Tuesday, 4 December 2018

चंद शेर

1.
मेरे  सब्र को "धरम" अब और क्या ही आज़माना
कि गुज़रते गुज़रते अब तो गुज़र गया हर ज़माना

2.
वहीं से  ज़ख्म मिला "धरम" जहाँ से  ज़ख्म भरना था
कि बाद उत्तर मिलने के अब उपयुक्त प्रश्न करना था

3.
चैन की  एक  नींद  "धरम" मौत के  पहले भी आनी चाहिए
मौत के पहले भी एक रात कब्र-ए-मुक़र्रर में बितानी चाहिए

4.
न कोई यार है मेरा न तो किसी नज़र को इंतज़ार है मेरा
ख़ुद अपने आप से भी तो 'धरम' नहीं कोई क़रार है मेरा

5.
बज़्म-ए-उल्फ़त की रौनक-ए-महफ़िल "धरम" एक उसके जाने से घटती नहीं
वो एक बार गुजरी तो क्या गुजरी मुझ पे की अब तो  कोई भी याद मिटती नहीं

6.
पीकर समंदर को  नशा सुबह  तक चारो  आखों में बनाए रखा
एक ही आग से लिपटकर "धरम" दोनों ज़िस्मों को जलाए रखा

7.
बात को जब आगे निकलनी थी तो हर दीवार टूटी  कई रास्ता बना
बुनियाद मोहब्बत की थी "धरम" मगर उसपर ये कैसा वास्ता बना

8.
इस एक सख़्श को "धरम" अब और कितना आजमाना है तुम्हें
कि क्या मोहब्बत को इसी के साथ अंजाम तक ले जाना है तुम्हें

9.
सासें बोलती रहीं "धरम" सिहरन दोनों ज़िस्मों को ज़िन्दा करता रहा
बाहों से बाहें लिपटी रहीं घूँट इश्क़ का हलक़ में  चढ़ता उतरता रहा


Saturday, 24 November 2018

बे-वफ़ा औ" बे-ईमान बनकर मिलेंगे

कभी तो हम  यार थे  मगर अब जो मिलेंगे तो अनजान बनकर मिलेंगे
एक ही  ज़िस्म में क्यूँ न रहें  मगर अलग-अलग  जान  बनकर मिलेंगे

न कभी  मैं तेरे पंख लगाकर उड़ूँ  न कभी तुम ही  मेरे ज़िस्म में उतरना
आमने सामने  भी दोनों अब  तो अलग-अलग  पहचान  बनकर मिलेंगे

न तुम मुझे  कभी आँखों से पिलाना  न मैं कभी तेरे रूह  को महसूस करूँ 
ग़र अकेले में भी मिलेंगे  तो दोनों बदन की  साँसें बेजान  बनकर मिलेंगे

महज़ रिश्ता के मरने से  सिर्फ नजदीकी ही घटती है फ़ासला नहीं बढ़ता 
अब जो हम दोनों मिलेंगे 'धरम' तो बे-वफ़ा औ" बे-ईमान बनकर मिलेंगे 

Tuesday, 13 November 2018

चंद शेर

1.
उससे हर मुलाक़ात के बाद ख़ाक सहरा का उड़ाना पड़ता है
कि क्या कहें 'धरम' दिल लगाने के बाद दिल जलाना पड़ता है

2.
वहाँ अब आग जल रही है जहाँ से पहले कभी दरिया निकलता था
वहाँ अब सिर्फ खाई है "धरम" जहाँ पहले कभी दिल फिसलता था

3.
कहाँ  कभी नींद आई "धरम" जो उसके  उड़ने का एहसास हो
कोई रिश्ता कभी पनपा ही नहीं तो कैसे कोई दिल के पास हो

4.
चिराग़-ए-दिल से अब कोई रौशनी नहीं होती सिर्फ़ धुआँ निकलता है
ज़िन्दगी ऐसे मुक़ाम पर है "धरम" जो ना तो गुज़रता है न ठहरता है

5.
मुझमें अब कहाँ  कोई रहा "धरम" जो  मुझको जानता हो
वह शख़्स अब तो ज़िंदा भी नहीं जो मुझको पहचानता हो

6.
कि बाद उसके एक बार फिर से ज़िंदगी की एक शुरुवात करनी है
मौत में पेवस्त एक ज़िंदगी से "धरम" फिर से मुलाक़ात करनी है

7.
ग़र बारिश न बची हो "धरम" तो अब आग ही बरसे
बदन की यह प्यास बुझने को अब तो और न तरसे

Monday, 12 November 2018

अपना आक़ा भूल गया

जो जल के  फिर से बुझा  तो बुझने  का  सलीका भूल गया
रौशनी के  दर पर  उपजा अँधेरा  अपना  ईलाका भूल गया

जिसको तराशा  इन्सां बनाया  तालीम दी आसमाँ दिखाया
आज महज़  एक ही बुलंदी  पाई वो  अपना आक़ा भूल गया

दिल-ए-समंदर में  जब भी  हलचल हुई तासीर रूह तक हुई
निगल कर  रूह को  सैलाब ख़ुद अपना ही  ख़ाका भूल गया

दिल मोम था तपिश अपनी थी साथ ज़माना था तो यूँ हुआ 
मोम ख़ुद से  तपकर "धरम" पिघलने  का तरीका भूल गया

Friday, 2 November 2018

चंद शेर

1.
अपनी प्यास का अंदाजा लगाये बिना वह दरिया में उतर गया
दरिया के बहाव में बहकर 'धरम' फिर न जाने वह किधर गया

2.
मेरे दिल में लगी आग 'धरम' किसी दश्त-ए-आग से कम तो न थी
वह आग सबकुछ जला गई दिल में उपजे एक सन्नाटे को छोड़कर

3.
सन्नाटा जब भी जलता है तो न राख़ बनता है न ही ग़ुबार उड़ता है
सिर्फ साँसें सुलगती हैं "धरम" दिल में एक अलग निगार बनता है

4.
ख़ुद अपनी ही लगाई आग को "धरम" क्यूँ बुझाने लगा
वो फिर से मुझे बे-वक़्त मौत की नींद क्यूँ सुलाने लगा

