Friday, 27 December 2013

चंद शेर

1.
ये कैसी मुसीबत है कि दुआ-ए-हर्फ़-ए-आशिक़ भी बे-असर निकला
मेरे घर से मेरे इश्क़ का जनाज़ा निकला और मैं ही बे-खबर निकला

2.
जो जलाया था चराग-ए-इश्क़ मैंने कभी अपने जिगर-ए-लहू से
उसके दामन में तो बहार आई  मेरे ही हिस्से में तीरगी निकला

3.
वो वफ़ा की बात थी और करार-ए-मिलन-ए-चौदवीं की रात थी
मैं ता-उम्र उसकी याद मैं बैठा रहा और वो इससे बे-खबर निकला

4.
हम न तो खुद के हुए न ही ज़माने के हुए
न साक़ी के हुए और न ही पैमाने के हुए

5.
हर्फ़-ए-दुआ-ए-कातिल था अच्छा हुआ बे-असर निकला
वो मेरे घर से होकर निकला और मैं उससे बे-खबर निकला 

Saturday, 7 December 2013

ज़िंदगी

ज़िंदगी की डोर भी बड़ी अजीब होती है
जितनी सुलझाओ उतनी उलझती चली जाती है

जब भी कभी ज़ख्म पर मरहम लगाता हूँ
तो और भी गहरा ज़ख्म उभर कर आता है

जब भी दिल में अपने लहू का चिराग जलाता हूँ
न जाने क्यूँ आँखों के सामने अंधेरा छा जाता है

चांदनी रात भी अब अमावस सा क़हर बरपा जाती है
ज़ख्म-ए-दिल अब तो हर मौसम में तेरी याद भुला जाती है

अब न तो दर्द की दवा करता हूँ और न ही दर्द-ए-बेदवा पाता हूँ
ज़िंदगी कैसी हो गई हो तुम हर कदम पर तुमको बेवफा पाता हूँ

हर चेहरा एक पहाड़ सा दीखता है और आँख समंदर सा दीखता है
दिल में एक तूफाँ सा दीखता है और ज़िस्म खंड़हर सा दीखता है

मैं तो "धरम" अब रिश्तों में यूँ ही उलझना छोड़ दिया हूँ
ज़िंदगी को थाम कर तो रखा हूँ मगर जीना छोड़ दिया हूँ


Thursday, 28 November 2013

अठखेलियां करती ज़िंदगी

तुम्हारी वो मौजों भरी ज़िंदगी
मानो बीच समंदर में
जैसे लहरें अठखेलियां करती
उछलती कूदती समंदर में खो जाती

फिर दूर कहीं और किसी दूसरे तूफां के साथ 
ठिठोली करती हज़ारों रंग में जीवन के सपने बुनती 
ऐसा मानो कि इंद्रधनुष का रंग भी फींका हो 
और मौजों के ढलने पर तुम अकेले निकल जाती 

तुम्हें समंदर के गहराई का अंदाजा हो गया है 
अब तुम ज़िंदगी में किनारा ढूंढने लगे हो 
तुम तो हमेशा सफ़र में अकेले चला करते थे 
मगर अब तुम सहारा ढूंढने लगे हो 

ज़िंदगी के हर रिश्ते को जलाकर तापा है मैंने  
बुझती लौ को अपने साँसों से हवा दी है
मेरी साँसें बुझती यादों के साथ ठंढी हो गई है  
अब वो रिश्ता एक दफनाया जनाज़ा सा है 

बगैर तेरे हर रात 
तन्हाई में मैं रिश्ते को जलाता था 
रिश्ता जलता था और फिर कमरा 
तुम्हारी यादों से रौशन हो जाता था  
मगर वो यादें कब की बुझ चुकी हैं  

Sunday, 24 November 2013

डायरी लेखन

डायरी लिखने की प्रथा बहुत पुरानी है.  लेखक डायरी में अपनी दिनचर्या और आत्मकथा लिखते हैं. अपनी डायरी, अपना व्यक्तित्व और अपना ही आकलन। डायरी लिखने से लेखक का मन हल्का हो जाता है और उसे शांति मिलती है.  डायरी लिखने से स्मरण शक्ति बढती है और लेखन क्षमता में भी दक्षता आती है. स्मरण शक्ति का तात्पर्य यह है की जिस घटना या दृश्य के बारे में आप लिखना चाहते हैं वह आपको कितना याद है ? यदि पूरा याद हो तो फिर उस घटना या दृश्य के बारे में आप सब कुछ लिख सकते हैं और अगर याद नहीं हो तो फिर डायरी में जो भी लिखेंगे वह पूर्ण सत्य नहीं होगा। लेखक किसी भी दृश्य या घटना को कितने बारीकी से देखता है और उसका मूल्यांकन किस तरह करता है यह उसके डायरी लेखन से परिलक्षित होता है.  डायरी में लेखक अपनी जीवन यात्रा को कलमबद्ध कर सुरक्षित रख सकता है. अपने जीवन के कडवाहटों तथा मधुर संबंधों को अपने ही शब्दों में पिरोकर लेखक हरेक सम्बन्ध को जीवित रख सकता है. अपनी संवेदना व्यक्त करने का एक बहुत ही अच्छा माध्यम है डायरी। लेखक डायरी में अपनी गलतियों के बारे में भी लिखता है. वह  क्षण हमेशा के लिए कैद हो जाता है जब मनुष्य खुद गलती करता है और उसे उस गलती का एहसास भी होता है जो की वह डायरी के माध्यम से जीवित रखना चाहता है. बहुत लोग गलती के पश्चाताप के बारे में भी लिखते हैं। गलती मानकर उसका उचित पश्चाताप भी लेखक के जीवन दर्शन के बारे में बताता है. डायरी में लिखे अपनी गलतियों को साक्षी मानकर यह प्रतिज्ञां करता है की उन गलतियों की पुनरावृति नहीं होगी। लेखक द्वारा लिखे गए डायरी के पढने से उसके व्यक्तित्व और जीवन दर्शन के बारे में पता चलता है. लेखक का मूल्याङ्कन पाठक के बौद्धिक क्षमता पर भी निर्भर करता है. एक डायरी यदि अलग-अलग विचारधारा के पाठक पढेंगे तो वो लेखक का मूल्याङ्कन भी एक जैसा नहीं कर पायेंगें। 
डायरी लेखक की निजी संपत्ति होती है. डायरी यदि सार्वजानिक हो जाए तो लेखक की कमजोरी बन सकती है. खुद अपनी गलतियों को दूसरों के सामने बताना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के जैसा है. यदि लेखक किसी संगीन घटना का प्रत्यक्ष द्रष्टा हो और उसका उल्लेख यदि डायरी में हो तो वह उसके लिए पीड़ादायक हो सकता है. पूर्वजों की डायरी पढने से परिवार तथा समाज में द्वेष की भावना भी उत्पन्न हो सकती है. एक गलत चीज़ को एक डायरी के माध्यम से यदि कोई बुजुर्ग सही ठहराते हैं  तो उसकी अगली पीढ़ी उस चीज़ को सही मानकर फिर से वही गलती कर सकती है. एक पक्षपातपूर्ण लिखा हुआ डायरी उतना ही विध्वंशक हो सकता है जितना की पक्षपातपूर्ण लिखा हुआ इतिहास।   

