी की  ज़द में रहा  
दीवार हद की गिराई तो फिर ज़माना संभलने लगा 

होठों पे तबस्सुम था औ" चेहरा भी उसका साफ़ था  
सितमगर करके सितम ख़ुद हाथ अपना मलने लगा 

जब ज़मीं के  ख़्वाब को कोई  अपना आसमाँ मिला 
तब होंठ आधा खुला रहा  मगर आधा  सिलने लगा   

जब हक़ीक़त मर गई 'धरम' सिर्फ़ वहम ज़िंदा रहा
तब हर लाश को लहराता  एक कारवाँ चलने लगा 

Monday, 10 October 2022

वो ख़ूब रुलाने लगे

नींद बोझिल होने लगी कुछ ख़्वाब ऐसे आने लगे 
कैसे रुई से पत्थर तोड़कर बर्फ़ से पिघलाने लगे 

क्यूँ कोई भी चेहरा दुबारा कभी नज़र नहीं आया  
तेरी महफ़िल से निकलकर लोग कहाँ जाने लगे

ख़्वाबों से बनी दीवारें  ढ़ेर सारे ख़त से ढ़ला छत  
किसी मुंतज़िर को कब चैन की नींद सुलाने लगे 

आईने ने धीरे से कुछ कहा अक्स से नज़रें मिली 
फिर आँखों से आँखें चूमकर वो ख़ूब रुलाने लगे 

दिल में था तो दश्त था क़दमों से उतरी ख़ाक थी
ख़ुद के अंदर लोग न जाने  क्यूँ आग जलाने लगे   

सितारे अर्श के "धरम" अब ज़मीं को तकते नहीं    
सिरहाने में ख़ुद चाँद रखकर  नींद सुलगाने लगे  

Friday, 7 October 2022

मैं कुछ दर्द गढ़ता हूँ

न तो मसरूफ़ रहता हूँ न ही फ़ुर्सत में रहता हूँ
अपना त'आरुफ़ मैं कुछ इस तरह से कहता हूँ
 
जब भी ज़ख़्म मोहब्बत का ढ़लने लगता है तब 
रखकर कलेजा कील पर  मैं कुछ दर्द गढ़ता हूँ

एक तो तन्हा आईना उसमें मेरा वो तन्हा शक्ल
अक्स औ" आईने को मैं एक धागे में सिलता हूँ 

आँखों से आँखें जब मिली रूह तक पथरा गई 
कि किसके चेहरे में  मैं अपना चेहरा पढ़ता हूँ

मिलें तो ख़फ़ा होना  न मिलें तो  बे-वफ़ा होना 
हरेक इश्क़ में ये इनाम  मैं दिन-रात सहता हूँ

ग़र कोई कल हो तो  क्यूँकर हो  किसलिए हो 
उम्र भर का दर्द 'धरम' जब मैं आज रखता हूँ 

Tuesday, 27 September 2022

कि क़र्ज़ बढ़ने लगा

चाँद ख़ुद अब अपनी चाँदनी को रास्ता नहीं देता 
मोहब्बत में अब कोई किसी को वास्ता नहीं देता 

टूटे हुए लम्हों का समंदर  दिल से लपेटकर रखा   
एक भी लम्हा दिल में उफान आहिस्ता नहीं देता  

क्यूँ ख़ुद से भी यदि रु-ब-रु होता हूँ तो वो विसाल      
एक मुस्तक़बिल देता है  कोई गुज़िश्ता नहीं देता

हर वाक़ि'आ  मोहब्बत का  ज़ुबाँ पर है तो मगर  
वो बयान तो देता है हाँ! कभी नविश्ता नहीं देता

तेरा हाथ थामा तो ऐसा लगा कि क़र्ज़ बढ़ने लगा
ये एहसास 'धरम' क्यूँ कोई और रिश्ता नहीं देता

Thursday, 8 September 2022

लहू कभी उबलता नहीं

रास्ते बदलते हैं  मगर वाक़ि'आ बदलता नहीं 
कि क्यूँ बुलंदी से फ़ासला कभी बदलता नहीं 