5.
एक ऐसा दिया जले दिल के अंदर "धरम" जिसकी रौशनी से बहार हो
क़रम ऐसा बरसे की दामन भर जाए खुशियों से औ" पूरा हर क़रार हो 

Friday, 26 October 2018

फ़ासले को बढ़ने का एक इशारा मिला

कि कब दरिया में डूबा  किसकी कश्ती से लगकर  कैसा किनारा मिला
कुछ भी पता न चला  किसके हाथों डूबते रिश्ते  को कैसा सहारा मिला

कि ख़ुद की किताब-ए-हिज़्र पर जब अपनी ही तन्हाई की रौशनी डाली
हर वरक़ में मुझे  सिर्फ़ चाँद की परछाहीं  मिली सूरज का अँधेरा मिला

कि ज़माने के महफ़िल में लौ के बुझने तलक हर दिये को निहारा गया
बाद उसके किसी के हिस्से में न कभी रौशनी आई न कोई बसेरा मिला

कि जब कभी किसी एक ख़्वाब  को तोड़कर दूसरे  ख़्वाब से जोड़ा गया
तो दरम्याँ दोनों  ख़्वाब के ग़ुबार भर आया सिर्फ  धुंधला नज़ारा मिला

कि जब हर सन्नाटा  सिर्फ़ सिसकी से टूटे तो कौन  किससे सवाल करे
दो ज़िस्म के  दरम्याँ उग आए फ़ासले को  बढ़ने का  एक इशारा मिला

कि जब भी ख़ुद  को पलट  कर देखा वीरान  दश्त का एक  पत्थर पाया
अपना नक्श-ए-पाँ तो न पाया मगर हाँ! हर ज़ख्म "धरम" ठहरा मिला 

Friday, 5 October 2018

चंद शेर

1.
यदि मैं ज़मीं भी देखूँ "धरम" तो खुला आसमान दिखता है
मुझे तो हर ओर सिर्फ अपने ही मौत का सामान दिखता है 

2.
कि यह तय कर दिया कि वो मौत नहीं तमाशा था
क्यूंकि मरने वाले का भार "धरम" महज माशा था

3.
हमारे कोष के जो भी बचे-खुचे सितारे गर्दिश में थे अब वो भी डूब गए
अब तो किस्मत के अलावा 'धरम' हम ख़ुद अपने आप से भी ऊब गए

4.
ख़ुर्शीद कल भी निकलेगा दोनों ज़िस्म कल भी जलेंगे मगर वो तपिश न होगी
हम साथ भी रहेंगे बातें भी होंगी "धरम" दरम्यां हमारे मगर वो कशिश न होगी

5.
हर हद से ऊँची उड़ान उड़ना ज़मीं तो ज़मीं तुम पूरा आसमान उड़ना
एक ही ज़िंदगी में 'धरम' तुम मौत के बाद का भी सारा ज़हान उड़ना

6.
यहाँ किसको ख़्याल था कि हर बात पर मेरा दिल बैठता है
अब तो यहाँ किसी से भी मिलना 'धरम' मुश्किल बैठता है


Sunday, 30 September 2018

चंद शेर

1.
सफर में कुछ ही दूर चलने के बाद बाकी बची दूरी का पता नहीं चला
कि उसकी मेहरबानी औ" ख़ुद अपनी ही मजबूरी का पता नहीं चला

2.
उसे किसी भी बात का 'धरम' अब कोई भी नहीं है मलाल
पहले तो सिर्फ ज़िस्म नंगा था अब बदन पर नहीं है खाल

3.
मेरा चिराग़-ए-जां बुझने से पहले एक बार जरूर देखना
कि मेरे मौत से पहले एक बार मुझको मेरे हुज़ूर देखना

4.
कि क्यूँ तेरा हर रिश्ता 'धरम' या तो बोझ या बनावटी होता है
रूह ज़िस्म जां हर किसी का मिलन सिर्फ दिखावटी  होता है

5.
बात दिल से ज़ुबाँ तक आते-आते कई बार हलक़ से चढ़ता उतरता रहा
कभी "धरम" नाउम्मीदी कभी बेख़्याली तो कभी पज़ीराई उभरता रहा 

Thursday, 6 September 2018

एक ही पैमाना है

तू किस महफ़िल से आया है तू कहाँ का दीवाना है
जो इस अंजुमन के हर तौर-तरीके से अनजाना है

यहाँ या तो हलक़ से मय उतरता है या फिर लहू
हाँ मगर इन दोनों के लिए यहाँ एक ही पैमाना है

दर-ओ-दीवार यहाँ पर्दा में रहता है हुस्न बेपर्दा है
यहाँ तो उठी औ" झुकी दोनों नज़रों का नज़राना है

बात चलती है तो दुआ के लिए हर हाथ उठता है
ग़र चले हुस्न तो यहाँ हर किसी को मर जाना है

यहाँ नशा हुस्न का मय का इश्क़ का सब बराबर है
ज्यादा या कम से हटकर यह एक अलग ज़माना है 

यहाँ किसी की ख्वाईश किसी और से नहीं मिलती 
औ" हर किसी का "धरम" अलग-अलग फ़साना है 

Tuesday, 4 September 2018

ख़ुद को तलाशने का सिलसिला

बीच से किनारा
औ" फिर किनारे से बीच का फलसफा   
जब निकला इससे
हासिल हुआ रेगिस्तां औ" जलजला

धूप और छाँह
दोनों के वज़ूद को अलग-अलग तराशते
मानो जड़ और चेतन के बीच
ख़ुद को तलाशने का सिलसिला 

अपने हिस्से का आसमाँ मिलने के बाद
ज़मीं की खोज में भटकता
कई बार उजड़े हुए गुलसन के गिर्द खो जाता
पर नहीं पाता कभी मरहला 

Friday, 10 August 2018

चंद शेर

1.
कि उदासी लब को चूमे औ" ज़ख्म दिल को रौशन करे
तो भला इस जहाँ में 'धरम' क्यूँ मेरा कोई व्यसन करे

