Sunday, 21 December 2025

कितना आसमान आएगा

कि कितनी ज़मीं के हिस्से में  कितना आसमान आएगा  
फ़ैसला उसका भी होगा जो दोनों के दरमियान आएगा

यह बोरिया-बिस्तर औ" यह निवाला सारा यहीं रहने दो 
सफ़र बहुत ही लम्बा है काँधे पर कितना सामान आएगा

शर्त-ए-मोहब्बत  न जाने क्यूँ हमेशा इसी पावंदी में रही
कि दिल में वही उतरेगा  जो सरापा लहू-लुहान आएगा

कभी उधर से गुज़रो जहाँ सिर्फ़ दिल-जलों की तुर्बतें हैं    
वो एहसास होगा कि दिल में न कभी इत्मिनान आएगा

जिधर मंज़िल-ए-'उरूज है उस रास्ते पर नहीं जाना है 
कि उस रास्ते में हर कदम पर लिखा सावधान आएगा

वो गुज़रा ज़माना है 'धरम' अब उसे क्यूँ ही याद करना 
कि ज़ेहन में या तो तारीक़ी आएगी या बयाबान आएगा  

Tuesday, 21 October 2025

रहबर का तमाशा देखिए

सफ़र में निकले हैं रहबर का तमाशा देखिए
मंज़िल फ़तह करने वालों की हताशा देखिए

तख़्त मिलते ही ज़ेहन में जिन्न पैवस्त हो गया
लहू में सना है ये ताज़ कैसे बे-तहाशा देखिए

मंज़िल ख़ुद ही हैरान है कौन उसको खा गया
फ़लक़ की आँखों में छाई यह निराशा देखिए

गूँगों की आवाज़ में आज ऐसी ताक़त आ गई
बहरों के कानों तक पहुँची इर्ति'आशा देखिए

अभी तो उम्र शुरू हुई है हयात पूरी बाक़ी है 
अभी से ज़मीं में गड़ने का मत तहाशा देखिए

इंसानों की जमात है इंसानियत की ही बात है 
सबके ज़ेहन में छुपा 'धरम' एक रा'शा देखिए

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इर्ति'आशा: प्रतिध्वनि
तहाशा : भय / डर
रा'शा : कंपन / थरथराहट

Monday, 13 October 2025

सफ़ीना मस्ती में टहलता है

फ़लक में ख़ुर्शीद पहले की तरह कहाँ निकलता है 
मग़रिब-ओ-मशरिक़ किसी के इशारे पर चलता है
 
ये दिल भी तो अब कहाँ पहले की तरह उबलता है 
सीने में घुसकर  अब कहाँ कोई दिल को मलता है 

उरूज यहाँ ख़ुद ही जवाल की तरफ़ फिसलता है
बशर मंज़िल पाकर अपनी ही हस्ती को छलता है

यहाँ चिलमन शक़्ल  देखकर रंग अपना उगलता है   
आलम-ए-पस-ए-चिलमन है कहाँ कोई संभलता है

माज़ी मौजूदा मुस्तक़बिल एक दूसरे को निगलता है
मगर संगीन कलम को अपनी चुटकी में मसलता है

कि लहरों के चढ़ाव पर सफ़ीना मस्ती में टहलता है 
यह देखकर 'धरम' समंदर अब और भी उछलता है

Monday, 15 September 2025

साज़िश कराई जा रही थी

मरज़ का पता नहीं मगर दवा दी जा रही थी 
कि सर-ए-आम ये बात भी बताई जा रही थी

बात कुछ और थी कलाम किसी और का था   
औ" सूरत किसी और की दिखाई जा रही थी

यहाँ क़त्ल के गुनाह को रहमत बताया गया
हर रोज़ ये कैसी साज़िश कराई जा रही थी
    
महफ़िल में ख़ामोशी वैसी की वैसी ही रही 
कैसे कहें उसके आने से तन्हाई जा रही थी

वो मु'आमला सिर्फ़ दिल का नहीं रहा होगा
क्या जाने वहाँ वो जश्न क्यूँ मनाई जा रही थी

आदमी सिर्फ़ एक ही था लिबास ढेर सारे थे  
औ" फिर सूरत पर सूरत पहनाई जा रही थी

जाने क्यूँ "धरम" बात तू-तू मैं-मैं पर आ गई  
फ़िज़ा में धुलकर सारी आशनाई जा रही थी