Monday, 18 November 2013

दो गज़ जमीं

ये तो बस ख़ुदा की ही रहमनुमाई है
कि दो गज़ जमीं मेरे हिस्से में भी आई है
वरना हमने तो जिस-जिस को चाहा
आज वो हर एक शख्स पराई है

जो आग लगी थी मेरे दिल में कभी
अब तक कहाँ किसी ने बुझाई है
मोहब्बत बिकने लगी है पैसों पर
हद-ए-निगाह तक अब सिर्फ बेवफाई है

फैला था दामन मेरे प्यार का कभी
अब तो उसमे सिर्फ रुस्वाई है
जो झांकता हूँ यूँ किसी के दिल में
देखता हूँ "धरम"अब तो हर कोई हरज़ाई है


  

Thursday, 7 November 2013

तेरी महफ़िल

अपनी महफ़िल में मुझे बुलाओ तेरी रुसवाई कम हो जायेगी
जो तुम मुझसे करो गुफ़तगू  तो तेरी तन्हाई कम हो जायेगी

तेरी महफ़िल में ज़माने भर का ग़म था तुम्हारा अपना भी ग़म था
मगर जो बरपा रही थी तुम औरों पर बताओ वो कैसा सितम था

यूँ तो तुम्हारे कई चाहने वाले होंगे जो सराहेंगे भी निबाहेंगे भी
गर जो हो वफ़ा की बातें तो तुझे लोग झुठलाएंगे भी भुलायेंगे भी  

दूर आसमां में कभी अमावस में एक रात महताब उतरा था
बाद मेरे ज़हन में कितना दर्द उतरा था कैसा ख्वाब उतरा था

जो तुझको देखूं तो हुस्न परेशां दीखता है इश्क़ बे-निशां दीखता है
तेरी महफ़िल में "धरम" न मैं दीखता हूँ न मेरा नक़्शे-पां दीखता है

Wednesday, 6 November 2013

चलो इश्क़ लड़ाएं सनम

चलो इश्क़ लड़ाएं सनम
दिल को दिल से मिलाएं सनम

कर के झूठे वादे
एक-दूजे को झुठलाएं सनम

हँस-हँस कर एक-दूजे को
थप्पड़ लगाएं सनम

निगाह तो रहे एक-दूजे पर
निशाने कहीं और लगाएं सनम

जो मिलें तो खूब मजे उड़ायें
फिर एक-दूजे का मजाक उड़ायें सनम

जीवनभर साथ निभाने का
एक-दूजे की झूठी कस्में खाएं सनम  

प्यार आज भी है और कल भी रहेगा
इस बात पर एक-दूजे का गला दबाएँ सनम

चलो इश्क़ लड़ाएं सनम  ....

Monday, 4 November 2013

चंद शेर

1
तुम्हारे कितने यार हैं
हर जगह तुम्हारे ही अशआर हैं
हाँ बताओ तुम्हारे कितने यार हैं !

2
चराग मेरे इश्क़ का आधा जला हुआ आधा बुझा हुआ
मुझको थोड़ा उजाला कर गया थोड़ा अँधेरा कर गया

3
मत पूछ मेरे मेहबूब हाल-ए-दिल मुझसे
कहीं तेरी दास्ताँ ही न बयां हो जाए

4
लुट कर तेरे इश्क़ में मुझे चैन की नींद आई
वाह रे हरज़ाई वाह रे तेरी बेवफाई

Sunday, 3 November 2013

रिश्ता यारी का

मारी फूँक
चले रिश्ते की जान पढ़ने
बिलख उठा मन
और लगा बिगड़ने
अपने ह्रदय का स्पंदन

कौन रिश्ता ! कैसा रिश्ता !
कितना गहरा ! कितना सुन्दर !
बनकर व्यापारी
लगे बस तौलने अपनी तुला पर
एक ओर तुला पर चढ़ बैठी
अपनी बुद्दि अपना विवेक

मगर
रिश्ता पकड़ में नहीं आ रहा है
तुला का दूसरा सिरा
अब भी झूल रहा बिना रिश्ते के

बढाकर हाथ जो चाहा पकड़ना रिश्ता
फिसल कर दूर जा गिरा वो अपना रिश्ता
चिमटे के सहारे जो पकड़ा रिश्ता
उभरकर दाग आया और बड़ा कराहा रिश्ता

जो रखा तुला पर तो बड़ा घबराया रिश्ता
और लगा बुदबुदाने डंडी तुला का
अरे मत तौल उसे वो तो रिश्ता है
जिससे हो जाये वही तो फरिश्ता है

जम गई है धूल रिश्ते पर
जो झाड़ा धूल तो
साथ में ही झड़ गया रिश्ते का वो अपनापन
कर रहा अफसोश क्यूँ किया ऐसा अकिंचन

रिश्ते को दिया था नाम यारी का
लगा था झूमने वह बिना खुमारी का
मगर फिर हुआ ऐसा क्यूँ
लगे तुम खोजने फिर से नाम रिश्ते का

जिस रिश्ते का नाम यारी है
उसमे भला कहाँ कोई बीमारी है
बेसबब न ढूँढ कोई और नाम इसका
ये यारी है और यही तो ईमानदारी है

Wednesday, 30 October 2013

ख्याल-ए-मोहब्बत

एक बार फिर क्यूँ मातम सा छा गया
मेरे लहू में फिर क्यूँ ज़हर सा घुल गया

तन्हाई का दर्द मुझे फिर से लूटने लगा
जो वो फिर से याद आये तो मैं टूटने लगा

दिल मेरा एक सिकन्दर था आज रोता हुआ दिखा
आँसूं की बूंद में समंदर आज सिमटता हुआ दिखा