2.
दरिया को बीच से काटकर "धरम" नया किनारा बनाया गया
किसी एक के सहारे के लिए कितनो को बेसहारा बनाया गया

3.
क्यूँ तेरे एक ख़्वाब के बाद "धरम" कभी भी कोई दूसरा ख़्वाब नहीं आता
कि दिल धड़क के रुक जाता है मगर हाँ कोई मुक़म्मल जवाब नहीं आता

4.
कि कितने गुनाहों के बाद हम उस वक़्त-ए-रुख़्सत के पनाह से निकले
खुद अपने ही सजाए क़ब्र से 'धरम' हम रंग-ए-चेहरा-ए-स्याह से निकले

5.
मैंने जब भी रास्ता बदला "धरम" मंज़िल को भी बदलते देखा
कि मैंने तो मील के पत्थर को भी मोम की तरह पिघलते देखा

6.
जब उसने जाने की ज़िद की "धरम" तो मैंने ख़ुद ही रास्ता बना दिया
बाद उसके फिर कभी न आह निकले दर्द पनपे ऐसा रिश्ता बना दिया

7.
इश्क़ का आगाज़ हुआ तो था हाँ! मगर हुस्न के ढल जाने के बाद
जैसे रात का मिलना हुआ "धरम" ख़ुर्शीद के निकल जाने के बाद

8.
परत दर परत खुलती गई नक़ाब दर नक़ाब सरकता गया
चरित्र औ" चेहरा दोनों 'धरम' कई आयाम में उभरता गया

Monday, 6 August 2018

अपने वज़ूद को बस तरशता रहा

कि हवा के रुख हुआ 'धरम' तो हवा उड़ा गई मुझे
औ" ग़र न हुआ हवा के रुख तो हवा तोड़ गई मुझे
मैं तो हर हाल में अपने वज़ूद को बस तरशता रहा 

Sunday, 5 August 2018

तो समझो रिश्ता मुकम्मल हुआ

रिश्ता महज़ दो ज़िस्मों के दरम्यां नहीं पनप सकता
दोनों रूहों का बराबर जुड़ना जरूरी होता है

संवेदनाओं की तरंगें जब दिल से निकलकर
बदन के हर रोम-कूप को जागते सहलाते
अपने होने का एहसास कराते
सर से पैर तक को सिहरन में डुबोते
सुख के अथाह सागर का देर तक अनुभव कराते
दिल और ज़िस्म के फ़ासले को मिटाते
दो सासों को एक करते

ज़हाँ के होने न होने के एहसास से इतर
दूर सितारों में कहीं घूमते हुए खो जाते
दोनों ज़िस्मों के अंदर संवेदना के
एक तीसरे ज़िस्म का निर्माण करते
और फिर उसमें दोनों समा जाते

संवेदना रूपी जिस्म के
अन्तः मन के उपजे किरण से
जब गैरों को
दो अलग-अलग जिस्मों का
बिब्म एक दिखने लगे

तो समझो रिश्ता मुकम्मल हुआ

Tuesday, 31 July 2018

चंद शेर

1.
बदन में यूँ ही तो आग न लगी होगी दिल में यूँ ही तो धुआँ न उठा होगा
कि क़फन में लिपटे जज़्बातोँ को 'धरम' जरूर कुछ न कुछ हुआ होगा

2.
कि किताब तो मुकम्मल हो गई मगर हाँ! उसके कई वरक़ कोरे रह गए
मानो ऐसा 'धरम' की मौत के बाद भी ज़िंदगी के कई सपने अधूरे रह गए

3.
ऐसा क्या ख़्याल करूँ की ग़म और पैदा हो ज़ख्म और गहरा हो
औरों के लिए वहॉँ बाग़ हो "धरम" मगर मेरे लिए सिर्फ सहरा हो

4.
साक़ी तू पैमाने में अब ग़म मिला न तो दरार-ए-दिल मिट न सकेगा
क्या कहूं "धरम" कि ये ऐसा दरार है जो बिना ग़म के जुट न सकेगा

Sunday, 15 July 2018

काम-ए-शबाब नहीं कहना

कि अब किसमें कौन कितना ज़िंदा है इसका जवाब नहीं कहना
भरी दुपहरी में उग आए उस महताब को आफ़ताब नहीं कहना

कि जिसको दिल समझा था वो तो हक़ीक़त में मकतल निकला
वहां कितने अरमानों का क़त्ल हुआ उसका हिसाब नहीं कहना

कि वो पूरी मौत थी औ" बाद उसके ज़ख्मों का असर कुछ न था
मरने के बाद फिर ज़िंदा तो हुआ मगर अब आदाब नहीं कहना

कि अब फिर से मरना गँवारा नहीं की अब ये नागवार गुजरेगा 
फिर से क़त्ल के उस ज़ुर्म को 'धरम' काम-ए-शबाब नहीं कहना

Thursday, 12 July 2018

चंद शेर

1.
ये कैसी हिज़्र की किताब है "धरम" यहाँ बहता अश्क़ बेहिसाब है
कि किसी से किसी की कोई बात नहीं होती सिर्फ होता आदाब है

2.
जो निकले थे आसमाँ के तलाश में तो अपने हिस्से की ज़मीं भी खो गई
नतीजा यूँ हुआ "धरम" कि मुझे महज़ हवा का एक झोंका ही डुबो गई

3.
इश्क़ कहाँ था "धरम" जो था वो आधा हुस्न था बाकी आधा आज़ार था
कि मख़मली लिबास में जो लिपटा ज़िस्म था वो अंदर से खार-खार था

Friday, 22 June 2018

चंद शेर

1.
जब "धरम" पानी से पानी को जलाया आग से आग बुझाई
कि तब जाकर ग़म खा के ज़िंदगी खुद मेरे क़दमों में आई

2.
पिरोया था अपनी जां को "धरम" तेरी जां में इस कदर
कि ख़ुद को पा लेता था बस देखकर तुझको एक नज़र

3.
दोनों को "धरम"अब तो इस रिश्ते के मरने का इंतज़ार करना है
क्यूँकि दोनों को अब तो अलग-अलग सख़्श पर ऐतवार करना है