Wednesday, 3 September 2025

प्रथम गुरु होती है माता

प्रथम शिक्षा शिशु माता के गर्भ में ही है पाता
प्रथम गुरु होती है माता 
पाकर स्नेह पिता का शिशु गर्भ में है इठलाता 
प्रथम गुरु होती है माता

बात अनोखी भेद चक्रव्यूह का 
अजन्मा अभिमन्यु  कैसे है पाता
प्रथम गुरु होती है माता    

पश्चात् जन्म शिशु धरा के संपर्क में है आता
प्रकृति से अनायास ही बहुत कुछ है पाता 
प्रथम गुरु होती है माता

छात्र जीवन में विद्यालय की भूमिका है अद्भुत 
यहाँ आचार्यों के मार्गदर्शन में शिशु 
शिक्षा के सागर में गोता है लगाता 
ज्ञान के मोती चुनता 
अपने ललाट पर पिरोता 
प्रथम गुरु होती है माता

महाविद्यालय के प्रांगण में बन वयस्क जब आता 
ज्ञान की महिमा का अनुभव कर गर्वित होता 
गुरु के चरणों में शीश नवाता ज्ञान अलौकिक पाता 
प्रथम गुरु होती है माता

विश्वविद्यालय के प्रांगण में दर्शन जब उसे भाता 
पठन-पाठन के साथ रहस्य शोध के भी पाता
प्रथम गुरु होती है माता

गुरु के मुख से निकली विद्या संग सदा ही रहती 
चाहे कोई चुने तपोवन या चुने गृहस्थी
धर्म अधर्म के संकट से भी मिल जाती है मुक्ति  

मगर शिक्षा का ऋण यूँ ही नहीं उबरता
माथे पर यह ऋण अगर बच जाये तो  
बार बार धरा पर आना है पड़ता

लेकर ब्रह्मराक्षस का रूप 
भटकना पड़ता शिष्य की तलाश में
और यह ऋण ज्ञान देकर ही उबरता 
प्रथम गुरु होती है माता 

Monday, 11 August 2025

दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

यादों का झोंका कभी सुकूँ से सोने नहीं दिया
कि सलोने सपनों को कभी संजोने नहीं दिया

उसे बुत-ए-मसीहा के अलावा और क्या कहूँ 
वो जो तन्हाई में भी कभी मुझे रोने नहीं दिया

मेरे क़त्ल की गवाही वो ख़ंज़र ख़ुद देता रहा       
कैसा ख़ंज़र था दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

आज महताब नक़ाब में है रात भी शरमाई है  
महफ़िल ने चाँदनी को धूमिल होने नहीं दिया
  
उसका क़तरा पर कभी तो कोई एहसान था  
जो समंदर ने उसे ख़ुद को डुबोने नहीं दिया

अपने साये से बिछड़कर रौशनी खोजता है 
शख़्स जो कभी कोई  सूरज बोने नहीं दिया

दोस्ती की चादर  उसके साथ ओढ़ूँ तो कैसे 
वो तो एक भी सूत "धरम" पिरोने नहीं दिया 

Wednesday, 6 August 2025

गर्दन गुल-पोश है

मसीहा ही क़ातिल है हुक्मरान ख़ामोश है 
कि क़ातिल के लहू में बहुत गरम-जोश है

कभी फूलों को हटाईये गिरेबाँ तो देखिए  
कि बर्षों से तो आपकी गर्दन गुल-पोश है

आप न तो यहाँ आईये न ही दिल लगाईये    
सबकी तबी'अत तो यहाँ ख़ाना-ब-दोश है

कैसा क़र्ज़ है कि रस्म-अदायगी पता नहीं
अब खाली हो चुका अपना वफ़ा-कोश है 
 
पहले नज़दीक आईये फिर हाथ मिलाईये   
कि यहाँ हाथ मिलाना भी एक आग़ोश है

मंज़िल-ए-मक़सूद  जब नज़र में आ गया    
फिर बाद उसके बची ज़िंदगी बे-जोश है

अब क्या बात करें  किससे नज़र मिलायें  
यहाँ सबका चेहरा तो "धरम" रू-पोश है  

Saturday, 19 July 2025

दोनों अरमाँ निगलते हैं

जो लोग मरकर सितारे बनते हैं आसमाँ में मिलते हैं 
वो लोग उस जहाँ में भी एक दूसरे के होंठ सिलते हैं