ठोकर मारी गले लगाया  कोई वास्ता न रखा    
वो एक ऐसा पत्थर है जो कभी पिघलता नहीं 

शम'-ए-महफ़िल उसके सामने लाया ही नहीं  
वो ज़हर पीता तो है मगर कभी उगलता नहीं 

सहरा रात तन्हाई मोहब्बत कई ज़माने देखे  
इश्क़ ऐसा समंदर है जो कभी मचलता नहीं 

सुबह दोपहर शाम रात बस जलता रहता है 
लहू में ये कैसी ठंढक है कभी उबलता नहीं

न तो चलने सलीक़ा  न ही मंज़िल का 'उबूर      
ठोकर भी खाता है और कभी संभलता नहीं 

यार की बातें प्यार की बातें तकरार की बातें 
कैसा दिल है की "धरम" कभी बहलता नहीं 

Saturday, 20 August 2022

फिर कोई चुभन खलती नहीं

सुकून को जब दिल में क़ैद किया तो एक दरार उभर आया
वा'दा-ख़िलाफ़ी का ख़याल आया तो एक क़रार उभर आया

उस एक आवाज़ पर सीने में मातम छा गया गला भर आया  
औ" साथ इसके  दिल में यादों का  एक मज़ार  उभर आया
 
मुफ़लिसी हो या हो कोई और दौलत तन्हा कभी नहीं आया  
दामन का दाग से ये एक कैसा रिश्ता बे-क़रार उभर आया
 
क़ुदरत ने रिश्ता 'अता किया औ" दो रूहों ने सींचा उसको 
फिर क्या बात हुई साँसों में क्यूँ नज़रों में ग़ुबार उभर आया
 
वो एक चिंगारी थी मगर रूह को उसकी तपन अच्छी लगी 
कि बाद इसके ख़ुद को जलाने का  एक शरार उभर आया
  
वक़्त का जब ढ़लान देखा तो फिर कोई चुभन खलती नहीं 
औ" ता-उम्र के लिए 'धरम' दिल में एक सहार उभर आया    

Monday, 8 August 2022

कब रिश्ते को दौलत-ए-ईमान दे सका

कि साँसों का ग़ुलाम  तख़ईल को कब उड़ान दे सका
ख़ुद को सफ़र में  कब वो जरुरत का सामान दे सका   

बस एक चिंगारी उठी औ" दिल सुलगकर जलने लगा  
न दिल को संग बनाया न कोई 'इल्म-ए-वीरान दे सका

रूह को दिल में क़ैद करना एक क़त्ल से कम न रहा 
दिल-ए-सल्तनत  रूह को कब कोई फ़रमान दे सका

इश्क़ में या तो क़त्ल हो जाना या फिर क़त्ल कर देना 
अलावा इसके ख़ुद को कोई और न अरमान दे सका 

साँसों में साँसें क्यूँ उलझी क्यूँ सीने में मर्ज़ उभरता रहा 
इसका न कोई तबीब ही हुआ न कोई दरमान दे सका
  
"धरम" रूह में झाँका  दिल में उतरा  साँसों में समाया 
बाद इसके भी कब रिश्ते को दौलत-ए-ईमान दे सका 

Thursday, 4 August 2022

क़त्ल दुबारा कर दिया

सीने में ख़ुद ही से दिल को किनारा कर दिया
नज़रें जब मिलीं एक धुँधला नज़ारा कर दिया
 
एक ही क़त्ल पर  जवानी  कहाँ ख़त्म होती है   
आगोश में फिर लेकर क़त्ल दुबारा कर दिया
 
सर पर ताज रखा फिर अंदाज़-ए-नायाब रखा
जलाकर ताज चार सू नायाब शरारा कर दिया

घूँट में समंदर पिया  अश्क़ से फिर बना दिया
अंदाज़ा अपने कद का  ऐसे इशारा कर दिया

जनाज़ों की सीढ़ी  इंसां के लहू में तैरता तख़्त
हरेक क़त्ल  सर-ए-महफ़िल गवारा कर दिया

लेकर साँस मेरे सीने की  तेरे सीने में डाल दी
जो मेरा था "धरम"  उसको तुम्हारा कर दिया

Monday, 1 August 2022

वो ताज पिघलाता रहा

जब उड़ाकर ग़ुबार इंसान आईना देखता रहा 
शक्ल तो धुँधली रही मगर चेहरा दिखाता रहा

रिश्ता जब दफ़्न हुआ  एक कसक बचती रही  
क़ब्र की ज़मीं छोटी रही मुर्दा पैर फैलाता रहा   
  
जब मायने  उनके क़त्ल के  मुर्दों से पूछा गया   
हर ओर फैली ख़ामोश रही हल्क़ सुखाता रहा

आग़ाज़-ए-इश्क़ की चिंगारी बुझने के बाद भी 
वो एक तपन होती रही जो दिल सुलगाता रहा 

बुलंदी तब मिली जब आसमाँ और ऊँचा हुआ 
ख़ुर्शीद अपनी उम्र तक वो ताज पिघलाता रहा 

हुस्न को बुलंदी पर "धरम"  तन्हाई खलती रही 
जिस्म से लिपटने को   एक साया लहराता रहा 