4.
कि सर मेरा जब भी झुका 'धरम' क़लम कर दिया गया
उस रिश्ते में पनपे गहराई को भी भरम कर दिया गया  

Sunday, 17 June 2018

अकेला मैं ही गुनाहग़ार था

मेरे आगोश में तुम कब थे जो था वो सिर्फ तुम्हारा एक किरदार था
वो घर भी तो एक भ्रम ही था मैं जहाँ रहता था वो तो एक बाज़ार था 

तू किसी और के ज़िस्म की तपन थी क्यूँ कर मेरे ज़िस्म में उतर गई
कि बाद इसके जो मुझमें तुम्हारा वज़ूद था वो सिर्फ एक आज़ार था 

आखँ से आँखें बोलती दिल से दिल बोलता साँसों से साँसें बात करती
मगर क्यूँ जब भी ज़ुबाँ खुलती हर प्रश्न का उत्तर सिर्फ़ ख़बरदार था

कि जहाँ तूफां था ग़ुबार भी था औ" थे मेरे चंद जाने पहचाने चेहरे भी
वहां भी उस चिराग़ के बुझाने के ज़ुर्म का अकेला मैं ही गुनाहग़ार था

कि अपनी दास्ताँ-ए-ज़िंदगी "धरम" तुझको अब मैं क्या बयां करूँ
हम तो वहाँ लुटे हैं जहाँ लोग भी अपने थे औ" साथ में पहरेदार था

Wednesday, 13 June 2018

चंद शेर

1.
कि हर आलम मुझे नज़र आता तो है मगर लम्हा गुज़र जाने के बाद
मेरी आखों में लहू उतरता तो है "धरम" मगर ज़ख्म भर जाने के बाद

2.
कि मेरी याद 'धरम' उनके ज़हन में कब जा के उतरी
जब वो हर शख़्स से टूटे तन्हा हुए तब जा के उतरी

3.
इस बार की ये बेरुख़ी नाराज़गी क्या कहें जान लेकर जाएगी
औ" ग़र बच गए ज़िंदा "धरम" तो फिर ईमान लेकर जाएगी

Monday, 4 June 2018

चंद शेर

1.
हमने जिस-जिस को पनाह दिया "धरम" वह हर शख़्स नकाबपोश निकला
जब हटा नक़ाब तो हर शख़्स चेहरे का काला औ" ज़ुबाँ का ख़ामोश निकला 

2.
अब जो हम दोनों के दरम्याँ है "धरम" वो सिर्फ पर्दादारी है
जो बचा-खुचा रिश्ता का अवशेष है वो सिर्फ एक बीमारी है

3.
जब भी खुलती है आँख 'धरम' तो अंधेरे पर रौशनी का धोखा होता है
औ" ग़र खुल गई ज़ुबाँ तो बाद उसके जो होता है वो अनोखा होता है

4.
कि जब भी तुमने ज़ुबाँ खोली "धरम" मेरी इज़्ज़त को किया तार-तार 
जब मिलाया हाथ तो महज़ एक ज़ख्म के पीछे दिए ज़ख्म कई हज़ार

5.
कि बाद इस मुलाक़ात के जो भी बचा-खुचा भ्रम था वह टूट गया 
ज़ुल्म इतना हुआ 'धरम' की मेरे सब्र का अंतिम घड़ा भी फूट गया

Sunday, 3 June 2018

वो रिश्ता जो बे-आबरू होकर हलाक़ हुआ

तेरे साथ का वक़्त-ए-मुलाक़ात भी तो तन्हा ही गुजरता है 
आँखें बंद करूँ तो भी तस्सबुर में तेरा चेहरा नहीं उभरता है

तेरे हर रंग-ए-मिजाज़ को मैंने देखा औ" सीने से लगाया भी
वो रंग-ए-उल्फ़त तेरे चेहरे पर देर तलक़ क्यूँ नहीं ठहरता है

ख़ुद को ज़मीं पर रखकर ज़माने से नहीं अपने आप से पूछो
क्यूँ तेरा हर शाग़िर्द तेरे परछाहीं से भी मिलने से मुकरता है

न ही मेरे आखों को सुकूँ मिला न तश्ना-लब की प्यास बुझी
हर वक़्त-ए-मुलाक़ात में तेरा चेहरा ये किस तरह निखरता है

वो रिश्ता जो तेरे ही पहलू में बे-आबरू होकर हलाक़ हुआ था
मैं सोचता हूँ तो दिल मेरा टूटकर कई टुकड़ों में बिखरता है

कि मैं अब तो तुझसे फ़ासले पर ही क़याम करता हूँ "धरम"
तुझसे करीबी के बात पर तो जिस्म औ" रूह दोनों सिहरता है

Sunday, 20 May 2018

चंद शेर

1.
क्यूँ इन्तहाँ के बाद का ही मंज़र आखों में ठहरता है
ज़ुबाँ खामोश रहती है 'धरम' सिर्फ चेहरा उतरता है

2.
ये न तो कोई मंज़िल है न ही कोई रास्ता है "धरम" जहाँ अभी रुका हूँ मैं
ऐ! बीता वक़्त तू मुझे अब ये बता कि किस-किस के सामने न झुका हूँ मैं 

Sunday, 13 May 2018

एक और कब्र का उभर जाना हुआ

जिस इन्तहाँ के इंतज़ार में था उसका कई बार गुज़र जाना हुआ
मुझे एहसास भी न हो सका कि कैसे कई बार बिखर जाना हुआ

महफ़िल थी ख़्वाब था किरदार थे औ" थे मेरे कुछ कद्रदान भी
सिर्फ एक ही इन्तहाँ के बाद कैसे इस सब का उजड़ जाना हुआ

कभी तो ज़ख्मों तले भी मुझको कुछ ख़ुश-नुमा एहसास होता था
मगर ये कैसी ख़ुशी मिली कि ज़ख्म का ता-उम्र ठहर जाना हुआ 

कि बाद मेरे मरने के भी उस सितमगर का क़हर मुसलसल जारी था
नतीजा यह हुआ की मेरे कब्र पर एक और कब्र का उभर जाना हुआ