सुबह कोई और सूरज था  शाम कोई और सूरज है 
कि ज़मीं हो या हो आसमाँ  दोनों अरमाँ निगलते हैं 

वक़्त ने जो भी मरज दिया मुसलसल बढ़ता ही गया  
कैसे कह दें कि वक़्त के मारे लोग कभी सँभलते हैं

जिन जुगनुओं की उम्मीद पर मैंने चिराग़ बुझा दिया
पता न था वो सारे मेरे दुश्मन के इशारों पर जलते हैं

वो जो सच्चाई है सब को पता है ज़मीं में दफ़्न भी है
लोग किस क़ब्र में गड़ते हैं किस क़ब्र से निकलते हैं 
    
इस बारिश के मौसम में "धरम" दो रंगों के बादल हैं  
दोनों साथ घिरते हैं  दोनों पानी औ" आग उगलते हैं 

Saturday, 12 July 2025

मिट्टी में समा गया

कैसे आँखों के आगे बादल सा कुछ छा गया
रूह जिस्म से निकलकर मिट्टी में समा गया
 
आवाज़ अनजानी थी चेहरा भी अनजाना था
न जाने क्यूँ आया औ" गीत ख़ुशी के गा गया

ख़ामोशी से आया शायद ख़ुदा का करम था     
आकर उजड़े गुलसन को फिर से बसा गया

ख़ामोशी ने शोर से न जाने क्या उधार लिया
सुकूँ के समंदर से भी अब सन्नाटा चला गया

ख़ुर्शीद का एहतराम करना चाँद को चूमना 
जाने क्यूँ इस बात पर दिल फिर पथरा गया
        
फूलों के क़त्ल का "धरम" कोई ग़वाह न था
बड़ी आसानी से बाग़बाँ बाग़ को भरमा गया

Saturday, 21 June 2025

आसमाँ के ऊपर छत देखना

ये ऐसी हक़ीक़त है कि इसको ख़्वाब में भी मत देखना 
कि मन का एक वहम है आसमाँ के ऊपर छत देखना
 
जंग दो दिलों के दरमियान है यह कोई ख़ूनी खेल नहीं 
ऐ! तुर्बतों में दफ़्न एहसासात  तुम अपनी बढ़त देखना
   
परिंदों ने आशियाँ सजाया था  तुमने दरख़्त काट दिया 
ऐ! आदम-ज़ाद तू अब यहॉँ हर मंज़र में ख़ल्वत देखना

दोनों अपने जज़्बात को एक साथ सिलना जूड़ा बनाना   
ये बातें किताबी हैं अपने यार की बाँहों में जन्नत देखना

यह कोई मामूली मरज़ तो नहीं है मक्कारी का नशा है  
बाद फ़रेबी के आईने में अपना क़द्द-ओ-क़ामत देखना 
  
छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते का क़त्ल यह गुमाँ कैसा है
दिल को पसंद नहीं  औरों की शान-ओ-शौकत देखना

कि वक़्त ढल चुका है अब वहाँ से क़याम करो "धरम"
बाद में नफ़ा'-नुक़सान खोजना अपनी तबी'अत देखना

Friday, 30 May 2025

परिंदा कोई बेनाम यारो

आसमाँ को गिरने दो इसे और न अब थाम यारो
हो जाने दो अपने भरम का तश्त-अज़-बाम यारो

इमां तो बिक चुका है मगर डर अब भी ज़िंदा है 
यहाँ अब काम कोई होता नहीं खुले-'आम यारो

कोई तो सितम हुआ की गर्दन उसकी झुक गई  
यहाँ कौन करता है  सर-ए-आम एहतिराम यारो

ख़ुशी या ग़म जो भी हो एक चराग़ रौशन करना 
कभी ज़िंदगी में ग़र हो कोई सुब्ह या शाम यारो

जिस्म ज़िंदा है मगर रूह तो सबका मर चुका है
कुछ तो बताओ यहाँ कैसे करते हो क़याम यारो  
        
अभी तो क़ाफ़िला चला ही है मंज़िल अभी दूर है
अभी से इतना मत किया करो दुआ-सलाम यारो

अभी तो सिर्फ़ ज़ुबाँ कटी है और सब सलामत है    
ठहरो की अभी कुछ और भी मिलेगा इनाम यारो

ख़याल नहीं "धरम" मगर उसका कुछ नाम तो है   
ख़ुद को तो वो कहता है परिंदा कोई बेनाम यारो       