गुजरे वक़्त का हिसाब वो फिर से मांगने लगे
लेकर मेरी तस्वीर वो सर-ए-आम चूमने लगे

वो ख्याल-ए-मोहब्बत और शहंशाह-ए-हिन्द
बनवाकर ताजमहल "धरम" कभी भुला न सके

Tuesday, 8 October 2013

एक दिलदार भी था

पूरा समंदर पी गया मगर फिर भी प्यास न गई
कई सालों से तन्हा हूँ उसके आने की आश न गई

पहले भी मरासिम थे अब भी ताल्लुकात न गई
जो कभी चूमते थे आसमां अब भी वो ख़यालात न गई

बरसात का महीना और वो लुका-छिपी का खेल
मौसम तो बीत गया मगर वो  मुलाकात न गई

दौलत-ए-हुस्न भी था मखमली रुखसार भी था
करम-ए-यार भी था "धरम" मेरा एक दिलदार भी था

Sunday, 29 September 2013

मुर्दा और मैं

मेरे घर से मुर्दाघर की करीबी बहुत है
मैं जहाँ रहता हूँ वहाँ गरीबी बहुत है

हम हँस के जिए खूब जिए फ़ाकामस्ती किए
फिर भी जिंदगी में मजाज़ी बहुत है

कभी खुद से मिले कभी मुर्दे से मिले
हम तो हर गर्दिश-ए-दौराँ से मिले

महफ़िल में गए तो सदर-ए-मजलिस रहे
और जो तन्हाई में रहे तो घुट-घुट के रहे

गैरों के ज़ख्म भी देखे मरहम भी किये
हम जहाँ भी रहे "धरम" मुज़ाहकः से रहे

Wednesday, 18 September 2013

झूठा वादा

उसके इश्क का हरेक वादा यूँ हीं झूठा हो गया
वो जो एक सजर था अब बिल्कुल ठूठा हो गया

सूखे पत्तों की तरह इश्क का हरेक वादा झड़ गया
जो मैं सामने पड़ गया तो वो यूँ ही कट के मर गया

ताउम्र वफ़ा की बात कुछ यूँ तूफाँ के साथ उड़ गया
जो मैं कभी सामने हुआ तो मुझे देखकर मुड़ गया

घर के पुराने कागज़ में एक तस्वीर फेंकी हुई मिली
जो कभी लिपट के खड़ी थी अब यूँ बिखरी हुई मिली

ग़म-ए-हबीब का ग़म अब तो नहीं रहा "धरम"
रुसवा-ए-रकीब का मुझपर अब हो रहा सितम

Tuesday, 10 September 2013

मोहब्बत

मोहब्बत यूँ ही कोई इत्तेफाक नहीं होता
इसमें दिल तो जलता है मगर खाक नहीं होता

मोहब्बत के अपने कई सारे उसूल होते हैं
एक जिस्म दूसरे जिस्म का सिर्फ खुराक नहीं होता

तन्हाई देखी  इश्क किया  रुसवा भी हुए
दुनिया के नज़र में ये रिश्ता-ए-पाक नहीं होता

मैंने कभी मोहब्बत में इबादत नहीं किया "धरम"
इबादत के दो-चार लफ्ज़ मोहब्बत का फलसफा नहीं होता

Friday, 23 August 2013

मोहब्बत के उसूल

अब कहीं कोई बेवफा नहीं होता 
मोहब्बत भी अब रुसवा नहीं होता 
ज़माने ने बदल दिए हैं मोहब्बत के उसूल 
अब कहीं कोई बेपर्दा नहीं होता 

इश्क अब हुस्न बनकर बाज़ार में बिकता है 
अब कोई दीदावर खरीददार नहीं मिलता 
हुस्न हरेक दौलतमंद का चौखट चूमता है 
झुककर सलाम करता है "धरम"
मयवस्ल भी खुलेआम करता है

Wednesday, 21 August 2013

चंद शेर

ख़ामोशी में ये किसकी चीख सुनाई देती है
पश-ए-आइना कैसी तस्वीर दिखाई देती है 
ये मेरी जिंदगी है या मौत मेरे मौत का आलम है 
कभी रूकती है तो कभी भागती दिखाई देती है

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वो लम्हा कोई और था जाम पीते भी थे छलकाते भी थे 
अब तो "धरम" जाम परोसते भी हैं और पी भी नहीं पाते

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ग़म-ए-ज़ीस्त का हर क़िस्त अदा कर दिया
रखकर कांटे मैंने फूलों को जुदा कर दिया 
दूर तक वो पहलू अब कहीं नज़र नहीं आता "धरम"
की जिसमे सर रखकर सांस लूं थोड़ी देर सो सकूँ

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इश्क का हरेक पन्ना अब जलकर राख हो गया 
मेरी जिंदगी तो यूँ ही जलकर अब खाक हो गया 
एक बेवफा को न जाने क्यूँ ऐसी प्यास जगी 
की मेरा ही इश्क "धरम" उसका खुराक हो गया

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हजारों मतभेद थे   सिर्फ एक इत्तेफाक निकला 
उनके दर्द से हमारा वही पुराना ताल्लुकात निकला

Saturday, 17 August 2013

ये कैसा रहना

ये क्या की हर बात पर बुझा-बुझा सा रहना
इश्क के दौड़ में भी थका-थका सा रहना

ये जिंदगी तो यूँ ही मुख्तसर है
इसमें भी क्यूँ तन्हा-तन्हा सा रहना

थामकर हाथ उसका ज़माने के सामने आ जाओ
ये क्या की ज़माने से रुसवा-रुसवा सा रहना

जब देखते हो आईना तो खुद से भी मिला करो
ये क्या की अपने आप से ही छुपा-छुपा सा रहना

बाज़ार-ए-हुस्न में तुम इश्क खरीदते हो
तब भला क्यूँ "धरम" यूँ ठगा-ठगा सा रहना 

क्यूँ हिसाब मांगते हो

लगा कर फूल पलाश का तुम गुलाब मांगते हो
ये क्या की अमावस में तुम महताब मांगते हो

अपने हरेक लम्हें को तुमने तो कैद कर के रखा
तब भला क्यूँ मुझसे ताउम्र का हिसाब मांगते हो