Saturday, 23 July 2022

ख़ुद से एक भी चराग़ बुझा न सका

क्यूँ कभी एक भी दर्द  इंतिहा तक  आ न सका 
ऐसा क्यूँ की एक भी साँस सीने में समा न सका
 
यूँ  ख़ून-ओ-पसीना  साथ-साथ कई बार निकला 
कभी अपना ख़ून अपने पसीने से मिला न सका
 
चेहरे के एक-एक हर्फ़ को पढ़ा भी  भुलाया भी  
मगर एक भी हर्फ़-ए-ख़ुफ़्ता कभी भुला न सका 

किसी का कद बढ़ा दिया किसी का छोटा किया 
मगर एक कद को वो दूसरे कद से मिला न सका 
 
यूँ तो अनगिनत लम्हें दिल की पनाह में थे मगर  
किसी एक भी लम्हा को  सुकूँ से  सुला न सका 

यूँ तो वो सारा चराग़ हवा की ज़द में न था मगर 
कभी ख़ुद से 'धरम' एक भी चराग़ बुझा न सका 

Thursday, 21 July 2022

एक ऐसा भी सहारा कर लिया

उस एक बिखरी याद से जब किनारा कर लिया 
बज़्म में गया भी नहीं मगर हाँ नज़ारा कर लिया
 
कि शिकस्त-ओ-फ़त्ह का ख़याल आया ही नहीं  
जब उस शख़्स से  मोहब्बत  क़ज़ारा कर लिया

दुश्मन के कंधे पर सर रखा फिर न ख़बर रखा 
ज़िंदगी में कभी  एक ऐसा भी सहारा कर लिया 
 
दरमियान दो दिलों के जब फ़ासला बढ़ता गया  
वो नज़र झुकाने से पहले एक इशारा कर लिया 

जहाँ बैठे थे मुंतज़िर सारे  क़यामत के दीदार में 
जब वहाँ शरीक हुए दिल को आवारा कर लिया 
 
जब दश्त-ब-दश्त बीतता गया तन्हाई बढ़ती गई  
तब सफ़र में "धरम"  ख़ुद को पुकारा कर लिया


Sunday, 17 July 2022

वो कैसा मआ'ल था

न मैंने कभी  बुलाया था  न ही  तुम ख़ुद  आये थे 
वो एक  लम्हें की बेबसी थी  वो कैसा विसाल था 
 
राख हो चुकी  सारी यादों  को हवा  उड़ा रही थी 
दिल में  तिरे कैसी  अगन थी वो कैसा ख़याल था 
 
अश्क़ औ" लहू   एक दूसरे के  क़र्ज़दार बन गए 
 ख़ुद से  वो कैसी गुफ़्तगू थी   वो कैसा सवाल था 

ख़ामोशी की उम्र दराज़ हुई चीख सुकूँ से सो गया 
दरमियाँ ज़िंदगी और मौत के वो कैसा मआ'ल था 

तन्हाई की  क़ब्र पर  उपजी और  फैलती  ज़िंदगी 
सुकूँ को  बेचैनी पर  "धरम" वो  कैसा  'अयाल था  

Friday, 15 July 2022

काग़ज़ ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जायेगा

समंदर की  ख़ामोशी  अपनी गहराई को  बयाँ करती है 
औ" उसके बवंडर की दास्ताँ  दूसरे की  ज़बाँ करती है 

जब इश्क़ होता है तो प्याला-ए-हुस्न बे-वजूद हो जाता है 
ख़ुलूस-ए-दिल से जलाई गई आग अँधेरा कहाँ करती है 

क़लम की दौलत है तो काग़ज़ ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जायेगा 
दास्ताँ इसकी हर संग पर लिखी बातें यहाँ-वहाँ करती है 
 
उलफ़त के लफ़्ज़  बंद क़िताबों में  क़ैद  नहीं रह सकते 
दास्ताँ इसकी  धरती आसमाँ  औ" सारा जहाँ  करती है 
 
इंसाफ़ का सिर्फ़ एक तराजू  औ"  हर तन से  जुदा सर   
बड़ी शिद्दत से  इंतिज़ार "धरम" नज़र-ओ-जाँ करती है   

Saturday, 9 July 2022

कोई और इनाम नहीं देंगे

क़त्ल को इलाही ये  क़त्ल का नाम नहीं देंगे 
ये हुक्मरान अब तो कोई भी पैग़ाम नहीं देंगे 
 