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तश्त-अज़-बाम : भेद खुलना
एहतिराम : सम्मान

Tuesday, 27 May 2025

राष्ट्र प्रथम पर एक कविता

धर्म पूछ कर मारा जिसने 
माँ भारती को ललकारा जिसने 

वे मानवता पर हैं कलंक हैं नर-पिचाश के वंश 
अपने इस कुकृत्य का झेलना होगा इन्हें दंश 

ये सनातनी परंपरा है सिन्दूर है अनमोल 
इसे किसी भी तुला पर न पाओगे तोल 

छेड़ा है तुमने तो मोल चुकाना होगा 
आसमाँ से बरसेगी आग तुम्हें बस पछताना होगा 

जहाँ हो नारी शक्ति, वीर सपूत और धर्म भी हो साथ 
उस पवन धरती का अपमान करोगे तो काट जायेगा हाथ 

यहाँ तुमने मासूमों का अकारण रक्त बहाया है 
ऐ आतंकियों तुमने तो मानवता को भी भरमाया है 

कायरों की भाँति तुमने वार किया है आम जनों पर 
अब तो बरसानी होगी आग तुझ जैसे सर्पों के फनों पर 

तुझ जैसे पापियों को न्याय क्या है बतलाना होगा 
अदम्य साहस शौर्य पराक्रम का परिचय देना होगा 

लो ये बरसी आग तुझपर इससे अब न बच पाओगे 
अगर बच भी गए तो जीवन में और क्या पाओगे 

यह भारतवर्ष है सर्पों से भी युद्ध में धर्म नहीं छोड़ेगा 
"जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे" से युक्तियुक्त संधान करेगा 

नमन है यहाँ की सेना को उन सशस्त्र बल को 
जिन्होंने कुचला है आतंकियों को और उसके शीश महल को 

विश्व को धर्म का मार्ग बतलाते हैं यहाँ के सपूत 
सब मिलकर इन्हें नमन करें ये हैं मानवता के दूत 

इनके साहस शौर्य पराक्रम की गाथा का बार-बार करें गुणगान 
और शहीदों को दें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि और सम्मान 

!! भारत माता की जय !! 
!! जय हिन्द की सेना !!

Thursday, 15 May 2025

ज़मीं से निकाल कर लिया

ज़िंदगी पर जो फ़ैसला लिया सिक्का उछाल कर लिया
दोस्ती हो या दुश्मनी जो मिला  ख़ुश-ख़याल कर लिया

रंग-ए-मिज़ाज़ रंग-ए-फ़िज़ा ही रहा  और आरज़ू न रही
रंग-ए-स्याह को भी क़ुबूल अबीर-ओ-गुलाल कर लिया

यहाँ इंसाफ़ के तराजू का एक पलड़ा हमेशा भारी रहा   
बग़ैर जुर्म के भी ग़र कोई सज़ा मिली हलाल कर लिया

वो महज़ जुर्म न था बर्बरता की एक जागती मिशाल थी    
माज़ी का हिसाब मौजूदा ने ज़मीं से निकाल कर लिया

वह ईमान का सौदा था वहाँ ज़मीं भी थोड़ी धँस गई थी
इंसानियत जो मंज़र कभी न देखा था बहाल कर लिया
     
आरज़ूओं की महफ़िल थी वहाँ मोहरों की नुमाइश थी 
इम्तिहाँ ऐसा कि "धरम" बर्फ़ को भी उबाल कर लिया

Wednesday, 30 April 2025

दिल को कभी हैरत में न रखना

आँसुओं को बरसने देना यूँ किसी सियासत में न रखना  
दुनियाँ बड़ी ज़ालिम है दिल को कभी हैरत में न रखना

जज़्बात दिल-ओ-दिमाग की खेती है अनमोल फसल है  
तिरे जज़्बात तेरे अपने हैं  ग़ैरों की हिरासत में न रखना

आरज़ू-ए-दिल है मोहब्बत बुलँद है कोई ख़ौफ़ भी नहीं 
इस बार तू क़ुबूल कर यूँ इसे फिर से तुर्बत में न रखना

उरूज़ बढ़ता गया कदम मुसलसल मुख़्तसर होते गये 
तन्हाई ही मंज़िल है मगर दिल को ख़ल्वत में न रखना

कि आने वाली फ़िज़ा में मौसम सारे एक साथ आयेंगे
ये वक़्त का क़हर है मज्लिस-ए-'अदालत में न रखना