मेरी जिंदगी के पगडंडियों में तुम सड़क ढूंढते हो
ये क्या की कतरा से दरिया का हिसाब मांगते हो  

मेरा दिल तो सीने से निकल कर बाहर आ गया है
अब भला क्यूँ तुम मुझसे रुसवाइयों का हिसाब मांगते हो

जो ज़हर तुमने लहू में चुभोया था वह पानी हो गया
अब भला क्यूँ तुम मेरे जिंदगी का हिसाब मांगते हो

दर्द-ए-दिल,दर्द-ए-हिज्र,दर्द-ए-बेवफा सब तुम्हारे ही नाम हैं
तब तुम भला क्यूँ "धरम" से हरजाई का हिसाब मांगते हो

Tuesday, 6 August 2013

धुंधले हो चले

पुराने किताबों के हर्फ़ धुंधले हो चले
जो पहले जवां थे अब बूढ़े हो चले

कोई हाथ अब थामने के लिए नहीं उठता
वो बुजुर्गों की थाथी अब कहीं नहीं दीखता

जरा सी बात पर यूँ अकड़ जाते हैं लोग
अब कोई मानवता का नाता नहीं दीखता

जो बुजुर्ग हैं अब छुपकर निकलते हैं
अब कहीं कोई पर्दा नजर नहीं आता

Friday, 2 August 2013

तुम्हारा जाना

दूर
मुझसे बहुत दूर
इतनी दूर
की अब दूरी पाटी भी न जा सके
बेसबब तुम्हारा जाना

तुम्हारा जाना
जैसे वक़्त का गुजर जाना
हाँ, मगर
कुछ कही, कुछ अनकही यादों का
हमेशा सिरहाने से लगा रहना

कमरे के दीवार-ओ-फर्श मायूस हैं
उनको पता है तुम्हारा जाना
हाँ मगर छत
अब भी तेरी सूरत को
संजोये रक्खा है
जब भी कभी ऊपर देखता हूँ
तुम्हारी सूरत नजर आती है

Sunday, 28 July 2013

धुंधला दीखता है

नींद मुझे अपने आगोश में लेकर
एक वीरां जंगल में छोड़ आया है
जहाँ से सब कुछ धुंधला दीखता है
ठीक उसी दिवा स्वप्न की तरह
जहाँ एक बेशक्ल की बाहों में मैं झूलता
जिंदगी की थोड़ी बहुत खुशियाँ महशूस करता हूँ

जब भी कभी कागज़ और पेन्सिल लेकर
उस बेशक्ल की स्केच बनाता हूँ
पता नहीं क्यूँ  स्केच पूरा नहीं हो पाता
स्केच को अधूरा छोड़कर
मैं गहन चिंतन में डूब जाता हूँ
कई तरह के विचारों का उफान
अंतर्मन झेलता रहता है

मैं भला स्केच क्यूँ बनाता हूँ
क्या हमेशा ख़ुशी को शक्ल देना जरुरी होता है ?
यह प्रश्न निरुत्तर ही रह जाता है
वीरां जंगल में सब कुछ धुंधला दीखता है

Friday, 26 July 2013

छोड़ गए

ये कैसे लोग हैं क्या शमां छोड़ गए
जिस्म तो लेते गए मगर जां छोड़ गए

Saturday, 20 July 2013

क्यों सो रहे हो...

मेरा मन न जाने कहाँ खो रहा था
ऐसा लगा कि मै अचानक सो रहा था
फिर संचार हुआ एक शक्ति का
मन में भाव आया एक भक्ति का

ऐसा लगा जैसे कि कोई कह रहा हो
और मेरे ही साथ जैसे रह रहा वो
कहता है, तुम मानव हो
तुम ही हो मेरे विशिष्ट कृति
तुम्हारी अनुपम है प्रकृति

फिर क्यों ये खेल खेला जा रहा है
मानव से मानव को तौला जा रहा है
मैंने तो सबको बनाया था समान
फिर क्यों होता है किसी का अपमान
मानवता सब जगह हो रहा है खंडित
निर्दोष क्यों हो रहे हैं दण्डित

अपनी मर्यादा का कुछ तो भान करो
मेरे इस कृति का कुछ तो सम्मान करो
बंद करो यह लूट-पाट
बंद करो यह जात-पात
बंद करो यह रंग-भेद
बंद करो यह लिंग-बिभेद
इतना कह कर वो हुए गंभीर
और मैं फिर हो गया अधीर
अगले ही पल वे विलीन
मेरा ही तेज कुछ हुआ मलीन

ऐसा लगा कि कोई झकझोर गया है
लगा अपनी भुजा का मुझ पर जोर गया है
मैं हो गया पुनः कुछ अशांत
और मन भी हो गया कुछ अधिक क्लांत...

परिवर्तन... सही या गलत

जग बदला , मन बदला , बदला जमाना कुछ ऐसा
नकली सोने को भी कहे, लगता है यह असली जैसा
लोग कहे पुरानी सभ्यता को , है यह कैसा पिछड़े जैसा
पुरानी संस्कृति के संस्कृत को , कहता है यह पिछड़े जैसा

सभ्यता गोरों का है इनके लिए आदर्श
नहीं चाहिये इनको किसी सभ्य बुजुर्ग का परामर्श
कहते हैं बदलते समय में हो रहा इनका उत्कर्ष
व्यवशायिक जिंदगी में ये तो हैं बहुत दुर्घर्ष

जिंदगी के ख्याल में है इनका अपना स्वछन्द विचार
पुरानी सभ्यताओं का बोझ इनको लगता है अत्याचार
धार्मिक स्वतंत्रता का जग में करना है इनको प्रचार
जात-पात और धर्म से उपर उठकर इनका है अपना विचार

संतुष्टि हो तन की या संतुष्टि हो मन की
संतुष्टि हो अपनेपन की या संतुष्टि हो धन की
नहीं चाहिये कोई बंदिश अपने उपर इनको
अन्यथा हो जाएगी रंजिश आपके उपर इनको

कहते हैं मिलाना है इनको एक-दुसरे का रसायन
तभी हो सकता है इनका जाकर कहीं पाणी-ग्रहण
मिलाना है इनको एक-दुसरे के सोच की आवृति
नहीं चाहिये इनको किसी पुराने प्रथा की पुनरावृति...