मेरी तलाश-ए-ज़िंदगी महज़ उस मौत के बाद ख़त्म नहीं हुई थी
मगर क्यूँकर उस रूह का बस एक ही ज़िस्म में ठहर जाना हुआ

वो वक़्त भी गया वो ज़िंदगी भी गई "धरम" कि वो ज़िस्म भी गया
क्यूँ फिर से पिछले ही ज़ख्मों का नई ज़िंदगी में उभर जाना हुआ

Tuesday, 1 May 2018

निकलेगा कोई नतीजा नहीं

तेरा मुझ पर कोई रहम-ओ-क़रम नहीं औ" कोई वफ़ा नहीं
दिल किस तरह से टूटा मेरा इसका तुझे कोई अंदाजा नहीं

मेरे इस टूटे दिल को तो "धरम" अब हिज़्र ही मजा देता है 
अब फिर से न बढ़ाओ हाथ कि निकलेगा कोई नतीजा नहीं 

Friday, 27 April 2018

ज़हर पिला दिया मैंने

जब भी ख़्याल दिल-ए-आबाद हुआ उसे जला दिया मैंने
औ" बाद उसके मौत के बाद की नींद भी सुला दिया मैंने 

कि जिस किरदार को मैंने पैदा किया पाला मशहूर किया
खुद अपनी मौत से पहले उसको ज़हर पिला दिया मैंने

ये इश्क़ हुआ कि क्या जाने मेरी मौत का तमाशा ही हुआ
क्यूँ कर खुद ही अपनी हस्ती को मिट्टी में मिला दिया मैंने 

एक तो तू उजड़ा चमन औ" उसपर तेरी बातों में भी बेरुखी
हाय! ये किसके इंतज़ार में खुद अपनी हड्डी गला दिया मैंने

इस रात के ढल जाने के बाद एक और सुबह की उम्मीद है
इस बात पर अपने दिल में एक और चिराग़ जला दिया मैंने

मुझे अब भी रौशन हैं उम्मीदें कि ज़हाँ मेरा भी आबाद होगा
हरेक ग़म को ठोकर मारकर अपने पहलू से भगा दिया मैंने

तेरे दामन में सिर्फ कांटे ही आबाद होंगे फूल कभी न आएगा
कि ये लो तेरे मुकद्दर का फैसला आज तुमको सुना दिया मैंने 

जिस बुझते हुए लौ को कभी सींचा था अपने ही खून से मैंने
आज खुद "धरम" अपने एक ही फूँक से उसे बुझा दिया मैंने

Thursday, 26 April 2018

चंद शेर

1.
जो हक़ीक़त है वो कोई ख़्वाब न था औ" जो ख़्वाब था वो कभी हक़ीक़त न हुआ
कि तेरी ज़िंदगी का ऐसा कौन सा लम्हा है 'धरम' जो तेरे लिए गनीमत न हुआ

2.
ऐ! ज़िंदगी अब तू न मेरे ज़िस्म में उतर न मेरे लहू में दौड़ कि पूरा बदन दुखता है
कि मौत के दस्तक का एहसास "धरम" अब तो जी को बिल्कुल ही नहीं चुभता है

3.
हमने जो बात रखनी थी "धरम" हमने रख दी थी कि बारी अब तुम्हारी थी
महज़ एक ही झटके में तुमने टाल दी थी वाह क्या खूब तेरी समझदारी थी

4.
जब तुझको देखता हूँ 'धरम' अंदाज़-ए-ज़माना याद आता है
औ" बाद उसके तेरे ज़ुर्म का एक-एक फ़साना याद आता है 

Sunday, 22 April 2018

कि वो क़त्ल भी हमारा नहीं हुआ

कि तेरी नज़र में रहकर भी मैं कभी तेरा नहीं हुआ
क्यूँ एक भी बार मेरी ज़िंदगी में कोई सवेरा नहीं हुआ

तेरे हर लफ्ज़ में उलझन थी औ" थी हर नज़र पशेमाँ
तू ये कैसी दरिया है जिसका कोई किनारा नहीं हुआ

जाम के सहारे यारों कभी हम भी चलते तो थे मगर
रुख़्सत-ए-जाम के बाद कभी कोई सहारा नहीं हुआ

कि ख़ुद अपनी गलतियों का अब क्या हिसाब करूँ
जब सही फैसले पर भी मेरा कहीं गुज़ारा नहीं हुआ

उजड़े हुए गुलसन पर ख़ुद क़त्ल कर तो दी ज़िंदगी
क्या कहें "धरम" कि वो क़त्ल भी हमारा नहीं हुआ

Monday, 2 April 2018

किसी का किसी से कोई रिश्ता नहीं

कि दिल किस ज़ख्म से आबाद होगा इसका अंदाजा नहीं
तेरे जी को क्या चाहिए इसका ख़ुद तेरे जी को पता नहीं
 
हुस्न की दहलीज़ पर जाकर भी तुम तश्ना-लब लौट आए
अब ख़ुद ही से तुम ये पूछो की क्या ये भी तेरी ख़ता नहीं 

ऐ! ख़ुशी तू मेरे पहलू में आते ही एक मातम बन जाती है
इस बात का मुझे एहसास है तू मुझे और कुछ भी बता नहीं

क्यूँकर बुलंदी की हर राह एक सन्नाटे पर ही ख़त्म होती है
कि क्या इसके अलावा कहीं भी बचा कोई और रास्ता नहीं

आज वो ज़ाम भी धोखा दे गया जिसमें कल तक ज़हर था
पूछा तो पता चला की उसका मुझसे अब कोई वास्ता नहीं

क्यूँ महज़ एक मौत के बाद फिर कोई सितमगर नहीं आया 
इस ज़हाँ में तो "धरम" किसी का किसी से कोई रिश्ता नहीं 

Monday, 26 March 2018

बुझते दिये को मैंने फिर से जलाया है

कि मुरझाया फूल भी यदि मेरे दामन में आया है
मैंने उसे भी इज़्ज़त से अपने माथें पर सजाया है

निकालकर दिल से मुझे जब तुमने ठोकर मार दी
न जाने कितने हाथों ने मेरे ज़ख्मों के सहलाया है