कि यहाँ आईना तीरगी में भी शक्ल दिखाता है "धरम" 
तुम अपनी शक्ल से ख़ुद को अजनबिय्यत में न रखना 

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तुर्बत : कब्र
ख़ल्वत : तन्हाई

Friday, 4 April 2025

पत्थरों के बयान और भी होंगे

आगे बढ़ो कि ज़ख़्मों के निशान और भी होंगे 
राह में मील के पत्थरों के बयान और भी होंगे
  
बुलंदी की मंज़िल पर  तू अभी पहुँचा कहाँ है  
बस बढ़ते चलो की आगे ढलान और भी होंगे
 
वो बात महज़ उस एक लम्हे की न रही होगी      
पुराने लम्हे  दोनों के दरमियान और भी होंगे

ख़बर न थी बज़्म में रात ख़ामोशी में गुजरेगी
यूँ महफ़िल में शामिल बे-ज़बान और भी होंगे

दिल में कोई याद नहीं ज़ख़्म सारा भर चुका
अब तो इस दिल के इम्तिहान और भी होंगे

एक ही बार में तीर निशाने तक नहीं पहुँचा  
कि दरमियान दोनों के कमान और भी होंगे

जो तख़्त-नशीं थे उनको कभी यकीं न हुआ        
कि उन आक़ाओं के हुक्मरान और भी होंगे

समंदर अभी पूरी तरह से सोया नहीं "धरम" 
कि लहरें और भी होंगीं उफान और भी होंगे 

Thursday, 27 March 2025

सूरज ने दमकना छोड़ दिया

क्या हुआ कि सितारों ने चमकना छोड़ दिया
चाँदनी मुरझाई सूरज ने दमकना छोड़ दिया

मक्कारी, फ़रेबी, बे-ईमानी बातें कैसी भी हो 
इन बातों को कहने में झिझकना छोड़ दिया

साक़ी का क़हर हो कि हो रिन्दों की बे-सब्री    
ऐसी बातों पर साग़र ने छलकना छोड़ दिया

मंज़र ज़ुल्म-ओ-सितम का हो या 'उरूज का      
अंदर किसी भी आग ने दहकना छोड़ दिया

बाद चैन-ओ-सुकूँ के भी आँखों में नींद नहीं 
थकन में पलकों ने भी  झपकना छोड़ दिया

आँखों में न अश्क़ रहा न ही लहू रहा 'धरम' 
तन्हाई में साँसों ने भी सिसकना छोड़ दिया 

Tuesday, 18 March 2025

कलियाँ लगती है झुलसाई

जो आँख खुलती है तो बजने लगती है तन्हाई
फूल झड़ जाते हैं  कलियाँ लगती है झुलसाई
 
आँखें जब मिलती है  नज़र लगती है मुरझाई
दरमियाँ दोनों के  कि बातें लगती है बिसराई

जाने किस बात पर चिड़िया लगती है इतराई
शाख को बैठी चिड़िया बस लगती है भरपाई

पहले-पहल पायल उसी ने लगती है झनकाई
कि उसने जो कही वो बातें लगती है दोहराई

वो पुरानी यादें उसकी अब लगती है दफ़नाई 
कि ख़याल आने पर साँसें लगती है अकुलाई 
   
लो उसने कह दी दोनों में लगती है आशनाई
'धरम' जिसकी बातें सबको लगती है भरमाई

Saturday, 8 March 2025

सवालों के घेरे में रहा है

उसका हरेक जवाब सवालों के घेरे में रहा है 
उसे ख़बर न थी कि वो ख़ुद भी अँधेरे रहा है

वहाँ बज़्म में सिर्फ़ इस बात की ही चर्चा रही  
कैसे मुफ़लिस के घर ख़ुर्शीद सवेरे में रहा है

दरमियान दोनों के फ़ासला  आसमाँ जितना 
तो फिर लहज़ा  क्यूँ हमेशा तेरे-मेरे में रहा है

तेरे दर से जब निकला  एक बेचैनी बनी रही  
दिल में सुकूँ रहा जब भी तेरे बसेरे में रहा है

सूरत उसकी याद है या भूल गया  पता नहीं 
कि चेहरे पर अँधेरा हर वक़्त घनेरे में रहा है

बज़्म में जाने से पहले ख़ुद को तौलना 'धरम'
ये इश्क़ भी एक खेल है साँप-सपेरे में रहा है