गिद्ध और चमगादड़

गरुड़ की खाल ओढ़े गिद्ध
सभा में नाचता
मद में फूलता
घोर गर्जन कर
छुपाता अपने पैने नुकीले चोंच
लगा है रक्त मानव का

अनेक चमगादड़ हैं उसके जासूस
रात के अँधेरे में
चुपके से घर में घुसकर देखता
कहीं कोई भर पेट खाया तो नहीं

बिलखता भूख से बच्चा
माँ की गोद में सिसकियाँ लेता
बस खाकर स्नेह की थपकी
रात्रि के अँधेरे में खो जाता
पछताता
भला यह जन्म ही क्यूँ हुआ
देखकर ऐसी बात
तृप्त होता चमगादड़

चमगादड़ ढूंढता है
कहीं कोई हो ऐसा मानव
कि जिसने पाया भूख पर विजय
पाकर ऐसी विलक्षण बात
भला चमगादड़ तब क्यूँ  छुपा रहता
सटकर कान से मानव के गुजरता
फुसफुसाता धमकियों भरा शब्द
और कराता अपने होने का एहसास

मगर वह मानव भी अकड़कर बोलता
कि मैंने पा लिया अब भूख पर विजय
लपेटकर अपने पंख में चमगादड़
मानव को डराता
पहचानो इस घुटन को
हवा मुफ्त में नहीं मिलती यहाँ
चीरकर चमगादड़ के पंख
मुक्त होता मानव
लेता जीवन दायिनी स्वांस

करता आश्चर्य चमगादड़
कि इस मरघट में यह है कौन
वह चमगादड़, मानव के
उस नस्ल को नहीं पहचानता
उड़कर चला वह गिद्ध को बतलाने
कि मुर्दा बोलता है

Monday, 15 July 2013

गुजरा वक़्त

गुजरे वक़्त का एक भी पल हँसीं नहीं देता
मैं ग़म में डूब चुका हूँ कोई ख़ुशी नहीं देता

जलते चराग को हवा का एक झोंका बुझा गया
बुझा हुआ चराग कहीं कोई रौशनी नहीं देता

उसका स्पर्श अन्तः मन को शांति देता था
अब कोई भी स्पर्श वैसी अनुभूति नहीं देता

ज़माने ने मुझपे इतनी मेहरबानियाँ की है
की अब तो कोई ख़ुशी भी ख़ुशी नहीं देता


Wednesday, 26 June 2013

प्रकृति का अपमान

प्रकृति का अपमान करते जब नर-नारी
भुवन पर होता है तब अति विपद भारी
नरता जब होता है पशुत्व में परिणत
धरा पर दीखता है मानव छत-विछत

मानवता के नाम पर जब कोई लूटता है
घड़ा विष का तब कुछ यूँ ही फूटता है
गरल न सिर्फ मानव को ही लीलता है
धरा को भी कलंकित कर वह फूलता है

जब मनुज खुद लील लेता धर्म-ग्रन्थ
तब भला क्यूँ चुप रहें दिग-दिगंत
हर ओर भयंकर यूँ ही प्रलय होगा
देव-स्थल का मरघट में विलय होगा

चुपचाप सहेगा मानव जाति ये कोहराम
मुख से तो निकल भी न सकेगा हे राम!
हर ओर व्याप्त विलाप-क्रंदन होगा
कलयुग पर मानवता का रुदन होगा 

Tuesday, 11 June 2013

फेंका गया मुझे

हर बार मेरे ही ज़ख्म में पिरोया गया मुझे
जो कराहा तो फिर से सताया गया मुझे
अपने बदन के टुकड़ों को जो मैंने समेटा
तो फिर से दुगुने टुकड़ों में काटा गया मुझे

हर बार मेरे ही लहू में डुबाया गया मुझे
जो बच के निकला तो तडपाया गया मुझे 
जंग-ए-तख़्त-ए-सियासत में यहाँ  
अपनी ही मिट्टी से मरहूम किया गया मुझे

हर बार निगाह-ए-हिकारत से देखा गया मुझे  
जो नज़र मिलाया तो बेसबब झुकाया गया मुझे 
फरमान हद-ए-निगाह से दूर जाने का दे दिया गया
जो फिर से देखा गया तो नंगा घुमाया गया मुझे

हर बार मेरे ही आग में जलाया गया मुझे
जो बुझ गया तो फिर से सुलगाया गया मुझे 
कब्र-ए-मुक़र्रर की जमीं भी न दी गई "धरम"
जो मर गया तो काट के फेंका गया मुझे

Saturday, 8 June 2013

ख्वाब देखा

उजड़े घर में फिर से पुराना ख्वाब देखा
अमावास की रात में मैंने आफताब देखा
धडकता पत्थर फिर से दिल हो चला था
उसके लौटने का मैंने फिर से ख्वाब देखा

डूबने का डर

मुझे उसके जाने का डर लगा रहता है
ख्वाब में भी उसके पर लगा रहता है
वो मुस्कुराये फिर भी न जाने क्यूँ
मुझे अनजाना सा डर लगा रहता है

बातें उसकी मेरे समझ में नहीं आती
इश्क में भी गुरुर-ए-हुस्न नजर आता है
रिश्ता-ए-पाक-ए-मोहब्बत में भी "धरम"
मुझे तो अब डूबने का डर लगा रहता है

Saturday, 25 May 2013

"चंद शेर"

1.
आओ अब कहीं दूर चलें
बाँहों में बाहें डालें झूमें, इठलायें 
भर किलकारी खूब हसें 
सारे ग़म को झुठलायें 
आओ अब ...

2.

मुक्कमल है तुम फिर याद भी आओ 
मगर वो सिर्फ अजनबी अहसास ही होगा 
बेसबब तुम्हारे रूठने का सबब "धरम"
मेरे लिए तो सिर्फ बकवास ही होगा

3.

तन्हाई से डर नहीं लगता सूनापन काटता भी नहीं
दर्द खुद बन गया है दवा अब तो दिल दुखता भी नहीं

4.

सुलगता जिस्म था आखों में लहू उतरा था 
सीने को चीरकर दिल बाहर निकला था

5.

उस वीरां सन्नाटे को दिल से लगाया 
आहिस्ता आहिस्ता धड़कन ठहराया 
बहार की बू न आए उससे 
ये सोचकर दिल फिर घबराया ...

6.

उजड़े हुए खंडहर को महल बनाते हैं 
हम बीते हुए कल को वापस बुलाते हैं 
पुरानी बीती बातों को समेटकर अब 
हम फिर से अपना युगल बनाते हैं 

7.