सज्दे में गर्दनें  झुकी रहेंगी  क़त्ल भी  होंगी 
अलावा ज़ब्र के  कोई और  इनाम  नहीं देंगे 
 
करम की  बातें होंगी  होंठ भी  सिले जाएँगे  
ख़ुद आपको  आपका ही   कलाम नहीं देंगे 

आपके लहू की क़ीमत किसी मोल का नहीं        
आपकी शहादत पर भी वो सलाम नहीं देंगे 

न शिकस्त न फ़त्ह न ही दरमियाँ  की बुलंदी
हाथ थामकर भी 'धरम' कोई मक़ाम नहीं देंगे 


Sunday, 12 June 2022

नक़्शा बदलते देखा

सुबह को  शाम की  तरह  ढलते देखा 
लहू को  जाम की  तरह मचलते  देखा 

ता-उम्र  संग-ए-दिल के जमात में रहा  
हरेक  शख़्स का  चेहरा पिघलते देखा 

गांव  शहर  क़तरा दरिया औ"   इंसान   
हरेक  बज़्म का  नक़्शा  बदलते  देखा 

मुंसिफ़ के  सामने  एक  मुर्दे  की पेशी   
ताबूत से फिर  मुर्दे को  निकलते देखा 

हया की आढ़ में बे-हया हुस्न-औ-इश्क़ 
क्या ख़ूब एक  दूसरे को निगलते देखा

उम्र गुज़र गई "धरम" वक़्त ठहरा रहा 
उस एक लम्हा को  आग उगलते देखा  

Friday, 3 June 2022

फिर क़लम से लिखा गया

खंज़र से लिखी बात को  फिर क़लम से लिखा गया
मक़्तल की दास्ताँ को भी ख़ूब फ़हम से लिखा गया  
  
क़त्ल होने वाले क़त्ल हुए लहू का कोई मोल न रहा 
औ" ज़ालिमों के नाम को बड़े  अलम से लिखा गया

इंसान के आँखों में न तो लहू बचा न ही अश्क़ बचा  
दास्ताँ उनकी उन्हीं के दिल-ए-लहम से लिखा गया 

जब ख़याल ही जब्र था तो कोई हुदूद-ए-जब्र न रहा 
सिर्फ़ एक ही बात थी  जिसे भी वहम से लिखा गया 
 
एक ज़ालिम की बात दूसरे ज़ालिम ने लिखी "धरम"
ख़िताब-ए-अम्न बताया  बड़े ही रहम से  लिखा गया

Tuesday, 19 April 2022

कौन है किसमें कितना अंदर

एक वक़्त औ" कई सारे चेहरे जिसमें दिखते  अनगिनत मंज़र
उसकी खुली आँखें औ" ढेर  सारी यादों का  उफनता समंदर 

हुस्न औ" इश्क़  दोनों एक दूसरे को समेटे  बस खामोश रहता  
तकिये पर ज़ुल्फ़ पसारकर वो ऐसे लेटती कि हो कोई क़लंदर  

रु-ब-रु हों तो लगे कि दोनों एक दूसरे में हो इस तरह समाया 
प्रारम्भ मध्य अंत कुछ पता नहीं कौन है किसमें कितना अंदर 

कि लपटें आग की ज़ुल्फ़ों को चूमे  लहू आँखों का दीदार करे 
वक़्त के हर सितम को वो ऐसे तोड़े कि जैसे हो कोई सिकंदर 

चेहरे से निकली  रौशनी  बढ़ती दूरी के साथ  और रौशन हुई 
अपने वज़ूद को  "धरम" वो हमेशा करती रही  हुदूद से बदर 

Wednesday, 30 March 2022

एक नुमाइश-ए-बर्ज़ होता है

चेहरे  पर उदासी  औ"  दिल में  दर्द  होता है 
जो पास  तेरे जाता हूँ  तो सिर्फ़  मर्ज़   होता है  

पहले  राख बनाता है  औ"  फिर उड़ा देता है 
कि उसके इश्क़ में ऐसा भी एक फ़र्ज़ होता है 

इन्सां को  बुत बनाता है  ख़िताब डाल देता है 
ऐसा इश्क़  परदे में रहता है ख़ुद-ग़र्ज़ होता है

एक ही बात चलती है एक ही फ़साना होता है 
उसकी ज़ुबाँ से कहाँ  और  कुछ अर्ज़ होता है 