Wednesday, 5 March 2025

'अजीब मंज़र बना है

जब से क़तरा से कटकर  वो समंदर बना है
क्या कहें अपने माज़ी से भी बे-ख़बर बना है

इसे हाथ का जादू न कहें तो और फिर क्या
सारे मुखौटों का चेहरा  इतना सुंदर बना है

तीर उसने जो चलाया सब निशाने पर लगा 
मत पूछ ये इल्म उसमें किस-क़दर बना है

वहाँ दरख़्तों में अब फ़क़त कील फलते हैं  
ये मत पूछ वहाँ क्या ज़मीं के अंदर बना है

हर मुबारकबाद में ख़ंज़र भी साथ आया है        
दिल ऐसे ही नहीं  ज़ख़्मों का भँवर बना है

बाद मौत के 'धरम' मुर्दों में रूह तलाशना
जिधर भी देखो यही 'अजीब मंज़र बना है 

Monday, 3 March 2025

ख़ुद को निगलकर बना है

ये कैसी तपन है ये क्या पिघलकर बना है 
वो अपनी ही शक़्ल को  बदलकर बना है
  
बुलंदी की हवस है कौन किसका है यहाँ    
ऐसा क़िरदार ख़ुद को निगलकर बना है

आसाँ नहीं होता मंज़िल-ए-मक़्सूद बनना      
वो कितने मंज़िलों को  कुचलकर बना है

वहाँ आसमाँ तक जाने की सीढ़ी लगी है 
वो राह उसके घर से  निकलकर बना है

कील चुभाए रखना हवा का रुख मोड़ना  
वो हुनर है  जो काँटों पर चलकर बना है

ये ऐसी ढ़लान है जहाँ सिर्फ़ फिसलना है 
यहाँ कौन है 'धरम' जो सँभलकर बना है

Wednesday, 26 February 2025

बची मेरी उमर न थी

बात ऐसी कौन सी थी जिसकी उसे ख़बर न थी 
मगर मेरे क़द-ओ-क़ामत की कोई क़दर न थी
 
किसी तंग-दिल की मुंसिफ़ी थी क्या ही कहना      
इतनी लम्बी सज़ा जितनी बची मेरी उमर न थी
   
जो इश्क़ के परिंदे थे मौसम ढ़लते ही चले गए 
वहाँ अब परिंदों के उड़ने की कोई लहर न थी

आँखों से आँखें तो मिली मगर दिल मिला नहीं  
कोई भी मुलाक़ात  कभी ऐसी ज़ख़्म-गर न थी

फ़ासला बस दोनों को हाथ मिलाने भर का था  
मगर वो कदम भर की दूरी भी मुख़्तसर न थी

आँख से ओझल था मगर हर वक़्त नज़र में था  
उसके नफ़रत की तो कोई पैक-ए-नज़र न थी

बुलंदी अक्स ने पाई  जिसे तारीक़ी निगल गई
उसकी शख़्सियत 'धरम' सफ़र-ए-हज़र न थी   
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ज़ख़्म-गर : ज़ख़मी करने वाला/वाली 
पैक-ए-नज़र : दृष्टि की सीमा
शख़्सियत : किसी व्यक्ति का अस्तित्व या व्यक्तित्व
सफ़र-ए-हज़र : हर समय 

Saturday, 15 February 2025

दिल में न कोई ऊल-जलूल रख

ग़र सर पर ताज़ रख  तो ताज़ पर थोड़ी सी धूल रख 
अपने वतन की धूल-मिट्टी के लिए शख़्त उसूल रख

दरिया को रास्ता बताना है  रुख़ हवा का बदलना है
मुफ़लिसों के हुक़ूक़ का हमेशा  रहनुमा-उसूल रख 

यह मु'आमला मज़लूमों का है चाँद-सितारों का नहीं  
फ़ैसला देने वक़्त सामने अपने चेहरा-ए-मक़्तूल रख

ख़ाक से मोहब्बत करनी है  ये राह कुछ आसाँ नहीं      
आँखों में समंदर रख इरादा ख़िलाफ़-ए-मा'मूल रख

ये क्या बात करते हो बात चाँद-ख़ुर्शीद की करते हो             
ग़र इश्क़ है तो सारे शर्त भी मुम्किन-उल-हुसूल रख
 