दामन छूट भी जाये तो भी चराग-ए-इश्क जलाए रखना 
गर मन का दिया बुझ भी जाये तो दिल को जलाए रखना 

8.

समंदर के जैसा ही तेरा प्यार भी बेसहारा निकला 
देखने में तो दरिया था मगर चखा तो खारा निकला


Sunday, 5 May 2013

मिट्टी


सुबह का नाश्ता लिया भी नहीं
काम का वक़्त हो चला था
कुदाल कंधे पर लेकर वह
खेत की ओर चल पड़ा

मिट्टी कोड़ना कोई आसन काम नहीं
हर एक प्रहार पर वो उतना कटता था
जितनी की मिट्टी नहीं कटती थी
उस मिट्टी से उसका माँ का रिश्ता था

वो जानता था माँ अपने बच्चे को
कोई भी कीमत अदा कर के पालती है
हम सब इस मिट्टी की संतान तो हैं
और वो आंसू पोछ लेता था

वक़्त हो चला था मिट्टी को पानी पिलाने का
मिट्टी भींगी है सेंधी खुसबू बिखेर रही है
वह मिट्टी में पूरा यूँ सना हुआ था
जैसे मानो माँ की आँचल से लिपटा हो

अब बारी थी बीज छिडकने की
बीज भी तो मिट्टी के अंक से ही निकला था
फसल यूँ लहलहाया जैसे कह रहा हो
भला माँ भी कभी अपने बच्चे से नाराज़ रहती है

अब वक़्त है फसल काटने का
मिट्टी खुश है,अपने बच्चे का आहार देखकर
वह खुश भी है और थोडा सिसक भी रहा है
इस फसल के बाद उसे ही तो
फिर से चीरना है मिट्टी के सीने को

Saturday, 27 April 2013

यादें


मैं वो यादें ले आया हूँ
जो तुम वहां छोड़ आई थी
तुम खुद से दफ़न कर दो इसे

मैं जब भी कभी
अपने जमीर की मिट्टी खोदता हूँ
मेरा हाथ कांपता है
यादों का कोई कद-काठी नहीं है
कब्र कितना लम्बा
कितना चौड़ा और कितना गहरा होगा
मुझे इसका कोई अंदाज़ा नहीं है

Wednesday, 24 April 2013

कैसा शहर

ये कैसा शहर है कि यहाँ बुत भी है परेशां 
दिल है पत्थर का और शीशे का है आशियाँ 

हर मजार पर रौशन है चमकता रहता है
और मन ही मन इन्शां दहकता रहता है 

वो खड़ा है लूटने फ़क़ीर को हर मोड़ पर यहाँ 
इन्शां के शक्ल में भेड़िए बच के जाओगे कहाँ 

दरख़्त की छाहँ भी किसी के जागीर में बसती है 
इस शहर में "धरम" कहाँ किसी इन्शां की हस्ती है

Sunday, 7 April 2013

बलात्कार के नए कानून पर एक टिपण्णी


बलात्कार एक जघन्य और घृणित अपराध है . संसद द्वारा बनाये गए बलात्कार के नए  कानून , जिसमें की अपराधी को आजीवन कारावास या मौत की सजा हो सकती है , से मैं सहमत हूँ .

किसी का पीछा करने को भी जुर्म माना गया है और इसके लिए अधिकतम सात साल की  सजा मुक्कर्रर की गई है. यह भी बिलकुल सही है. किसी को किसी की पीछा करने का कोई अधिकार नहीं है और होना भी नहीं चाहिए.

हमारे देश के कानून में जुर्म की सजा आर्थिक दंड / जेल / मौत है. जब जेल जाना एक सजा है तो किसी को झूठे आरोप में जेल भिजवाना भी एक "जुर्म" होना चाहिए.यदि किसी पर बलात्कार जैसा जघन्य और घृणित आरोप लगता है तो उस व्यक्ति को पुलिस अपने हिरासत में ले लेती है और अक्सर आरोपी को जेल भेज दिया जाता है. यदि यह आरोप बाद में गलत निकलता है तो माननीय न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति को आरोपमुक्त घोषित किया जाता है और यदि वह जेल में है तो जेल से रिहाई का आदेश दे दिया जाता है. बाद में वह व्यक्ति यदि चाहे तो मानहानि का मुकदमा न्यायालय में दर्ज कर सकता है. उस मानहानि पर न्यायालय तय करेगी की पुरुष (पुरुष लिखने का तात्पर्य यह है की सामान्यतः महिला ही पुरुष पर बलात्कार का आरोप लगाती है) के इज्जत का कितना आकलन होना चाहिए ?

मैं उस पुरुष के मनोस्थिति के बारे में सोचना चाहता हूँ जिसपर कोई बलात्कार का झूठा आरोप हो और वो जेल में हो. उसके लिए जेल जाना भी एक मानसिक बलात्कार ही तो है. वहां उसकी  सारी स्वतंत्रता खत्म हो जाती है. वह व्यक्ति वहां बार-बार मरता है. जब भी कभी समाज की बात उसके दिमाग में आती होगी तो वह जरुर सोचता होगा की न्यायालय से तो उसे आरोप से मुक्ति मिल ही जाएगी मगर क्या समाज में फिर से वही इज्जत ,वही सम्मान, वही प्रतिष्ठा मिलेगी ?? इस तरह की मानसिक पीड़ा और बलात्कार से वह व्यक्ति जूझता रहता है. किसी महिला का बलात्कार जो की संभवतः आधे घंटे में पूरा हो जाता होगा उससे कई गुणा ज्यादा समय तक उस पुरुष का जेल में मानसिक बलात्कार होता है.

यदि बलात्कार का आरोप झूठा साबित होता है तो जिस व्यक्ति (महिला/पुरुष) ने किसी पर बलात्कार का झूठा आरोप लगाया है उसके लिए भी क्यूँ नहीं एक निश्चित सजा मुकर्कर की गई ?? झूठा बलात्कार का आरोप लगाना भी बलात्कार करने जैसा ही एक जुर्म माना जाना चाहिए. झूठा बलात्कार का आरोप लगाने वाले/वाली को भी क्यूँ नहीं आजीवन कारावास हो या क्यूँ नहीं उसे भी मौत की सजा सुनाई जाए और यह सजा उस निर्दोष व्यक्ति के मानहानि के आरोप लगाने पर नहीं बल्कि कानून में ही होना चाहिए की यदि बलात्कार का आरोप झूठा साबित हुआ तो आरोप लगाने वाले/वाली व्यक्ति को भी पता चलना चाहिए की झूठा बलात्कार का आरोप भी बलात्कार के जैसा ही एक जुर्म है.