वक़्त गुजरता तो है  मगर हर  लम्हा एक सा है  
न कुछ पुराना होता है न कुछ तह-दर्ज़ होता है

'धरम'  झुककर चला औ" संग सीने पर खाया 
कि ऐसा हुनर तो एक नुमाइश-ए-बर्ज़ होता है 

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मर्ज़ - बीमारी 
तह-दर्ज़ - पूर्णतः नया
बर्ज़ - सुन्दरता

Saturday, 26 February 2022

चंद शेर

1.
ख़याल को जब भी शक्ल मिला एक झुलसा हुआ चेहरा मिला 
बदन को कोई ख़ुशबू न मिली 'धरम' रंग लहू को उतरा मिला

2.
वो पहले वा'दा-ख़िलाफ़ी करता है औ" फिर झुक जाता है 
'धरम' तन्हाई से शुरू होता है औ" इश्क़ पर रुक जाता है 

3.
सीने में उतरता तो है मगर सूराख़ नहीं करता 
कैसा इश्क़ है 'धरम' कभी बेबाक नहीं करता

4.
क्या कहें कि  एक चेहरा औ" एक ही फ़साना है 
मोहब्बत में "धरम" अब एक ऐसा भी ज़माना है 

5.
इश्क़ में "धरम" बदलता रहा  मिज़ाज उम्र भर
अश्क़-औ-लहू में होता रहा इम्तिज़ाज उम्र भर

(# इम्तिज़ाज = मिलावट) 

6.
ज़काब मेरा ख़ून-ए-दिल था "धरम" कलम उसका खंज़र था 
वो एक फ़ैसला-ए-क़िताब लिखा जिसका हर वरक़ बंजर था 

7.
ख़्वाब में मिलते भी हैं  तो लब पर ख़ामोशी रखते हैं  
औ" चेहरे पर "धरम" ख़याल-ए-फ़रामोशी रखते हैं 

8.
सितम की पैदाइश थी वो सितम का ही ज़माना था 
हर ज़ुबाँ पर 'धरम' बस फ़ाहिश का ही फ़साना था
 
(# फ़ाहिश : हद से गुज़रने वाला
# फ़साना : कहानी)

9.
हर रास्ता 'धरम' एक दलदल पर ख़त्म होता है 
औ" मंज़िल पर न जाने  क्या-क्या कत्म होता है

(#कत्म : छिपाव, पोशीदगी)


Friday, 18 February 2022

कोई भी तबीब न हुआ

अक़ीदत का एक भी फूल मेरे दामन को नसीब न हुआ  
कारवाँ में शामिल तो था  मगर कोई भी   क़रीब न हुआ  

न तो देखा हुआ तबस्सुम  न ही  तसव्वुर में उभरा चेहरा
एक अजनबी मुझसे मिला  औ" कुछ भी अजीब न हुआ  

वो शख़्स दरिया-ए-उल्फ़त की शक्ल का था औ" ख़ुश था 
उम्मीद के तराजू पर तौला गया औ" वो भी हबीब न हुआ

जहाँ भी नज़र डाली  बाद उस दोनों के  वहां कोई न रहा 
वह ऐसा शख़्स था जिसका कभी भी कोई रक़ीब न हुआ 

क्यूँ हर रोज तन्हाई की  उम्र मुसलसल  दराज़ होती गई 
'धरम' क्यूँ ज़माने में इस मर्ज़ का कोई भी तबीब न हुआ    

Thursday, 13 January 2022

एक चेहरा-ए-बशर चाहिए

हर कदम पर नई कश्ती  हर सफ़र में  नया समंदर  चाहिए 
ऐ! दिल-ए-परेशां  तुझे हर ज़ख्म पर  ख़ून-ए-जिगर  चाहिए 

हवा  शाख़ से पत्ते को उड़ा ले गई   शजर  बस  देखता रहा  
ऐ! बवंडर  तुम्हें अपने  जुनूँ का और  कितना  असर चाहिए   

तलाश-ए-यार कैसे ख़त्म होगी  तुझे ख़ुद  इसका  पता नहीं 
ऐ! अँधेरे के  अक्स तू  ये बता की   तुझे कैसी  नज़र चाहिए 

जो मेरे दामन की बुलंदी थी  वो किस-किस  को  नसीब हुई 
मुझे तो नहीं  मगर हाँ!  ज़माने को इसकी पूरी ख़बर चाहिए 

वो एक  शक्ल पर  मुखौटों चेहरों का चढ़ना-उतरना "धरम"
बावजूद इसके भी उस शक्ल को एक चेहरा-ए-बशर चाहिए