इस रिश्ते की नींब 'धरम' एक बात एक ईमान से है     
तूने अब ज़बाँ दी है दिल में न कोई ऊल-जलूल रख      
   
 
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रहनुमा-उसूल : क़ानून 
मक़्तूल : मृतक/क़त्ल होने वाला
ख़िलाफ़-ए-मा'मूल : असाधारण, ग़ैरमामूली
मुम्किन-उल-हुसूल : जिसको प्राप्त करना संभव हो
ऊल-जलूल : बेमानी 

Tuesday, 11 February 2025

हर किसी को वर्ग़ला देते हैं

मसीहाई के सबूतों को  बर-सर-ए-'आम जला देते हैं 
फ़िर ख़ुदाई की बात पर हर किसी को वर्ग़ला देते हैं

फ़िज़ा में ख़ामोशी है  ज़ब्र कुछ इस कदर से तारी है 
मज़दूरी की बात पर पसीने को पानी में मिला देते हैं

ये तज़ुर्बा ये इल्म ये अदाकारी सब को हैराँ करते हैं   
पहले ख़ूब हँसाते हैं बाद उसके ता-उम्र रुला देते हैं

ज़िंदगी-मौत का खेल है तहज़ीब-ओ-तमाशा देखिए   
जीतने वाले को ब-तौर इनाम ये दश्त-ए-बला देते हैं

अपने हक़ की बात कीजिए फिर ये रिवायात देखिये   
ताज़ शराफ़त का रखते हैं फ़ैसले में बद-बला देते हैं
     
यहाँ दिल लगाने की बात "धरम" कभी मत कीजिए 
यहाँ लोग ऐसे हैं जो रोज़ क़त्ल करते हैं भुला देते हैं

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बर-सर-ए-'आम : सबके सामने
दश्त-ए-बला : desert of calamity
रिवायात : traditions
बद-बला : जान के लिए मुसीबत

Wednesday, 5 February 2025

जो शक़्ल पर कतीब था

काँटों से घिरा दिल था उसका बंज़र नसीब था 
न तो दिल-ए-खुशफ़हमी थी न ख़ुदा क़रीब था

क्या कह के पुकारते कि मुआमला अजीब था 
नुमाइश-ए-इश्क़ में गले पर दाग़-ए-सलीब था 

ज़बाँ खुली ही नहीं कि मु'आमला-ए-हबीब था 
फिर कहीं बिछड़ न जाये कुछ ऐसा नहीब था
   
रास्ते का कुछ ख़याल ही नहीं  ऐसे कबीब था
जहाँ से भी गुज़रा वो राह उसका अर्रक़ीब था

छुपाना भी मुश्किल था कि दिल ही लहीब था
वो हक़ीक़त था ऐसा  जो शक़्ल पर कतीब था

कि उन बातों का ही क्या  जो माज़ी-क़रीब था
वो गुज़रा ज़माना भी "धरम" कितना ग़रीब था  
   
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नहीब : भय, डर, आतंक
कबीब : औंधे मुंह पड़ा हुआ
अर्रक़ीब : रक्षक/ईश्वर का एक नाम
लहीब : अग्नि-ज्वाला, लपट, शोला
कतीब : लिखा हुआ
माज़ी-क़रीब : बीता हुआ समय या काल

Sunday, 26 January 2025

उजड़े दयार में रहने का

अजब इल्म है  दिल के दरार में रहने का
कि ता-उम्र एक उजड़े दयार में रहने का

'इल्म-ओ-फ़न को परखना  बोली लगाना  
अजब तौर-तरीका है  बाज़ार में रहने का

दौलत आबरू तबी'अत कुछ तो गँवाइये  
ऐसे ही नहीं मिलता अख़बार में रहने का

यहाँ से निकलना है औ" दश्त में जीना है     
जी नहीं करता यूँ चार-दीवार में रहने का

न कोई बिसात न कोई मोहरा खेल कैसा
फिर भी ख़ुद ही से तू-तुकार में रहने का

ज़मीं पर आओ अब कुछ बंदगी कर लो          
कब तक 'धरम' यूँ इश्तिहार में रहने का

Saturday, 18 January 2025

बयाबान बिफरने लगा

कुछ दूर तो वह सीढ़ी से चढ़ा फिर उड़ान भरने लगा  
मंज़िल तक पहुँचा भी न था की आसमान गिरने लगा

ग़म-गुसारों की महफ़िल थी  दिल जलने के किस्से थे  
कुछ देर तो वह ख़ामोश रहा  फिर बयान करने लगा