यह लेखक का अपना स्वतंत्र मत है.

Tuesday, 2 April 2013

प्यार मांगता है


वह कौन है जो मुझसे मेरा हिसाब  मांगता है
मेरे ख्वाब में आकर मेरा ही ख्वाब मांगता है

मैं जब भी रूठता हूँ वो मुझे मनाता है
और रूठने का मुझसे मेरा अंदाज़ मांगता है

चांदनी रात  ठंढी हवा  झील का किनारा
वो कौन है जो मुझसे मेरा प्यार मांगता है

घर की दीवार  दरख़्त की छाल और मानसपटल
वो कौन है जो मेरा नाम  नाम-ए-यार मांगता है

चेहरे पर मासूमियत  दिल में प्यार   बांह पसारे
वो कौन है जो लिपटने को मुझसे बार-बार मांगता है

वो हुस्न की अंगड़ाई  इश्क की गहराई "धरम"
भरे बाज़ार मुझसे सिपहसलार मांगता है

वो कौन है जो मुझसे मेरा प्यार मांगता है...


Monday, 1 April 2013

"अप्रैल फूल"

"अप्रैल फूल" का मजा ही अलग है .. अलग क्यूँ न हो इसमें पश्चिमी रंग जो है.. जी हाँ अपने देश में रहने वाले कुछ लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति से घोर असंतुष्टि है.. उनका मानना है की विदेशी रंग ही असली रंग है बाकि अपना रंग तो फींका है..कुछ लोग तो "फूल" का मतलब "पुष्प" समझते हैं और "बिपरीत लिंग" वाले मित्र को पुष्प अर्पित करते हैं और फिर उस पुष्प को पुष्पांजलि भी दे देते है और कहते हैं की ये "अप्रैल फूल" था..

मत खेल प्रिये


क्यूँ खेले है तू खेल प्रिये
अब दिल में कहाँ है मेल प्रिये
रख कर तुम वो वादे झूठे
क्यूँ ढूंढे है तू खुद में सच्चे

मुफलिस हूँ मैं खड़ा सड़क पर
देखता रहता तुझको छुपकर
रहना है किस्मत से दूर
हो गया मुझे ये भी मंजूर

Wednesday, 27 March 2013

प्रेमी-प्रेमिका की गोपनीय बातें


प्रेमिका प्रेमी से : तुम्हारा दिल पत्थर सा क्यूँ है ?
प्रेमी प्रेमिका से : तुम ही कहती थी न की दिल यदि पत्थर सा होता तो इसके टूटने का डर नहीं होता
प्रेमिका प्रेमी से : धत्त ये मैं तेरे लिए थोड़े न कही थी
प्रेमी प्रेमिका से : तो क्या तुम अपने लिए कही थी ?

प्रेमिका प्रेमी से : खैर जाने दो ... तुम तो यूँ ही बात बनाते हो.  अब तुम ये बताओ की तुम कभी-कभी गधे की        
                          तरह क्यूँ करते हो ....मुझे अच्छा नहीं लगता है...
प्रेमी प्रेमिका से : मुझे जब भी एहसास होता है कि तुम आज गधी कि तरह लग रही हो तो मैं सोचता हूँ कि अब
                        तो मुझे गधे के  तरह ही बात करना पड़ेगा नहीं तो तुमको बुरा लगेगा न !!

प्रेमिका प्रेमी से : तुम मुझे कभी-कभी गिद्ध कि तरह क्यूँ घूरते हो ?
प्रेमी प्रेमिका से :  जब तुम कोयल कि तरह सजकर कौवे की तरह बोली बोलती हो तो मुझे लगता है की मुझे
                          भी एक पक्षी की तरह ही व्यव्हार करना चाहिए...

प्रेमिका प्रेमी से : तुम बिल्कुल उल्लू हो ....
प्रेमी प्रेमिका से : हाँ ! यदि मैं उल्लू न होता तो मुझे ये कभी पता नहीं चल पाता की रात के अँधेरे में तुम मेरे
                         अलावा और कितनों से मिलती हो ...

प्रेमिका प्रेमी से : मेरी एक सहेली कविता (काल्पनिक नाम) का प्रेमी कितना अच्छा है .. वह उसकी हरेक बात
                         मानता है.."ही इज सो क्यूट"..
प्रेमी प्रेमिका से :  मुझे तो तुम्हारे अलावा अपने सारे मित्रों की प्रेमिकाएँ बहुत अच्छी लगती है.. पता नहीं
                         भगवान ने तुम्हारे अलावा बाकी सबों को इतना अच्छा क्यूँ बनाया... "ओह माई गॉड" !!!

Tuesday, 26 March 2013

हरजाई

तुम तो मुझे जिंदगी की दुआ न दो 
तुम हरजाई हो मुझे झूठी वफ़ा न दो 
रिश्ते जोड़ना रिश्ते तोडना 
तुम्हारे लिए खेल सतरंज सा है
प्यार तो ऐसा है की सिर्फ रंज सा है 
उससे वफ़ा की बात पर "धरम" 
अब तो हर सक्श तंग सा है

Friday, 15 March 2013

कमर टूट जाती है


मेरी कमर टूट जाती है
उधारी की लाठी पकड़कर खड़ा होता हूँ
मगर जब फ़क्त सूद
मूलधन से जियादा हो जाता है
मेरी कमर टूट जाती है

सड़क के किनारे खड़ा होकर
कातर निगाह से
बड़ी बड़ी गाड़ियों में झांकता हूँ
शाही कुत्तों को देखता हूँ
मेरी कमर टूट जाती है

महंगाई की मार ऐसी  है
की मुझ मुफलिस के पास
न "वायफ" है न "तवायफ" है
खाली थैली और खोखला दिल
हाँ मेरी कमर टूट जाती है

Saturday, 9 March 2013

जिंदगी और रिश्ता


औरों के शिकस्त पर मुस्कुराना ठीक नहीं
खुद अपनी शिकस्त पर रोना  भी ठीक नहीं
जिंदगी है, यह बहुत कुछ दिखाती है
यह कर्म भूमि भी यह धर्म भूमि भी
यह कर्त्तव्य भूमि भी यह रणभूमि भी

यहाँ रिश्ते बनते भी है टूटते भी हैं
कुछ रिश्ते गांठ के सहारे चलते भी हैं
अर्थ के नींब पर टिके रिश्ते
जरा सी चूक पर बिखर जाते हैं
कुछ ठिठुरते रिश्ते कुछ उबलते रिश्ते
मानो शर्द भी गर्म भी और हवा भी
मन यूँ उलझता है कि अब क्या करें


प्रेम की परिभाषा भी कुछ बदल सी गई है
जैसे मानो की प्रेम कोई व्यापार हो
आह!अगर प्रेम निःस्वार्थ और निश्छल हो
तो जीवन सुखी भी और सफल भी हो

Wednesday, 20 February 2013

चंद शेर

1.