मेरे नाम से जुड़ने का अब तो कोई शौक नहीं तुझे
तुमने उस गुज़रे ज़माने के हर याद को भुलाया है

वो मेरे वफ़ा का क़त्ल भी था औ" थी तेरी मेहरबानी
तेरे उस सितम ने तो मुझे बिना दरिया के डुबाया है

मेरे उम्मीद को फेरने के लिए तेरे पास तो समंदर था
जब भी प्यास लगी उससे एक बूँद भी पानी न पाया है

मैंने बढ़ाया है हाथ फिर से चाहो तो गले लगा लो मुझे
कि एक बुझते दिये को "धरम" मैंने फिर से जलाया है 

चंद शेर

1.
हमने ढ़ेर सारे ज़ख्मों को 'धरम' नासूर बनते देखा है
एक तरफ़ा प्यार में बिना बात के हुज़ूर बनते देखा है

2.
ये मेरे तस्सबुर के चाँद के टुकड़े हैं कि तू आ तुझे इसमें लपेट दूँ
तेरे इस बेपनाह हुस्न को 'धरम' मैं अपने हाथों से चाँद में समेट दूँ

3.
मुझे चाहने वाले भी कुछ लोग हैं "धरम" जिसके लिए ज़िंदा हूँ मैं
मगर तेरी नज़र में तो बस क्या कहूँ भटकता हुआ एक रिंदा हूँ मैं 

4.
कि मेरी उड़ान तेरी ज़िंदगी की उड़ान से कुछ कम तो न थी 
मगर फिर भी तेरे लिए तो महज बिना पंख का परिंदा हूँ मैं

Friday, 16 March 2018

अब फिर से मेरी मौत नहीं होगी

कि आपके शान में मेरी तरफ से अब कोई और गुस्ताख़ी नहीं होगी
मुझे पता है कि बाद इस माफ़ी के अब कोई और माफ़ी नहीं होगी 

कि ये एहसास मुझे तब हुआ जब अरसा बाद हम दोनों रु-ब-रु हुए
जो तुम में वो किरदार ही न रहा तो अब फिर वो महफ़िल नहीं होगी

कि किस इरादे से बात रखे थे और किस मुक़ाम पर तुम मुझे ले आए
बाद इस मंज़िल के तेरे बताए किसी और मंज़िल की ज़ुस्तज़ू नहीं होगी

कि ग़र मेरे क़त्ल की ही तमन्ना थी तो मुझे कह दिए होते मैं जां दे देता
मगर हाँ! तेरे बख्शे इस मौत के बाद अब फिर से मेरी मौत नहीं होगी 

कि ग़र वक़्त ने यदि ये दौर बख्शा है तो हालात ने मुझे सिखाया भी है
हाँ! रिश्ता ज़िस्म जां और रूह हर किसी की मौत एक जैसी नहीं होगी

कि इस क़रीबी के दरम्यां पसरे सन्नाटे को मर जाने तक छोड़ देना है 
हाँ! रूह के ज़िंदा रहने तलक "धरम" अब कोई और बात नहीं होगी 

Wednesday, 7 March 2018

चंद शेर

1.
हर हवा के सामने "धरम" मेरा ही चिराग़ है
हाँ मगर इसमें मेरे जलते लहू की आग है

2.
हमारे दरम्या बात वफ़ा की कब थी जो था परस्पर का सहारा था
कि न कभी तुम ही हमारे थे 'धरम' और न ही मैं कभी तुम्हारा था

3.
कि हो पंख उड़ो तब गरुड़ सदृश औ" बोलो तो निकले दहाड़
हर हीन भावना पर "धरम" तुम खुलकर करो प्रचंड प्रहार

4.
कि अब बताओ तेरे लिए कौन सी गली बाकी है कौन सा द्वार बाकी है
ये भी बताओ "धरम" की तेरे बुलंद हौशले का कितना पारावार बाकी है

5.
वसीयत के नाम पर स्थाई ज़ख्म मिला औ" मिली कई तस्वीर
जब भी ज़माने से किया नेकी "धरम" अपने हिस्से आया जंज़ीर

6.
सब ताज़ उछाले जाएँ सब तख्त गिराए जाएँ
सारे चेहरों से "धरम" अब नक़ाब हटाए जाएँ

7.
इस सुकूँ के बाद "धरम" अब बाकी कोई सुकूँ नहीं
तुम जब मिल ही गए तो अब बाकी कोई जुनूँ नहीं

8.
एक ही रास्ता एक ही मंज़िल औ" दरम्याँ हमारे कोई फ़ासला भी नहीं "धरम"
फिर न जाने क्यूँ तुम चलते चलते रुक गए थे मैं बोलते बोलते चुप हो गया था

Saturday, 17 February 2018

चंद शेर

1.
कि दो महज ज़िस्म "धरम" कब तलक एक साथ रह सकते हैं
दोनों के दरयमां कोई तीसरा न आ जाए तब तलक रह सकते हैं

2.
उसके वफ़ा की बात जब जफ़ा तक आ गई तो हमने किनारा कर लिया
जब ज़िंदगी की उम्मीद ही न बची 'धरम' तो ख़ुद को बेसहारा कर लिया

3.
उसकी नज़र में तुम कब न थे 'धरम' तेरी नज़र में वो कब न था
जब तक रिश्ते ने दम न तोड़ा था दोनों एक दूसरे के नज़र में था

4.
बात लगातार बिगड़ती रही फिर भी उम्मीद-ए-लुत्फ़ ज़िंदा रहा
अंतिम नतीजा यह हुआ 'धरम' कि मैं बिना पंख का परिंदा रहा 

5.
तेरा हर अंदाज़ "धरम" ऐसा लगता है कि अंदाज़-ए-ज़माना है
मगर फिर भी क्यूँ ऐसा लगता है कि तेरा-मेरा कोई फ़साना है

6.
अपने क़त्ल पर "धरम" आपको रुस्वा नहीं होंगे ये मेरा आपसे वादा है
आप ये बताएं कि क़त्ल के अलावा क्या आपका कोई और भी इरादा है 