ज़ख़्म भी भर चुका था चमड़ी भी नई निकल आई थी   
वक़्त ने कुरेदा तो  फिर से  कुछ निशान उभरने लगा
 
बात मोहब्बत से करनी थी  बात इश्क़ की करनी थी 
सामने बस बैठे ही थे कि दिल में तूफ़ान गुज़रने लगा

पहले एक साया दो रूहों से अलग-अलग मिलता था    
अब वही साया दोनों रूहों के दरमियान उतरने लगा

दरख़्त की छाँह में 'धरम' हाथ मिलाया दिल-लगी की   
फिर दोनों को तन्हा देखा  तो बयाबान बिफरने लगा 

Monday, 13 January 2025

चेहरे पर जवाब बहुत गहरा है

लब की बात क्या कहें लब पर ख़ामोशी का पहरा है
आँखों झुकी रहती है चेहरे पर जवाब बहुत गहरा है

ख़ुदाई फिर से लौटेगी वक़्त को थोड़ा और ढ़लने दे 
लम्बे वक़्त तक पानी भला किसके दर पर ठहरा है

बात उसके मतलब की थी ही नहीं हवा में उड़ गई 
अपने लफ़्ज़ों को ज़ाया मत करो वह अभी बहरा है

बातें सितम की हो या सनम की हो कोई फ़र्क़ नहीं    
अपनी फ़िज़ा में तो बस ख़ल्वत है दश्त है सहरा है

एक बेचैनी सी है दिल में यादों की क़ब्र ज़ेहन में है   
सीने में उठी महज़ लहर है या कोई दर्द सुनहरा है

कि सिर्फ़ वीरानी थी वहाँ कोई जज़्बात था ही नहीं     
दिल का क्या कहें "धरम" दिल ता'मीर-ए-सहरा है 

Sunday, 12 January 2025

बात डूब जाने की थी

वो बात कहाँ कोई कदम साथ रखने या उठाने की थी 
दरमियान दोनों के जो भी बात थी सिर्फ़ ज़माने की थी

कि समंदर तैर भी जाते मगर हासिल क्या ही होना था   
कि शुरू से ही  बात जब एक दूसरे को भुलाने की थी
    
इश्क़ मोहब्बत फ़रियाद तकल्लुफ़ कुछ भी बचा नहीं 
सब जलकर राख हो गया बात इसी आशियाने की थी

शाख़ें दरख़्तों की कट गई  घर परिंदों का उजड़ गया
बस जरा सी बात थी बात परिंदों के चहचहाने की थी

मिलें तो नज़र चुराना राख़ यादों का फूँककर उड़ाना   
अब दोनों में जो भी बातें बची थी  दिल दुखाने की थी

था तो वो एक समंदर मगर दोनों किनारा दिखता था
एक दरिया-ए-इश्क़ में "धरम" बात डूब जाने की थी  

Monday, 6 January 2025

एक धोखा था वहम था

ज़ंजीर सारे कागज़ के बने थे फंदा महज़ भरम था
कैसे कह दें की यह कोई सज़ा थी कोई सितम था

आसमाँ का झुकना  ज़मीं से मिलना हाथ मिलाना    
जब भी ऐसा देखा था  वह एक धोखा था वहम था

सदाएँ दिल को चुभती थी शक़्ल आँखें जलाती थी
कैसे कह दें कि साथ उसका फ़ज़्ल-ओ-करम था

यार पुराना वर्षों बाद मिला कैसी अजनबिय्यत थी    
मिलकर लगा ऐसा कि जैसे कोई दूसरा जनम था

कि वो हाथ मिलाना गले मिलना आँखें चार करना     
यह सब का सब तक़ल्लुफ़ यक़ीनन चार-ख़म था 
      
लिखी हुई कुछ बातें मिटाई भी गई जलाई भी गई   
ज़माने के निगाह में 'धरम' जो लौह-ओ-क़लम था 
 

फ़ज़्ल-ओ-करम : मेहरबानी-ओ-इनायत
चार-ख़म : कुश्ती का एक दांव
लौह-ओ-क़लम : तख्ती और उस पर लिखने का क़लम, वह तख्ती जिस पर भविष्य में होने वाली सारी घटनाएँ लिखी हुई हैं और वह लेखनी जिसने यह सब कुछ ईश्वर की आज्ञा से लिखा है