गुजरे वक़्त में मैंने खुद को कुछ यूँ तलाशा 
जैसे डूब रही हो नैया और छूटती हो आशा ...

2.

मिले तो मुलाकात के कीमत वसूल गए 
खुद हसें और मुझको रुला के चले गए ...

3.

उसने मुझे तन्हा देखा अधूरा समझा 
मिला भी तो कहाँ कभी पूरा समझा ...

4.

तन्हाई की रात थी बहुत देर से गुजरी
ख़ामोशी रौशन थी और साँस थी ठहरी ...

5.

इश्क में रूठना, नाराज़ होना अदाकारी होता है 
जाम अगर न छलके तो कहाँ खुमारी होता है ...

6.

महफ़िल सजी और मेरे इश्क का जनाज़ा निकला 
हाय "धरम "ये कैसा प्यार का खामियाजा निकला

7.


खतरों का सिलसिला उसने जारी रखा 
मुफलिसी में भी इश्क का बीमारी रखा 

8.


अब तो यहाँ हर जगह  इन्शां बिकते हैं 
मगर फिर भी उसने अपना एतवारी रखा 

Tuesday, 12 February 2013

तन्हाई भी न रही


मोमबत्ती की मद्धिम रौशनी थी
सामने आइना था
मैं खुद को तलाश रहा था
तन्हाई मेरे बगल से गुजरी थी
चेहरे पर नकाब लिए
मैंने रोका उसे
बोला तू तो मेरी अपनी है
तू मुझसे दूर क्यूँ है
वो बोली
अब तन्हाई भी तेरी अपनी न रही

Saturday, 2 February 2013

लकीर


मेरा प्यार था दरिया था बह गया
तेरी खींची लकीरें को पार कर गया
वापस आया तुम्हें छू कर आया
कुछ यादें समेट कर साथ लाया

तेरे हुस्न की गर्मी से
तेरे अश्क सूख गए हैं मगर
यकीं है तेरे दिल का रूखापन
जरुर थोड़ा गीला हुआ होगा

Wednesday, 30 January 2013

मैंने अपनाया है


बिखरे हुए रेत को मैंने फिर से सजाया है
वो लौट आई तो मैंने उसे फिर से अपनाया है
हाँ उसकी यादों को मैंने रह-रह के भुलाया है
मगर वो जब भी तन्हा थी उसे मैंने हँसाया है

Friday, 25 January 2013

इमां टूट गया


जिक्र-ए-यार हुआ
और ज़ख्म हरा हुआ
हाय! ये तेरी याद ने
सारे ग़म रौशन कर दिए

हुस्न भी था इश्क भी था
और मेरी वफाई भी थी
हाँ तेरे ही दिल में
मगर कुछ रुसवाई भी थी

दरख्त से कोई जवाँ पत्ता
बेमौसम क्यूँ टूट गया था

लहर तो यूँ उठा मानो मैं समंदर था
देखी तेरी वफाई तो कतरा भी न रहा
वो थी उसकी वफाई भी थी  "धरम"
मगर अब मेरे हिस्से उसका वो इमां न रहा




Wednesday, 16 January 2013

चंद शेर

1.

मुलाकात का मसला है 
जज्बात का मसला है 
दिल फिर से फिसला है 
मगर न जाने क्यूँ 
कदम पत्थर सा हो गया 
अब आगे बढ़ता ही नहीं

2.

मेरे मरने के बाद याद आई मेरी यारी 
वह रे तेरी यारी वह रे तेरी तलबगारी

3.

हिज़्र का फिर से मौसम आया 
वो तन्हा रोया ज़ार-ज़ार रोया 
अश्क की बूंदें समेटी 
नाम-ए-यार लिख दिया 
जीनतकद: वीरां हो गया 
दिल फिर से परीशां हो गया 

जीनतकद:- प्रेयषी का घर

4.

वो जो चाँद बन के मिली थी तू 
तू अज़ीज थी मेरे करीब थी 
ये गिला तुझसे क्यूँ हो गया
मेरा चाँद तन्हा फिर हो गया

5.

पुराने वादों का सफ़र अभी बाकी था
वो फ़िक्र-ए-यार भी अभी बाकी था 
मैं चला गया था अकेले उस गली की तरफ 
जहाँ उसके साथ जाना अभी बाकी था

6.

उदासी चेहरे से उसकी छुपी ही नहीं 
नज़र यूँ झुकी कि फिर उठी ही नहीं
वो खुद परेशां थी जुबां भी खामोश थी 
बस सिसकियों ने ही तो कुछ कहा था 
अश्क था या समंदर पता ही न चला 
गहरा इतना कि मैं माप ही न सका 
मैं बहता चला गया संभल ही न पाया 
डूबने लगा तो सहारा उसके बाहों का ही था







Sunday, 6 January 2013

चंद कदमों का सवारी


उम्र भर का साथ
रक्खा तो सही उसने निभाया ही नहीं
मिलकर साथ चले थे
मैं गिर पड़ा उसने उठाया ही नहीं
मैं खुद उठा चल पड़ा पास पहुंचा
मेरी आहट को उसने पहचाना ही नहीं

मेरा भरम अभी जिन्दा था
सामने ही मेरे वो परिंदा था
हाथ पकड़ा नाम पूछा
झटका हाथ मेरा और जुबां खामोश

मैं उसके साथ था खामोश था उदास था
अचानक एक और लम्हा आया
हलक में जाँ मेरी अटक गई थी
वो गैरों की बाँहों में लिपट गई थी

मेरे जज्बात पर हुस्न उसका भारी था
मैं तो बस चंद कदमों का सवारी था