Sunday, 11 February 2018

सलमा और नूरज़हाँ का कोठा

कल सलमा नाची नहीं थी| उसके पैर में थोड़ा सूजन था| नूरज़हाँ थोड़ी ख़फा थी सलमा पर| सलमा वर्तमान में उस कोठे की नूर थी जिस कोठे पर कभी नूरज़हाँ के कई कद्रदान दमभर के दौलत लुटाते थे| यूँ तो सलमा नूरज़हाँ की औलाद न थी मगर उसकी बहुत प्यारी थी| सलमा, नूरजहां के कोठे की एक कनीज़ और उस शहर के एक नामी रईस की पैदाईश थी| यूँ तो नूरज़हाँ अब ढल गई थी मगर हुस्न अब भी उसके कैद में था| उसके शौक अब भी वैसे के वैसे ही थे जैसे जवानी में हुआ करते थे| हो भी क्यूँ नहीं? नूरज़हाँ को सलमा जैसी नूर मिल गई थी जिसे मानो ख़ुदा ने ख़ुद अपने हाथ से सजाया हो| बला की ख़ूबसूरत| नूरज़हाँ, सलमा में अपनी जवानी देखती थी| शहर के लौंडों को नूरज़हाँ अब भी ऊँगली पर नचाती थी| नूरज़हाँ के कई शौक थे| एक से एक रईसज़ादे, सरकारी अफ़सर, हट्ठे-कट्ठे नौजवान, हुस्न के कद्रदान सब के सब नूरज़हाँ के नज़ाकत के अब भी शिकार थे| सलमा का बीमार पड़ना नूरज़हाँ को बिलकुल ही पसंद नहीं था| मगर तबीयत पर नूरज़हाँ के हुस्न का कोई ज़ोर नहीं चल सकता था| बात सलमा के बीमार होने की थी| नूरज़हाँ ने शहर के सबसे बड़े डॉक्टर को बुलावा भेजा| डॉक्टर साहब आए और नूरज़हाँ के क़दमों में अपनी हाज़िरी पेश किए| नूरज़हाँ ने अपने पुराने अंदाज़ में ही डॉक्टर साहब का ख़िदमत किया| डॉक्टर साहब अब सलमा की नब्ज़ टटोल रहे थे|   बीमारी बिल्कुल ही मामूली थी| डॉक्टर साहब सलमा को दवाई और नूरज़हाँ को दिलाशा देकर चले गए| कोठे की 3-4 लौंडियाँ अब सलमा के क़दमों में पेश-ए-ख़िदमत थी|

अगले दिन के मुज़रे का न्योता नूरज़हाँ बहुत दिन पहले ही शहर के ढेर सारे नए-पुराने रईसों को भिजवा चुकी थी| नूरज़हाँ को उस रात नींद नहीं आ रही थी| उसके साख की बात थी| सलमा का अचानक से बीमार होना नूरज़हाँ का सरदर्द बन गया था| मगर अब क्या हो सकता था, नूरज़हाँ बार-बार उठकर सलमा को देखने जाती थी| सलमा को चैन की नींद सोते देख नूरज़हाँ को काफी तस्सली हुई| रात्रि के अंतिम प्रहर में नूरज़हाँ भी नींद के आगोश में खो गई| सुबह सलमा थोड़ी देर से उठी और नूरज़हाँ उससे भी और थोड़ी देर से उठी|  नूरज़हाँ सुबह उठकर सलमा का नज़र उतारती है और फिर महफ़िल के तैयारिओं का मुआयना करने चली जाती है| नूरज़हाँ चिंतित है की उसके पुराने कद्रदानों को किसी चीज़ की कमी महसूस न हो जाए| इस बात को लेकर कोठे पर के कई लौंडियों को नूरज़हाँ कई बार आँख दिखा चुकी है| दोपहर अपनी जवानी से बुढ़ापे की ओर ढल रही थी| उस शाम के आने की थोड़ी-थोड़ी आहट हो रही थी जो की नूरज़हाँ के कोठे पर एक साल में एक बार ही आती है| इसी बीच में नूरज़हाँ एक बार सलमा को निहार लेती है| सलमा के तबियत को लेकर नूरज़हाँ अब पूरी तरह से निश्चिंत हो जाती है| ढेर सारे रंग के फूल, मदहोशी ख़ुश्बू वाले इत्र, पीकदान, पान, शाही अंदाज़ वाले बैठक, कालीन और कई ढेर सारे चीज़ों का नूरज़हाँ ख़ुद ध्यान रख रही थी| ये सारी चीज़ें उस शाम के रौनक को और हसीं बनाने वाले हैं| अब वक़्त आ चला था, उस शाम की शहनाई बज उठी| नूरज़हाँ पूरे साज़-ओ-सामान के साथ महफ़िल में आ गई|

बाबू राम खेलावन सिंह उनके कोठे से सबसे पुराने रईस थे| वो अपने चार लौंडों को दोपहर में ही नूरज़हाँ के कोठे पर अपने आने की सूचना देकर भेज थे| वो चारो लौंडे शाम की शहनाई बजते ही नूरज़हाँ के कोठे की सीढ़ी पर उपस्थित हो गए| बाबू राम खेलावन सिंह अपनी बैलगाड़ी पर बैठे चले आ रहे थे| उनकी अगुवाई में नूरज़हाँ अपने दो लौंडे भेज चुकी थी| कोठे से 50 मीटर की दूरी से ही वो दोनों लौंडे बाबू राम खेलावन सिंह के ख़िदमत में पेश थे| बाबू राम खेलावन सिंह अब कोठे की सीढ़ी तक पहुंच गए थे| नूरज़हाँ की दो लौड़ियाँ कालीन के ऊपर अपना दुपट्टा बिछा देती है और नूरज़हाँ ख़ुद चलकर बाबू राम खेलावन सिंह को उनके बैठक तक पहुँचाती है| पूरी तहज़ीब के साथ बाबू राम खेलावन सिंह भी नूरज़हाँ के क़दमों में एक शेर पेश करते हैं:
                                            तेरे ख़्याल के बाद भी सिर्फ तेरा ही ख़्याल था
                                            कि ऐ! नूरज़हाँ बिन तेरे मेरा जीना मुहाल था 

बाबू राम खेलावन सिंह के इस शेर पर नूरज़हाँ झुककर आदाब पेश करती है और फिर बाबू राम खेलावन सिंह सोने के दो सिक्के नूरज़हाँ के क़दमों में रख देते हैं|

कामता प्रसाद और अम्बिका प्रसाद सगे भाई थेl यूँ तो दोनों मुश्किल से ही कभी एक साथ बैठते थे मगर नूरज़हाँ के कोठे पर यौवन का आनंद दोनों एक साथ उठाते थेl नूरज़हाँ उन दोनों भाइयों के आखों की नूर थीl उनके भी आने का वक़्त हो चला थाl नूरज़हाँ की लौंड़ियाँ कोठे के दरवाजे से लग कर उनकी राह देख रही थीl कामता प्रसाद अपने घोड़ा-गाड़ी और अम्बिका प्रसाद अपने बैल-गाड़ी पर दूर से आते दिखाई दिएl जो लौंडियाँ उनकी राह देख रही थीं उनके इंतज़ार का वक़्त ख़त्म हुआl नूरज़हाँ को दोनों भाइयों के आने की ख़बर लेकर एक लौंड़ी दौड़ पड़ती हैl नूरज़हाँ दोनों भाइयों का भव्य स्वागत करती हैl नूरज़हाँ ख़ुद अपने हाथों से दोनों भाईयों के कुर्ते पर इत्र लगाती है, गिलौरी पान खिलाती है और मटककर उनको अपने-अपने बैठक तक ले जाती हैl कामता प्रसाद दिल से शायर भी थेl नूरजहां के लिए एक शेर उन्हौंने भी पढ़ा: 
                              ऐ! नूरज़हाँ मैं यही दुआ करता हूँ कि ये रात मुख़्तसर न हो
                              बाहें तेरी हो औ" उसमे मेरे अलावा किसी और का सर न हो

कामता प्रसाद के इस शेर पर बाबू राम खेलावन सिंह की भृकुटि तन गई थी जिसे नूरज़हाँ ने बड़ी अच्छी तरह से भांफ लिया थाl बाद इसके नूरज़हाँ के इशारे पर एक लौंड़ी बाबू राम खेलावन सिंह को अपने हुस्न की थोड़ी सी चटनी चटा देती हैl  ..............अभी जारी है लिखना......

चंद शेर

1.
कि हमने जिसको जिया था वो ज़िंदगी कोई और थी
वहां खुदा कोई और था 'धरम' वो बंदगी कोई और थी

2.
कि क्यूँ कर न मेरी ज़ुबाँ ही खुलती है 'धरम' औ" न ही मेरा चेहरा बोलता है
मोहब्बत ये तेरी कैसी मेहरबानी है कि अब मुझको तो ग़म भी न मिलता है 

3.
हर बार बस यहीं सोचता हूँ कि इस सफर के बाद अब कोई सफर न हो
क्यूँ भूल जाता हूँ "धरम" कि ग़र सफर न हो तो ज़िंदगी का बसर न हो

4.
कि जहाँ से याद था राह-ए-ज़िंदगी अब वहीँ से रास्ता भूल गया हूँ मैं
ऐ 'धरम' मुझे अब मुकाम-ए-ज़िंदगी के ठोकरों की कोई परवाह नहीं

5.
ज़ुबाँ की बेज़ुबानी अब भी है कोई छुपी कहानी अब भी है
कि तुझमें "धरम" कहीं कोई खामोश बेईमानी अब भी है

6.
जिस रात की कोई सुबह नहीं उस रात के बीतने का इंतज़ार ही क्यूँ
ये जानकर भी "धरम" सूरज की पहली किरण के तलबगार ही क्यूँ

Thursday, 1 February 2018

चंद शेर

1.
ये बिल्कुल लाज़िमी नहीं 'धरम' की ज़िन्दी का हर सपना पूरा हो
मगर ऐसा भी न हो कि किताब-ए-ज़िंदगी का हर वरक़ अधूरा हो

2.
ज़माने की बात चली "धरम" तो हमने भी ज़माने को सुना दिया
पहले तो हरेक शख़्स को पहचाना और फिर हर चेहरा भुला दिया

3.
क्यूँकर हर मुलाक़ात में "धरम" लब ख़ामोश रहता है सिर्फ चेहरा बोलता है
कि एक के बाद एक और दर्द और फिर सिर्फ सिलसिला-ए-दर्द ही चलता है

4.
अब आ की तुम भी उसी आग में जलो जिस आग में जलता हूँ मैं
कभी तो पत्थर था "धरम" अब तो मोम की तरह पिघलता हूँ मैं

5.
हम कब तलक ज़िंदा रहें महज़ एक तेरे वादा-ए-सुखन के साथ
कि दिल हर रोज़ बुझता है "धरम" एक अनजाने जलन के साथ


Saturday, 6 January 2018

चंद शेर

1.
हक़ीक़त में भी मेरी ज़िंदगी में 'धरम' तुम तुम न थे मैं मैं न था
औ" बाद मरने के भी मेरी कब्र में तुम न थे तेरी कब्र में मैं न था

2.
कि अभी तो मैंने बात रखी थी अभी ही उसने टाल दी
मेरे पैदा होने से पहले ही 'धरम' उसने गर्दन हलाल दी

3.
खुद तेरी ही महफ़िल में "धरम" तेरे नाम का कोई जाम भी नहीं
ये तेरी ज़िंदगी में कैसा मुक़ाम है कि अब तुम बदनाम भी नहीं

4.
कि तुमको आवाज़ दूँ तो दिल दुखता है न दूँ तो जी घबराता है
देखूँ जो गैरों से बात करते "धरम" तो पूरा बदन जल जाता है 

5.
हरेक दिलाशा महज़ एक भरम है हर जोड़ से टूटता करम है
बात तो सब के डूबने की थी पर क्यूँ डूबता सिर्फ "धरम" है

6.
कि दिल से दिल मिलाकर भी जब उसने वफ़ाई छोड़ दी
नज़र से नज़र मिलाकर "धरम" हमने भी बात मोड़ दी